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गुरुवार, 7 सितंबर 2023

जन्माष्टमी विशेष





 कृष्ण,

हम सनातनियों....अरे ये गलत कहा मैंने....सनातनी नहीं तथाकथित हिंदू....अपनी सुविधानुसार कृष्ण का नाम , छवि का उपयोग किसी की रंगीली छवि या कूल ड्यूडवाली #प्लेबॉय छवि के लिए करते हैं। 


आश्चर्य होता है की कि उनका नाम; उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व या कृतित्व को भूलकर कुछ पढ़े- लिखे अनपढ़ अपने गलत कार्यों या सोच को उच्च दिखाने के लिए बोलते। हास्य...... नहीं नहीं मुझे तो रणनीति लगती ,एक ऐसी छवि को दूषित करने के लिए जिसके अनुयाई सिर्फ भारत में नहीं , वरन पूरे विश्व में संभवतः सबसे अधिक होंगे। 

 इस तुलना करते वक्त हम भूल जाते हैं कि कृष्ण होने का अर्थ ; यातना सहते हुए मां की कोख से जन्म लेकर तुरंत उनसे दूर होना था... जब पालक के स्नेह में आकंठ डूबे थे तो जन्मस्थल के प्रति कर्तव्य हेतु उन्हें अपनी यशोदा मां , साथी ग्वाल बाल ,गोपियां और प्राणवल्लभा राधा को छोड़ना पड़ा...

गोकुल छोड़ा फिर मथुरा के होके भी नहीं रह पाए ।

कुछ न कुछ छूटता ही रहा... नहीं  छूटा तो ईश्वर होकर भी सीमाओं को निभाते हुए कर्म और कर्तव्य करते हुए सदा अधरों पर खिलती उनकी मोहक मुस्कान । 


हर स्थितियों में जीवंतता को बनाए रखना , कभी हार नहीं मानना यही तो कृष्ण ने अपने जीवन में दर्शाया और सिखाया.....भावों से पूर्ण होकर भी कर्म हेतु सम्पूर्ण त्याग।

आसान नहीं थी ये यात्रा ...... राम से चलकर कृष्ण होने की पूर्णता जीना...।

राम राजा हैं ,कृष्ण राज्य के स्थापक। राम ने मर्यादा से बांध कर रखा स्वयं को .....कृष्ण मर्यादा की सीमा को बांधना सिखाए ...उसके बाद दंड का प्रावधान भी...शिशुपाल याद है ना। 


राम रण में अपनों के लिए बिलखते हैं ,अस्थिर चित्त होते हैं ,कृष्ण अपने सबसे प्रिय की भी आहुति से पीछे नहीं हटते। अभिमन्यु याद है ना।


राम ने स्वयं को माया के बस हो जाने की मर्यादा रखी , और कृष्ण ने भ्रम को तोड़ने की चेष्टाएं। पूतना ,बकासुर याद हैं ना।


राम सामाजिक मूल्यों के लिए लड़ते हैं, कृष्ण समाज में मानव के अधिकार के  लिए....... पांडव याद हैं ना..


 राम ने लोक के लिए एक स्त्री - स्वयं की पत्नी को त्यागा..और कृष्ण से लोक से त्याग की स्थिति की स्त्रियों को पत्नी का स्थान दिया... १८, ०००रानियां याद हैं ना। 



कृष्ण ने सदैव धर्म को कर्म से निभाकर आदर्श स्थिति स्थापित की।  सर्वशक्तिमान होने पर भी एक दुखी मां के श्राप को सहर्ष स्वीकार किया। क्योंकि वो धर्म स्थापना की उनके वंश के विनाश का कारण होना था। 


वो क्या था की बांसुरी से ही सबको मोहित करने की क्षमता वाले कृष्ण ने सदा के लिए बांसुरी त्याग दी थी? देह से अलग आत्मिक प्रेम की पराकाष्ठा का उदाहरण , त्रिकाल दर्शी होने पर भी वर्तमान के अनुरूप व्यतीत होना....विनाश के फन पर लास्य का आनंद जीवित रखना .... प्रतिपल त्याग करते हुए भी स्वयं में सृष्टि हो जाना ....ये कृष्ण हैं। 


तो अब जब भी कृष्ण से तुलना कर स्वयं को सही सिद्ध करने का प्रयास करें तो एक बार स्मरण करिएगा की रास रचैया क्यों योगेश्वर होकर

*महाभारत* के सारथी हुए । और जब आप स्वयं इन प्रश्नों के उत्तर खोज लेंगे तो अपनी तुलना की चेष्टा क्षुद्र प्रयास लगेगा।

*कृष्ण का जीवन आत्मसमिधा- आत्महवि का सफल कार्मिक यज्ञ है*।



जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

#ब्रह्मनाद

#डॉ मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी 

मंगलवार, 29 अगस्त 2023

रक्षाबंधन विशेष अगस्त २०२३


 

होssssss
कभी भैया ये बहना ना पास होगी,
कहीं परदेश बैठी उदास होगी।

बचपन में इस गीत को सुनकर मैं और छोटा भाई  आंसू बहाकर इमोशनल दिखाने का नाटक करते फिर दोनों ही बहुत हंसते थे। उस दिन हमारी लड़ाई होना भी तय  होता था। एक दूसरे से मुंह फुलाए राखी नहीं बांधने - बंधाने की धमकी और अंत में मेरे भैया लिखी हुई बड़ी सी चमकीली फोम वाली राखी बांधने की धमकियास्त्र से राखी की शुरुआत होती। तब दिन अलग थे, हम साथ थे ,एक जगह ,एक छत के नीचे। जीवन में संघर्ष के नाम पर बस पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करना और सबसे आगे रहना ही पता था। राखी गीत ;तब हम दोनों को एक दूसरे को खिजाने का साधन थे। ना तब उन गानों की गहराई समझते ना ,ना ही उसके शब्दों से ज्यादा भाव ग्रहण करने की स्थिति।
खूब मार कुटाई करते एक दूसरे के साथ।कहने को भाई मुझसे छोटा पर लड़ते हुए दोनों बराबर के बन जाते। मां से सजा मिलने पर भी ढीठ जैसे एक दूसरे को चिढ़ाते और सजा की तीव्रता और पीड़ा को कम करने का उपाय भी ढूंढ कर एक दूसरे को बताते। जैसे की गर्मी की तपती छत पर बिना स्लीपर के खड़ा करने की सजा मिलने पर छत पर गिरे पत्तों को इकट्ठा कर पैरों के नीचे रखकर राहत पाना......... और भी बहुत कुछ यादें इस राखी के त्यौहार के आते ही महकने लगती । तपती धरती पर गिरी पहली बारिश के बाद की सौंधी सी खुशबू जैसी। जो बेचैन भी करती ,सुखद भी लगती।
समय के पहिए की बदली चाल से आज राखी के दिन भी  अपनी- अपनी जिम्मेदारियों के चलते हम दोनों बहुत दूर हैं। रास्ते में गुजरते हुए या नेपथ्य में चलती TV में राखी गीत बरबस ही आंख नम कर जाते । कभी भैया ये बहना ना पास होगी, कहीं परदेश बैठी उदास होगी, अब बस गाना नहीं बचा ,बल्कि वो भाव बन गया जो सबकी नजरों से बचाते हुए नम आंखों की कोरों से चुपके से ढलक कर गालों  तक अनायास ही चला आता। अब उन गानों को सुनकर हंसी नहीं आती, टीस उठती है ,की जिम्मेदारियां कितनी बड़ी हो जाती कि एक रिश्ते की डोर के दो सिरों पर जुड़े दो लोग चाह कर भी नहीं मिल पाते।
सच में कई राखियां अब इन गीतों को सुनकर बस गालों पर बनी आंसुओं के चिन्हों के साफ करने पर गुजर जाती।
बचपन की लड़ाइयां अब नाजुक एहसास का खजाना लगते। राखी से जुड़ी यादें ,वो उत्साह..... सपने होकर भी सबसे कीमती दौलत लगते। अब अगर किसी राखी में भाई पूछेगा की क्या चाहिए तुम्हें तो बोलूंगी एक बार ही सही वो बचपन की राखी का एहसास वापस ले आओ।

सच में राखी बचपन की मासूमियत समेटे ,सबसे खूबसूरत वक्त की थाती जैसे सुरक्षित रखने वाला त्योहार है।जिसके रेशमी धागों के स्नेह और शीतल स्पर्श को लाखों  शुभकामनाओं और आशीर्वाद के साथ अपने भाई की कलाई में हर साल खुद सजाना हर बहन की चाहत होती है।
खैर आज भाई से दूर बैठी हर बहन की तरफ से यह कामना करूंगी कि बहन की राखी; भाई की याद में नहीं ,बल्कि भाई के साथ में ही बीते । गानों के अर्थ भी समझे जाए पर भाई और बहन के साझे स्नेह के सानिध्य में। जिसमें अपने भाइयों की अपनी  नजरों से बलाऐं उतारते हुई बहने लाड़ ने भरकर शगुन के लिए लड़ें ,मनुहार करें , और भाई को राखी से लिपटे ढेरों सद्भावी कामनाओं और रिश्ते की मिठास से हमेशा परिपूर्ण रखें।
मेरे भाई सहित सभी बहनों के भाईयों की खुशियों और सफलता की कामना करती हूं और सभी के लिए  इस पर्व की निरंतरता अक्षुण्य रखने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हूं.....
गुनगुनाते हुए........
चंदा रे ,मेरे भैया से कहना .....
बहना याद करे। 🙂

तुम्हारी बहन
#गुड़िया
#ब्रह्मनाद
#डॉ_मधूलिका

शनिवार, 10 जून 2023

खुशियों का खग्रास


 घनीभूत पीड़ाओं के विषम ज्वार..... 

नहीं होते नियंत्रित ,चांद की कलाओं से।

जीवन के उतार-चढ़ाव,

अक्सर दोहराए जाते,

शापित हो अनुप्रासों में।


अनचाहे ही अक्सर ये डुबो जाते,

काली पुतलियों से सजे ,

एक जोड़ी सफेद कटोरों को,

एक नमक से भरे ,खारे एहसासों में।।


कई अनमनी अभिव्यक्तियां सहसा,

रोक ली जाती हैं ,होंठों के कोरो पर आकर,

बहुत कुछ छुपा कर ,

दर्द झलक ही जाता,बदनुमा से दागों में।।


चीत्कार कर उठती जब आत्मा,

कई मूक यंत्रणाओं में,छलक ही उठता प्रमाद,

लाल डोरों से चमकती ,

आंखों की चिंगारियों में।।


संघनित, ऊष्मित ...

आत्मिक घावों से रिसती मवाद,

थिरने लगी है अब ,कही गहरे , 

किसी तलहटी को तलाशते ,

जहां ना शेष हो कोई अवसाद,

बैचेनियों को मिले, 

सासों का अंतिम ग्रास ,

क्या सांसों संग ही अब पूरा होगा,

जीवन के खुशियों का खग्रास ।


#डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद 

सोमवार, 5 जून 2023

अनन्त


 तुम मेरी सोच में रहते हो ,या मैं तुम्हारी सोच में जीती हूँ। हर वक़्त तुमको सोचती हूँ ,या सोच की वजह से ही मैं रहती हूँ।

यहां वाक्य नहीं भावना महत्वपूर्ण है। किसी के होना , उसके लिए सोचना ,उसे याद करते रहना ही किसी का जीवन बन जाता है। 

एक विद्वान का कहना था कि "ईश्वर और मनुष्य ने एक दूसरे को देखा और दोनों के मुँह से निकला कि अहा, मेरी कृति".... । मनुष्य को अपनी क्षमता से परे जाने के लिए ,अपनी असफलता के दुखड़े को रोने के लिए, आगे बढ़ने की आस बनाए रखने के लिए एक स्तम्भ चाहिए होता। इसलिए उसने ईश्वर को गढ़ा। फिर तर्क आता कि हमें किसने गढ़ा.... ईश्वर /पराशक्ति।जिसे हम परिभाषित न कर सकें, जिसके आगे हमारी सोच न जा सके, जिसके होने से ही हमें अपने अस्तित्व का आसरा मिला...... वही ईश्वर। पता नहीं हमने गढ़ा या वो था या है या हमने ढूंढा। बस आस्था के अनुसार हम उसी का हिस्सा ,और वो हर वक़्त हममें रहता। आस्था में तर्क नहीं होते। इसलिए हम कभी खोजने का प्रयास ही नहीं करते।

अगर वो नहीं होता ......तो जिक्र ही नहीं होता....और अगर वो है तो अन्य किसी बात की फिक्र ही कहाँ.... । 

निश्चित ही प्रेम भी किसी घोर आस्तिक की उपज है। जिसने माना कि प्रिय के बिना हम कुछ नहीं। उसका होना ही हमारा होना है।हमारे सुख ,दुख ,प्रमाद ,अवसाद सबसे उससे ही शुरू ,उससे ही खत्म.... । प्रेम में हम जिसकी वजह से हैं, वो हमारे ही वजूद का एक अंग जिसके बिना जीवन नहीं। मानिए जैसे संसार और जीवन। एक दूसरे के हिस्सा और एक दूसरे बिना अस्तित्वहीन। अगर जीवन न हो तो इस निर्जीव संसार की परिकल्पना इतनी अद्भुत और रोमांचक कहाँ लगने वाली!!!! और अगर ये संसार न हो तो जीवन कहाँ से आएगा। 

तभी तो अनंत की परिकल्पना एक लेटे हुए 8 जैसी है। गूंथा हुआ ....ऐसा जिसका छोर न खोजा जा सके। कहाँ शुरू हुआ ,कहाँ खत्म ये ज्ञात ही नहीं होता। यही तो प्रेम का भी संकेत.... प्रेमी और प्रेमिका ,जीवन और संसार से..... कौन किसमें कुछ नहीं कहा जा सकता। ये चक्र भी अनन्त है, संसार के अस्तित्व की तरह.... जहाँ स्वयं 0 होकर भी अनन्त की परिकल्पना को सार्थक कर लिया जाए.... वही ब्रम्हांड है ....वही संसार .....वही प्रेम है। 

#डॉ_मधूलिका 

#ब्रह्मनाद

गुरुवार, 1 जून 2023

नदी और जीवन का मौन


 धीरे-धीरे चुप हो चली हूँ। अगर काम और बच्ची के लिए बात करना मजबूरी न हो तो शायद दिन भर में 1 वाक्य भी ना बोलूं। शुक्र है कि इस दौर की सुविधाओं में मोबाइल के जरिये सन्देश भेज कर बात कह देने का विकल्प आ गया,वरना मन मार कर बोलना पड़ता ही। 


कभी हमेशा हंसती थी। शायद ही कभी चेहरे की मुस्कान वाली मांसपेशियों को राहत मिलती रही हो। तकलीफ भी रहे तो पता नहीं क्यों ये मुस्कान अपना ठिकाना नहीं छोड़ती थी। ढीठ किरायेदार की तरह मकान खाली करने को ही तैयार न होती थी।साथ ही ये संक्रामक भी हुआ करती थी....दूसरों को भी मुस्कुराते रहने की बीमारी लगा ही देती थी।

पता नहीं कब अचानक अंदर से जीवंत सी नदी गायब ही हो गई। नदी जीवंतता की निशानी होती हैं।उछलती ,मचलती ,कभी पूरे पाट पर फैली,कभी एक छोटे से जगह से भी रास्ता तलाश लेती। पत्थर रास्ते मे हों तो उससे भिड़ती नहीं,किसी न किसी तरह पार कर ही लेती। विपरीत स्थिति में सिकुड़ जाती तो वक़्त आते ही वापस अपना यौवन पा कर वर्जनाएं तोड़ कर बढ़ जाती।अब वो जीवंत भाव खुद में सागर में बदलता महसूस हो रहा।जैसे कहीं गहरी खोती चली जा रही हूँ।कभी ज्वार भाटा की तरह भावना उमड़ भी जाती तो ऊंचाई से उठने वाली लहरों की तरह वापस बहुत गहराई में चली जाती। सागर जैसे सब कुछ समा कर शांत बना रहता ,अपनी गहराई में न जाने कितना कुछ समेटे,अब धीरे धीरे मैं भी वही बन रही। 

कहते हैं कि अधजल गघरी छलकती है....सम्भवतः मैं ऐसी ही थी।जब मैं का भाव प्रबल था ,अपनी जानकारी का दर्प था .....तब मैं वाचाल और बेवजह हंसने वाली थी।

किनारों पर उथली हूँ पर जितना गहरी जाती जा रही, सब कुछ ऊपर से थमता सा जा रहा, ज्ञात होती जा रही अपनी अज्ञानता ,कमियां ,थोथापन ।सम्भवतः  कोई बदलाव अब न बहुत उत्साह देता न ही कोई दुख ;कोई गहरी चोट। और आसूं..... उसी के खारेपन का सागर बना हुआ। कई मीठे पानी की नदियों की मौत और अंत ऐसे ही हुआ है। गहराई में घुलती हुई ,अपने ही सभी दुखो से जन्मे आसुओं के साथ शांत होती हुई .... अथाह सागर में बदल जाती। और फिर उनका पुर्नजन्म कभी नही होगा।उनकी जीवंतता फिर कभी नही वापस आती। उसकी कल -कल गति एक गहरी चुप्पी में बदल जाती। और वो चुप्पी हमें चीखती हुई लगती।कई भावानाओं की धारा की शांत करने सागर में बदलने की दशा..... ऊपर हलचल भीतर बस थमी हुई गहराई और शांति। 

 तब वो अनन्त में शून्य हो जाती और फिर खुद की ही गहराई में खोती चली जाती। विलीन हो जाती कोलाहल से गुजर कर .......नाद में । 


#डॉ_मधूलिका 

#ब्रह्मनाद

मंगलवार, 30 मई 2023

कल...... एक मृगतृष्णा

 *मैं तुमसे बाद में बात करूँगी/करूँगी। 

*कल ये काम कर लेंगे।

*कल से पक्का नया रूटीन फॉलो करूंगा /करूँगी।

*कल से जल्दी उठेंगे।

*कल पक्का तय करेंगे कि आगे क्या करना...... 


और हर आज ;वही कल होता है जिस कल की हमने कल बातें की थी। अफ़सोस हम कल में टालते जाते.... कल के आसरे में बैठे रहते ,और वो कल कभी नहीं आता। हां इस कल को पाने की जद्दोजहद में हम आज को जरूर खो देते। आज की निश्चितता को कल की आस में नजरअंदाज करते रहते। 

इस कल के चक्कर में हम बस खोते ही चले जाते....... कई अपनों को ,और सपनों के लिए हकीकत को। 

कल कभी आ ही नहीं पाता। और हम अन्तहीन दौड़ते ही चले जाते।ये कल हमसे हमारे एक कदम आगे ही रहता।जब -जब हाँथ बढते तो लगता हम इसे पकड़ लेंगे।पकड़ में आता तो सपने हकीकत बन जाते..... पर  ये एक छलावा रहता ,एक मृगतृष्णा.... हम आगे देखने के चक्कर मे अपने नीचे की जमीन भी खो देते। और फिर औंधे मुंह गिरते। निगाहें फिर भी उसी कल की ओर लगी रहती, और वो हमसे उतनी ही दूरी पर खड़ा रहता ,जितना हमारे सफर की शुरुआत में था।


जब तक आंख खुलती....... कल खो चुका होता ,बीत चुके कल में। और हम एक पेंडुलम बन चुके होते कल और कल के बीच । तब वर्तमान भी पहुंच से छूट चुका होता और हमारा आधार ......... एक ट्रेडमिल की तरह हमें ऐसी दौड़ में ले जाता ,जहाँ हम दौड़ते तो रहते अनवरत ,पर कहीं पहुंच नहीं पाते। कल ....... कभी नहीं आता ,समझ तब आता ,जब आज कल में बदल जाता और हाँथ और आँखें दोनों खाली ..........

और फिर एक दिन कल की ओर ताकते हुए हम आज से कल में बदल कर इस दुनिया के अस्तित्व में ही आंकड़े से गायब हो जाते।

#डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद 

बुधवार, 24 मई 2023

चाय और तुम

 

       (तस्वीर:- साभार गूगल)


चाय और तुम्हारे साथ .....दुनिया में इससे बेहतर सुकूं शायद ही मुझे दोबारा नसीब हो। किसी गहरी घाटी की किसी अंतिम छोर पर टेंट लगाकर जतन से जुटाकर लाई गई कुछ सूखी लकड़ियों और पत्थर के ढेरों  से बनाए गए चूल्हे पर चढ़ी हुई चाय....।


 हल्की ठंडक का एहसास.... मुँह से निकलता धुंआ और आँखों में बरसों से ठहरी नमी रहकर रहकर बाहर निकलने को बेताब..... उन लकड़ियों की आंच से तुम्हारा दिव्य चेहरा लाल सा दिख रहा। जैसे अभी किसी युद्ध से तपकर लौटे हो और शौर्य अब तक उबल रहा हो। पर तुम्हारी आंखे मासूमियत के साथ मुझे और उबलती चाय को तक रही हैं। एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है। तुम होंठों को हिलाने की नाकाम कोशिश कर ,चुप हो रहा जाते।जैसे बोलना बहुत कुछ हो ,पर छोर न मिल रहा हो। 


मैं तुम्हारी आँखों मे ही खोई हुई हूँ। तुम चेहरे और आँखो के इशारे से मुझसे पूछते.... क्या हुआ ।और मैं सर डुलाकर मना कर फिर चाय को ताकने लगती। अंदर एक शोर से है। इस मुलाकात से पहले क्या क्या नहीं सोचा था। ढेर बात करूँगी ,ढेर सवाल .... कुछ शिकायतें।और अब जैसे उस शोर को अंदर के निर्वात ने ग्रस लिया। 


तुम्हारी आंखें और हाँथ मेरी नजरें रह रह कर इनपर टिक जाती। हां बस इनसे ही तो मेरा परिचय हुआ था। चेहरे से नहीं।वो ही मुझे मेरे लगे... मुझे यूँ ताकते पाकर तुम्हारे होंठों  पर मुस्कान खेल जाती और मैं झेंप कर उन जलती लकड़ीयों को खोतने लगती। तुम धीरे से मेरे पास सरकते और मेरे हांथ को अपने हांथों में लेकर दबा लेते।जैसे मुझे यकीन दिला रहे हो...हां ये मैं ही हूँ। उस ठंडक वाले एहसास में तुम्हारे हांथों की नरमी और गर्मी मुझे अंदर तक सिजा रही है।


अचानक चाय खौलती और जलने की मीठी सी खुशबू हम दोनों ने नाक में समाती। हल्के धुएं से आंखें लाल और आंसू भरी हो जाती ,जिनकी आड़ में मैं अपने आंसुओं को भी पोछ लेती।


छान कर चाय की गिलास तुम्हारे हांथों में पकड़ा देती।जिसे तुम जैकेट की आस्तीन पंजों तक खींचकर उसके बीच पकड़ लेते। पहला घूंट लेने के लिए मैं गिलास को थामे तुम्हारे हांथों को तुम्हारे होंठों की ओर करती और एक चुस्की के बाद मैं चुस्की लेती।

वो बड़ी सी गिलास से 2 चुस्कियों के बीच हम दोनों चुप्पी में भी ढेर बातें कर ले रहे। तुम्हारे होंठों को छूने के बाद जब गिलास मेरे होंठों तक आती तो मानो तुम्हारा मन उमड़ कर उस एक चुस्की चाय में पिघल जाता।चाय की खत्म होने वाली अंतिम चुस्की मैं तुम्हें ही पीने को देती,कहते हैं  खाने पीने का अंतिम घूंट और कौर ,तृप्ति का होता है। मैं वो तृप्ति तुम्हारे नाम कर देती हूँ। 


मेरे जीवन की क्षुधा तुम हो, मेरे आत्मा की प्यास तुम हो .... और उससे तो मैं कभी तृप्त ही नहीं हो पाऊंगी। मैं घूंट घूंट अपनी आंखों से तुम्हें पी रही हूँ। मेरी आत्मा तृप्त होने की बजाय और क्षुधातुर हो रही है। 

हम दोनों उठ खड़े हुए तुमने अपनी बाहों के सहारे मुझे जमीन से कुछ ऊपर उठा लिया।देखा आज मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे। तुम्हारे होंठों पर अपने होंठ रख मैं आंखें बंद कर लेती हूँ।और आंसुओं की दो जोड़ा धार उस निर्जन में भागीरथी से भी प्रचंड तरीके से बह निकली। 

उद्वेग काबू करके एक दूसरे के माथे पर बोसा रख तुम वापस मुझे जमीन के हवाले कर देते। तुम्हारे बलिष्ट हांथों से होते हुए मेरा चेहरा तुम्हारी हथेलियों में समा गया। जिन्हें मैं नेमत समझ कर चूम रही हूँ। आंखें आखों में कैद हो गई है। हम दोनों अपने अपने रास्तों के रुख करते । बस इतना हो बोल पाते .....अपना ख्याल रखना।

मैं पहले नहीं मुड़ सकी.... इसलिए तुम एक झटके से मुड़ कर तेज़ कदमों से निकल गए।मैं वहीं खड़ी देखती रही जब तक तुम्हारा अक्स् ओछ्ल न हो गया। 

ये मेरी अंतिम चाय थी....उस वक़्त तक के लिए जब तक तुम दोबारा मुझे नहीं मिल जाते। हर शाम की चाय की चुस्कियों से एक  के होंठों  से दूसरे के होंठों तक चुप सी बातें करने को।


#डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद 

बुधवार, 3 मई 2023

नानी और अक्षय तृतीया : एक संस्मरण


 मेरे लिए अक्षय तृतीया या अख्ति का बचपन से बस एक अर्थ था.. मिट्टी के बने  गुड्डे -गुड़िया का एक खूबसूरत जोड़ा लेकर आना ,उनकी ख़ूबसूरत सी ड्रेस बनवाना और कुछ पकवान बनाकर मंडप सजाकर उनकी शादी करवाना । बरा बरसात के दिन उनकी गांठ खोली जाती और वो दिन भी मौहल्ले की सखियों या अपनी चचेरी -ममेरी बहनों के साथ उत्सव सा लगने लगता। 

साल भर बाद उन्हें पूजा के साथ विसर्जित कर फिर दूसरे जोड़े को लाकर उनकी पूजा और विवाह। कितना प्यारा बचपन था ,जब माटी के ये खिलौने ,कुछ जरी लगी उनकी पोशाकें, बरा ,पुआ , गुलगुला इतनी खुशी और उत्साह दे जाते थे जो बड़े बड़े होते होते किसी भी उत्सव किसी भी पोशाक,किसी भी खिलौने से नहीं मिल सके। 


इस विशेष दिन से जुड़ी एक खास याद नानी की है,जिन्हें मैं और सारे बच्चे बाई बोलते थे। बचपना जाते हुए इन गुड्डे गुड़ियों के त्यौहार से दूर करता गया ,पर नानी.... मेरे लिए हर साल गुड़िया -गुड्डा का जोड़ा लाकर शादी कराके पूजा करना न भूलती। चूंकि ये दिन गर्मी की छुट्टियों की दौरान आता था इसलिए अक्सर हमें ये नानी के घर मे ही मिलता। 


वक़्त के साथ जब हम अपनी दुनिया में व्यस्त होते गए...हर गर्मी की छुट्टी अब नानी के यहाँ भी नहीं जा पाते थे... पर नानी अब भी मेरे लिए वो रीत निभाती जा रहीं थी। मैं जब नानी के यहाँ जाती वो उस सजे हुए गुड्डा -गुड़िया को मेरे सामने कर देतीं। और मैं नानी से कहती कि अब मैं बड़ी हो गई हूं इससे नही खेलती।और वो हंसती की जब तक जिंदा हूँ मेरे लिए तुम खिलौने से खेलने वाली गुड़िया ही रहोगी। जब नहीं रहूँगी तभी बन्द होगा ये रिवाज। याद है मुझे ,जब छोटी थी तो कई बार साल भर उस गुड्डे -गुड़िया की कभी नाक ,कभी मुकुट, कभी हाँथ का हिस्सा खेलते हुए टूट ही जाता था। पर मन  उस टूटे हुए खिलौने से कभी न उकताता। बड़े होने पर वो एक कोने में पड़े -पड़े मुझे चुपचाप ताकते रहते। 


आज अखबारों में ,बाजारों में ये गुड्डे -गुड़िया के जोड़े देख कर नानी की याद आ रही। उनके जाने के बाद से किसी ने मेरे लिए अख्ति पूजन नहीं किया।किसी ने मेरे लिए मिट्टी के उस जोड़े का पूजन कर मुझे सौंपने के लिए नही सहेजा। एक मिट्टी की बनी  स्नेह से डूबी काया ,आज बहुत याद आ रही है।क्योंकि वो मेरे बचपन से जुड़ा सबसे खूबसूरत रिश्ता और एहसास था।

बाई  आप ,उस मिट्टी के जोड़े से जुड़ी जो खुशी आपने मेरे  लिए अपने जीवन रहने तक सहेजा अब उसके लिए तरसती हूँ। न अब खुश होना इतना आसान है न ही कोई मेरे लिए सहेज कर रखने वाली आप रही। 

 बाई आप ,आपके दहबरा और गुलगुला ,और वो गुड्डे -गुड़िया....मेरे जीवन मे एक बड़ी रिक्तता बन गए हैं।जो अब मेरे जीवन के अंत तक रिक्त ही रहेंगे। आज आप बहुत याद आ रही हो.......😓

#डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद 


गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

एक प्रेयसी का रूपांतरण

 वो सुबह जागने से लेकर ,सोने के बाद तक मेरे साथ रहते हैं। सुबह का पहला ख्याल रात्रि के अंतिम पहर का स्वप्न भी है। सुबह नींद खुलते ही एक टीस सी उठती, खुद में एक ख़लिश सी महसूस होती लगती। हर वक़्त उन्हें अपने पास चाहती ,एक साये की तरह साथ रहना चाहती जो अंधेरे में उनमें ही समा जाती। तकिए की बजाय उनके हांथों का सिरहाना हो, कभी वो मेरे सीने पर सर रखकर इतनी निश्चिन्त नींद लें कि सुबह उठने पर उनके चेहरे  और कनपटी का वो तरफ पसीने से तर मिले जो मुझे स्पर्श कर रहा था । 


दोनों में से किसी एक कि नींद खुले तो दूसरे को खुद की ओर हल्की मुस्कान और ढेर स्नेह से तकते हुए पाए। सुबह अपना अक्स आईने से पहले उनकी आंखों में देखूं। कभी उनके कांधों पर अपने हाँथ रख उनकी बलिष्ठ भुजाओं में बेफिक्र झूल सी जाऊं,इस भरोसे से साथ कि वो ताउम्र मुझे कभी गिरने न देंगे।  उनके थकान से चूर पसीने से तर बदन की खुशबू अपने बदन में समेट कर उन सी महकती रहूं। मैं अपना हर दिन आभाष नहीं बल्कि स्पर्श कर अनुभव में बिताना चाहती हूं। जीना चाहती हूं उन्हें अपनी हर सांस ,हर चितवन ,हर मुस्कान , हर छुअन में। 


न जाने कबसे  यही  सब ख्वाब संजोए वक़्त को उसकी गति से दौड़ने से रोक नहीं पा रही हूँ। जितना शिद्दत से पकड़ना चाहती उतनी तेज़ी से फिसल जाता है।वो जब आए थे तब उम्र और उसके निखार का ओज चरम पर था। जब मुस्कान आकर्षण के दायरे को समेट कर होठों में सिमट जाती थी। हर तकलीफ को परे रख मुस्कुराते रहने की जिद थी। शायद एक अल्हड़ता थी जो उस वक़्त जीवित थी। अब परिपक्वता से आगे बढ़ती हुई एक प्रौढ़ स्त्री हो चुकी हूं। जिसकी मुस्कान अब मोहक नहीं डरावनी दिखती। क्योंकि अब उम्र की रेखाएं कई तिर्यक काट के रूप में उभरने लगती। बहुत कुछ उम्र के साथ खोती सी जा रही। बाहरी और भीतरी परिवर्तनों का दौर जैसे बीत सा गया अपनी अंतिम परिणीति पाने के लिए। अब ठहरी हुई गम्भीरता कहीं गहरे घर कर रही। सेल्फी में अब दंतपंक्ति भी नहीं दिखती।याद करके मुस्कुराना पड़ता। अब दिखती है तो एक गम्भीर , निरुत्साही ,जीवन को बस काटने की सोच लिए हुए  एक औरत ,जो अब प्रेयसी होने की सोच से कहीं अंदर धंसी सोच में जीने लगी। प्रेयसी होती तो लड़ती, हक मांगती, रूठती ,मनाए जाने को आतुर रहती, नखरे दिखाती। पर अब प्रेयसी नहीं बची। बदल चुकी हूँ उस औरत में आकाश की तरह अपने प्रिय के लिए छा जाना चाहती ताकि उसे जीवन की चुभती धूप से बचा सके,और धरती की तरह थाम लेना चाहती रुकने के लिए एक मजबूत आधार देकर ,उसे ठौर बना देने के लिए। जो मेरा मालिक ...उसके लिए अब प्रेयसी नहीं ...... माँ का वात्सल्य समेट कर ,दोस्त का धैर्य समेट कर, बहन सी चंचल और विनोदिनी और अंत मे अपना सब कुछ उनके लिए समर्पण और विसर्जन कर देने वाली अर्धांगिनी होने   वांछना शेष। 


एक आस अब तक शेष है ..... क्योंकि अब तक सांस शेष है.... मैं बसूं उसमें उसकी रूह की तरह, और रहूं उसके सीने में उसकी धड़कन की तरह। ❤️

#डॉ_मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद 


सोमवार, 24 अप्रैल 2023

#विश्व_पुस्तक_दिवस




किताबें और मैं:)

मैं अक्सर किताबें पढ़ते हुए कहीं खो जाती हूँ। दरअसल मैं पढ़ती नही हूँ , मैं किताबों को जीने लगती हूँ। उनके किरदारों में ढल जाती हूँ।मैं #पीताम्बरा पढ़ती ,तो मीरा हो जाती, मैं खो देती खुद को आराध्य कृष्ण में। मुझे संसार बेमानी लगने लगता। उस पीड़ा को जीती जो मीरा ने जी थी, उतनी उदात्त और उदारमना भी हो उठती। 

मैं #कृष्ण_की_आत्मकथा पढ़ती तो कृष्ण हो उठती। ईश्वर नहीं ,महामानव जिसकी सहायता कई साधारण मानवों और कई नाटकीय घटनाक्रम सहित प्रकृति भी करती,ईश्वरत्व पाने को। 

#सोमनाथ में कभी अभिजात्य जीती ,कभी पीड़ा । मैंने उस महान काल को खुद में गुजरता महसूस किया। सोमनाथ के गर्भगृह पर पाया खुद को, तो  शिव के सम्मुख  ,पूरे नगर के सामने कला प्रदर्शन को प्रस्तुत ;एक देवदासी की किंचित निराश किन्तु उद्दीप्त आभा की प्रतिदीप्ति खुद में महसूस की,अंत मे मातृभूमि छोड़ने की व्यथा भी। 

#शेखर पढ़ते हुए मैं विद्रोही हो उठी, व्यवस्था और आडम्बर से दूर , रूढ़ियों को खुद में गलाती हुई ,मैं विद्रोही हो गई। 


कभी मैं द्रौपदी का द्वंद जी, कभी कर्ण का त्याग,कभी उर्मिला सी जड़ हो गई।  मैंने आदिवासियों का सहज जीवन जिया, कभी उनमे ढल कर जंगल मे खो गई। कभी शरदचन्द्र की रचनाओं की  सदहृदयी बड़ी कोठी की मालकिन हुई,कभी किसी मुनीम की मासूम सी बेटी जो कौतूहल से हवेली में कदम रखते हुए किसी लक्ष्मी पुत्र की नज़र में आ जाती। आगे उसकी जिंदगी सिर्फ भूल भुलैया बन जाती। 


मधुशाला के रहस्य को छायावादी बना कर उसका खुद में प्रकृतिकरण किया। हर नायक का संघर्ष , हर नायिका का त्याग, अंतर्द्वंद्व ,ना जाने कितने भाव मुझे खुद में जगह देते हैं। खुद में खोकर नायकत्व पाने को। 


कभी भुवाली के सेनिटोरियम की मरीज की सेविका होती, कभी डॉ । शिवानी के रूप में प्रस्तावना लिखती ,तो उसकी काली मोटी पर अल्हड़, जिंदादिल  नायिका भी  । उसकी सद्यस्नाता नायिका तो सदा मुझमे ही रहती है। 

मैंने जापान की दुर्दशा देखी। मैंने यूरेनियम खदानों की विकिरण की मार झेली। मैं कभी मूक पर आंखों से बोलने वाली पात्र हुई, कभी अपने चुके अभिजात्य को याद करती और उसके दम्भ को अब तक अपनी अकड़ में जीती बुढ़िया भी।

ना जाने कितना कुछ जीती हूँ इन किताबों में। जितनी किताबे पढ़ती गई,उतने ही किरदार में ढलती गई। कभी राष्ट्रवादी,कभी आक्रांता . ..कभी पतित ,कभी पावन ,कभी सन्यासी हुई ,कभी संसारी। सारे रस खुद में पाई। कवित्त की प्रेरणा बनी तो कभी लेखक हुई। कितने भूखंडों का विस्तार मुझमे हुआ,कितने फूलों की खुशबू मुझमे समाई। 

दुनिया मे रहकर भी ,एक अलग दुनिया मुझमे बसने लगती। जो लोगों के लिए अनदेखी होती ,पर मेरी आत्मिक अनुभूति होती।


उस वक़्त तुम मुझे नहीं ढूंढ सकते। मैं #मैं नही बचती।।मैं किताब जीती हुई किरदार हो जाती हूँ।


हां मैं किताबे पढ़ती नहीं, #मैं_किताबें_जीती_हूँ। 


©®डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

गुरुवार, 20 अप्रैल 2023

अपने अपने युद्ध



कोई बाह्य युद्ध मे रत तो कोई आंतरिक से जूझ रहा है। घरों में रहने वालों के चारदीवारियों के भीतर का युद्ध,एक कमरे में रहते हुए अलग-अलग लोगों का भी युद्ध एक तरह का नहीं होता है। 


कुछ अपनी परिस्थितियों से युद्ध कर रहे होते हैं। तो कुछ अपने ही मन में एक युद्ध निरंतर जी रहे होते। कुछ भाग्य से लड़ रहे होते, कुछ ईश्वर से युद्ध मे होते...... उनकी लिखी नियति को अस्वीकार कर अपने ध्येय को पूर्ण करने के लिए। जितने लोग, उतनी ही सपने और उतने ही युद्ध। कोई किसी से दूर जाने का युद्ध लड़ रहा तो कोई किसी को पास लाने के लिए अपने आस पास के लोगों से....कोई त्रिशंकु सा अपनी ही मनोस्थिति के बीच युद्धरत। कोई पहचान का युद्ध कर रहा ,कोई अधिकार का ,कोई अस्तित्व का । 


हथियार सबके भिन्न होते हैं... कुछ के इतने मारक के एक जीव समूह का विनाश करते ,कुछ परिवेश का और कुछ खुद के लिए भी घाती। घृणा ,क्रोध , प्रेम , सामंजस्य , अभद्रता और न जाने कैसे -कैसे हथियार ।


 अंदर युद्ध ,बाहर युद्ध ,जीवन वास्तव में सरल नहीं बल्कि एक रनक्षेत्र है। बाहर होने वाले युद्ध की भर्त्सना होती ,शान्ति के प्रयास होते। कुछ पक्ष ,कुछ विपक्ष में होते। किंतु अंदर के युद्ध ......उसका क्या ???

 

 क्या यह सम्भव नहीं कि अंदर के युद्ध जीत कर हम बाहर युद्ध की स्थिती ही न बनने दें । सम्भव क्या?????? असम्भव है....। जीवन एक समर है ,जहां धरती पर पहली सांस लेते ही शुरू हो जाते अंतहीन युद्ध.... जब तक आस है ,जब तक सांस है।

रविवार, 2 अप्रैल 2023

लड्डू के डैडा और मम्मा की कहानी : ऑटिज्म अवेयरनेस डे विशेष

 




डैडा

हां मेरी डॉल

डैडा हगी हगी कर लो।

आ जाओ डॉल।

डैडा की डॉल उन्हें जोर से hug करके गोद मे बैठ जाती है।


लड्डू- डैडा ,रात नहीं आएगी। वो अपनी आदत अनुसार ये बात लगातार दोहराते हुए रोती रहती है।


लड्डू की मम्मा आकर उसे आंख दिखाते हुए शांत रहने को बोलती है ,और कहती है तुम्हारे कहने से रात होना बंद नहीं होगी। और लड्डू पर आंखें तरेरती है। डॉल के डैडा को मम्मा का रवैय्या नहीं पसन्द आता और वो लड्डू की मम्मा को अंदर जाकर अपना काम करने कहते हैं। लड्डू और तेज़ रो रोकर डैडा के सर पर बैंड बजा रही होती है। डैडा उसे चुप कराते हुए रात नहीं होने का कारण पूछते हैं। लड्डू जवाब न देकर कहती है ,मुझे मॉल जाना है। डैडा गुड्डा को बोलते हैं बस इतनी सी बात हम तो रात में भी मॉल चल सकते। डैडा उसे उन्ही कपड़ों में गाड़ी में बिठाते और लेकर निकल जाते।घर के ही आस पास चक्कर लगा कर वो उसे गार्डन में ले आते। उनके पास कुछ चॉकलेट्स और चिप्स के पैकेट भी होते। जिसे वो गार्डन के एक प्लेटफॉर्म में रख देते। लड्डू को कहते चलो अब यहाँ हम मॉल बनाएंगे। और लड्डू को स्लाइड पर खिलाते। और लड्डू सब भूल कर मजे से खेलने लगती। थोड़े देर में डैडा उस प्लेटफॉर्म पर बैठ कर शॉपकीपर बन जाते। लड्डू उनसे खेल खेल में चिप्स और चॉकलेट खरीदती ,बदले में नोट नहीं ,बल्कि जामुन और आम के कुछ पत्ते देती। जिसे डैडा बहुत सम्हाल कर अपने पास रख लेते। फिर वो लड्डू से कहते अब घर चलना ,डिनर टाइम।चलो गाड़ी में बैठो,लड्डू थोड़े नाटक के साथ गाड़ी में बैठ जाती। डैडा फिर एक चक्कर लगा कर वापस घर आ जाते और मम्मा को बोलते, हम लोग तो मॉल घूमकर आए। डिनर टेबल पर भी मम्मा मुँह फुलाए खाना परोसती। लड्डू डैड से बिल्कुल चिपक कर खाना खाती। और फिर कुछ पज़ल खेलने के बाद उनकी ही गोदी में दुबक कर सो जाती। उसे बेड पर लिटाने के बाद उसके दिए हुए पत्ते अलमारी में एक डब्बे में सहेज कर रखते। लड्डू की मम्मा का गुस्सा फिर उबल पड़ता- आप अब ये कचड़ा भी इतना सम्हाल कर रखेंगे। लड्डू के डैडा लड्डू की मम्मा जो बेड पर किनारे अपने गोद में बिठाते हुए कहते। आपको ये कचड़ा लगता। ये मेरे लिए दुनिया की सबसे महंगी करेंसी है,जो मेरी प्रिंसेस ने मुझे दी। इससे मुकाबले पूरी दुनिया सस्ती। और आप अब इतना गुस्सा करना छोड़ दीजिए। लड्डू को आप हम नहीं समझेंगे तो दुनिया कैसे समझ पाएगी। आपको पता कि लड्डू के सोचने ,दर्शाने का तरीका अलग। लड्डू अगर आम जिंदगी जीती तो क्या इतनी परेशानियों को जानबूझकर अपने ऊपर हावी होने देती? क्या आपकी एक डांट से सब सही नहीं बोलती या करती? क्या आपको लगता उसे जो आता वो जानबूझकर नहीं करती,या हम उसे समझा नहीं पा रहे जो उसे जानना चाहिए। लड्डू की क्या गलती जो उसे ये सब झेलना पड़ता। वो चाह कर भी एक आवरण नहीं बना सकती।वो जैसी है ,वो वैसी ही दिखती।उसे फर्क नहीं पड़ता लोग उसके लिए कैसा सोचते।वो खुद में सच्ची है। और जानती हो न आप इस दुनिया में खुद से सच्चे रहना ,सबका मुश्किल । 

मैं जानता हूँ ,आप उसे मेरे से थोड़ा कम चाहते (ये बोलते हुए लड्डू के डैडा ,उसकी माँ की ओर तिरछी नजरों से देखकर हंसते हैं) और अगर मेरे बाद कोई उसकी भलाई सोचता तो वो आप हो,फिर अपना संघर्ष उस पर नाराजगी बना कर क्यों निकालते। आपको तो लड्डू के लिए वहाँ भी एडवोकेट बनना चाहिए जहां आपको लगे वो नही कर सकती,या नहीं समझ सकती।उसे आपके साथ कि जरूरत ,आपके गुस्से से वो डर और सहम जाती। और मैं नहीं चाहता कि लड्डू अपनी माँ का संघर्ष गुस्से से भरा देखे। उसे कभी ये न लगे वो आपकी जिंदगी में मुसीबत बढा रही।उसे ये लगना चाहिए कि उसकी मां हर स्थिति में उसे प्यार करेगी,भले ही वो सामाजिक रूप से सफल हो या असफल। आप हमेशा उस पर गर्व करोगे। 

लड्डू की माँ लड्डू के डैडा के सीने पर सर रखकर फूट फूट कर रो पड़ती। ये रुलाई लड्डू की समस्या नहीं बल्कि एक माँ के रूप में उसकी कमजोरी के लिए थी। लड्डू के डैडा का सीना बिल्कुल भीग गया। वो उसे और जोर से भींच लेते हैं। उनकी आंख भी साथ ही बह रही होती। वो 2 जोड़ी आंखे एक कहानी के किरदार नहीं ,बल्कि माँ -बाप के अलावा एक दूसरे के हिस्से के रूप में उस वक़्त साझा भाव जी रहे होते।


#डॉ मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद 


ऑटिज्म अवेयरनेस डे विशेष


 मैंने कई साल पहले एक मूवी देखी थी, "अंजली" ... उस वक़्त उस मूवी की लीड एक्ट्रेस जो कि एक बच्ची थी उसकी क्यूटनेस में ही खोई रही, मुझे उसकी स्टोरी उस वक़्त नही समझ आई थी। कुछ साल पहले कुछ और मूवी मुझे अंजली की याद दिला गई।"तारे ज़मीन पर", " माय नेम इज खान", "कोई मिल गया" और बर्फी ।

इनके किरदारों में एक समानता मिली ,सामाजिक व्यवहार और संवाद में दक्ष नही दिखे। इन मूवी के  किरदारों  बारे में खोज करने पर एक विशेष शब्द सामने आया "AUTISM" ( ऑटिज़्म) ..........


संवाद जीवन में बहुत विशेष भूमिका अदा करता है। ये ऐसा जरिया जिसके माध्यम से हम दूसरों से जुड़ते,अपनी इच्छाएँ, अपेक्षाएं सामने रखते ,और एहसास भी प्रकट करते।


ऑटिज़्म / ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर एक ऐसा शब्द या शब्दावली  है ;जो क्षेत्रगत  व्यवसायिक दक्ष लोगों के द्वारा उन बच्चों के लक्षणों के लिए प्रयोग में लाया जाता जिन्हें सामाजिक व्यवहार ,खेलने, संवाद में समस्याएं होती। जो अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने में भी सक्षम नही होते। 

इसमे विभिन्न लक्षणों को भिन्नत करने के लिए S.P.D., A .S.D.  ,ADHD, P.D.D. ,Asperger syndrome, Hyperlexia, और Semantic pragmatic disorder  जैसे टर्म प्रयुक्त होते। 


आज वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस डे है। मैं अभिभावकों से इन लक्षणों पर ध्यान देने के लिए अनुरोध  करती हूँ। खासकर #18 महीने से  3वर्ष तक की आयु के बच्चों में। यह समस्या समय पर उचित समाधान न मिलने पर गम्भीर रूप धारण कर सकती है। इसकी सचेत रहिए । इसलिए इन लक्षण पर बच्चे को परखें: - 


- अर्थपूर्ण वाक्य बनाने में काफ़ी कठिनाई ,

- दूसरों द्वारा बोले गए वाक्यों को दोहराने की प्रवृत्ति,

- अपनी बात समझने के लिए  संकेतों का ज्यादातर इस्तेमाल करना

- संचार के लिए भाषा ज्ञान कम या बिल्कुल न सीख पाना। 

- अपनी ज़रूरतों, भावनाओं को समझा न पाना या प्रकट न कर पाना। 


- प्रश्न को दोहराना ,कई बार सही उत्तर न दे पाना।


-अकेले खेलने की प्रवृत्ति , गोल गोल घूमने वाली वस्तुओं की ओर ज्यादा ध्यान देना।

-दिनचर्या में अचानक हुए बदलावों में स्वीकारता नहीं।

-अपने शरीर को आपके शरीर से या बेड या कोई भी दो वस्तुओं के बीच दबाव देने का प्रयास। 

- अपने नाम को पुकारे जाने पर प्रतिक्रिया न देना।

- ध्वनि, गंध, स्वाद, देखना और सुनने जैसे सम्वेदी व्यवहार में असामान्य प्रतिक्रिया।  

- अपने ही हांथों से खेलते रहना- पक्षी की तरह फड़फड़ाते रहना , ताली बजाना ।

- उनसे संवाद करते समय आखों के कोने से किसी अन्य ओर देखने।

 आप जिसे गम्भीर समझें, ज़रूरी नहीं  वो गम्भीर हो और आप जिसे मामूली समझे वो सामान्य ही हों।इसके लिए जरूरी है पूर्ण चिकित्सकीय परीक्षण । ताकि अगर वाकई समस्या है तो समय पर निदान और समाधान मिले।


पहली बार सन् 1938 में वियना युनिवर्सिटी के हास्पिटल में कार्यरत हैंस एस्परजर ने आटिज्म शब्द का इस्तेमाल किया था । एस्परजर उन दिनों आटिज्म स्प्रेक्ट्रम (ए.एस.डी.) के एक प्रकार पर खोज कर रहे थे । बाद में 1943 में जॉन हापकिन हास्पिटल के कॉनर लियो ने सर्वप्रथम ‘आटिज्म ‘ को अपनी रिपोर्ट में वर्णित किया था कॉनर ने ग्यारह बच्चों में पाई गई एक जैसी व्यवहारिक समानताओं पर आधारित रिर्पोट तैयार की थी। और ये लाईलाज बीमारी तीसरी सबसे आमफ़हम शारीरिक और मानसिक विकलांगता है।


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■ #ऑटिज़्म तंत्रिका संबंधी विकलांगता है जो दिमाग के सामान्य विकास में बाधा पहुँचाती है। इससे संचार, सामाजिक अंतःक्रिया, संज्ञान और व्यवहार पर असर पड़ता है। ऑटिज़्म को एक स्प्रेक्ट्रम विकार माना जाता है क्योंकि इसके लक्षण और विशेषताएँ कई मिलेजुले तरीक़ों से प्रकट होते हैं जो बच्चों को अलग अलग ढंग से प्रभावित करते हैं। कुछ बच्चों में गंभीर समस्या आ सकती है और उन्हें मदद की ज़रूरत रहती है जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो हल्कीफुल्की मदद के साथ स्वतंत्र रूप से अपना कामकाज स्वयं ही कर पाते है।


ऑटिज़्म की सही सही वजह तो अब तक पता नहीं चली है लेकिन शोध बताते हैं कि ये आनुवंशिक और परिस्थितिजन्य या पर्यावरणजनित कारकों की मिलीजुली वजह से हो सकता है। पर्यावरणीय या परिस्थिति से जुड़ी वे विभिन्न स्थितियाँ हैं जो मस्तिष्क के विकास पर असर डालती है। ये जन्म के पहले या जन्म के फ़ौरन बाद उत्पन्न हो सकती हैं। ये भी देखा गया है कि बच्चे के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को नवजात दिनों में कोई नुकसान पहुँचने से भी ऑटिज़्म हो सकता है।


ऑटिज़्म एक जीवनपर्यंत की स्थिति है और इसका कोई इलाज नहीं है। लेकिन सही थेरेपी और सही इंटरवेंशन से बच्चे को ज़रूरी कौशल सीखने में मदद मिल सकती है जिनसे वे अपनी ज़िंदगी को बेहतर बना सकते हैं। चूंकि 18 महीने की उम्र या उससे पहले ही बच्चे में ऑटिज़्म का पता चल सकता है लिहाज़ा बच्चे के बेहतर विकास के लिए काफ़ी पहले से मदद मुहैया कराई जा सकती है।

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■ मातापिता के लिए महत्त्वपूर्ण नोटः- 


"" ऐहतियाती क़दम के तौर पर, माता पिता बाल रोग विशेषज्ञों को ऐसे रूटीन विकास संबंधी टेस्ट करने के लिए कह सकते हैं जिनसे ये पता चल सके कि बच्चे का शारीरिक मानसिक और भाषाई विकास ठीक से हो रहा है या नहीं. ""


ऑटिज़्म की पहचान का कोई एक मेडिकल टेस्ट उपलब्ध नहीं है लेकिन कुछ विशिष्ट आकलन और जाँच, इस विकार के होने की पुष्टि कर सकती हैं ऐसी ही कुछ जाँचों में शामिल हैं -


• शारीरिक और तंत्रिका तंत्र के परीक्षण

• ऑटिज़्म डायगनोस्टिक इंटरव्यू- रिवाइज़्ड (एडीआई-आर)

• ऑटिज़्म डायगनोस्टिक ऑबज़र्वेशन शेड्यूल (एडीओएस)

• चाइल्डहुड ऑटिज़्म रेटिंग स्केल (सीएआरएस)

• जिलियम ऑटिज़्म रेटिंग स्केल

• परवेसिव डेवलेपमेंटल डिसऑर्डर स्क्रीनिंग टेस्ट

•COMM DEAll असेसमेंट 

•इंडियन स्केल फॉर असेसमेंट ऑफ ऑटिज्म


• क्रोमोसोम असमान्यता को चेक करने के लिए जेनेटिक परीक्षण

• संचार, भाषा, बोलचाल, संचालन, पढ़ाई लिखाई में प्रदर्शन, संज्ञानात्मक कौशल से जुड़े टेस्ट

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किसी बच्चे में ऑटिज्म  का पता चलता है कि तो उसके अभिभावकों को स्वयं के लिए यह दुनिया खत्म सी महसूस होने लगती है। भावनात्मक और मानसिक यंत्रणा का दौर होता है ये। फिर शुरू होता है इलाज , इंटरवेंशन और थेरेपी के लिए लगभग अंतहीन लगने वाले चक्कर। घर पर ढेर सारे समझौते ,अपने व्यक्तिगत उद्देश्यों की बलि देते हुए कई अभिभावक इससे सामंजस्य बनाने की कोशिश करते हैं।पारिवारिक सदस्यों ,आदतों को भी बच्चे के हिसाब से बदला जाता है। अलग दिनचर्या अलग योजनाएं बनती है। इस तरह से एक अन्य बच्चे के मुकाबले ऑटिज़्म वाले बच्चे को पालना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।  

लेकिन अगर सही समय पर इसके बारे में जानकारी मिल सके तो इस स्थिति से निपटना अपेक्षाकृत सरल होगा।


इन हालात में, अभिभावक या देखरेख करने वाले व्यक्ति के तौर पर आप :-


*ऑटिज़्म के बारे में पढ़े और जानें पर ध्यान रखें हर बच्चा अलग है तो जरूरी नहीं कि नेट पर किसी अन्य के बारे में दी गई जानकारी और टिप्पणी आपके बच्चे पर भी लागू हों। नकारात्मक साहित्य से बचें। आप रेमेडीज/ समाधान की तरफ ध्यान दें। 


* बच्चे सहित परिवार में सभी दिनचर्या निश्चित करें ताकि बच्चे को अनावश्यक तनाव न हो ।उसे पूर्व आभास रहे कि आपका अलग कदम क्या होगा। 


*बच्चे ,परिवार के सदस्यों और जरूरत पड़े तो स्वयं के लिए भी मनोचिकित्सक से  काउंसलिंग लें। आप भी इंसान हैं ,भावनाओं का ज्वार आपको भी परेशान कर सकता है। 


*एक विशेष जरूरत वाले बच्चे के लिए आपको भी भावनात्मक रूप से मदद और साझा करने की आवश्यकता होती है। ऐसे समूहों से जुड़े जिनमें इस स्थिति से गुजर रहे माता पिता शामिल हों। सब आपस मे जानकारी साझा करें, एक - दूसरे की मदद करें। 


*आपके स्थान अपर थेरेपी की व्यवस्था न हो तो  प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर गतिविधियोंके बारे में सीख सकते हैं जिससे बच्चे के साथ काम करने में आपको मदद और मार्गदर्शन मिले। 


* ये न सोचें कि बच्चा आपको सुन नहीं रहा और उससे बात करना बंद न करें।बल्कि लगातार उससे हर चीज ,हर घटना के बारे में बताएं। रास्ते से गुजरते समय भी आप लगभग कॉमेंट्री जैसी करते रहें। ये उसे दिमाग मे नए शब्द और घटनाओं के तारतम्य को सिखाएगा।


*प्रिटेंड प्ले, इमेजनरी प्ले भी सिखाए। एक ही खिलौने से अलग अलग तरह से खेलना सिखाएं। अलग अलग कॉन्सेप्ट 

दीजिये।


* शुरुआत में बच्चे की रुचि अनुसार सोलो गेम से शुरू करके धीरे धीरे समूह में खेलने वाले गेम की तरफ लाइये। इससे बच्चे अपनी बारी का इंतज़ार करने के अलावा नियम भी सीखने लगेंगे। 


*बातचीत में  वाक्य छोटे और सरल निर्देशों वाले रखें।ताकि बच्चे को समझना आसान हो।


*शुरुआत में वो बच्चे जिन्हें भाषा या संवाद में कठिनाई हो ,उनके लिए कम्युनिकेशन कार्ड बना कर रखें। इसके माध्यम से उन्हें अपनी बातें ,जरूरत साझा करना सिखाइये।


*बच्चों को मदद  माँगने के तरीके सिखाइये।


*पहले बच्चे को समझाए फिर बोलने का प्रयास कराएँ। ताकि सही शब्द प्रयोग करना आए।


*छोटे से छोटे सफल प्रयास पर भेज बच्चे को बहुत उत्साहित कर उसे इनाम भी देना है। याद रखें ये इनाम हमेशा कोई भौतिक वस्तु न हो, बल्कि कई बार उसकी पसंदीदा गतिविधि या भाव भी हो।


*बच्चे को आप हमेशा #स्पून_फीडिंग( जरूरत से पहले ही पूर्ति) न कराएं। उसे प्रोत्साहित करिये अपनी जरूरत को प्रकट करने के लिए उसके बाद उसकी मदद करें। याद रखें आपको बच्चे को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाना है न की निर्भर ।


*आपका शारीरिक मानसिक  बेहतर होना स्वास्थ बच्चे के लिए भी जरूरी है ,इसलिए खुद पर भी ध्यान दें। 


#सामाजिक व्यवहार के लिए :- 

 1 बच्चे को घर व बाहर के लोगों से मिलाएं ।


2.  बच्चे को पार्क  या किसी हॉबी क्लास में ले जाएं।


3. दूसरों से संवाद के लिए प्रेरित करें। प्रॉम्प्टिंग कि स्थिति को हटाते जाएं। इसे फेडिंग कहते हैं। 


4.बच्चे के ऐसे व्यवहार जो बार बार दोहरा रहा हो,उसे नजरअंदाज न करें और उसे किसी भी प्रकार से व्यस्त करें ताकि उसका ध्यान उस एक गतिविधि से हटे।बच्चे को अकेलेपन की स्थिति में न छोड़े।


5.बच्चे के गलत व्यवहार को नजरअंदाज न करें। आप उसे विभिन्न तरीकों से समझाने का प्रयास करें कि उसके द्वारा की गई  गतिविधि ने आपको /अन्य को नुकसान पहुंचाया।गुस्से और दुख को दिखाने के लिए शारीरिक हावभाव के अलावा विजूअल कार्ड का इस्तेमाल करें।बच्चे की वीडियो या फ़ोटो( अवांछित व्यवहार के दौरान) लेकर रखें और समझाते समय इसे दिखाएं। 


 6.बच्चे के साथ  नज़र मिला कर बात करने की कोशिश करे,उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए उसके रुचि की वस्तु अपने चेहरे के पास रख बात करें। 


7. हर सही प्रयास के लिए प्रोत्साहित करना कभी न भूलें ।


8. बच्चे का  अधिक गुस्सा या अधिक चंचलता दिखे तो उसे शारीरिक व्यायाम ,खेल सम्बन्धी गतिविधि में लगाएं। इससे अलावा यदि उसकी गतिविधि स्वयं या अन्य को शारीरिक क्षति पहुंचाने के स्तर पर हों तो मनोचिकित्सक से सम्पर्क करें।


👉 ऑटिज़्म को अभिशाप के रूप में न लें। हर बात के दो पहलू होते हैं। इससे ग्रस्त व्यक्ति  विशेष विधा ,क्षेत्र में ध्यान केंद्रित करने की अनूठी क्षमता रखते हैं।उन्हें कुछ विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से खुद को अद्वितीय साबित करने का अवसर दे सकते हैं। कोई भी सम्पूर्ण नहीं होता , इस डिसॉर्डर के साथ जीने वालों में कई मशहूर हस्तियां जुड़ी हुई , निकोल टेस्ला, अमेडस मोजार्ट,  आइंस्टीन , हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति महामहिम कलाम साहब , प्रियंका चोपड़ा, ह्रितिक रोशन ,अभिषेक बच्चन जैसे लोगों ने इस अक्षमता को हरा कर खुद को  अपनी क्षणताओं के अग्रणी स्थान पर काबिज किया। 


प्रकृति ने जब कोई भेदभाव नहीं रखा तो कहीं न कहीं हमारा भेदभाव पूर्ण व्यवहार प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ ही जाएगा।और प्रकृति जब विरोध करती है तो त्रासदियों को जन्म देती है। सम्हलकर... सोचकर ..... अपना कर .... अनुकूल व्यवहार करें।


*समस्या होना जीवन का अंत नहीं होता, बल्कि समस्या होना जीवित होने का संकेत है*..........*समाधान से उसे जीतना ही जीवन है।*


#डॉ मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद 

बुधवार, 22 मार्च 2023

अनंत पथ...

 यूँ तो जीवन और मृत्यु का ये पथ अनंत होता है। और हर किसी का पथ और उसका अंतिम मुकाम निर्धारित होता है। मैं भी अनंत काल के इस जन्म मृत्यु के क्रम की यात्रा में हूँ। ये यात्रा मेरे लिए सामान्य समतल पथ की गाथा नहीं है ,इस यात्रा में मैं अंतहीन अंधेरों के कई वर्तुल,तीक्ष्ण मोड़ वाले वृत्ताकार पथ पर तुम्हारे एक ऊदीप्त प्रकाश पुंज से पहचान पाकर ; तुम तक पहुंचने की राह तय कर रही हूँ।

केंद्र सदा तुम ही रहे.......जब चली थी ;तब भी , जब खत्म होउंगी; तब भी...अनन्तकाल से मैं तुमसे निकलकर ,तुम तक आने की यात्रा करती हूँ। 

जब - जब तुमसे इस पथ पर दूरियां बढ़ी ,मेरा एहसास शीत के प्रभाव में सर्द होता गया, तुम्हारे नजदीक आने की निश्चित आवृतियों के दौरान मैं ऊर्जामयी हो उठती। ।मैं अपनी गति के साथ भी तुम्हारे सापेक्ष स्थिर ही रहती। ये मेरा भ्रम था कि नियति की मैं लगातार गति करती रही ,तुम तक आने के प्रयास में, पर एक निश्चित तयशुदा स्थिति से....मुझमें उद्विग्नता नहीं। डरती हूँ,मेरी तेज़ गति कहीं मुझे तुम्हारे ऊष्मीय एहसासों की परिधि से ही ना दूर कर दे। इसलिए कभी सीमा अतिक्रमण का साहस भी ना कर पाई।

मेरा तो यूँ भी मुझमे कुछ नहीं है। मेरा प्राकट्य तुम्हारे ही वैचारिक संलयन के प्रकाश में सम्भव होता। मेरा हर परिवर्तन तुम्हारे ही प्रभाव से होता। मैं खुद के केंद्र में भी सदा तुम्हें ही पाती, और मेरे आस पास के संसार का केंद्र भी तुम्ही होते। 


कई बार इस परिधीय मार्ग में यह महसूस होता कि मैं  तुम्हारे पूर्व से पश्चिम में आकर अस्त हो रही,किन्तु अगले ही क्षण, समय की न्यूनतम इकाई की चंचलता और तत्परता से तुम मेरे दूसरे आयाम को पुनः पूर्व बना जाते हो। पश्चिम में डूबती मैं फिर से प्रकाशवान होकर पूर्व की परिकल्पना में जीवित हो उठती। 


जानती हूँ ,इस अनंत विस्तार में  कोटि -कोटि जैविक पिंडों के बीच तुमने मुझे चुना वरना मेरा सामर्थ्य तो एक टूटे सितारे  का भी नहीं था। कहा जाता है कि भक्त अपनी प्रकृति अनुसार भगवान चुनता। पर मेरी क्या बिसात जो मैं स्वयं की प्रकृति अनुसार तुम्हें गढूं, तुम्हें चुनूँ!!!!!! तुमने मुझे चुन कर मुझे देवत्व दे दिया। 

अब बस मैं अपना अंत चाहती हूँ, तुममे उसी तरह समा कर जैसे जल के दो अणुओं में कोई भेद न मिल पाता। बिल्कुल वैसे जैसे स्थूलता सूक्ष्म रूप से मिलकर अपरिमित हो जाती। बिल्कुल वैसे जैसे जीवन के बाद आत्मा और परमात्मा में कोई अंतर ना होता।तब तक  करती रहूंगी इस तय परिधि पर ,निश्चित नियति की यात्रा....जिसका आदि भी तुम थे ,अंत भी तुम होंगे.......... अंतिम सत्य भी और अनन्तिम भी।


तुम्हारी मीरा ।

#डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद 


जीना या जी ना ?


 बहुत बैचेनी होती,जब प्रकट में शांत और मन में बहुत कुछ उमड़ रहा हो।ऐसा लगता जैसे ज्वालामुखी फटने से पहले या भूकंम्प आने से पहले जो स्थिति होती,वही स्वयं में उस वक़्त जीते है। 

बोलना और शांत हो जाना सरल होता। चुप रहना और उसे सालते जाना ,प्रतिपल आंतरिक विस्फोट को जीते रहने की स्थिति होती। ऐसे में क्या ध्यान शांति देता।कतई नहीं ,अंदर से अशांत को हम कैसे स्थिर कर सकते। मन भी कितना अजीब होता,जब खुश तो दुनिया अपनी लगती,जीवन मोहक लगता। जब नाखुश तब जैसे स्वयं भी निर्जीव लगने लगते। जैसे चाभी भरा एक खिलौना ,जिसे दिन से रात तक निश्चित गति से बस उसके लिए निर्धारित कामों को करने के लिए चाभी भरी गई।

उद्देश्य क्या,संतुष्टि क्या,उस काम से खुशी क्या...... इन सब बातों से परे बस उसे अनवरत चलते रहना है। जैसे शरीर एक जीवन को सिर्फ ढो रहा। 

जीवन ढोना और जीना ,उतना ही अंतर जैसे अंदर से प्रकाश,शांति महसूस करना और खुद को शांत दिखाने का अंतर। बनावट सदा घातक होती। स्वयं के साथ अपने से जुड़े लोगों और समाज के लिए भी। हर वक़्त खुद के होने का स्वांग अन्तत: एक दिन खुद को कहीं गहरे दबा कर बस नाटकीय व्यक्तित्व बना देता। जिसके लिए जीवन सिर्फ और सिर्फ बिना अनुभूति के सांस लेना बचता।


#डॉ_मधूलिका

#ब्रम्हनाद 

गुरुवार, 9 मार्च 2023

मैं वैदेही

 



मेरे अवतारी ईश्वर को समर्पित- 


सुनो मेरे मनुज तन देव् अवतारी,

यदि तुमने निश्चित किया मेरा ,

परित्याग अपरिहारी,

तो रचना होगा ,

मुझे वैदेही सा विधान ,

तुम्हारे समर्पण को देने ,

राम की मर्यादा सा प्रतिमान।।


तो सुनो मैं करती स्वाहुत यज्ञ का आह्वान ,

अपनी अभिलाषाओं का करती हूँ ,देहावसान।

त्याग कर समस्त रक्त औ विधिक सम्बन्धों का,

लेकर तुम्हारे निर्णय की समिधा का दान ।।


तब होएंगी ,कुछ निश्चित आहुतियां,

सम सम भाव कुछ तय आवृतियाँ,

तब यम को मिलेगा प्रथम दान,

हृदय स्पंदन की आहुति ,हो निष्प्राण।

दूजा मिलेगा अग्नि को स्थान,

जब तन होगा चिता पर विराजमान ,

अंतिम भाव मिलेगा जल को ,

भस्मीभूत जब अस्तित्व अवसान ।


तब तुम करना ,मेरा भावों से तर्पण,

स्मृति पिंड से करना ,पिंडदान।

मोक्ष नही मुझ दासी की कामना,

पिय संग हृदय रहे बस मेरी वांछना ,

तब होउंगी ,मैं सकल तुम्हारी,

देह से अलग ,समष्टि विस्तारी।


मैं तुममे होऊं ; तुम्हारी समभाग ,

होगा पुरुष तन ,एक स्त्री का भान ,

मैं  होऊं अद्वैत  का सूक्ष्म परिमाण,

तुम स्थूल के रहोगे अपरिमित मान,


हाँ मैं वैदेही सा प्रारब्ध रचूंगी,

"विदेह" हो तुम्हारी देह बसूंगी,

"विदेह" हो तुम्हारी देह बसूंगी।


✍️ डॉ मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद 

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

रोज डे





आज दुनिया इस रोज़ डे की खुमारी में डूबी है ,और मैं सिर्फ आपकी यादों में। आज बादल थे यहां ,सूरज कुछ मद्धम सा। ऐसा लग रहा था जैसे मैं आपकी सोच में खोई रहती वैसे ये भी खोया था।
आज पहले सोची आपको "रोज़ डे " विश करके कुछ लिखूं। पर पता नही क्यों ये दुनियावी रस्म उस इंसान के लिए मुझे झूठी लगी जिसका होना ,जिसका एहसास मेरे हर रोज को महकाए रखता। क्या गुलाब आपकी उस भावना का मुकाबला कर पाती जो आपके सहेजे हुए हर रोज के गुलाबों में समाई हुई है। इस दिन के भाव को महज एक गुलाब की भावनाओं में कैसे समेट दूं ???
वो भाव जो सांस के चलने की वजह है, वो वजह जो जिंदगी को जिंदगी होने का एहसास देते। 
पशोपेश में हूँ , की कैसे ये रस्म निभाऊं, निभाऊं भी या नहीं??? 

हो सकता है प्रेम प्रदर्शन के इस तरीके में मैं पीछे हो जाऊं, पर हम ये वादा आज जरूर कर सकती हूँ कि आप जब जब मेरे प्यार को महसूस कर खुद को देखेंगे ,आपकी हर मुस्कान अनगिनत खिले गुलाबों को भी शर्मसार करने की आभा बिखेरेंगे। मैं हर पल ,हर दिन उस खिली मुस्कान को जीवंत रखने के लिए कृतसंकल्पित हूँ।

मैं हर रात आंख बंद करने से पहले और सुबह आंख खुलते ही आपकी गुलाबों सी मुस्कान को सहेज लेना चाहती हूं। आपकी सांसों की ,शरीर की गुलाब इत्र सी महक मेरे सर्वांग में व्याप्त रखना चाहती हूँ तो भला इक रस्म में आपको कैसे पूर्णता महसूस करा सकती।

आपकी एक उपवन की तरह सुरभित सोच और भाव ,रोज़ डे की विश में सार्थकता नही पा सकते। आपके लिए तो शायद संसार के फूल भी कम पड़ेंगे। मैं अपने आराध्य को अपना प्रेम समर्पित कर रही हूँ हर रस्म के लिए ,हर दौर के लिए। क्योंकि सुना है पार्थिव पूजन से कहीं ज्यादा मानस पूजन सफल और सार्थक होता। तो ग्रहण करिये मेरे सदा ही ताज़े और खिले हुए भावों के मानसिक फूल और कृतार्थ करिये मेरी पूजा को।

आपकी आराधिका 

#डॉ_मधूलिका
#ब्रह्मनाद 
 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

बिना_चाँद_की_रातें


 


वो मुझे चाँद कहता, मैं कभी उसके हांथों की लकीरों में उभर आती ,कभी आंखों में सज जाती। दिन होते ही उसके आगोश में छुपकर फिर एहसासों के उगने का इंतज़ार करती रहती।जब वो खुशी से मुस्कुराता ,तब मैं चतुर्थी का चन्द्र बनकर उसके होंठों पर उग आती। उसकी खुशी के साथ अनगिनत पुनर्जन्म मिलते मुझे। न जाने कितने बार उसने मुझे जीवन दिया।


       अब वो सारी रात अपनी आंखों के तले गुजरते वक़्त को पलकों की झपक से गिनता है। वो उदास सी उनींदी रातों को बुनता,उनमें नमी की झिलमिलाहट के  सितारे भी सजा लेता, पर चाँद उगाना उसने बन्द कर दिया। उसके जीवन में रातें तो आती पर चांद के बिना। वो उदास हुआ ,और मुझे ग्रहण लग चुका था। मैं डूब चुकी थी। और तब से अब तक जीवन के लिए तरसते हुए उसकी ओर निहार रही हूँ।छटपटा रही हूँ अपने अंधकार से उबरने के लिए। मैं वापस उगने के लिए उसकी मुस्कान की राह तक रही हूँ। शायद कभी मैं वापस एक जीवन पाऊँगी.... शायद वो मुझे कभी फिर जीवित करेगा। मैं आस में हूँ....... ।

✍️ डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी 

#ब्रह्मनाद

शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

एकांतिक प्रतीक्षा






 मन की गहराइयों के,

गह्वर और झंझावातों में,

स्पष्ट होकर भी,

कुछ भी दृष्टव्य नहीं।


मेरे अनन्त अथक,

 प्रयासों के मध्य,

कुछ निर्दिष्ट भावों के,

अनुप्रासों के मध्य,

कभी -कभी सब ,

सहज और सरल सा,

प्रतीत होने ही लगता।


मैं तुम्हारे निर्धारित पथ पर,

मूर्तिवत खड़ी होती,

अनिमेष दृष्टि और 

युगों की प्रतीक्षा लिए।

कभी इस निम्लित दृष्टि को,

सहसा यूँ बोध होने लगता,

कि एक बंकिम मुस्कान सहेजे,

तुम मेरी ओर ,

अविराम  चले आ रहे हो।


गुरुवार, 19 जनवरी 2023

मेरे बाद भी .....?

 


मेरे बाद भी क्या तुम,

हर लम्हा मुझको याद करोगे?

एक बार फिर से,

तुमसे मिलने को बोलूं,

ये कहकर लौटने की,

फरियाद करोगे? 

या कोशिश करने लगोगे,

शिद्दत से मुझे भुलाने की,

या जीकर मेरी यादों के संग,

खुद में मुझे जी जाने की,

ये अनोखी शाद रखोगे?

या टूटोगे हर लम्हा तन्हा,

खुद को खुद में खोकर से,

या सहेज के कुछ प्यारे से लम्हें,

खुश हो,मुझे आबाद करोगे?

या आंसुओं से धो दोगे,

तुम मेरी हर एक बात पुरानी,

या आसुओं से कलम सजाकर,

मुझे मुकम्मल किताब करोगे।

बोलो क्या मेरे बाद भी  क्या तुम,

हर लम्हा मुझको ही याद करोगे?

#डॉ_मधूलिका_मिश्रा_त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद 


जागती रातें

 




कुछ रातें होती जिनमें सपने नहीं होते। एकदम खाली। और कुछ जिनमें नींद ही नहीं होती। 

दिन भर की थकान से चूर मुरझाई आंखें, जिनकी नमी भी सूख चुकी है। जिनमें सपने भी नही बचे। बचे हैं तो टूटे सपनों की किरचें ,जो पलकें बन्द होने पर आंखों में गड़ते हैं....चोट पहुंचाते । पता नहीं इन आँखों में अब आंसू क्यों नहीं आते। तकलीफ में तो आंसू बहते हैं.....पर ये आंखें खाली हो चुकी। जैसे सिर्फ ये दृश्य की क्षणिकता तक ही जीवित रहती..... उसके बाद पथरा जाती हैं ।


पर यहाँ बात नींद की होती। खुशियों से भरी रातें बहुत छोटी होतीं। जैसे पलक झपकते ही खत्म हो जाती। लगता है जैसे अभी तो वक़्त शुरू हुआ...अभी कैसे खत्म हो गया। काश थोड़ा देर और ठहरती ये रात..... ।

और तकलीफ़ में नींद से खाली  हुई रातें ....सदियों से लंबी होती। शरीर को तोड़ती थकान हर अंग में भारी लगती....पर आंखें ये क्यों भारी होकर बन्द नहीं हो जाती। सपना न सही कम से नींद तो मिले...। नींद भी एक बड़ी नेमत है जो सही वक्त पर हर किसी को नहीं आती।खुशनसीब और स्वस्थ लोग होते हैं वो जिनको आंखों में नींद का बसेरा होता।


इन जागती आंखों में जैसे हर सम्वेदी अंग और ज्यादा सक्रिय हो जाता। आंखें अंधेरे के पार देखने लगती। कानों में घड़ी के कांटों की सरकन भयावह लगती। 1सेकंड सरकने में लगता जैसे मीलों चलने जितनी ताकत लगाती हो ये घड़ी। AC रूम में  भी कई बार बिना आंसू बहाए रोकर अंदर ही जप्त आंसुओं की भाप शरीर को गर्मी से उबालने से लगती। कानों में अपनी ही हृदयगति हथौड़े से तेज़ पड़ती और दिमाग जैसे धड़ धड़ करते कई प्रश्न की ट्रेनों का जंक्शन बन जाता। जिसमें भीड़ इतनी ज्यादा की मैं पहली बार सफर पर निकले राहगीर सी बदहवास सी उस  सही प्रश्न वाली ट्रेन  को भी खो देती। 


एक अनजाना डर हावी हो जाता..... प्रश्नों का ताना बाना ऐसे जकड़ लगता जैसे हवा में कई माझें वाली पतंग आपस मे उलझ कर सुलझाने वाले हाँथ को ही काट देती।

एक प्रश्न सर उठाता.... उत्तर नहीं ढूंढ पाती,तब तक दूसरा ,फिर तीसरा और न जाने ये क्रम कहाँ तक चलता जाता। इस दौरान डर कर पसीने  से सराबोर यूँ लगता जैसे जीवन की परीक्षा  का पर्चा है ,और मैंने तो इसमें कुछ पढा और जाना ही नहीं।इस परीक्षा में हमेशा फेल ही होती आई हूँ। 

कभी कभी नींद का एक झोंका आने पर मुझे ये सपना कई बार आता। कि मेरी परिक्षा और मैंने वो विषय पढा ही नहीं जिसका पेपर। 

ये रातें इतनी भयावह होती कि इन प्रश्नों के उत्तर देने के लिए आपके पास कोई नहीं होता। नितांत अकेले। एकांत अकेलेपन में बदल कर मुँह फाड़ने लगता जैसे कृष्ण विवर। और हम उससे बचने की जद्दोजहद में संघर्ष करते कि शायद जल्दी कोई किरण फूटे। इस रात का अंत हो। 

रात खत्म हो जाती।पक्षी कलरव से जता देते सुबह आ गई।पर तब तक रात में खुद से ही लड़कर सुबह के इंतज़ार में इतना टूट जाती की अब सुबह भी न उत्साह दे रही न खुशी। एक टूटे मन और थके तन को किसी तरह समेट कर ढेर आलस से लिपटे होने के बावजूद मशीन की तरह  दिन से रात तक के सफर के लिए फिर उठना पड़ता। हर दिन एक सोच चलती.....काश एक रात ऐसी हो,जिसमें सपने हो। सपने ना हो तो कम से कम नींद तो हो। जिसकी आगोश से उठने का कभी मन न हो।न कोई उठा सके।न उठने की बाध्यता हो। काश एक ऐसी रात मिले........


#डॉ_मधूलिका_मिश्रा_त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद 


शनिवार, 31 दिसंबर 2022

#चरैवेति

 



लीजिये ,ये भी चला ही जा रहा। रोके कब रुकता है.....ये पल,ये जीवन,और ये आवगमन चक्र ही संसार की निरंतरता का पर्याय। आज हम जिसका इंतज़ार कर रहे,वो पल आएगा और पलक झपकते ही वो #गत भी घोषित हो जाएगा। और इन्हीं में हम उत्सवों के अवसर तलाशते। किसी का जाना भी उत्सव का कारण!!!!!!! जैसे मृत्यु आत्मा का अवसान नहीं ,बल्कि जीवन का सतत अंग है। ये निशानी है ,ना ठहरने की.....चलते जाने की..... गुजरते हर पल में गुज़र जाने की......।

अगले पल या पीढ़ी को अपना स्थान देने के लिए खुद से रिताने की प्रक्रिया का माध्यम ......उत्सवों के आह्वान ।
विगत को याद रखने ,आगत के स्वागत के लिए, निरन्तरता के औदार्य प्रश्रय की प्रक्रिया ........ उत्सवों का भान।

जो जा रहा वो दीर्घ जीवनाक्रान्त #महीनों के बंधनों का अंत है। बिना किसी भूमिकाओं के जिज्ञासाओं का अंत है। कई प्रतीक्षाओं के अधूरे होने पर भी एक निश्चित अवधि का अंत है। किंतु जो समाप्त हो रही वो सिर्फ अवधि ,समय निरन्तर है। नवीनीकृत पुरातनता का मापक - समय ।

ये आपके लिए नवीन हो सकता, किन्तु ये सर्वमान्य नवीन नहीं। कोई अभी इसे रुका मान रहा,तो किसी की चेतना में इसकी अनुभूति नवीन नहीं। कोई व्यवहारिक दृष्टि से अपने संस्करण में इसे नवीन नहीं पाता तो कोई इसे सिर्फ काल  गणना समझता .....।

जो बीत रहा ,वो सिर्फ एक दृश्य है, दृश्य की सत्यता स्थायी नहीं। स्वयं को दृष्टा के रूप में विलय कर सिर्फ उसकी अनुभूति ही सत्य है और वही जीवन की वास्तविकता और विशेषता। तो प्रतिपल के पुनर्जन्म के साक्षी होकर स्वयं में प्रतिपल नवीन अनुभूति को पुनर्जीवित करते रहिये। आलोकित रखिये जीवन के अनंतपथ को स्वयंप्रभा से। भले ही वो  तिमिर पथ पर आपके चरणों के आगे ही एक मद्धम से प्रकाश से पथ का आभाष प्रस्तुत करे... पर निरन्तर रखिये  ,तरल रखिये ,सरल रखिये। जीवन को बढ़ने दीजिये ....उस पथ पर जो अनंत है। शिव ,शिवकारी हों।
गत  से उत्तरोत्तर आगत की ओर कदम बढ़ाने की शुभकामनाएं 🙏🙏🙏

#डॉ_मधूलिका_मिश्रा_त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद 


गुरुवार, 29 दिसंबर 2022

संवेग

 



धुंधली दृष्टि,आंसुओं से।

उबलता खून ,धमनियों में।

अभी तरलता, कभी विरलता,

अभी डूबता,कभी उबरता।

अभी कठोर,कभी आक्रांत,

अभी कोलाहल,कभी एकांत।

अन्तस् ,अनंत सा।

विचार,शून्य सा।।

उंगलियों के पोरों से ,

छिटकते कई भाव।

प्रवाह है निरंतर,

हाँ पर रुके हैं ,

भावों के प्रमाद।।

#डॉ_मधूलिका_मिश्रा_त्रिपाठी

सोमवार, 26 दिसंबर 2022

#तुम_जैसा_सोचोगे_मुझको___मैं_वैसी_हो_जाऊंगी




मैं मरुथल में मृगतृष्णा सी हूँ,

जिसमे तुम्हारे ही ख्यालों की मछलियां उछलती हैं।

परिणामतः लोग मुझे मत्स्यगंधा की पालक मान लेते।


मैं एक वन सी हूँ गहन हूँ,

जिसमे तुम्हारी ही गम्भीरता की गहनता है,

परिणामतः लोग मुझे मलय पवन की सृजक मान लेते।


मैं एक अस्थिर प्राणी सी हूँ,

जिसमे तुम्हारे कोमल भाव महकते हैं,

परिणामतः लोग मुझे कस्तूरी -कुंडली  बसाए एक मृग मान लेते।


मैं एक असीम अनंत रहस्य सी हूँ,

जिसमे तुम्हारे चित्त का ठहराव है,

परिणामतः लोग मुझे जलनिधि मान लेते।


मैं  एक  तप्त गलित लौह सी हूँ,

जिसमे तुम्हारे पौरुष का ओज ढलता है,

परिणामतः लोग मुझे अयस्क पिंड सी कठोर मान लेते।


मैं धवल प्रकाश सी हूँ,

जिसमे तुम्हारे ज्ञान की शुभ्र रश्मियां प्रकाशित है,

परिणामतः लोग मुझे ज्ञान सलिला मान लेते।


तुम समझ गए ना ???

मेरा अस्तित्व प्रवंचना है..

मेरा मूल बस,

तुम्हारी वैचारिक रचना है।।

मैं ना हूँ सत्य, 

ना सत्य सम ,

जब तक ना रहें ,

तुम्हारे पूरक हम।।

सुनो गर देना हो ,

मेरे आभास को ,

एक आकाश सा,

अविराम ,निश्चल आह्वान,

तुम्हें ,रचना होगा ,

पल - प्रतिपल एक ,

उदीप्त विचार,

तुम जो सोचोगे ,

मैं वैसी ही हो जाऊंगी,

तुम्हारे ख्यालों की अनुपस्थिति में,

मैं बस ख्याल ही रह जाऊंगी।

तो देने मुझको पूर्णता,

तुम रचना एक,

 अनवरत  विचार श्रृंखला ,

जिसके सृजित विचारों से ,

मैं प्रतिपल जीवन पाऊंगी।

तुम जैसा सोचोगे मुझको,

मैं वैसी हो जाऊंगी .....

सुनो मैं निःशब्दता ,

तुम्हारे  स्वर में स्वर पाऊंगी,

जब जब तुम सोचोगे मुझको,

मौन का निनाद बन जाऊंगी,

तुम जैसा सोचोगे मुझको,

मैं वैसी हो जाऊंगी.....


#डॉ_मधूलिका_मिश्रा_त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद 


संस्मरण - वायलिन की धुन

 




बात पुरानी हो चुकी पर जब जब वायलिन की धुन सुनती ,वो स्मृति चंदन कि तरह भीनी भीनी महक उठती। वर्ष 2001 ठंड शुरू हो चुकी थी। हम सभी परास्नातक की छात्राएं सेमिनार और सेमेस्टर एग्जाम की तैयारी में जुटे थे। 

होस्टल में खाना मिलने का वक़्त शाम 6 से 7.30 तक था ....लगभग सभी खाना खाकर शाम की प्रार्थना के बाद पढ़ने से पहले कुछ मौज मस्ती की तैयारी में थे। अचानक होस्टल के स्पीकर में कॉल हुआ सभी छात्राएं कॉलेज ऑडिटोरियम में इकट्ठी हो। 

लीजिये हम सबके चेहरे में 8 बजे ही 12 बज गए ,पूरे दिन में सहेजा गया ये समय न जाने किस मोटिवेशनल स्पीच या संगीत कार्यक्रम की भेंट चढ़ने वाला था।

दरअसल कॉलेज बन्द होने के बाद हम होस्टल की गाय भेड़ बना कर हांक ली जाती थी 😂😷... 

खैर आदेश था तो पालन भी किया। प्रस्तुत आगत को लगभग कोसते हुए हम सब लड़कियां ऑडिटोरियम में इकट्ठे हुए। वाईए इस वक़्त कॉलेज में प्रवेश एक अलग सुकून भी दे रहा था,क्यों????? अरे ना प्रेक्टिकल का टेंशन ,ना कोई लेक्चर क्लास।

जाकर ऊँघते हुए हम सब कुर्सियों में जम गए, कुछ को चुहल सूझ रही थी,कुछ नाक चढ़ाए बिसूर रही थी। 

लीजिये हमारी होस्टल की वॉर्डन मैडम ने स्टेज से घोषणा की कि अभी आपको श्री .......जी का वायलन वादन सुनने को मिलेगा। 

सबने माथे पे हाँथ रख मुँह में कुछ बुदबुदाया सा, हे राम किसी गायक को भी बुला लेती  जो ख्याल ,भैरवी ,यमन ,दीपक राग से हम सबके सब्र का इम्तेहान ले सके 😥 😠 और कुछ चमची टाइप कन्याओं ने वाओ मैम कह कर गुड गर्ल लिस्ट में  अपनी रैंकिंग ऊपर की। 😇


अब ओखली में सर गया तो मूसल पड़ना ही था।

सभी कलाकारों ने मंच पर जगह लेकर ,अपना परिचय दिया। अफसोस मुझे नाम याद नही अब :( .....

उन्होंने शुरुआत की" ऐसी लागि लगन" भजन की स्वर लहरी से।

ये क्या हम सब चुपचाप ,एकटक मुग्ध से उनके वाद्य यंत्र के स्वर और नाद को सुनने लगे।

लय बढते हुए "जादूगर सैंया,छोड़ मोरी बैय्यां" ,

"ओ बसंती पवन पागल"  जैसे कई गीतों की स्वर लहरी से होते हुए सफर थमा 

" वंदे मातरम " पर।

बिना बोले हम सब अपनी सीट छोड़ खड़े हो गए। 

पता नही क्यों मेरे सहित बहुत सी लड़कियां भाव विभोर थी। भावातिरेक में मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे ,और आंखों की दृष्टि आसुओं की वजह से धुंधली हो गई थी। 

आते वक्त जिन पर हमारा गुस्सा अप्रत्यक्ष रूप से बरस रहा था ,जाते वक्त हम सब नत थे उनकी प्रतिभा के सम्मुख। 

कहाँ हम सोच कर आए थे कि ये संगीत हम सबके  पल्ले नही पड़ने वाला ,कहाँउस रात से लेकर कई दिन तक वो हमारे दिमाग मे गूंजता रहा। आज भी जादूगर सैंया ,और वन्दे मातरम मुझे कानों में बजता सा सुनाई दे रहा।

सच में संगीत वो नहीं जो आपको किसी विशेष ज्ञान से ही महसूस हो,,, संगीत तो वो जो सहज ही आपकी आत्मा,हृदय और जेहन में प्रवेश कर जाए। वो आपको यूँ आत्मसात कर ले,जैसे जीवन आपको महसूस होता। 

वाकई जीवन भी एक संगीत है ,आत्मा का ,सांसों को ,उसको समझने के लिए दिमाग मत लगाइए,मन को मुक्त कर दीजिए उसे ग्रहण करने के लिए।

ये बात मैंने उस दिन महसूस की, आप आज महसूस करिये। 

सुनिए सासों के मधुरतम संगीत को ........

रविवार, 11 दिसंबर 2022

मां की पाती

 






मेरी प्यारी सी गुड़िया अन्वू,

कभी लगता  हर दिन बहुत लम्बा अंतराल लेकर गुजरा और कभी लगता यह (12/12/12)कल की है बात है ,जब बेहद खूबसूरत सी एक नाजुक सी गुड़िया अपनी चिबुक पर हाथ टिकाए मेरे बगल में लेटी हुई थी।तुम्हारे आने से पहले एक लम्बा दौर जिया था मैंने इंतजार का ...अवसादों का .... आशाओं और निराशाओं के उतार चढ़ाव का....। अंततः तुमने आकर उस दौर को खतम किया।

 मां बनना सुख और संघर्ष के सिक्के के दो पहलू हैं। एक ओर तुम मेरी ताकत हो...मेरी खुशी हो....तो दूसरी ओर मुझे कमजोरी और दुख भी तुमसे ही जुड़े हुए हैं। तुम्हारी हर असफलता या कमजोरी या व्यवहारगत परेशानी जहां मुझे निराशा के गहरे भंवर में धकेल देती है तो तुम्हारी मुस्कान ,शरारतें , छोटी से छोटी उपलब्धि  और तुम्हारी खुद की  समस्याओं से धीरे - धीरे लड़ना , उबरना ;खुशियों  के सतरंगे इंद्रधनुष की दुनिया में पहुंचा देती हैं। 

 कई बार मुझे लगता ,मुझसे ज्यादा समझदार तुम हो,मुझसे कहीं ज्यादा उदार। तुम पर कई बार अपना गुस्सा उतार कर ,तुमसे कभी घृणा नहीं पाई मैंने। तुमने अपनी नन्हीं बाहें फैलाकर हमेशा मुझ पर स्नेह ही बरसाया। कई अवसरों पर मेरी ढाल बनाकर खड़ी भी हो जाती । उस वक्त लगता जैसे मैं नहीं ,तुम मेरी मां हो। 

 जब  मेरी अपेक्षाऐं या आशाएं टूटती तो लंबे समय अवसाद से घिरी होती हूं। पर तुम गिर कर उठने और सम्हलकर फिर हंस कर जुट जाने में माहिर हो। वास्तव में तुम जैसी पावन और सच्ची आत्मा ही जीवन को सिर्फ उसी पल और आज में जीने की क्षमता रखती। कभी - कभी लगता तुम नहीं ,बल्कि ये संसार तुम जैसे सीरत के लोगों के लायक नहीं है। ये झूठ ,दिखावे,छल और मतलबपरस्त लोगों से भरा हुआ है...जहां तुम जैसे लोग अनफिट माने जाते। पर ईश्वर इस दुनिया में अब भी कुछ पवित्रता बचाए रखना चाहता ,इसलिए तुम और तुम जैसे लोग धरती पर भेजता। ये हमारी कमजोरी की हम जैसे लोग तुम जैसों के लायक ये दुनिया में बना पाते। 

 तुम्हारे आने के बाद ही कोशिश कर पा रही हूं हर दिन संघर्ष करके जीना। एक उद्देश्य के साथ आगे बढ़ना। 

 मेरी बच्ची मैं जानती हूं एक मां होने के नाते मैं तुम्हें कई बार बहुत कुछ करने से रोक देती हूं ,जो तुम चाहती हो। क्योंकि कहीं ना कहीं तुमको लेकर सुरक्षा की भावना हावी हो जाती है। पर यकीन मानो तुम्हारी मां कभी तुम्हारे रास्ते की बाधा नहीं बनेगी....मैं वो रोशनी बनकर हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी जो तुम्हें आगे तक का रास्ता साफ देखने में मदद करेगी। 

 तुम अपने पंख खोलो... उड़ो ... और अपने जीवन की परवाज को पूरा करो...मैं बेड़ी नहीं तुम्हारा आकाश बनूंगी,तुम्हारा हौसला रहूंगी। आज के इस विशेष दिन में तुमको अनन्त शुभकामना और स्नेह मेरी राजकुमारी। बस यही कामना रहेगी की अपने जीवन को स्वतंत्र रूप से और भरपूर जियो। इस तारीख को तुमसे एक विशेष पहचान मिले..... हैप्पी बर्थडे मेरी लड्डू।

 

 #अन्वेषा_की_मम्मा 

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

लv जिhaद

 "दुनिया की नजरों में तुम भले ही मेरी पत्नी बन गई हो किन्तु मेरे लिए तुम तब तक मेरी बीवी नहीं, जब तक तुम 3 बार ‘मुझे कबूल है, कबूल है, कबूल है’ नहीं कह देती।’’ हिन्दू रीति-रिवाज से एक हिन्दू लड़की विवाह कर जब पहली बार ससुराल पहुंचे और उसे पता चले कि जिस लड़के ने खुद को हिन्दू बताकर उससे शादी की है, वह वास्तव में मुसलमान है तो उस पर क्या बीती होगी? झूठे प्रेमजाल में फंस वैवाहिक जीवन के हसीन सपने लिए जिसे वह अपने जीवन की डोर थमा बैठी हो, वही उसे सुहागरात के दिन इस्लाम में मतांतरण के लिए प्रताडि़त करे, इससे बड़ी त्रासदी और क्या होगी?


लव जिहाद कैसे होता है इसका कोई वजूद है या नही इसपे बहस करने वाले बहोत लोग है आपको सोसल मीडिया पे इसके बहोत से सामग्री उपलब्ध मिलेंगे जिनमे इससे बचाव इनकी पहचान और अन्य बाते रोज कोई न कोई लिखता ही रहता है ।। लेकिन आज भी कुछ बाते ऐसी है जो आपको नही पता है , लव जिहाद करने के लिए एक पैटर्न काम करता है वो पैटर्न समझ लीजिए आपको लव जिहाद समझ मे आ जायेगा और इससे आप बच भी सकते है --

लव जिहाद के कुल 4 चरण है 

1- आयु 

2 - पैसा 

3- शिक्षा

4 - सौंदर्य 


आयु -- लव जिहाद की शिकार सबसे ज्यादा 15 से 25 साल और फिर 35 से 45 साल के बीच की हिन्दू स्त्रियों को टारगेट किया जाता है ।।


पैसा - गरीब घर की लड़कियों और जरूरतमंद हिन्दू घरो में इसी के माध्यम से पैठ बनाई जाती है एक बार घर मे इंटर हुए तो शिकार शुरू


शिक्षा -- पढ़े लिखे घर की लड़कियां आफिस क्लास और जो धर्म कर्म में ज्यादा विश्वास रखे उसके लिए पहले उसके रीतियों के लिए उसके मन मे द्वेष पैदा कर दो फिर इस्लाम की तारीफ और शिकार हाजिर 


सौंदय - स्मार्ट लड़के कॉलेज , ब्यूटी पार्लर आफिस के बाहर आपका ही इंतज़ार कर रहे है ।। हर लड़की चाहती है कि उसका bf या पति स्मार्ट हो और ये कमी वो पूरी करता है और लड़की शिकार बन जाती है ।।


पैटर्न -- सर्च + स्टाल्क+हेल्प + इम्प्रेस+ अप्प्रोच 


इसमे सर्च का काम लोकल मुस्लिम जैसे रिचार्ज वाला किराने वाला कंबल बेचने वाला और मुस्लिम मित्र स्कूल की 

टाइप कन्फर्म होने पे उसी कि पसन्द के मिलने वाले लड़के से उसका पीछा करवाना ।

हेल्पफुल लड़का आपकी हर जरूरत पे आपके लिए खड़ा होता है ।

आपको इम्प्रेस करता है और आपकी तारीफ में कसीदे आपको गुड मॉर्निंग गुड नाईट का कंटीन्यू संदेश आप उसके केअर और हेल्पफुल नेचर से खुस 

सही समय पे जब आप कभी कमजोर हो भावनात्मक रूप से आपको अप्प्रोच (प्रोपोज़) करना लड़की कभी मन नही कर पाती ।।


बचाव -- बस अपने बच्चो को समय दीजिये अपने घर की औरतों को समय दीजिये , बस इतना ध्यान रहे कि लव जिहाद तभी हो सकता है जब लव की जरूरत महसूस हो । ये याद रहे कि लव ज़िहाद की शिकार सबसे ज्यादा शादीशुदा यानी 35 से 45 के बीच और बच्चियों 15 से 25 ये ही है बीच के उम्र की लड़कियां एक मुश्किल टारगेट होती है इनके लिए सेक्यूलर बिग्रेड काम करती है 


सिर्फ भारत मे ही नही विश्व के हर कोने में इसे सुनियोजित तरीके के चलाया जा रहा है बस इतना समझ लीजिए कि इस्लाम मे सिर्फ 2 चीज़े है इस्लामिक(मोमिन) गैर इस्लामिक(काफिर) और इनका काम है सिर्फ काफिरों को इस्लाम कबूल करवाना वो किसी भी तरह हो ।।

मैं कुछ दिन पहले uk में था एक न्यूज स्क्रॉल करने के दौरान मुझे ये मिला --

five men of Pakistani origin, found guilty of a series of sexual offences against girls as young as 12. They were jailed. The reason why it is in the news again is that an official inquiry into the failure of police and social services to take action has submitted its report now. Some 1,400 girls from the north England town of Rotherham were sexually exploited between 1997 and 2013, and the inquiry found “blatant’’ collective failure on the part of the police and other local authorities to stop it.


"5 पाकिस्तानी मूल के इस्लामिक लड़को ने 1400 लड़कियों का सेक्सउली हररेशमेंट किया और उन्हें ब्लैकमेल करके इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया वो पकड़े गए और सजा हुई "


सैकुलरिस्ट ‘लव जिहाद’ को स्वीकारने से इन्कार करते हैं जबकि दक्षिण भारत के केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश में यह चरम पर है। केरल के पूर्व माक्र्सवादी मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि समूचे केरल के इस्लामीकरण की साजिश चल रही है।  


दिसम्बर, 2009 में केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के.टी. शंकरन ने ‘लव जिहाद’ पर कटु टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘‘ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि प्यार की आड़ में जबरन मतांतरण की साजिश चल रही है। छल और फरेब के आधार पर इस तरह के मतांतरण को स्वीकार नहीं किया जा सकता।’’


इससे काफी पहले सन् 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने भी तत्कालीन प्रदेश सरकार से पूछा था कि केवल हिन्दू लड़कियां ही इस्लाम क्यों कबूल रही हैं? न्यायमूर्ति राकेश शर्मा ने तब टिप्पणी की थी, ‘‘न्यायालय के सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनमें हिन्दू लड़कियों से इस्लाम कबूल करवाने के बाद उनका निकाह मुस्लिम लड़कों के साथ कर दिया जाता है। निकाह के बाद उनका पता-ठिकाना नहीं मिलता।’’ सैकुलरिस्ट अदालतों की इन टिप्पणियों को कैसे नकारेंगे?


लव जिहाद’ के अंतर्गत हिन्दू युवतियों से निकाह के बाद इन युवकों का असली चेहरा सामने आता है। ऐसी युवतियों को बाहरी दुनिया से सम्पर्क नहीं करने दिया जाता। उनका अधिकांश समय आतंक, जिहाद और अंतत: उनके द्वारा अपनाए गए नए मजहब की जीत का महिमामंडन करने वाली वीडियो या पर्चों-पुस्तकों को देखने-पढऩे में ही व्यतीत होता है। यह सब कुछ उन्हें जिहादी बनाने और आत्मघाती मानव बम बनाने की रणनीति का हिस्सा है। अभी हाल तक अधिकांश मुस्लिम युवक हिन्दू युवती से प्रेम विवाह मजहबी जुनून से प्रेरित होकर करते थे और इस ‘सवाब’ के काम में अक्सर उसके परिजन भी सहायक होते थे क्योंकि एक काफिर ‘मोमिन’ हो गई। अब इस मजहबी जुनून को जिहाद का अस्त्र बना दिया गया है।

#डॉ_मधूलिका_मिश्रा_त्रिपाठी


रविवार, 4 दिसंबर 2022

#life_is_not_a_bed_of_roses




कहते हैं ,जीवन की नींव बचपन में ही पड़ जाती।हमें  बच्चे के व्यक्तित्व को किस रूप में ढालना ये उस पर निर्भर करता कि हम उसे क्या सिखाते। हम बच्चों के लिए उस पड़ाव में हद से ज्यादा रक्षात्मक हो जाते। कोई भी नकारात्मक विचार से उसे दूर रखने का प्रयास करते। कोई भी घटना जो हमें लगता कि  बच्चों के मन में प्रश्न जगा सकती,उससे दूर रखने का प्रयास करते। शारीरिक रूप से भी उसे कोई चोट न पहुंचे इसके लिए हम जरूरत से पहले ही मौजूद रहते। भूख -प्यास महसूस न हो इसका इंतज़ाम भी यथासंभव करते। परी कथाओं को सुनाकर उसे सुनहरे सपने और एक खूबसूरत दुनिया दिखाते। अक्सर  सफलता की होड़ में अग्रणी होने पर सफल बताते,और ये प्रयास भविष्य में भी उसे आगे और सफल रखेंगे ,ये समझाते रहते। 

कुल मिलाकर एक सुनहरा सा दायरा बना देते हैं जिसमें सच्चाई कम ,अपेक्षा ज्यादा होती। पर आज अगर मैं आपको कहूँ कि आप ऐसा करके एक इंसान को कमज़ोर बना रहे तो शायद आपको मुझ पर ही हंसी आएगी। 


फर्ज़ करिये एक बच्ची थी,बेहद कुशाग्र ,हर दिल अजीज़, हर काम में बेहतरीन, हँसमुख ,हर जगह महत्व पाने वाली। उसे सिखाया गया कि जीवन ऐसा ही होगा।तुम्हारी शर्तों पर जी सकोगी। हमेशा इन खूबियों के साथ वो छाई रहेगी,अपने सुनहरे दायरों में। एक वक्त तक उसे सब सच लगा। अपनी खूबियों ,सपनों से उसे प्यार था। उसका होना उसे कुदरत का उपहार लगता।  वो बड़ी हुई ,उसका विवाह हो गया।  सुनहरी दुनिया रंग बदलने लगी थी। उसकी खूबियों में पहले जहां उसकी वाहवाही होती थी,अब वो दम तोड़ने लगी थी। उनके लिए ही उसे ताने मिलते, जो उसे उसकी ताकत लगते थे।उसके सपनों को समर्पण का जामा पहनाने की अपेक्षा और कवायद हुई। उसके होने का मतलब ,सिर्फ दूसरों की इच्छा अनुसार ढलना। उसे समझ आया कि कल जिन बातों को लेकर उसे बताया गया कि ये तुम्हारी सफलता की सीढ़ी है,वो अर्थहीन है। उसके सपने ,उसकी महत्वाकांक्षा ही आज उसका दम घोंट रहे थे। उसे अब लगने लगा कि काश उसकी आँखों में इतने बड़े सपने न डाले जाते,उसे ये न बताया जाता कि वो विशेष है। काश उसे बेहद आम बताया जाता ,उसे बोला जाता कि जीवन संघर्षों के नाम है।काश उसे  बताया जाता,की कर्म नहीं ,भाग्य ही प्रबल होता। जो उसकी विशेषता ,वो कोई गुण नहीं ,बल्कि सिर्फ विधा है। उसे ये ना बताया जाता कि तुम्हें कुछ विशेष करना है… काश उसे बताया जाता कि आम सा जीवन होना ही सच है। जिसमें कोई उद्देश्य नहीं हो सिर्फ एक नियमित दिनचर्या के अलावा। ऐसी स्थिति में वो ऐसी टूटी कि जिंदगी से ही उसका मोह भंग हो गया। 

वास्तव में जीवन का सच हमें बचपन से ही बताना चाहिए। बताना चाहिए कि हर कदम श्रेष्ठ होने पर भी जीवन मे सफल हो जाओ ये जरूरी नहीं। कोई लूज़र माना जाने वाला इंसान भी तुमसे बेहतर जिंदगी जी या साबित  हो सकता। बताना चाहिए कि तुम इतने भी विशेष नहीं ,तुम आम से इंसान हो ,जो कई अरबों में एक हो। हमेशा सपनों में मत रहो, एक आम सी दिनचर्या भी जिंदगी होती। हर वक़्त मत हाज़िर कर दीजिये उनके पंसद का खाना,तेज़ भूख महसूस होने दीजिए,प्यास महसूस होने दीजिए। उनकी मर्ज़ी मत चलने दीजिये,उन्हें  समझौते सिखाइये। रोने पर हमेशा अपना कंधा मत दीजिये ,बताइये की खुद चुप होना सीखना होगा। कहीं चोट लगने की स्थिति में आप आगे मत आइये, लगने दीजिये उसे चोट,ताकि कल वो किसी के भरोसे खुद को सम्हालने की कोशिश न करें। उसे परियों की कथाएं नहीं,असली जिंदगी की कहानियां बताइये। जिसमें दुःख हों,तकलीफ हों,बीमारी हो ,भूख हो। समाज से मिले तिरस्कार हो,जिनमें मृत्यु का भी जिक्र हो। ताकि कल जब उसे अपेक्षित कल न मिल पाए तो वो टूटे नहीं। बल्कि सहज ही असफलता को भी स्वीकार कर जीता रहे। उसे बताइये की हर कहानी का अंत सुखद नहीं होता,कुछ में त्रासदी भी होती। जिस दिन ये सब सीख लेंगे,जान जाएंगे यकीन मानिए,आतमघात की प्रवृत्ति खत्म हो जाएगी। 

क्योंकि तब उन्हें पता होगा #life_is_not_a_bed_of_roses…. तब कांटे उन्हें जीवन का अंग लगेगें। आखिर सुख से ज्यादा जीवन दुख ही देता।