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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

मरने से पहले जीना सीख ले


(चित्र गूगल से साभार )


#जिजीविषा


#life_is_not_a_bed_of_roses 


जीवन क्या है? जन्म से मृत्यु तक का सफर..... एक लंबा अरसा ..जिसे किसी नियमित दिनचर्या के तहत व्यतीत किया जाता है। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो रुकिए ,मैं चाहती हूँ आप इस लेख को जरूर पढ़ें। शायद नज़रिया ही बदल जाए। 


समस्या ,दुख, तकलीफ ,रोग ....... कौन है जिसकी जिंदगी में इन शब्द से परिचित नहीं........!! जवाब होगा - कोई भी नहीं।  जिंदगी सकारात्मक और नकारात्मक परिस्थिति या ऊर्जा के बीच एक पेंडुलम की तरह गति करती है। पर कई बार हमारे जीवन मे कठिन परिस्थिति ,समस्या या बीमारी इतनी हावी हो जाती हैं की हम जीने की चाह खोने लगते। दिलासा , सलाह सब बेमानी से लगने लगते। दूसरों को देखकर खुद की स्थिति की तुलना हताशा और बढ़ा जाते। प्रश्न उठते की ये हमारे साथ ही क्यों हुआ???? 

     इसका जवाब भी मिलना असम्भव। पर जो घट गया उसके कारण ढूंढते रहने से क्या समस्या हल हो जाएगी .......???? नहीं, तो कोसना ,रोना और अवसाद से बेहतर है कि जिंदगी को हम सकारात्मक नज़रिये से देखना शुरू करें। पर कैसे.......?????  चलिए आपको कुछ बताती हूँ। 


मैं आदत के मुताबिक अक्सर यू - ट्यूब पर शार्ट मूवी या सब्सक्राइब चैनल के वीडियोज देखती रहती। एक दो दिन पहले स्क्रॉल डाउन करते हुए अचानक एक वीडियो क्लिक हो गया। अनमनी सी मैं उसे बदलने वाली थी ,पर उसमे एक शब्द ने मुझे रोक लिया। शब्द था #जिजीविषा । जिसका अर्थ है - जीने की प्रबल इच्छा /जीने की उत्कट इच्छा। 


वीडियो एक बच्ची *"गैबी शुल"* का था। 9 साल की उम्र में कैंसर के चलते उसका एक पैर घुटने के पास से काटना पड़ा । कीमोथेरेपी आदि के बाद उसे नकली पैर/ प्रोस्थेटिक लिंब लगाया गया। पर इस लड़की की चाह सिर्फ जीवन बिताना नहीं थी। इसकी चाह थी जीवन को अपनी इच्छा अनुरूप भरपूर जीना। अपने एक सुंदर सपने को इसी जीवन मे पूरा करना। उसकी जिंदगी उसे शारीरिक अक्षमता और बीमारी के कारण एक चुनौती के रूप में मिली। उसकी चाह ने उसे जिंदगी के प्रति नज़रिया और उद्देश्य दिया। 

वो लड़की अब एक बैले डान्सर है। एक ऐसी बैले डांसर जिसका एक पैर घुटने के ऊपर से नहीं है। पैरों पर सन्तुलन ,उनके द्वारा बनती विभिन्न मुद्राएं, लय एवम गति के साथ तारतम्य इस प्रोस्थेटिक लिंब के साथ .............हां, बहुत दुष्कर था ये काम और  परिस्थिति विषम । पर उसने हार ना मानी........और जिजीविषा जीत गई,उसकी अक्षमता पर। और यही वजह बनी ;मृत्यु से पहले #जीवन जीने की । 

आज गैबी सफल और प्रोफेशनल डांसर है। किशोरी गैबी अपने अदम्य साहस और जीवन के प्रति प्रबल इच्छाशक्ति के चलते अपनी साथी डांसर के साथ उतनी ही दक्षता और लयबद्धता से कदम मिलाती ,जितनी सम्भवतः दोनों पैरों से सक्षम कोई अन्य डांसर। उनका परिवार , उनकी प्रशिक्षिका और साथी कलाकार भी इसके लिए उसे भरपूर सहयोग करते। पर ये सफलता तब तक सम्भव नहीं होती जब तक गैबी की जिजीविषा ने विजय ना पाई होती। 


एक 6 साल की बच्ची ( 6 की उम्र में बीमारी ने असर दिखाया था) कैंसर जैसी बीमारी से जूझते हुए सम्भवतः टूट ही गई होगी.... शायद उसने किस्मत को कोसा भी होगा..... शायद ईश्वर से प्रश्न भी किये होंगे। किस डांसर के शरीर का वो हिस्सा ही अलग हो जाना जो उसकी उस कला विशेष का  अनिवार्य आधार है ..... । किन्तु गैबी ने हार ना मानी । जीवन एक बार मिलता और अगर उस कमज़ोर स्थिति में वो हर जाती तो शायद मरने से पहले ही हर पल मौत को जीती। पर उस मासूम सी बच्ची को पता था कि मौत अटल है , ध्रुव सत्य है,टाली नही जा सकती, एक दिन आएगी ही...और जो घट गया उसे भी बदला नहीं जा सकता तो क्यों ना हर पल में जिंदगी भर दी जाए। हर गुजरते पल में अपने सपने जी लिए जाएं। 

गैबी उस जिंदगी को जीना सीख चुकी है ,जो उसे कभी मौत से बदतर लगी होगी, इसीलिए अब मौत के बाद भी वो जियेगी। उसके जीवन के प्रति चाह ने उसे मिसाल बना दिया है। जिंदगी के बाद भी वो उदाहरण के रूप में हर बार के जिक्र के साथ जिंदा रहेगी । 

संसार मे कोई भी अमर नहीं है। पर मरने के बाद वही याद किये जाते ,जो जीवन सिर्फ काटते नहीं ,बल्कि "जी" जाते हैं। 

सिर्फ गैबी ही नहीं कई अन्य मशहूर लोगों के उदाहरण भी हमारे पास हैं ,जिन्होंने जिंदगी में मिली कठिनतम चुनौतियों को अपनी उत्कट आकांक्षा से जीता है। 


#अल्बर्ट_आइंस्टीन - (पहचान बताने की जरूरत है क्या ??) 

#स्टीफ़ेन_हॉकिन्स - मशहूर वैज्ञानिक  ।

#सुधा_चन्द्रन - शास्त्रीय शैली नृत्यांगना,अभिनेत्री ।

#अरुणिमा_सिन्हा- प्रोस्थेटिक लिंब के सहारे माउंट एवरेस्ट फतेह। 

#गिरीश_शर्मा - 2 साल की उम्र में हादसे में पैर खोने के बाद भी बैडमिंटन चैम्पियन बने। पैरालम्पिक में गोल्ड मैडल। 


#जिया_भी_जाता_है_एक_जिंदगी_के_बाद ........इन सब उदाहरण के अलावा भी ऐसे कई नाम आपको मिल जाएंगे जिन्होंने जिंदगी से शिकायत के बजाय ,हादसों को खुद के लिए एक परीक्षा माना।  इस जज्बे के लिए  हर पल लड़ाई ली ; अपने दुख ,तकलीफ और समस्याओं से । यदि हम तकलीफ में है तो प्रयास करें किसी अन्य की तकलीफ को दूर करने का, हमारी जिंदगी में उदासी का घना कोहरा ,तो किसी को मुस्कान की किरण देने की कोशिश करिये। हम किसी रोग से पीड़ित तो खुद के साथ दूसरों को उससे लड़ने की हिम्मत बंधाइये।  हमारे जीवन मे जो कमी  हम महसूस करते ,प्रयास करना चाहिए कि हमारे माध्यम से  वो कमी किसी अन्य की जिंदगी में  पूर्ण हो जाए। किसी की मुस्कान से आप ये अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि किसने जिंदगी में क्या सहा ,कितनी परीक्षा दीं.......??? किसी की मुस्कान का मतलब ये भी हो सकता है कि जिंदगी तू आसमान कितने भी ऊंचे कर ले, चुनौतियों के मकाम कितने भी कठिन कर ले, मेरे जज़्बे ,मेरी जिजीविषा उसे जीत ही लेगें। 

तो बनाए रखिये खुद पर यकीन और #मरने_से_पहले_जीना_सीख_ले। 

#ब्रह्मनाद

©®✍️डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

शनिवार, 24 जनवरी 2026

संस्मरण - यादें बचपन की

 



 



संस्मरण - भाग 2 ; यादें बचपन की 


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तो लेडीज एंड लेडाज़ अररररर मेरा मतलब जेंटलमैन ,

 बचपन के कुछ वाकये जेहन से कभी नहीं मिटते.. कहने को तो कहा जाता है कि बचपन की बातें इंसान सामान्यतः भूल जाता है... स्थाई स्मृतियां बड़े होकर बनती हैं। पर यही वो वक्त होता जो हमारी नींव भी बना जाता।कभी हम कुछ ऐसा सीख जाते हैं जो ताउम्र हमें याद रखता, हमारे व्यक्तित्व का एक मजबूत हिस्सा बनकर । हां कुछ के लिए ये  स्थिति कमजोर हिस्सा भी साबित हो सकती हैं। फर्क पड़ता है कि आप किनके संपर्क में आए ..... आप किनसे मिले.... आपके अनुभव कैसे रहे।

ये प्रसंग है जब मैं कक्षा 11 में थी.... अवसर राज्यस्तरीय भाषण प्रतियोगिता( वर्षा नहीं बताऊंगी,अन्यथा आप लोग मेरी उम्र का अंदाजा लगा लेंगे) । इससे पहले मैं  कई उतार चढ़ाव और संघर्ष वाली परिस्थितियों के बीच "विनोबा भावे जन्मशती " के अवसर पर आयोजित जिला स्तरीय भाषण प्रतियोगिता जीत चुकी थी। ( इसके बारे में आपने पुराने संस्मरण में पढ़ा था) 


अगस्त में जिला स्तरीय प्रतियोगिता जीतने के बाद मैं राज्य स्तरीय प्रतियोगिता के लिए उत्साहित होकर जुट गई। पर मेरे पापा हमेशा मुझे टोकते की इसमें कुछ नही रखा,पढाई में कोताही नहीं  करो। खैर मेरी माता जी मुझे प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष सहयोग करती रहतीं। पर आशा के उलट भाषण प्रतियोगिता का बुलावा हम तक सितंबर में भी नही पहुंचा। मुझे भी ये सब ठन्डे बस्ते में गया मामला दिखने लगा। मन ही मन सोचने लगी की सरकारी खाना पूर्ती हुई है। 


मैं वापस अपनी दिनचर्या में रम गई। अगस्त से मेरे पापा की तबियत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। कुल मिलाकर घर में कमाने वाले वो इकलौते इंसान थे और वो भी अगस्त से बिस्तर में लगे हुए थे। पापा अधिवक्ता हैं। उनकी तबियत खराब मतलब कमाई का जरिया "शून्य"।


पैसा पानी की तरह बह रहा था ,पर वो ठीक होने का नाम नहीं ले रहे थे। डॉक्टर उनका मर्ज ही नही पकड़ पा रहे थे। अक्टूबर महीने तक तबियत में कोई सुधार नही। हम सबका मनोबल टूटा सा था। उसी बीच अचानक एक दिन लगभग दोपहर 2 बजे स्कूल के प्रभारी प्राचार्य ने मुझे बुलाकर कहा,जिला शिक्षाधिकारी कार्यालय से फ़ोन आया की तुम्हें कल सुबह भोपाल में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल होना है। सुनते ही मेरा उत्साह चरम पर पहुँच गया। किन्तु दुसरे ही क्षण सर ने ते कहा कि स्कूल में लिखित में ऐसा आदेश नही पहुंचा इसलिए तुम्हें भेजने की जिम्मेदारी हमारी नहीं। 


ना तो टी ए, डी ए का ना ही किसी टीचर को साथ भेजने की। समय भी इतना नहीं बचा था कि लगभग 2 घण्टे की दूरी में स्थित जिला कार्यालय में जाकर लिखित आदेश लाया जा सके। उमरिया से भोपाल जाने वाली ट्रेन 4.30 पर निकल जाती थी। तो ये पूरी स्थिति हमारे अनुकूल नहीं दिखी। घर में पापा की स्थिति मुझे पता थी ,इसलिए मैं मान चुकी थी की बेटा तू इस प्रतियोगिता में भाग नहीं ले पाएगी। फिर भी घर पहुँच कर माँ - पापा को हमने ये खबर दी। 


आशा के उलट पापा ने पहली बार मुझे उत्साहित करते हुए कहा कि तुम्हारा नाम वहां दर्ज होगा,तभी ये नोटिस जिला कार्यालय तक पहुंचा। और रही टी ए, डी ए की बात तो मैं तुम्हारा और तुम्हारे साथ जाने वाले टीचर का खर्च दूंगा। कम से कम इस मुकाम में पहुँचने के बाद तुम रुकोगी नहीं।


इसी बीच स्कूल प्रबंधन ने हमारी एक स्नेही मैडम को हमारे साथ जाने राजी कर लिया ,हाँ शर्त यही थी की खर्च हम ही वहन करेंगे। आनन-फानन तैयारी हुई,पर तब तक उमरिया से ट्रेन निकल चुकी थी। मैं फिर निराश सी रेलवे स्टेशन से लौटने लगी। तभी मेरे एक दूर के नानाजी जो स्टेट बैंक के मैनेजर थे वो अपनी गाड़ी से जबलपुर की ओर आ रहे थे। उन्होंने आवाज़ देकर हमें बुलाया और साथ चलने की पेशकश की। बस अँधा क्या चाहे ,दो आँखें। फिर एक बार हम आगे बढ़े ये सोचकर की शायद पहुँच जाएं। 


जबलपुर पहुँचते ही फटाफट टिकेट लेकर दौड़ते भागते ट्रैन पकड़ी गई। ये भाग्य ही था कि उस दिन आधे घण्टे देरी से निकली। अब मन आशा ,निराशा,उत्साह और पापा की चिंता से भाव मे डूब और तैर रहा था।सब सोचते सोचते आँख कब लगी पता ना चला। सुबह आँख भोपाल में खुली। 


पहली बार घर से ,अपनों से इतनी दूर एक प्रतियोगिता में । उत्साह की जगह एक अनजाने डर और अजनबी शहर के कौतूहल ने ले ली थी। हम सीधे रजिस्ट्रेशन स्थल पर पहुंचे। चूंकि हमारे पास लिखित कोई कागजात नहीं था इसलिए ये साबित करने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी की जिला स्तरीय के विजयी प्रतिभागी हम ही हैं। हमारे प्राचार्य महोदय ने आने से पहले एक विभागीय पत्र इस संदर्भ में पूरे घटनाक्रम के विवरण के साथ आयोजक मंडल के नाम लिख कर हमें दे दिया था। अंततः उस पत्र की वजह से मुझे प्रतियोगिता में स्थान मिल गया। 


पहला अवसर जब पूरे प्रदेश के लगभग हर जिले से प्रतिभागी साथ थे। उम्र में वहां मैं सबसे छोटी थी इसलिए जल्द ही वहां आए हुए अन्य प्रतिभागियों की छोटी बहन घोषित हो गई । पर अशोकनगर से महाविद्यालय स्तर के दो प्रतिभागी श्वेता जैन दीदी (निबंध) और श्रीवास्तव भैया (भाषण; नाम याद नही रहा अब ) से जल्द ही मेरा स्नेह प्रगाढ़ हो गया। 


इन सारे घटनाक्रम में मुझे भाषण तैयारी करने का अवसर न मिला। मैं डरी और आशंकित थी ,अपनी हार के लिए। 


नियत समय पर मुहैया बस द्वारा सभी प्रतिभागी संस्कृति भवन पहुँचे। पहले महाविद्यालय स्तर की प्रतियोगिताएं होना तय था। एक से एक प्रतिभासम्पन्न प्रतिभागियों को देख कर मेरा डर चरम पर पहुँच गया। सर्दी में भी मुझे पसीने छूटने लगे। मेरी असहज स्थिति को श्रीवास्तव भैया ने भांप लिया। तात्कालिक भाषण के शुरू होने से पहले उन्होंने मुझे हॉल से बाहर बुलाया। और फिर सर पर चपत लगा कर पूछे "गुड़िया ,डर रही है क्या" और मैं रो पड़ी। घर में पापा की स्थिति और सारा घटनाक्रम उन्हें रोते हुए बता दी। 


और अचानक उन्होंने बड़े प्यार से सर पर हाँथ रख कर मुझे बोले की बेटा पहली बात की तुझे जीतना है ,तेरे पापा के पहली बार तेरे पर विश्वास के लिए। दूसरी बात तू अगर जीत नहीं  सकी तो क्या कोई तुझे फांसी देगा? मेरे ना बोलते ही उन्होंने कहा सुन आज तुझे जीत का मंत्र देता हूँ ..... *जब किसी को सुनो तो सोचो की तुमसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। तुम शून्य हो।और जब तुम बोलो तो ये सोचना की सामने वाले शून्य हैं,उनको सिर्फ उतना ही पता है,जितना कि तुम बोलोगी ।

*दूसरी बात भाषण के पहले खड़े होकर भीड़ में  हर तरफ बैठे लोगों के चेहरे देखो,ताकि जब तुम बोलने लगो तो अचानक कोई तुम्हें कोई अजनबी ना लगे। 

*तीसरी बात लोगों को सुन कर सार निकाल कर भाषण दो। और अगर प्रतियोगिता के शीर्षक की कोई टैग लाइन है तो उसे बोलने में जरूर उपयोग करो।


मैं थोड़ी संयत होकर हॉल में गई। चूंकि सितंबर के बाद मैंने सम्बंधित साहित्य को एक बार भी नहीं पढ़ी थी। फिर भैया की बात को मान कर कान /दिमाग खोल कर भाषण सुनी। मेरे भाषणों में मैं कोशिश करती थी अंत किसी खास उद्धरण या पंच लाइन से हो,इस बार उसका अभाव होने वाला था । खैर मेरा नाम पुकारा गया और मैं मंच पर पहुँच कर उन्हीं मन्त्रों का अनुकरण की। बोलते बोलते समय सीमा का मुझे ध्यान ना रहा और वांर्निंग बेल ने मेरी तन्द्रा भंग की। और 2 सेकण्ड के लिए मैं फिर घबरा गई। मुझे2 मिनट में भाषण खत्म करना था । और मेरा ध्यान फिर उन भैया के चेहरे पर गया। उन्होंने मुस्कुराकर हम सबके कपड़े में टँके बैच पर इशारा किया ,और मैं समझ गई की मुझे पंच लाइन मिल गई। भाषण का अंत हुआ बैच पर लिखे आह्वान के साथ। और हॉल में बजती तालियों ने मुझे इतना यकीन दिला दिया की प्रतियोगिता जीतूं ना जीतूं ,लोगों के दिमाग में अपना स्थान जीत चुकी हूँ। 


कुछ देर बाद प्रतियोगिता के परिणाम में द्वितीय विजेता के रूप जब मेरा नाम पुकारा गया ,मैं रो पड़ी थी। उस दिन मुझे जो सबक मिले वो मुझे हर मंच में सफल सिद्ध करते गए। 


जिंदगी भी ऐसी ही है। मैं डरती हूँ इससे, पर जब मैं इसके हर पहलू को सोचकर ,आंख में आंख डालकर बोलूंगी तो इसे भी शून्य होकर मेरी बात को मानना होगा।


#ब्रह्मनाद 

©® डॉ मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

सोमवार, 19 जनवरी 2026

12/12/24











 तू मांगे एक सितारा चांद मै तेरे हांथ में रख दूंगा.... एक ट्रेडिंग गाने की ये पंक्ति सुनकर मुझे तुम्हारी याद आती है। हां सामान्यतः हर मां अपने बच्चे की हर ख्वाहिश अपने स्तर से भी ऊपर जाकर पूरा करना चाहती है.. मै भी। पर मैं ना सिर्फ तुम्हारी  ख्वाहिश को पूरा होते देखना चाहती हूं ,बल्कि यह भी चाहती हूं कि अपने साथ साथ तुम दूसरों के अरमानों को पूरा करने में समर्थ रहो।


जानती हूं कि तुमने हमेशा संघर्ष किया है। तुम जज्बे में हमेशा फाइटर थी। तुम्हारी सफलताएं उतनी आम नहीं जितनी किसी अन्य इंसान की हो सकती।तुम्हें बहुत मेहनत करनी होती है हर एक एक कदम पर खुद को साबित करने और अपनी कमजोरियों पर जीतने के लिए। तुम्हारे आने के बाद मैने एक नया जन्म लिया है। सच कहूं तो तुमने मुझे नए सिरे से गढ़ा। तुमने मुझे खुद की ताकत का भरोसा दिलाया। तुमने सिखाया कि मैं हार नहीं सकती,मुझे उस कमजोरी को जीतना होगा जो जीवन की प्रत्याशा खत्म कर सकती।मेरे जीवन में मां के अलावा तुमने मुझे "मै" बनाया। 

आज तुम अपने जीवन के नए साल में प्रवेश कर रही हो। होने को आज तुम्हारे बचपन के सालों का अंत है,पर वास्तव में तुम्हारा भोलापन ,सरलता, निश्छलता सदा तुम्हारे बचपन को जीवित रखेगा। तुम उतनी ही पावन और दैवीय हो जितना ईश्वर का स्वरूप। अन्य की दृष्टि का मुझे पता नहीं पर तुमने मेरे जीवन में आकर मुझे आम जीवन से ऊपर उठाकर खास मकसद दिया। 


हां तुम बहुत विशेष हो ,इसलिए नहीं कि तुम मेरी संतान हो, बल्कि इसलिए कि तुम बहुत से लोगों को आशा देती हो।

मेरी बच्ची आज तुम्हारे जन्मदिन पर मै यही दुआ करती हूं कि कई लोगों के लिए तुम सदा प्रेरणा बनकर रहो, उनकी आशाओं को तुम्हारे होने से बल मिले.... इस दुनिया की हर खुशी तुम्हारे नाम हो, और सफलता... मुझे पता है तुम अपने प्रयासों से हासिल कर ही लोगी। स्वस्थ रहो, यशस्वी हो, कर्म से जीवन सफल करो।


इस चेहरे की खुशी एक पल को भी कम ना हो, 

तुम्हारी आँखें दुख से एक पल भी नम ना हो,

दिन बदले ,माह बदले ,या बदलते रहे कई साल,

तुम्हारी खुशियों के मौसम एक पल को भी कम न हो।


जन्मदिन की शुभकामना मेरी लाडो अन्वेषा😘❤️👰🫅🤱🍬🎂🍫🎊🎉🎁। 

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

जन्मदिन विशेष: अन्वेषा (12 Dec 2025)


 

और आज 13 साल बीत गए ।सोचती हूं तो लगता है जैसे कल ही तुम्हें पहली बार देखा था, डॉ ने बधाई देते हुए कहा था कि परी जैसी खूबसूरत बेटी हुई है। नानी ने नाम दिया था गुलाबो,और हॉस्पिटल में सारी  ड्यूटी नर्सेज तुम्हें गोद में लेकर प्यार उड़ेल रहीं थी। और आज तुम इतनी आत्मनिर्भर,प्यारी सी #टीन गर्ल बन चुकी है । भले ही समय पंख लगाकर उड़ रहा था ,पर तुमने और मैंने इस दौरान हर एक दिन को बहुत गहराई से महसूस किया है। मेरे जेहन में इन वर्षों का संघर्ष वो अमिट छाप छोड़ गया जैसे कि भित्ति चित्र। तुम्हारे हर एक संघर्ष ,हर सफलता को मैंने शिद्दत से महसूस किया है। तुम्हारा बचपन एक आम और सामान्य बचपन नहीं था। सपनों से अलग ,अनुभवों की कड़ी धूप, एहसासों की बारिश तुमने झेली है। और आज उन सबका परिणाम है तुम बहुत से लोगों के लिए उदाहरण बन सकी। हालांकि अभी तुम्हारी मंजिल तुम्हें मिली नहीं, पर तुम दूसरों को रास्ते के संघर्षों से हार ना मानने की प्रेरणा देती हो।

तुम्हारी सबसे अच्छी बात यही है कि तुम हर चीज अपने भरोसे सीखती हो। तुम्हें सफलता कभी थाल पर परोसी हुई आसानी से प्राप्त हो जाने वाली चीज नहीं थी। तुम हर छोटी जीत को अपनी मेहनत से बनाती हो, धीरे-धीरे, शांति से, बिना किसी दिखावे के, धैर्य से।जैसे कोई माली एक-एक पौधे को बहुत संभाल कर बड़ा करता और खूबसूरत बाग बनाता है।हालांकि कई बार मुझे महसूस होता है,की मैं तुम्हारी सीमाओं को ना नजरंदाज कर तुम पर अपनी बड़ी अपेक्षाओं का बोझ डालती हूं। सच कहूं तो उस पर भावनात्मक मानवीय कमजोरी मेरी समझदारी पर भारी पड़ जाती है..... पर तुम्हारी जीवटता और प्रतिबद्धता मेरी अपेक्षाओं के लिए खाद का काम करती है। मुझे तुम यकीन रहता है कि मेरी अपेक्षा तुम पूर्ण कर सकती हो, इसलिए मैं तुम पर एक दबाव भी बनाती। हां कभी मै तुम्हारे परिणामों से निराश होती तो कभी कभी अप्रत्याशित रूप से गर्व का अनुभव भी कराती हो।हां, अब मैं इस बात को मानती की "life is not bed of roses".


खैर बात तुम्हारे जन्मदिन की है। सच है कि मां बच्चे को जन्म देती है, लेकिन  मेरा जन्म दो बार हुआ। एक बार जब मेरी मां ने मुझे दुनिया में लाई, और दूसरा जन्म तुमने दिया। तुमने मेरी सोच बदली, मेरा नजरिया, यहां तक कि मेरी पहचान भी बदल दी। मेरी पहचान भी तुम्हारी वजह से ही स्पष्ट रूप ली।तुम ना होती तो मेरा जीवन भी आम सी इच्छाओं में बंधकर बीत जाता। तुमने मुझे एक पावन और महान उद्देश्य दिया है। तुम्हारे साथ रहते हुए मैंने समझा कि असली ताकत  कोशिशों में होती है ।कभी हम सफल होंगे तो कभी असफल, और इसमें से कुछ भी अंतिम नहीं होता। ना तो सफलता की खुशी मनाना ना ही असफलता की उदासी या मायूसी। तुम्हारे लिए कुछ भी ऐसा नहीं, जिसमें तुम ठहर कर बाकी जीवन को नगण्य मानो। 

तुम निरंतर बिना किसी शिकायत के, बिना किसी अपेक्षा के, बस अपनी पूरी कोशिश से आगे बढ़ती हो। तुम्हें चाहिए होता है  बस एक अवसर, थोड़ा समय और तुम्हारे आस पास तुम पर यकीन रखने वाले लोगों का दायरा , और तुम दिखा देती हो कि तुम क्या कर सकती हो। यही बात तुम्हें अलग और सबसे खास बनाती है।तुम नैसर्गिक रूप से पावन और निश्छल हो ।


अन्वेषा, तुमने मुझे बेहतर इंसान बनाया है। तुमने मुझे धैर्य सिखाया, स्वीकार करना सिखाया, और बिना शर्त प्यार का मतलब भी समझाया। तुमने मुझे सिखाया कि दुनिया को देखने का एक और तरीका भी होता है, जो अधिक शांत, अधिक सच्चा , अधिक गहरा और पूर्वाग्रह रहित होता है।जिसमें हम अपेक्षा नहीं करते ,बल्कि अबाध रूप से दाता बनकर रहते। तुम मेरी जिंदगी का वो अध्याय हो जिसने मुझे मेरी असली ताकत से मिलवाया है।।मेरे लिए तुम सिर्फ  बेटी नहीं, मेरी प्रेरणा, मेरी रोशनी का स्रोत , मेरे जीवन की दिशा हो।


आज जब तुम 13 साल की हो गई हो, बस इतना कहना चाहती हूं कि मैं तुम्हारी मां होने पर खुद को बहुत भाग्यशाली मानती हूं। तुम्हारी हर मुस्कान, हर कदम, हर छोटी-बड़ी उपलब्धि मेरे लिए किसी उपहार से कम नहीं।बल्कि वो मेरे लिए मील का पत्थर  हैं। 


तुम्हारे जन्मदिन पर ईश्वर से मैं यही प्रार्थना करती हूं कि तुम्हें इतना सक्षम बना दें कि तुम्हारे जीवन में मेरी भौतिक अनुपस्थिति भी तुम्हें कभी कमजोर ना कर सके। अपना जीवन स्वतंत्र पूर्वक जियो और सार्थक कर सको। 


खुश रहो, आगे बढ़ो, और हमेशा अपनी ही मेहनत से अपना भविष्य बनाती रहो।दुनिया का हर संभव आशीर्वाद तुम्हारे लिए ईश्वर से मांगती हूं। आकाश भर आशीर्वाद और अनंत स्नेह मेरी बच्ची।  💋💋💋🫅🤱😘😘😘😘

हैप्पी 13th बर्थडे मेरी लाडो अन्वेषा। तुम मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा हो। मुझे तुम पर गर्व है। 











मंगलवार, 4 नवंबर 2025

शिव और एकत्व

 




(छायाचित्र:गूगल से साभार)

शिव और एकत्व

क्या शिव होने का भाव एकाकी है? क्या यही एकत्व ही उनकी पूर्णता का प्रमाण है…?

कैलाश की सबसे ऊंची चोटी पर सुनहरी संध्या में जब हिमशिखर मौन होते हैं और शीतल वायु डमरु से टकराकर एक कंपन की ध्वनि को जन्म देती है, तब एक मौन संवाद जन्म लेता है शिव और शक्ति के बीच। सती की जिज्ञासा के माध्यम से उभरती है एक रहस्यपूर्ण अनुभूति ..... क्या वह जो सबका है, वह भी कभी एकाकी हो सकता है?

शिव कैसे परिवार होते हुए भी वैरागी भी बने रहते ????? तांडव से संसार का विनाश कर सकने वाले कैसे मौन समाधिस्थ हो जाते हैं...??? 

शक्ति के मन में कई प्रश्न ,कई जिज्ञासा पर शिव मौन होकर मुस्कुरा कर शक्ति की ओर स्नेह से देखते .. शक्ति उन नेत्रों में सम्मोहित सी स्वयं को नहीं संपूर्ण सृष्टि देख रही हैं... कालातीत, समय से मुक्त , अविनाशी , अनंत सत्य...।उसमें वह सब देखती हैं ,जो अस्तित्व में थे, हैं या कभी होंगे... वह भी जो अदृश्य है... वह जो भौतिक जगह से परे है। वह भी जो प्रश्न थे ,वह भी जो उत्तर हैं।उसमें वो स्वयं है ,सिर्फ वर्तमान स्वरूप में नहीं, बल्कि प्रत्येक जन्म की प्रामाणिक रूप में । वो भी उन्हें दिखा जो उन्हें स्वयं के लिए भी ज्ञात नहीं था..। 

 शक्ति को तब भान होता है कि शिव का मौन केवल वैराग्य नहीं है, बल्कि वह विस्तार है जिसमें सृष्टि की प्रत्येक गति समाहित है। उनके भीतर जो शून्य है, वही तो सृजन का बीज है।

तब भी शक्ति अबोधपन से पूछती हैं कि क्या वह एकाकी हैं??? तब शिव मुस्कुराकर बताते हैं कि उन्होंने स्वयं को विभाजित किया था, एक इच्छा से, एक कंपन से, एक अनुभूति से। और उसी विभाजन से शक्ति प्रकट हुई। तब से लेकर हर युग तक, वह अधूरापन जो शिव में है, वही उन्हें पूर्णता की ओर ले जाता है।

अर्धनारीश्वर रूप में जब शिव और शक्ति एक होते हैं, तब पूर्णता की एक झलक मिलती है , पर वह ठहराव नहीं लाता। वह गति को जन्म देता है, लास्य नृत्य को जन्म देता है। शिव शक्ति के सम्मुख स्वीकार करते हैं कि उनके के बिना वे शव हैं .... निस्पंद, निष्क्रिय। परंतु यह भी सत्य है कि जब शक्ति उनसे विलग हो जाती है, तब वे एक अलग स्वरूप के एकाकीपन में डूब जाते हैं ....... वह जो खाली है...... वह जो सृजनहीन है।

शिव का एकाकीपन निर्विकार नहीं है, वह प्रतीक्षा है। और प्रतीक्षा केवल उसी के लिए होती है, जो भीतर कहीं बहुत गहरा जुड़ा हो। जब शक्ति पुनः पार्वती बनकर लौटती हैं, तब शिव फिर से सजीव होते हैं ... पर अधूरापन अब भी बना रहता है, क्योंकि यही अधूरापन उन्हें नटराज बनाता है, उन्हें लय में रखता है। पूर्णता ठहराव है ...... और शिव ठहरते नहीं।

शिव कहते हैं कि वे काल हैं, स्मृति से परे हैं, फिर भी उन्हें सब याद रहता है। यही तो प्रेम है जो संपूर्ण होकर भी सदा नया है, जो स्मृति बनकर भी वर्तमान में धड़कता है। 

शक्ति की जिज्ञासा .... क्या वे कभी पूर्ण होंगे??? शिव उन्हें पूर्णता की माया से परिचित कराते हैं। वे बताते हैं कि अधूरा रहना ही सृष्टि को गतिशील बनाए रखता है, वही रचना का रहस्य है।

शिव का मौन उनके भीतर की गहराइयों से आता है, जहां कोई शब्द नहीं पहुंचता। पर वही मौन जब नृत्य में बदलता है, तो सम्पूर्ण ब्रह्मांड को आंदोलित कर देता है। यही विरोधाभास उन्हें शिव बनाता है ...... न तो पूरी तरह एकाकी, न पूरी तरह संग-साथ में , बल्कि उस रहस्य की तरह, जो समझने पर और अधिक गहराता जाता है।

शिव अकेले हैं, क्योंकि वे सबमें समाए हैं। वे पूर्ण हैं, क्योंकि वे स्वयं से जुड़े हैं। और जब शक्ति साथ होती हैं, तब वह अकेलापन भी एक सौंदर्य बन जाता है .... एक मौन सृजन, जो शब्दों से परे है। और यही शिव है,जो विरोधाभाषी गुणों को स्वयं में संतुलित कर सृष्टि को गति देते हैं। 


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका 

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

पटाखे:रिवाजों के नाम पर पीढ़ियों का खात्मा


 पटाखों पर प्रतिबंध से देश के एक बड़ा तबका नाराज होकर अपना प्रतिरोध प्रदर्शित करता रहा। इस वर्ष सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बदलाव हुआ। नतीजा.... दिल्ली सहित कई बड़े शहरों की एयर क्वालिटी हानिकारक स्तर पर भी ऊपर की ओर बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर पटाखों को ना जलाने की हिदायत पर बहुत सारे मीम शेयर हुए। अब मेरा उन मीम शेयर करने वालों से पूछने का मन हो रहा है, सांस में दिक्कत, दमा की समस्या, आंखों में जलन की समस्या भी क्या आपके मीम से हल हो जाएगी..? अब आप शांत क्यों है??? 

मैं दूसरों की बात नहीं करती , जबलपुर जैसे द्वितीय स्तर के शहर में कल पटाखों के धुएं के कारण कल अचानक बात करते हुए मेरा गला चोक होने लगा। मुझे डस्ट और धुएं से एलर्जी है। अतः यह समस्या कल होना स्वाभाविक था।और ये समस्या एक बार शुरू तो महीनों डॉक्टर के चक्कर और दवाइयों का खर्च सो अलग...। हालांकि ईश्वर की कृपा कल यहां बारिश के रूप में बरसी और एयर क्वालिटी में उसके कारण कुछ सुधार है। वैसे सच यही की पटाखे हमारी ओजोन परत को भले उतना नुकसान नहीं पहुंचा रहे, जितना युद्ध....। पर मूर्खता पूर्ण कारनामों में यह होड़ करना कि युद्ध जितना नुकसान नहीं होगा..... हमें कम मूर्ख साबित नहीं कर देता। हां, मैं इस बात में जरूर सहमति जताती हूँ कि पटाखों पर प्रतिबंध सिर्फ दीवाली नहीं, बल्कि अन्य अवसरों जैसे न्यू ईयर सेलिब्रेशन, विवाह समारोहों, खेल में जीत आदि के समय भी होना चाहिए। अवसर कोई भी हो,किसी का भी हो, ऐसे रिवाज हमारे वातावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। 

भारत में तेजी से बढ़ रही जनसंख्या और सिमटते प्राकृतिक संसाधनों के साथ त्योहारों की आड़ में जानबूझकर प्रदूषण बढ़ाना हमारे लिए ही घातक है। अगर अपने बचपन से लेकर अब तक हम मौसम की स्थिति का विश्लेषण करें तो नकारात्मक प्रभाव और अंतर साफ समझ आता है। बेमौसम बारिश, घटता हुआ ठंड का मौसम, बढ़ती गर्मी ..... सिमटते ग्लेशियर ...। 

हम सब अपने बच्चों के लिए बेहतरीन भविष्य चाहते हैं। उनकी पढ़ाई, कैरियर, संपत्ति के लिए अपने ओर से अच्छी व्यवस्था करने का प्रयास करते हैं। पर कभी सोचा ही कि क्या हमारे बच्चे या उनके बाद की पीढ़ियां उन संसाधनों के उपभोग के लिए सक्षम रह भी पाएंगे या नहीं। हम उन्हें एक ऐसा विषैला वातावरण देकर जाएंगे जहां उन्हें साफ हवा लेने के लिए भी शायद पैसे देने होंगे... हालांकि हम अब भी पर्यटन के नाम पर पैसा खर्च कर स्वच्छ हवा में सांस लेने कम आबादी वाली खुली जगहों की ओर रुख करते हैं। और जाकर उस जगह को भी अपनी हरकतों से गंदगी का ढेर बना आते हैं।

खैर मुद्दे पर आते हैं, इसे पढ़कर कई लोग ये प्रश्न जरूर करेंगे कि एक हमारे पटाखे ना जलाने से क्या हो जाएगा.. तो याद रखें मीलों की यात्राएं एक कदम से शुरू होती है। हर व्यक्ति यदि सिर्फ स्वयं की जिम्मेदारी ले ले तो कोई भी कार्य, विचार पूरा होना असंभव नहीं रहेगा। अगली बार जब आप पटाखों को हांथ लगाएं तो जरूर अपने बच्चे के भविष्य को जरूर सोच लें। जानती हूं बदलाव इतनी जल्दी नहीं आएगा, कुछ लोग परम्पराओं का भी ज्ञान देंगे.... पर शुरुआत कहीं से , किसी से तो करनी होगी। दिल्ली के कार पूल की तरह पटाखा पूल कर लीजिए।एक कॉलोनी या सोसायटी एक साथ इकट्ठे होकर कम से कम पटाखे एक साथ ही जलाएं, रोशनी और आवाज सबको दिखाई और सुनाई देगी, और एक सी ही होगी। और हां ये भी जरूर ध्यान दें कि आपके आस पास कोई बुजुर्ग, कोई छोटा बच्चा, कोई बीमार या कोई हॉस्पिटल ना हो।क्योंकि आपके लिए मजा , किसी की जिंदगी पर सजा बन सकता है।

बाकी मर्जी आपकी.... क्योंकि भविष्य और उसके परिणाम भी आपके ही होंगे। 

#ब्रह्मनाद #डॉ_मधूलिका 

शनिवार, 14 जून 2025

क्षणभंगुर जीवन


 


कौन, कहाँ, कब, किस वक्त आपका साथ छोड़ दे , यह कोई नहीं जानता। यह  क्रूर सच्चाई  हम अक्सर नजरअंदाज़ कर देते है। अहमदाबाद ,गुजरात विमान हादसा  की बात करें तो उसके यात्रियों या परिवार वालों में से किसने सोचा था होगा कि बोर्डिंग से पहले का समय अंतिम विदाई साबित होगा। उस फ्लाइट के यात्री कभी अपने परिवार यार दोस्तों को अपने गंतव्य तक सुरक्षित  पहुंचने की खबर ना दे सकेंगे .....! किसने सोचा होगा कि उस फ्लाइट के यात्री जिन सपनों के साथ उड़ान भर रहे वो बस दिवा स्वप्न बन वहीं दम तोड़ जाने वाले.....?  यह दुर्घटना इस  बात को मजबूती से साबित करती है कि जीवन में अगर कुछ साथ चल रहा है तो वह है ........अनिश्चितता और अनापेक्षितता। 


हम सोचते हैं कि कल समय मिलेगा ,अपनों से मिलने का, क्षमा माँगने का, प्रेम जताने का।अपने कामों, संबंधों  और भविष्य की योजनाओं में हम इतने उलझे रहते  हैं कि यह भूल जाते हैं कि अगला क्षण भी हमारा नहीं हो सकता, जो होगा वो हमें ज्ञात नहीं होगा, और आवश्यक नहीं जो हमने सोचा  वो होने की स्थिति भी बने।


 हम जिनसे प्रेम करते हैं, जिनकी उपस्थिति हमारे जीवन को अर्थ देती है, वे भी एक झटके में हमसे छिन सकते हैं। जिन चेहरों को आज हम अपने सामने देख रहे हैं, हो सकता है वे तस्वीरों में बदल जाते हैं।  जब वे नहीं रहते, तब आँखें तड़पती हैं, दिल पछताता है और समय की अटल गति हमें हमारी असहायता का बोध कराती है।जीवन में बस एक काश शेष रह जाता है। हम छटपटाते है उन क्षणों को याद करके जब हमारे किसी अपने ने हमसे समय चाहा था, जब वो हमारे साथ और पास होना चाहते थे। पर अफसोस समय बीत जाता और जो गया वो वापस नहीं मिल पाता। 


इसलिए आज और इसी क्षण को जी लो, जी भर कर जी लो। किसी के साथ समय बिताना एक अवसर है, न कि एक अधिकार। जो प्रिय हैं, उनके साथ हँसो, रोओ, बाँटो, क्योंकि हो सकता है कि कल की सुबह तुम्हारे या उनके लिए न आए। आगे तो बस एक खालीपन और पछतावा ........इसलिए जीवन के हर क्षण को पूर्णता के साथ जियो। अपनों के साथ समय बिताने में हिचको नहीं। नफरत ,वैमनस्य को भूल कर उनके साथ रहो,  क्योंकि जब वह समय निकल जाता है, तब सिर्फ़ और सिर्फ जीवन में उनके स्थान पर निर्वात बचता। 


जीवन सच में क्षणभंगुर है। पलकों के झपकने की गति से भी पहले हम उसे खो सकते ,जो हमारा है।इसलिए....... आज जब नींद से उठें और अपनों को आप सुरक्षित पाएं तो ईश्वर को धन्यवाद दीजिए ,इन अनमोल सांसों के लिए ।इसलिए...... माफ कर दीजिए हर उस व्यक्ति को जो कभी भी आपके लिए महत्वपूर्ण रहा हो,ताकि आपके मन पर कोई बोझ ना बचे। इसलिए ..... मन में बात मत रखिए ,बोल दीजिए किसी अपने को ,ताकि मलाल ना रह जाए। इसलिए ...... माफ़ी मांग लीजिए खुद की गलतियों के लिए ,ताकि कोई शर्मिंदगी ना बच जाए। और इसी लिए .......आज इस पल जो हमारे हैं ,उनके साथ हर उस पल को जी लीजिए जो आपकी सोच या आपके अपनों की अपेक्षा.... क्या पता कल ये पल ही ना रह जाए। 


#ब्रह्मनाद

#डॉ_मधूलिका






रविवार, 1 जून 2025

सैपियोसेक्सुअलिटी: सोच से प्रेम


     ( चित्र - गूगल से साभार)



जिंदगी में कभी हम किसी ऐसे शख़्स से मिलते हैं या यूं कहें कि संपर्क में आते हैं,  जिसकी ना सूरत देखी ना ही उसके बारे में कुछ पता होता। पर जब वह हमसे बात करना शुरू करते हैं , तो हर शब्द मानो आत्मा को छूने लगता। उसने विचारों में गहराई होती है, बातों में तथ्य, और सोच में ऐसा आकर्षण, जो सीधा अंतस में उतरता चला जाता है।


वो एक चेहरा नहीं था जिसने हमें बांध लिया होता है, वो शब्द थे। वो उनकी चेतना की आवाज़ थी जो दिमाग में पैठ बना लेती है , वो  उनकी सोच थी। और ऐसे अनुभव का नाम है सैपियोसेक्सुअलिटी।


यह एक एहसास है उनके लिए जो सुंदरता को सिर्फ आंखों से नहीं, मन से देखना जानते हैं। जिनके लिए सबसे आकर्षक चीज़ होती है किसी का मस्तिष्क। उनके लिए सुंदरता कोई तस्वीर नहीं, बल्कि विचारों की एक जीवंत भावना होती है , गहराई से बढ़ती हुई।


सैपियोसेक्सुअल लोग तब प्रेम में पड़ते हैं, जब कोई किसी विषय पर इतनी बारीकी से बात करता है कि हर शब्द एक नया आयाम  खोल दे। विज्ञान, दर्शन, साहित्य, मनोविज्ञान ,प्रेम ,धर्म , इन बातों में उन्हें वही अनुभव मिलता है जो किसी और को खूबसूरत चेहरे , आँखों की चमक या मुस्कुराहट में मिलता । वे संवाद को सतही नहीं बल्कि आत्मा तक ले जाना चाहते हैं।वो सिर्फ सुनना नहीं चाहते ,वो गुनना चाहते हैं । वो अनुभूति को चेतना के स्तर पर जीना चाहते । 


उनके लिए आकर्षण तब जागता है जब उन्हें महसूस हो कि, "उसकी सोच ने मुझे बदल दिया।" ,"उसके जैसी सोच सबकी होनी चाहिए ", "आज उसके नजरिए ने मुझे सोचने का नया आयाम दिया"। वो जो दिमाग को झकझोर डाले । वो जो दिमाग की भूख भी हो ,और खुराक भी। 


वे मन को पहले पढ़ते हैं, विचारों को  महसूस करते हैं। चेहरे की बनावट उनके लिए गौण होती है, पर सोचने का तरीका उन्हें बांध लेता है। जब वे किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं जो सवाल करता है, जो नई चीज़ें सीखने को लेकर व्याकुल है, तब उनके भीतर वह स्थायी रूप से बसने लग जाता। 


उनके लिए रिश्ते सिर्फ साथ चलने का नाम नहीं, बल्कि साथ सोचने का नाम होते हैं। उनके लिए प्रेम एक ऐसी बातचीत है जो रात के सन्नाटे में भी गूंजती है। एक ऐसा मौन संवाद, जिसमें दो ज़हन एक-दूसरे को धीरे-धीरे खोलते हैं।जहां उन्हें। बोलने की आवश्यकता भी ना पड़े ....पर मानसिक तरंग एक ही आवृत्ति में हों। 


हाँ, कुछ लोग कहते हैं कि यह घमंड है ,दिखावा है..... बुद्धिमत्ता को सौंदर्य से ऊपर रखना। लेकिन शायद यह सिर्फ एक अलग दृष्टिकोण है। हर किसी की अपनी पसंद होती है। कोई बाहरी आकर्षण में डूबता है, तो कोई भीतर की रोशनी में।


सैपियोसेक्सुअल वही लोग हैं जो शब्दों से प्यार करते हैं, सोच से बंधते हैं, और विचारों में अपना घर ढूंढ़ते हैं। जिनके लिए मस्तिष्क ही सबसे सुंदर अंग होता है , क्योंकि एक दिन चेहरा बदल जाएगा, आवाज़ धीमी पड़ जाएगी, लेकिन एक जीवंत सोच..... वो हमेशा युवा रहेगी।  और शायद, यही प्रेम का सबसे स्थायी रूप है।क्योंकि शरीर मरता है, पर सोच और विचार कभी नहीं.....। 


#ब्रह्मनाद

#डॉ_मधूलिका

शुक्रवार, 30 मई 2025

कल हो ना हो




 *मैं तुमसे बाद में बात करूँगी/करूँगी। 

*कल ये काम कर लेंगे।

*कल से पक्का नया रूटीन फॉलो करूंगा /करूँगी।

*कल से जल्दी उठेंगे।

*कल पक्का तय करेंगे कि आगे क्या करना...... 


और हर आज ;वही कल होता है जिस कल की हमने कल बातें की थी। अफ़सोस हम कल में टालते जाते.... कल के आसरे में बैठे रहते ,और वो कल कभी नहीं आता। हां इस कल को पाने की जद्दोजहद में हम आज को जरूर खो देते। आज की निश्चितता को कल की आस में नजरअंदाज करते रहते। 

इस कल के चक्कर में हम बस खोते ही चले जाते....... कई अपनों को ,और सपनों के लिए हकीकत को। 

कल कभी आ ही नहीं पाता। और हम अन्तहीन दौड़ते ही चले जाते।ये कल हमसे हमारे एक कदम आगे ही रहता।जब -जब हाँथ बढते तो लगता हम इसे पकड़ लेंगे।पकड़ में आता तो सपने हकीकत बन जाते..... पर  ये एक छलावा रहता ,एक मृगतृष्णा.... हम आगे देखने के चक्कर मे अपने नीचे की जमीन भी खो देते। और फिर औंधे मुंह गिरते। निगाहें फिर भी उसी कल की ओर लगी रहती, और वो हमसे उतनी ही दूरी पर खड़ा रहता ,जितना हमारे सफर की शुरुआत में था।


जब तक आंख खुलती....... कल खो चुका होता ,बीत चुके कल में। और हम एक पेंडुलम बन चुके होते कल और कल के बीच । तब वर्तमान भी पहुंच से छूट चुका होता और हमारा आधार ......... एक ट्रेडमिल की तरह हमें ऐसी दौड़ में ले जाता ,जहाँ हम दौड़ते तो रहते अनवरत ,पर कहीं पहुंच नहीं पाते। कल ....... कभी नहीं आता ,समझ तब आता ,जब आज कल में बदल जाता और हाँथ और ऑंखे दोनों खाली ..........

और फिर एक दिन कल की ओर ताकते हुए हम आज से कल में बदल कर इस दुनिया के अस्तित्व में ही आंकड़े से गायब हो जाते।


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका 

रविवार, 18 मई 2025

अंतहीन प्रतीक्षा


 

                      ( चित्र - गूगल से साभार)



प्रतीक्षा... एक ऐसा शब्द जो सुनने में सहज लगता है, पर जो इसे जीता, उसके लिए यह जीवन की सबसे कठिन परीक्षा बन जाता है। यह वह भाव है जो समय की गति को तो नहीं रोकता पर प्रतीक्षारत व्यक्ति वहीं रुका रह जाता जिस क्षण से प्रतीक्षा शुरू हुई थी। समय की गति  और हर क्षण उसे  भारी लगने लगता है।


वास्तव में प्रतीक्षा ऐसा वृक्ष है, जो ऊपर से हरा-भरा दिखाई देता है। आशा की पत्तियाँ उसे हरा-भरा दिखाते हुए लहराती रहती हैं, सपनों और आशाओं के फूल भी उसमें  खिलते  हैं, और विश्वास की कोपलें उसे सूखने नहीं देती हैं।देखने वाले को वह सुन्दर और जीवंत दिखता है, पर किसी को क्या पता कि उसका तना ,मन भीतर से  कितना खोखला हो चुका है।


 नमी तो अब केवल आंखों में बची है, आंसुओं के रूप में। जिसे  वो बाहर निकलने देता ,वो अंदर आंसू का हिम खंड बनाते हुए एक विशाल पर्वत बन चुका होता है।किंतु उस पेड़ की जड़ें इस भार को लिए हुए  सूख चुकी  होती हैं।


हर दिन, हर क्षण प्रतीक्षा उस पेड़ को थोड़ा-थोड़ा भीतर से खा जाती है। बाहर से मुस्कुराता चेहरा भी अंदर से एक लंबी चुप्पी में डूबा होता है। जैसे किसी ने आत्मा को चुपचाप को हटा दिया हो पर वह देह को किसी उम्मीदों की डोर से बंधे होने के कारण ना छोड़ पा रही हो। 


कभी किसी अपने के आने की उम्मीद, कभी उसी अपने के  उत्तर की आस, और कभी उस एक नई सुबह की चाह जो उस अपने को देखने और मिलने के लिए बची होती , सब उस वृक्ष को थोड़ा और हरा दिखाती हैं, लेकिन खोखलेपन का सच उससे छुपा नहीं रहता।


प्रतीक्षा थका देती है, पर खत्म नहीं होती। वह जीने की वजह भी बन जाती है और मुक्त होने के लिए बंधन भी। कभी - कभी कुछ प्रतीक्षाएँ अंततः पूर्ण होती हैं, और वृक्ष फिर से जड़ें पकड़ लेता है। पर कुछ प्रतीक्षाएँ केवल जेठ की एक सूनी दोपहर की तरह आती हैं, जिसमें विरह की तपन बिना किसी नमी के मन को दग्ध करती हुई ताउम्र बनी रहती है। 

कहने को प्रतीक्षा में जीवन है, पर असल में यह जीवन का सबसे मौन और सबसे कठिन रूप है।

कभी प्रतीक्षा को समझना हो तो  उस  पेड़ को भीतर से भी देखना जो बाहर से हरा भरा हो,  वह भीतर से खोखला हो हुआ हो… पर फिर भी खड़ा है, एक अंतहीन प्रतीक्षा के पूर्ण होने की आशा लिए।


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका 

शनिवार, 17 मई 2025

एक कोशिश जो हर दिन दोहराई जाती है

                         ( चित्र:- गूगल से साभार ) 



वह भी हर सुबह जल्दी उठती, दैनिक नित्य कर्म पूरा करती और स्कूल की ड्रेस पहन कर, टिफिन चेक कर बैग में रखती। पूजा घर में भगवान में प्रणाम कर बोलती हे भगवान मुझे बुद्धि देना ,अगर उसके टेस्ट या  एग्जाम होते तो उस दिन का सब्जेक्ट बोलकर कहती मेरा एग्जाम अच्छा कराना। कायदे से तो उसे शक्ति मांगना चाहिए ,हर दिन उपेक्षा और अपने लिए तिरस्कृत भाव का सामने करने के लिए।

उसके बाद ..... फिर हंसते हुए आँखों में उम्मीद लिए घर से निकलती बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे बाकी बच्चे। लेकिन स्कूल की दहलीज़ पर कदम रखते ही उसकी दुनिया थोड़ी अलग हो जाती है।

कक्षा में जब टीचर कुछ पूछते हैं, तो उसकी ओर कम ही निगाहें उठती हैं। उत्तर मालूम होने पर भी जब तक वह बोलने की कोशिश करती है, कोई और उत्तर दे चुका होता है। उसकी धीमी प्रतिक्रिया को अक्सर असमर्थता मान लिया जाता है। कुछ टीचर मुस्कुराकर देख लेते हैं, पर कुछ बिना प्रतिक्रिया आगे बढ़ जाते हैं ,मानो वह वहाँ है ही नहीं।

खेल के मैदान में उसकी जगह अक्सर किनारे होती है। जब टीमें बनती हैं, तो उसका नाम सबसे अंत में लिया जाता है या बिल्कुल नहीं। जहां  बाकी नामों को अपनी अपनी टीम में लेने की होड़ होती ,तो उसका नाम ऐसा रह जाता जो कोई अपने पक्ष में नहीं चाहता । कुछ बच्चे उसकी ओर देखकर हँसते हैं, कुछ बस उपेक्षा से नज़र फेर लेते हैं।

फिर भी वह हर दिन खुद को साबित करने की कोशिश करती है। उसकी कॉपी साफ होती है, चित्रों में उसका बचपना झलकता है, और जब उसे बोलने का मौका मिलता है, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक दिखती है।जो कि किसी का उसके लिए विश्वास का प्रतिबिंब होता है। 

कभी-कभी कोई एक सहेली मिल जाता है जो उसकी बातों को सुनता है, जो उसे उसके अपने तरीके से सिखाने की कोशिश करता है। ऐसे क्षण उसके लिए अनमोल होते हैं। लेकिन वे क्षण दुर्लभ होते हैं और उंगलियों में गिने जाने लायक.....बहुत कम।

अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं।जब किसी सहपाठी की तारीफ उसके सामने होती, जब किसी और को पुरस्कार मिलते हैं,किसी और के लिए तालियां बजती हैं , वह खुशी से ताली बजाती है। ईर्ष्या का लेश मात्र भी अंश उसमें नहीं होता, वह सबकी सफलताओं पर खुश होना जानती है। उसे कभी किसी से शिकायत नहीं होती। न कभी किसी के लिए ग़ुस्सा, न कोई रोष, न कोई कटुता, बस एक शांत स्वीकृति और अगली कोशिश की तैयारी।

उसे पता है कि वह अलग है, पर यह नहीं जानती कि इस "अलग" होने के कारण ही लोगों की उपेक्षा और उपहास का कारण बनती है। वह खुद के अलग होने को कमजोरी नहीं मानती ,ना बनने देना चाहती। वह हार नहीं मानना चाहती। हर दिन एक नई उम्मीद के साथ फिर खड़ी होती है क्लास में उत्तर देने के लिए, खेल में भाग लेने के लिए, सहेलियों द्वारा खुद को चुने जाने के लिए और सबसे बढ़कर "खुद के होने की स्वीकृति" पाने के लिए।

उसका संघर्ष हर दिन चलता है, समझे जाने के लिए, अपनाए जाने के लिए, खुद को सिद्ध करने के लिए। और फिर भी, उसके भीतर कोई नकारात्मकता नहीं।वह सिर्फ एक मुस्कान के बदले असीम स्नेह देने का मन रखती है।एक बार हांथ बढ़ाने पर अपने मन का सबसे कोमल स्थान देती है।सिर्फ नजर मिलाने पर निश्छल मुस्कान सौंपती है क्योंकि उसका मन निर्मल है, कोमल है ,एक पारदर्शी काँच की तरह।किसी के नकारात्मक व्यवहार का बदला भी वो अपने मासूम से सकारात्मक व्यवहार से देगी। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है, और शायद यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी। 

उसका हर दिन संघर्ष है, एक मौन और गहरी दृढ़ता के साथ। हर दिन आंख खुलने से लेकर बंद होने तक एक ऐसी कई परीक्षाएं , जो अंकसूची नहीं बल्कि लोगों के व्यवहार में परिणाम देती है।जिसमें वह कई बार अनुत्तीर्ण होने को भी स्वीकार लेती ,एक बार उत्तीर्ण होने की चाह में।


#ब्रह्मनाद

#डॉ_मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी 

 

शुक्रवार, 2 मई 2025

राइटर्स ब्लॉक


 

कभी-कभी शब्द हमसे दूर भागते हैं। हम कुछ सोचते हैं ,लगता है कि बस अभी एक खूबसूरत रचना रच डालेंगे।  हम बैठते हैं लिखने के लिए, लेकिन कागज़ खाली रह जाता है।  एक ऐसी दीवार, जो हमारे और हमारी कल्पनाओं के बीच खड़ी हो जाती है। 

दिमाग सोचना चाहता है पर उसमें होती हैं तो बस  चुप्पियाँ , जो सिर्फ चुप नहीं होतीं बल्कि एक  खालीपन उभार जाती हैं। जब लिखने की तड़प हो, लेकिन शब्द साथ छोड़ दें, तब हर साँस एक बोझ बन जाती है। पेन पकड़ते वक्त उंगलियाँ काँपती हैं, आँखें धुंधली होती हैं और कागज़ का कोरापन  भीतर तक चुभता है।

राइटर्स ब्लॉक सिर्फ न लिख पाने का नाम नहीं है — यह धीरे-धीरे टूटते जाने का अहसास है। यह देखना है कि हम जो सबसे ज़्यादा चाहते हैं, वही आपसे दूर भाग रहा है। हर अधूरा वाक्य ,हमारी हार बन जाता है, हर खाली पन्ना एक मौन चीख।

कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे शब्द जानबूझकर छुप गए हैं, जैसे खुद अपनी आवाज खो गई हो। जैसे भीतर जो कुछ भी था जज़्बात, सपने, कहानियाँ — सब बर्फ बनकर जम गए हों।

यह दर्द सिर्फ उस पल का नहीं होता। यह धीरे-धीरे दिल के कोनों में जमा होता है, हर असफल कोशिश के साथ थोड़ा और भारी हो जाता है। ऐसे में खुद से लड़ना भी थका देता है और फिर भी, छोड़ना भी मुमकिन नहीं होता।

हम दूसरों को पढ़ते हैं ,सोचते हैं कि हम इस स्तर पर क्यों नहीं सोच पा रहे ????क्या इस विषय पर हम लिख सकते थे??? क्यों एक पंक्ति लिखने के बाद लेखनी आगे बढ़ने से इंकार कर देती है। एक अदृश्य छटपटाहट जैसे हमारा बेहद कीमती कहीं खो गया है ,कभी ना मिल पाने के लिए । 

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई एक ऐसा कमरा जिसमें ना तो कोई दरवाजा ,ना खिड़की। हम छटपटाते रह जाते हैं एक सांस ताज़ी हवा के लिए, एक नजर धूप का कतरा देखने। पर हांथ आता है तो भयावह अकेलापन और शून्यता। 

पेपर की हर लिखावट आंसुओं के कारण अस्पष्ट सी रहती , हम उन पंक्तियों के बीच पढ़ने का एक अंतिम प्रयास करते जो अब तक लिखी भी नहीं गई हैं। हम हारने लगते हैं ,खुद से ।क्योंकि हमें लग रहा था कि अब तक हमारे लिए लिखना सांस लेने जैसे जरूरी था। हम उस व्यक्ति की तरह महसूस करने लगते जिसकी अंतिम सांस छूट रही हो ,और वो एक बार फिर जीने के लिए हर तरह का प्रयास कर रहा हो।

 पर अंततः सांस की वो डोर टूट ही जाती है। और हम कोरे पन्ने को बिसूरते उसमें आंखों के खारे पानी की आड़ी टेढ़ी लाइन बनते देखते हुए एक घने अंधकार से एक गहरी खाई में बस गिरते चले जाते.... इस आस में की शायद एक दिन फिर ये कलम कूक उठेगी बसंत के आगमन पर लेखन की प्रकृति की तरूणाई को जगाने। 

#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका

मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

नृत्य:- स्पंदन की गति का उत्सव




सांसों की ताल पर जीवन का नृत्य


जीवन एक नृत्य है, और इसकी  सुंदरतम लय है हमारी सांसों । जैसे कोई कुशल नर्तक संगीत की हर धुन पर अपनी गति को ढालता है, वैसे ही हमारा जीवन हर सांस के साथ एक लयबद्ध गति में संगत करता है।


 यह नृत्य केवल शारीरिक अस्तित्व का नहीं, बल्कि चेतना, भावनाओं और आत्मा के सूक्ष्म स्तरों पर होता है। हर सांस जो हम लेते हैं, वह न केवल जीवन को बनाए रखने का कार्य करती है, बल्कि हमें ब्रह्मांड की अनवरत गति से भी जोड़ती है। जब हम शांत होकर अपनी सांसों को महसूस करते हैं, तो ऐसा लगता है मानो सृष्टि की एक अनदेखी धुन हमें छू रही हो—एक ऐसी धुन, जो न कभी रुकती है, न थकती है।यह सम की गति पर होता है। किंतु स्थिति, परिस्थिति और भाव अनुसान जीवन में आरोह और अवरोह की गति भी होती है, जैसे नृत्य में क्रमशः पठन के साथ गति तेज होती है और आरोह , अवरोह से लयकारों से बढ़ते हुए एक समय थम जाता। 


सांसों की इस दिव्य लय में एक दैवीय नृत्य ताल मिलाता है। यह केवल मनुष्यों नहीं ,बल्कि पशु पक्षी सहित हर जीव में  यह वही संगीत है जो पेड़ों की सरसराहट में, लहरों की गूंज में, और पक्षियों की चहचहाहट में गूंजता है।जीव- अजैव की संगति से भी एक नृत्य का जन्म होता है।  इसके भेद को समझने वाला व्यक्ति जीवन के हर क्षण में ब्रह्म का अनुभव करता है। हमारे भाव और अंग संचलन संयुक्त रूप से इस बात को तय करते की प्रकृति में संचालित यह नृत्य लास्य होगा अथवा तांडव। 


जब हम जीवन के इस भेद को जान जानने का प्रयास करते हैं तब यह ज्ञात होता है कि हम सृष्टि के उस महान नृत्य का हिस्सा हैं, जिसमें हर जीव, हर वृक्ष, हर पिंड सम्मिलित , हर चेतना या दूसरे शब्दों में कहूं कि संपूर्ण ब्रह्मांड नृत्यरत है। एक निश्चित और तय गति, निश्चित लय ,यही अनुभूति हमें अलौकिक से  एकत्व का बोध कराती है और जीवन को एक गहन अर्थ देती है।


अंततः,सांसों की ताल पर चलता यह जीवन-नृत्य ईश्वर  की सृष्टि की सर्वोत्तम और सर्वोत्कृष्ट उपहार है। 



#अंतर्राष्ट्रीय_नृत्य_दिवस

#ब्रह्मनाद

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शनिवार, 26 अप्रैल 2025

मौन


 


मौन


मौन...... मतलब?? निःस्तब्धता ....जब कहने को कुछ ना हो ..या जब कुछ कहना ही ना चाहें ........नहीं ।

मौन मतलब जब आपके भाव का प्राकट्य शब्द की अनिवार्यता से ऊपर उठ जाएं। शांति की वह परम अवस्था ;जब आप मानसिक रूप से शांत हों। जब आपकी आत्मा सिर्फ आपकी #सांसों_की_लय का संगीत गुनगुना रही हो । जब #स्थूल ,#सूक्ष्म रूप में भेद ना बचे। जब मन  / विचार किसी  #विचलन की अवस्था मे ना हों। #आत्मपरिवर्तन की दिशा है मौन । 

#गीता में मौन को तपस्या कहा गया है। वास्तव में ये एक साधना ही है। सामान्यतः मौन का अर्थ हम शब्द ध्वनि पर रोक  समझते हैं । हालांकि ये स्थिति भी पालन करने में बेहद दुष्कर होती है। बाहरी वातावरण के प्रभाव से आंतरिक द्वंद की स्थिति में वाणी निषेध वाकई साधना ही है। 

 हम अक्सर ध्यान और प्रार्थना के समय शाब्दिक मौन होते हैं। इस स्थिति में स्वयं में एक प्रभा मण्डल को जागृत होता हुआ व एक शक्ति  भी महसूस करते हैं। स्वयं की आंतरिक ऊर्जा का नियमन कर एक बिंदु पर एकाग्र होना .....एकनिष्ठ भाव होते हैं ; शाब्दिक मौन के। किन्तु उससे भी श्रेष्ठ होता है ,आत्मिक / आंतरिक मौन। 

समाधि सी अवस्था ....मौन । मन की निः स्तब्धता की दशा।  कई बार हम वाणी से मौन होते ,किन्तु मन वाचाल रहता। कई तरह के विचारों ,परिस्थितियों का विश्लेषण  करते हुए और परिणाम सोचता। कई बार स्वयं में वाद - विवाद की दशा का भी जनक होता है ये मौन ( वाणी) । 

मूलतः मौन वही जब मन -मस्तिष्क #सम_की_दशा में हों। ना हर्ष - ना विषाद, ना द्वेष - ना क्लेश, ना अपमान - ना सम्मान ...शेष बचती है सिर्फ निरपेक्षता.... आत्मिक निर्लिप्तता । 

बिल्कुल वैसे जैसे अंतरिक्ष का परिमाण ,पर मान शून्य...

स्वयं में गहरे होते हुए ,अंदर से शांत ,विचार शून्य हो जाना। 

हम जब स्वयं के विचारों की लहर को शांत कर उसका नियमन और नियंत्रण सीख जाते ,जब आंतरिक उद्वेलन की स्थिति को काबू करना सीख लेते..तभी हम मौन को वास्तविक रूप में जान पाते। विचारों में शव की स्थिति को जीकर शिव हो जाना ही मौन को सही अर्थों में जी लेना। 

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#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

मां होना दुर्भाग्य है !


 #माँ_होना_दुर्भाग्य_है


मैं कन्या भ्रूणहत्या का समर्थन करती हूं..... क्यों कारण बहुत सारे हैं ,सिर्फ इसका एक बलात्कार कारण होता तो शायद यह मांग ही नहीं कर पाती।

 चलिए कुछ समय पीछे जाते हैं ,मेरी नन्ही बेटी मेरी गोद पर थी ।नन्हीं सी गुड़िया, प्यारी सी, नाजुक सी, ऐसा लगता था जैसे अगर ओस भी उसे छूऐगी तो उसे घाव हो जाएगा। तब मुझे एक नया नया चस्का लगा  हुआ था ,मैं इंटरनेट पर प्यारी प्यारी सी तस्वीरें सर्च करती थी ।उस हर एक तस्वीर में किड मॉडल की पहनी गई  ड्रेसेस , ऐसेसरीज के साथ अपनी बेटी की कल्पना खेलती हुई  मासूम चंचल गुड़िया  में करती।अब इन बातों में अचानक कन्या भ्रूण हत्या की बात कहां से आ गई !!!!!बताती हूं...

 वक्त के साथ मेरी बेटी बड़ी होती है ,मेरे सर्च करने का नजरिया और कन्टेन्ट चेंज हो गए। इंटरनेट पर जुड़ी हुई बहुत सी बातें ऐसी थी धीरे-धीरे मुझे रोचक कम लगती और डराती ज्यादा थी। कभी मुझे खबर आती एक 10 माह की मासूम के साथ उसके ही रिश्तेदार ने बलात्कार कर उसे मार दिया। कभी खबर आती कोई 5 साल की नन्ही सी गुड़िया की मासूमियत के साथ इस तरह खेल कर गया की गुड़िया दोबारा जुड़ नहीं पाई।

 कभी खबर आती किसी एक और नन्हीं जान की मासूमियत को कई हैवान तार तार कर उसकी जान ले लिए।

कभी खबर आती की पिता ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर अपनी बेटी का बलात्कार किया। आए दिन ऐसी खबरों से इंटरनेट के माध्यम से मुझे कई तस्वीर भी मिलती।

 एक दौर वो था जब मैं किसी प्यारी सी तस्वीर में अपनी गुड़िया की छवि देखती थी , अपनी बेटी को उस छविमें उतार लेती थी पर जब इन खबरों की तस्वीरें सामने आती थी तो कहीं ना कहीं मैं उसमें अपनी ही बेटी को अनजाने ही इन घटनाओ में देखने लगती। मुझे महसूस होता था कि मेरी 9माह की बच्ची कितनी नाजुक थी ,उसके कपड़े से लेकर,बिस्तर और  वह हर चीज  जिससे वो सम्पर्क में थी ;उसमें  मैं कोमलता का ख्याल रखती थी कि मेरी गुड़िया को किसी भी तरीके से चोट ना लग जाए। उसका क्रीम पाउडर उसको हानि ना पहुंचाए ।

 और जब मैंने जाना कि एक 9 माह की बच्ची के साथ किसी हैवान ने इतनी हैवानियत की कि वह अपनी जान ही नहीं बचा सकी तो मैं अपनी बच्ची की मासूमियत के साथ की तुलना करने लगी ।मुझे क्यों पता नहीं क्यों मेरी बच्ची तड़पते हुए देखने लगी मेरी ममता अंदर चीत्कार कर रही थी ।हर वह छोटी बच्ची की हैवानियत की शिकार होने  की तस्वीरें मुझे अंदर तक दंश देकर चली गई।  जब जब कोई ऐसी बच्ची की तस्वीर सामने आती जो किसी की यौन उत्कंठा का शिकार होती मैं अनजाने ही उन तस्वीरों में अपनी बेटी की कल्पना करने लगती ।मैं उस उस दर्द का अंदाजा लगाने लगती जो उस बच्चे के मां और पिता को मिला होगा ,उस बच्ची की हालत को देखकर और उससे भी ज्यादा उस बच्ची की हर वक्त की तड़प जो उस दुर्दांत इंसान के शिकंजे पर आकर उसने महसूस की होगी। 

कितना सहेजते हैं हम अपने बच्चों को, उनकी एक चोट पर हमारा दिल रोता है.....एक छोटी एक छोटी सी खरोच हमें अंदर तक तड़पा जाती है ।फिर उसी स्थिति का अंदाजा लगाइए जब एक छोटी सी बच्ची यौन उत्पीड़न का शिकार होती है ।बलात्कार का शिकार होती है ....कभी सोचा है एक बार महसूस करके देखिएगा कोई जबरदस्ती सिर्फ अगर आपका हाथ ही पकड़ ले तो आपको छुड़ाने में कितनी तकलीफ होती है ....और वह बच्ची जिसे उस कुकृत्य का मतलब भी नहीं पता है वह उसे कैसे झेलती होगी?? खुद को बचाने के लिए किस हद तक जूझती होगी। कितना रोती होगी एक अमानवीयता के दर्द से। कितनी मजबूर होती होगी खुद को मसले जाने को झेलने को। और अंत मे पीड़ा को मौत से जीत कर शांत हो जाती होंगी। 

 बात सिर्फ बलात्कार की नहीं है आसपास होने वाली सारी घटनाओं से मैं अब डरने लगी हूं ।मैं सोचने लगी हूं कि मैं एक बेटी की मां क्यों बनी हूं ????

मैं अपनी बच्ची को अपने पड़ोसी के घर भेजने से डरने लगी हूं, मेरी बच्ची के सर पर पड़ने वाले नहीं कि हाथ भी मुझे संदेहास्पद   लगने लगे हैं । मैं अक्सर सोचती हूं उसका ऑटोवाला उससे किस तरीके से व्यवहार करता होगा ???क्या उसे लाड़ जताने के बहाने कहीं ऐसे स्थानों पर ना छूता हो ,जो मेरी बच्ची के लिए सहज ना हो और वह डर जाती हो ।मेरी बच्ची कहने से मतलब हजारों-लाखों छोटी मासूम कलियों से है जो आए दिन जाने-अनजाने ,प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से इस तरह के हादसों के शिकार होती रहती हैं। कभी गेटकीपर,कभी लिफ्टमैन, कोई दुकान वाला न जाने किस नजरों से उन्हें देखते होंगे न जाने किस तरीके से छूते होंगे .....उनके सर को  सहलाने के बहाने वह न जाने अपनी किस कुंठा को तृप्त करते होंगे.... सोचकर कांपने लग जाती हूँ। वह जिसे हम एक मासूम से फूल की तरह समझते हैं एक कोमल कली की तरह हम उसे मान कर रखते हैं वह ना जाने इन आतंकियों के किस रूप का सामना करती होंगी ,हमसे दूर हो कर। हम कब तक उन्हें अपने पहलू में छुपा कर रखे??? हम कब तक उनके साथ हर जगह रहेंगे ?????कहीं ना कहीं तो उनको हमसे अलग होना ही होगा ।जब  वह हमसे अलग होंगी तो क्या महसूस करती होंगी हमें तो पता भी नहीं चल पाता। 

कई बार हम जैसे समझदार बुद्धिजीवी माने जाने वाली महिलाएं भी भावनात्मक तौर पर छली जाती हैं ,जो की बहुत अनुभव सम्पन्न मानी जाती हैं ।दुनियावी मामले में जब हमारी यह गति होती है इन बच्चियों का क्या होता होगा ????

हर पल ,हर लम्हा अपनी बच्ची को अपनी नजरों से दूर करते मैं मैं डरती हूं । परिवार के लोगों के बीच में छोड़ने से डरती हूं , बाहर उसे अकेले छोड़ने से डरती हूं ।

कितना अजीब वक्त आ चुका है विश्वास का कहीं नाम ही नहीं रहा कई बार ऐसी घटनाएं में पता चलता है कि पिता ही बेटी को बेच दिया पिता ने अपने दोस्तों के साथ रेप किया, घर पर किसी बुजुर्ग की उत्कंठा का शिकार हुई लड़कियां ।न जाने कितने ऐसे उदाहरण है ।

जहां हर वक्त मेरे सामने सिर्फ और सिर्फ इन बच्चियों का दर्द उभरता है , मैं उनका दर्द एक मां के तौर पर महसूस करती हूं और तब लगता है कि  मां होना दुर्भाग्य है ,क्योंकि मुझे अब अपनी बच्ची का भविष्य सुरक्षित नहीं। 

मेरी नजरों में हमेशा एक भ्रम की स्थिति बनी रहती है ,उसके भविष्य के लिए विचारशील रहती हूं पर  अब उसके लिए यह सपने नहीं देखती कि मेरी बेटी क्या बनेगी ?????

मैं अब  यह सोचती हूं मेरी बेटी सुरक्षित रहेगी  या नहीं ।

 कि अब मैं मां होना दुर्भाग्य समझती हूं ।मैं अब  बेटी को जन्म भी नहीं देना चाहती,ताकि  हर वक्त महसूस होने वाली उस पीड़ा से बच सकें ,जो कई गंदी नजरों कई गंदे पशुओं स्पर्शों  से  हमारे दिल दिमाग को छलनी कर जाता है ।

सिर्फ मैं नहीं मुझ जैसे लाखों माएँ इन घटनाओं को खुद में घटती हुई  महसूस करती होंगी ।खुद की बच्चियों की छवि में उन बच्चों की छवि देखती होंगी जिनकी तस्वीरें इंटरनेट पर इन हैवानों के  कुकृत्य की वजह से वायरल हो जाती हैं ।

हम अब किसी पर विश्वास नहीं कर पाते हमारी नजरों पर हमेशा दूसरों के कार्य और व्यवहार के लिए एक प्रश्न चिन्ह होता है ।एक अंजाना सा डर हमेशा सामने रहता है ।

जब आप किसी पर विश्वास नहीं कर पा रहे हो ऐसी स्थिति में जीना कितना मुश्किल होता है, यह समझाने की जरूरत नहीं है। सोचकर देखिएगा उस मां की पीड़ा को जो अपनी बच्ची को बाहर भेजने से डरने लगी है ,घर में भी वह उसे सुरक्षित नहीं पाती है। और जब हर वक्त यह अनिश्चितता उसके सामने होती है हर वक्त यह डर उस पर हावी होता है ,तो वह क्या बच्चे को सुरक्षित भविष्य दे पाएगी !!!!!!क्या वह बच्ची को वह मजबूत स्थिति दे पाएगी???

अब बताइए ऐसी स्थिति में क्या एक बच्ची का जन्म होना जायज है मेरे ख्याल से बिल्कुल नहीं जड़ ही खत्म कर देते हैं ....ना रहेगी बच्चियां ....ना रहेगा डर और जब डर नहीं होगा तो समाज का स्वरूप अलग हो जाएगा ।लोगों को समझ में आएगा कि एक औरत का होना , बच्ची का होना समाज में कितना जरूरी है..... तब शायद यह उत्कंठा खत्म हो पाए ।

हम आत्मरक्षा के गुर सिखाने की बात करते हैं ,इन सब घटनाओं से बचने के लिए ।पर वो मासूम बच्चियां जो अभी स्पर्श को वर्गीकरण नही जानती,अपने पराए  की सही परिभाषाएं भी नहीं जानती , वह कैसे अपनी आत्म रक्षा कर  पाएंगी???वह जो अभी अपनी भूख बताने के लिए भी सिर्फ रोकर ही जता पाती हैं, वह कैसे आत्मरक्षा कर पाएंगी ?? 

कैसे बचाएंगे हम  इन मासूमो को ।वह तो सक्षम नहीं हैं ,और हमारे पास सिर्फ एक ही तरीका है कि हम मां ही ना बने ,हम इन बच्चियों को जन्म ही ना दें ,इस घटिया मानसिकता वाले हैवानों के समाज मे। 

 इसलिए एक डरी हुई ,कुंठित माँ के रूप मैं पैरवी करती हूं ,कन्या भ्रूण हत्या ही जायज ठहरा दिया जाए ताकि बड़े होकर वह हर पल मरने से बच सकें और एक मां उस दुर्भाग्य को ना महसूस कर सके जो इन खबरों से वो अंदर तक टूट कर जीती है। 


ये लेख नहीं माँ के रूप में मेरी पीड़ा है, अगर महसूस कर सकें तो जिम्मेदारी लीजियेगा किसी माँ की अनुपस्थिति में उसके बच्चों को स्वयं के सामने सुरक्षित रखने की।  वरना आज नहीं तो कल हर औरत बेटी को जन्म  देने से मना कर देगी और प्रकृति खुद की प्रतिकृति के अभाव में अंत की ओर अग्रसर होगी। 


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका