(छायाचित्र गूगल से साभार)
होली की वास्तविक कथा बाह्य दृश्य में नहीं, अपितु मानव-चेतना के सूक्ष्म आयामों में घटित होती है। यह केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के अंतर्मन में निरंतर चलने वाला आध्यात्मिक संघर्ष है।
होलिका कोई मात्र पात्र नहीं है; वह भीतर स्थित दंभ, अहं-वृत्ति और अविद्या की प्रतीक है, जो अपने क्षणिक सामर्थ्य पर भ्रमित होकर सत्य को चुनौती देती है। होलिका वह प्रवृत्ति है जो बाह्य असत्य के आश्रय में स्वयं को सुरक्षित समझती है, किंतु अंततः अपने ही दुराग्रह में भस्म हो जाती है।
वहीं प्रह्लाद अंतःकरण की निष्कलुष, अचल और सत्यनिष्ठ चेतना का प्रतीक है। वह श्रद्धा है, जो भय और प्रलोभन दोनों से परे रहकर सत्य में स्थित रहती है। वह आत्मविश्वास है, जो विपरीत परिस्थितियों की के बीच भी आध्यात्मिकता से विचलित नहीं होता।
जब जीवन में आध्यात्म का ओज प्रज्ज्वलित होता है, तब वह बाह्य शत्रुओं को नहीं, अपितु अंतर्मन में जड़ जमाए अहंकार, आसक्ति और अज्ञान को भस्म करता है। उस अग्नि में मिथ्या धारणा ,मान्यताएं भस्म होती है, किंतु आत्मा नहीं।
इसी सत्य को श्रीमद्भगवद्गीता में उद्घाटित किया गया है:-
“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥”
उसी प्रकार :-
“अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो।
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥”
अर्थात् आत्मा नित्य, अजन्मी और अविनाशी है; शरीर के नष्ट होने पर भी उसका विनाश नहीं होता।
अतः होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मबोध की दिशा में एक प्रतीक है। यह उस क्षण का उत्सव है जब मनुष्य अपने भीतर की होलिका रूपी अहं-वृत्ति को विवेक की अग्नि में समर्पित करता है और प्रह्लाद रूपी सत्य व चेतना को प्रतिष्ठित करता है। यही इस पर्व की दार्शनिक सार्थकता है........ अहं के दहन से आत्मा/अवचेतन के आलोक की ओर अग्रसर होना।
#ब्रह्मनाद
#डॉ_मधूलिका

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