( छायाचित्र गूगल से साभार )
मेंटल हेल्थ.... अगर इसकी बात करें तो ज्यादातर लोग कहते हैं आजकल तो नई पीढ़ी का फैशन या सटीक शब्द कहुँ तो "चोंचले" घोषित किए जाते हैं।
पर वास्तव में ये टैबू वाला विषय है ,जिसके बारे में बात करना आज के समय में सबसे ज्यादा ज़रूरी।
मेंटल हेल्थ भी बड़ी अजीब चीज़ है… जब तक इंसान सबकी सुनता रहे, सबके लिए उपलब्ध रहे, अपनी परेशानियाँ छिपाकर दूसरों के चेहरे पर मुस्कान सजाता रहे, तब तक वो बहुत समझदार और मज़बूत है। लेकिन जिस दिन वो अपनी थकान ज़ाहिर कर दे, थोड़ा दूर हो जाए या अपनी शांति को प्राथमिकता देने लगे, उसी दिन उसके व्यवहार पर रिसर्च शुरू हो जाती है। 😂
मज़े की बात ये है कि लोगों को दूसरों की ज़िंदगी में दखल देने का पूरा अधिकार चाहिए, मगर अपनी ज़िंदगी में कोई झाँक ले तो प्राइवेसी याद आ जाती है। मानसिक स्वास्थ्य पर ज्ञान देने वाले भी अक्सर वही होते हैं, जो दूसरों का मानसिक सुकून छीनने में पीएचडी कर चुके होते हैं।
ख़ैर, व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन एक गंभीर बात समझने की ज़रूरत है।
शरीर में बुखार हो जाए तो डॉक्टर की सलाह लेते हैं, किडनी में दिक्कत हो तो स्पेशलिस्ट ढूँढ़ते हैं, दिल परेशान करे तो कार्डियोलॉजिस्ट की शरण में पहुँच जाते हैं। लेकिन जब मन थकने लगे, दिमाग़ उलझनों से भर जाए, रातों की नींद और दिन का सुकून छिनने लगे, तो सलाह मिलती है, “अरे! इतना मत सोचो, सबके साथ होता है।” मानो मानसिक तनाव कोई स्विच हो, जिसे ऑफ करते ही सारी परेशानियाँ छूमंतर हो जाएँगी।
*मेंटल हेल्थ के लिए किसी प्रोफेशनल की मदद लेना स्वयं को पागल स्वीकार करना नहीं है, बल्कि परेशानियों को पागलपन की हद तक पहुँचने से पहले सँभालने की दिशा में उठाया गया एक समझदार कदम है, जहाँ से वापसी मुश्किल महसूस होने लगे।*
याद रखिए, आपका मन और दिमाग़ भी आपके शरीर का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जितना दिल, किडनी, यकृत, पेट, हाथ और पैर। जिस तरह आप शरीर के इन अंगों को स्वस्थ रखने के लिए प्रयास करते हैं, उसका एक छोटा-सा हिस्सा भी अगर अपनी मानसिक सेहत पर खर्च करें, तो जीवन को कहीं बेहतर ढंग से जी सकते हैं।
अपने शौक के लिए समय निकालिए। ऐसे दोस्त बनाइए, जो हर बात पर *“सुन चंपा, सुन तारा…”* करके आपकी बातों के लिए बीबीसी न बनें, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर कड़वी ही सही, मगर सही सलाह दें। दिल खोलकर हँसिए, खुशी के अवसर तलाशिए, अपनों के साथ वक्त बिताइए और अपनी तकलीफ़ को हमेशा मुस्कान के पर्दे में छिपाकर मत रखिए। ज़रूरत पड़े तो किसी विशेषज्ञ से बात करने में भी संकोच मत कीजिए।
क्योंकि हर वक़्त मुस्कुराना मानसिक रूप से स्वस्थ होने की निशानी नहीं, और हर वक़्त चुप रहना घमंड नहीं होता। कभी-कभी इंसान दुनिया से नहीं, दुनिया के दिए हुए तनाव से थोड़ा आराम चाहता है।
दिल खोलकर जिएँ, ताकि जीने के लिए दिल न खुलवाना पड़े… और मन की सुन लें, ताकि एक दिन मन की आवाज़ सुनने के लिए बहुत देर न हो जाए।
दूसरों का ख़याल रखते-रखते ख़ुद को खो देना कोई महानता नहीं है। आप भी उतने ही क़ीमती हैं, जितने वे लोग जिनके लिए आप हर दिन मज़बूत बने रहते हैं।
इसलिए कभी दुनिया को सँभालने से पहले ख़ुद को सँभाल लीजिए। अपने मन को भी वही प्यार, वही समय और वही संवेदनशीलता दीजिए, जो आप अपनों पर लुटाते हैं।
क्योंकि ज़िंदगी सिर्फ़ साँसें लेते रहने का नाम नहीं, सुकून से जीने का नाम भी है। और आपकी ज़िंदगी में आपकी मौजूदगी भी उतनी ही ज़रूरी है, जितनी दूसरों की ज़िंदगी में आपकी।
#ब्रह्मनाद
#डॉ_मधूलिका





















