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बुधवार, 22 जून 2022

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम थे

 #अपनी_मर्ज़ी_से_कहाँ_अपने_सफर_के_हम_थे


जीवन एक लंबा सफर है। जन्म से मृत्य तक का। और इसमें आते हर उम्र के पड़ाव आपको एक अलग सोच ,अलग नज़रिए में ढालते जाते। कुछ के लिए जीवन इतना स्वछन्द होता कि उन्हें  अपने स्वायत्त से ऊब होने लगती,और कुछ के लिए ,उनके हर फैसले दूसरों के नज़रिए और सोच से चलते। उदाहरण के लिए :अगर उनके नज़रिए में सोशल मीडिया गलत है ,तो आपकी जिंदगी की हर कठिन परिस्थिति और तकलीफ काI जिम्मेदार सोशल मीडिया है। 

अब अगर आपको उनके अनुसार सुखी रहना है तो सोशल मीडिया छोड़ने पर आपका जीवन परम् सुख से भर जाएगा। 

दुनिया मे सिर्फ धोखेबाज हैं......हर व्यक्ति जो आपको सोशल मीडिया में मिला बस वो आपको यूज़ करने के लिए ही आपसे जुड़ा। मतलब अब अगर आपको जीना है तो टेढ़ी नज़र करके हर किसी को दोषी मानते हुए ,खुद में घुटते हुए जीवन काटिये,तभी आप सुरक्षित रह सकते हैं। 


क्यों लोगों को हमेशा सामने वाले बुरे, धोखेबाज़ ही दिखाई देते। अपने तक तो ठीक है,पर अपने नज़रिऐ से दूसरे की जिंदगी के फैसले लेने वाले आप लोग कौन .....हां आप अपने हो,इसका मतलब ये की हमारी जिंदगी के फैसले हम सिर्फ आपकी खुशी, आपके नज़रिए से ही तय करते रहें,मुख्य भूमिका में  पुरुष हो या महिला फर्क नहीं पड़ता ,पर इस समाज में एक बेटी की स्वायत्तता सदा घेरे में रहती। आप हंसों पर जैसे आपके #अपनों की सोच है ,उसके अनुसार। आप कैसे जियोगे, ये #अपने निर्धारित करेंगे, आप किसी के साथ रहना चाहते या एकाकी ,ये हक भी आपका नहीं ;#अपनों की सोच ही सही। फर्क नहीं पड़ता कि आप किसी के साथ जीना चाहते,किसी के साथ खुश रहना चाहते ,फर्क पड़ता है कि आपके #अपने क्या चाहते हैं । जिंदगी आपकी, जीना अपने सिवा बाकी सबकी मर्ज़ी की। जिसकी जहां मर्ज़ी बहा दिया, जिसकी जहां मर्ज़ी हटा दिया, जिसका जब मन निकाल दिया ,जब मन हुआ बुला लिया।मानो इंसान इंसान नहीं कोई सामान हो गया,जिसे अपनी मर्ज़ी मुताबिक प्रयोग किया जाए। 

आपकी अपनी कोई सोच नहीं, आपका अपना कोई वजूद नहीं ,आपका अपना कोई निर्णय नहीं ,जो है बस आप पर शासन करने वालों को। सफर हमारा ,मर्ज़ियाँ बाकी सबकी। इस सफर के दृश्य तक हम नहीं देख सकते ,हम वही देखें जो हमें दिखाया जाता। ना जन्म लिया जाता अपनी मर्जी से ,न ही मार दिया जाता .....जीते जी,अपनी मर्जी से........ न ही मौत आती,अपनी मर्जी से। सच मे अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम थे.......…!!!!!

©®#ब्रह्मनाद

#डॉ_मधूलिका

हां वो लफ्ज़ ही थे

 


हां वो लफ्ज़ ही थे,

रुई से हल्के ,

पर सुई से तेज़,

जैसे रूह पर हर बार ,

दर्ज करते  ,कई;

नश्तर के घाव थे।


बेहद बारीक ,

रूह के हर जर्रे पर ,

चुभते बेहद तेज़,

लाल  घाव से खुद को ,

बनाते रँगरेज,

कहीं धंस से जाते थे । 


बेहद गंभीर ,

जेहन के हर हिस्से को,

करते लहूलुहान,

मुझे टुकड़ों में तोड़ते,

बनते खुद मूर्तिकार,

तोड़ के बिखरा जाते थे।


बेहद चोटिल,

शख्शियत का हर एक पहलू,

रोता था ज़ार - जार,

फिर जिस्म औ जेहन  अब,

ख़ाक में हर पल,

 बदल से जाते थे।


हां वो इबारत ही थे ,

जो झंझोड़ जाते थे ,

मेरी पहचान,

खण्डर की तरह,

 तोड़ जाते थे।


मेरे हर एक ख़्वाब

 और अरमानों के,

थिरते घावों से ,

आती रहती थी,

बस एक ही आवाज़ ,

जिंदगी को बख्श भी दो ,

जिंदा ,होने की ,

कहीं एक छोटी सी आस।

पर वो लफ्ज़ थे,

जो हल्के थे, 

रुई से,

और तेज़ थे ,

सुई से....

©®#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका

सोमवार, 13 जून 2022

 #ये_बारिशें_तुम_जैसी_हैं 



बारिश और तुम्हारा ना जाने क्या रिश्ता है,हर  साल मौसम  की पहली बारिश तुम्हारे नाम होती है।दो साल पहले जब डॉ के क्लिनिक से भीगते हुए सेंटर वापस लौटी ,तुम्हारा मैसेज ब्लिंक हुआ..... कहाँ हो आप??? जवाब दिया ,बारिश में भीगते हुए लौटी अभी ,पूरी तर हूँ..... । स्क्रीन पर दोबारा आपका जवाब ...अहा बारिश ...पर कैसे मानूं आप भीगे हो,सेल्फी भेजिए।

और मैं ना जाने क्यों सारी झिझक छोड़कर, आपको साड़ी में भीगी हुई ...खुद की सेल्फी भेज दी। आपका जवाब आ गया,प्रकृति खुद में सराबोर ..भीगी, कितनी प्यारी लगती है। कोई बनावट नही,कोई आभूषण नहीं ,फिर भी बेहद प्यारी। 


आपका जवाब पढ़कर एकबारगी खुद से प्यार हो गया(हालांकि खुद को मैं कभी नही भायी) .... रियर व्यू मिरर में खुद को देखकर मुस्कुरा उठी.... । यूँ तो बारिश में अकेले ,खाली सड़कों पर घूमते हुए भीगना बड़ा पसन्द था,पर आज बारिश कुछ खुमारी सी बरसा गई। पता नहीं क्यों पलकें कुछ बेझिल सी थी,हया का बोझ था उनमे। लगा ये बादल नहीं ,तुम ही हो ,जो मुझे सराबोर कर गए। 

पिछली बार भी कुछ ऐसा हुआ कि जिस दिन पहली बारिश थी,कुछ दिनों की व्यस्तता में गुम आप उसी दिन लौटे। कभी कभी लगता ये मेघ आपके ही दूत....#मेघदूतम की कृति आपकी अपनी है। जब जब आप आते ,ये पहले सन्देशा ले आते...***सुनो भद्रे,हिय में बसने वाले पिय आ गए** .... और मन उन्मत्त हो उठता उस मोर की तरह जो बादल देखकर नाचने लगता। तुम्हारे आने की वो खुशबू,जो धरती खुद के सौंधेपन से मुझमें समा देती...,।


मेरे सूखे ,झुलसे अतृप्त मन को सदा ही अपने नेह से यूँ ही लहलहा देते हो,जैसे पहली बारिश से धरती....हां एक उमस सी भी महसूस होती, जो प्रतीक्षा की आतुरता सी बढ़ती ही जाती....पर बारिश के साथ तुम्हारा आना ही मुझे संतृप्त कर जाता..... आजकल पहली बारिश में भीगना मुझे तुम्हारा एहसास करा जाता। जहाँ मैं रोते रोते हंसने लगती...जहाँ अंदर का दाह शांत हो जाता, जहाँ कोर कोर सीज जाता,तुम्हारे  होने के एहसास है.....जिसमें मैं दोनो हांथो को खोलकर समेट लेना चाहती,तुम्हारे प्यार का एक एक कतरा... और तुमने ही तो कहा था ना...बारिश पड़े तो भीगिये। तो भीग रही हूँ ,आज फिर तुममे ,तुम्हारे एहसासों की बारिश में......हां, पहले मुझे बारिश पसन्द थी;पर अब बारिश से प्यार है। हां ये बारिश जब जब आएगी, मुझे तुममें भिगो के जाएगी,तुम कहीं भी रहो, ये मुझे तुम्हारे बेहद करीब होने का एहसास दिला ही जाएगी.....। 

ये बादल भी तो देखो ना आज फिर तुम्हारे ही प्यार की बूंदे बरसा गया....हां मैं आज फिर भीगी हूँ......

 💭✍️⛈️⛈️⛈️⛈️⛈️🌈☔🌧️🌨️


#ब्रह्मनाद 

#डॉ. मधूलिका

रविवार, 12 जून 2022

आदी_से_अनंत

 #आदी_से_अनंत





अनकही पर कई बार सुनी हुई है ,

मेरी कहानी प्रेम की....

वो शुरू तो होती है अक्सर,

सप्त स्वरों के लयकारे सी,

कई रागों और रागनियों से सजी,

जिसका मुझे कोई ज्ञान भी नहीं,

कई आरोह - अवरोह से गुंजायमान ,

किसी वीणा के तारों से उठते,

मृदुल टँकार से झंकृत,

निनाद में परिवर्तित आरोह में....

एक गूंज में बदलकर ..

जो स्थायी का परावर्तन है...

जैसे किसी मंदिर के घण्टे की ध्वनि,

गूंजती रहती है ,

उसके दोलन के खत्म होने के बाद भी।

गूंज वो जो अनन्त का हिस्सा है।

जो निरन्तर समाती रहती ,

कानों, हृदय और मस्तिष्क के,

कृष्ण विवर में,

वो खोती नहीं ,

समा जाती है,

मेरे सर्वांग कण -कण में,

मैं चलायमान भी ,

और स्थायी भी हूँ,

उस प्रेम के ज्ञात ,

हर भाव मे हूँ। 


ये प्रेम पैदा नहीं किया,

इसे तो तुमने ही जगाया है,

चिरकाल,चिरनिद्रा में लीन,

योगनिद्रा और समाधिस्थ की दशा से। 

तुमने प्रवाहित किया एक अनन्त सा,

जीवन स्रोत...

जिसका आदि तो है...किन्तु अंत अज्ञात।

हां तुमने ही गढ़ी, 

मेरे प्रेम घट की अनन्त गहराइयाँ।

जिसमें देव-सरिता ,

प्रवाहित हुई,लेकर सहस्त्र धाराएं,

समाहित हुई ,

कई महाकाव्यों की,

लिखित गद्य रचनाएं,

कोटि-कोटि यज्ञों की,

संचित पुण्य सर्जनाएँ। 


जिसमे कई बार समा चुका ,

अनन्त गीताओं का सार,

असंख्य क्षीरसागरों की ,

नील आद्रताऐं,

अंतरिक्ष के तारों की ,

अनगिनत संख्याएँ,

उपनिषद के मूल भाव की,

तत्व सहित व्याख्याएं,

ज्ञात - अज्ञात जीवन की,

सत्य या सोची गई अभिकल्पनाएँ।

हाँ मेरे प्रेम को तुमने विस्तार दे दिया,

कई कल्पों में भी जो ना लिखा जा पाए,

एक ऐसा विचार दे दिया।

मेरा प्रेम सिर्फ प्रेम नहीं, 

प्रकृति का अपररूप है,

जब जब जीवन हंसेगा इसमें,

 प्रेम की ही स्वर लहरी होगा। 


हमारा प्रेम  शिव का,

शाश्वत अवतार है.

समय से परे,

और तम के पार है,

जिसका प्रारम्भ तो ज्ञात ..

किन्तु अन्त नहीं, 

जो भी उसकी सीमाएं हैं,

वो बस अनन्त रही.....

बस अनंत रही..।

#ब्रह्मनाद 

#डॉ. मधूलिका 

मैं तुम्हारी ख्वाहिश का तारा

मैं_तुम्हारी_ख़्वाहिश_की_तारा









 सुनो हर दीवाली जब तुम मुझे करीब पाना चाहते हो। मेरे नाम का एक दिया जला लिया करना। यकीन मानो मैं बुझते बुझते भी तुम्हारे आस पास रोशनी रखूंगी। और एक दिया और जलाना मेरे ही नाम का।उसको आकाशदीप बना कर छोड़ देना दूर गगन की यात्रा में। जीवन की ज्योत खत्म होने के बाद मैं किसी सितारे का रूप लेकर उसमे जगमगाऊंगी। हर रात मैं तुम्हें देखा करूँगी,और कभी किसी रोज जब दुनियावी रोशनी तुम्हें उकताने लगे तो कहीं किसी नदी या तालाब के किनारे चले आना। मैं झिलमिलाती हुई तुमसे खामोशी से बातें करूँगी। और इन अनगिनत तारों की छांव में दूंगी तुम्हें हर रात एक पुरसुकून नींद का वादा और जब वो पूरा होगा तो सुबह तुम्हें सूरज की सुनहरी किरण हल्के से छूकर तुम्हें जगाएँगी।हां तब मैं तुम्हें नजर न आऊंगी, पर मैं इस उजली रोशनी के घूंघट तले तब भी तुम्हें देखती रहूँगी,अनवरत,अनंत तक,मेरे अंत तक।

🌠#ब्रह्मनाद 

#डॉ. मधूलिका 

                                         घनीभूत पीड़ाओं के विषम ज्वार




घनीभूत पीड़ाओं के विषम ज्वार..... 

नहीं होते नियंत्रित ,चांद की कलाओं से।

जीवन के उतार-चढ़ाव,

अक्सर दोहराए जाते,

शापित हो अनुप्रासों में।


अनचाहे ही अक्सर ये डुबो जाते,

काली पुतलियों से सजे ,

एक जोड़ी सफेद कटोरों को,

एक नमक से भरे ,खारे एहसासों में।।


कई अनमनी अभिव्यक्तियां सहसा,

रोक ली जाती हैं ,होंठों के कोरो पर आकर,

बहुत कुछ छुपा कर ,

दर्द झलक ही जाता,बदनुमा से दागों में।।


चीत्कार कर उठती जब आत्मा,

कई मूक यंत्रणाओं में,छलक ही उठता प्रमाद,

लाल डोरों से चमकती ,

आंखों की चिंगारियों में।।


संघनित, ऊष्मित ...

आत्मिक घावों से रिसती मवाद,

थिरने लगी है अब ,कही गहरे , 

किसी तलहटी को तलाशते ,

जहां ना शेष हो कोई अवसाद,

बैचेनियों को मिले, 

सासों का अंतिम ग्रास ,

क्या सांसों संग ही अब पूरा होगा,

जीवन के खुशियों का खग्रास ।

#ब्रह्मनाद 

#डॉ. मधूलिका 


 #चुम्बन 


हां ,कह सकते हैं इसे दैहिक अनुरक्तियाँ,

एक जोड़ी रक्ताभ मृदुल पंखुड़ी....

और कोमल भावों से सजी, 

कुछ स्वैच्छिक अभिव्यक्तियाँ।।


ना ही भौतिक सीमाओं के अतिक्रमण के उपालम्भ,

ना ही वांछना, ना ही अनिवार्यता के निर्मम दम्भ,

ना अनुस्वारों के प्रयोग  ,ना ही कोई अभिव्यंजना,

बस भाव प्रवणता और  प्रबल आवेगों की व्यंजना,

हृदय के अवगुंठनों को प्रकट करती वैचारिक गतियां।।


हां, नहीं आवश्यक होती इसमें कई मर्तबा, 

भाव अनुसार देह की संकल्पना ,

पर सम्मिलित रहती हैं.. 

हृदय के रक्त के नियमित घुलती ,

श्वासों के  आरोह- अवरोह की विलम्बित गतियां।।


एक जोड़ी अनिमेष दृगों से भी,प्रकट हो जाती है ,

चुम्बन की  आनुषंगिक,

 व्यवहारिक विभक्तियाँ,

आत्मिक सहजता से ही गढ़ पाते हैं,

ये अलौकिक भावनात्मक कृतियाँ।।


किसी नैसर्गिक ,किसी मान्य,

और किसी आत्मिक सम्बन्ध के ,

क्रमशः मस्तक ,कपोल,और स्मित पर,

प्रारब्ध के अमिट लेख की तरह दर्ज होते,

बिना स्पर्श की चुंबन सदृश्य ,

स्नेहिल अनिमेष दृष्टियां।।


भावों में कई दफा गुथी,

कई अवलंबित सम्बन्धों की,

कुछ अनगढ़ भ्रांतियां,

चुंबन सदा नहीं करता व्यक्त ,

कुछ सीमित दैहिक अभिव्यक्तियाँ,

देह के पार भी जब ,

आत्मा में  अंकित करता,

नेह ,एक समर्पित सर्जना,

तब इसे मिल ही जाती,

देव् निर्माल्य की सी अनुरक्तियाँ।।


#ब्रह्मनाद 

#डॉ. मधूलिका