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रविवार, 26 नवंबर 2017

सेल्फ़ी

पता नही क्यों पर मैं अपनी सेल्फ़ी लेने के बाद संतुष्ट नही होती। कुछ ना कुछ कमियां हमेशा ही दिखती हैं। सैकड़ों में एक भी तस्वीर नही भाती हमको। शायद इसलिए क्योंकि उस वक़्त हम खुद को अपने नज़रिये से देखते हैं और कभी आत्म मुग्ध नही हो पाते। बिलकुल वैसा ही गणित जिंदगी में भी लागू कर पाएं तो कितना अच्छा होगा। सैकड़ों जनहित/परोपकारी कार्यों को करने के बाद भी हम संतुष्ट और संतृप्त ना हो। जैसे ढेर सारी सेल्फ़ी डिलीट कर देते हैं वैसे ही अपने अच्छे कर्मो का लेखा जोखा भुला कर और बेहतर करने का प्रयास करें ।नेकी कर दरिया में डाल टाइप फीलिंग।


दोनों स्थिति में आत्म मुग्धता स्व प्रवंचना है। काश की मेरे सत्कर्मों की सेल्फ़ी में संतुष्ट रहूँ पर कभी संतृप्त ना होऊं

स्त्री गंध / या प्रेम की ग्रंथि

मैं जब जब प्रेम बोलती,
तुम तन क्यों चुनते हो??
मेरे भावों की भाषा में,
भोगों के संवाद क्यों बुनते हो???
मन के असीम धरातल को,
तुम बांधते रहे सदा ,
कुछ दैहिक ज्यामितीय रचनाओं में।
मैं जब बनना चाही,
तुम्हारी रात का अंत ,
होकर सुबह की अतिशा,
तुमने मुझे चाँद में बांध दिया।
जब भी रुकना चाही ,
तुम्हारी अलसाईं सुबह में ,
ओस की ताजगी बनकर ,
तुमने मुझे अख़बार बना दिया।
शाम ,जब मैं तुममे ढलना चाहती थी,
तुम्हारे टूटनों को ,
खुमारी में गढ़ना चाहती थी।
तुमने फिर ढूंढना ,
शुरू कर दिया,
मेरी स्त्री गंध का स्रोत ।
क्या तुम नहीं जान पाते,
मेरे प्रेम का आधार मन है।
तन जल्द ही रीत जाता है,
इन सांसारिक खेलों के ,
दैनिक क्रमों से।
क्यों ना ये होता की ,
तुम ढूंढ लेते मुझमे ,
प्रेम की ग्रंथि।
मन जब तुम बांध लेते,
तन भी उस संग,
बन जाता बंधुआ तुम्हारा।
मन मेरा आकाश है,
जो तुममे छाना चाहता है।
तन जब रीत जाए,
तब तुम्हें अपनाना ,
चाहता है,
मेरा तन ,प्रत्याशा में ,
मेरे मन को,
चुने जाने की स्थिति में।
बोलो अब तुम ,
क्या चुनना चाहोगे???
तुम ही चुनो अब,
स्त्री गंध /
या प्रेम की ग्रंथि ।।

उन्मुक्त मन का आसमान ...


.हाँ मेरे पास भी है मेरा अपना आसमान ,
जिसमे सितारों की तरह दिखते हैं,
मेरे अरमान,
आकार है उसमे ,
पर विस्तार नही...
मेरा अपना है वो.पर वो एक संसार नही ,कुछ सीमित सा,/कुछ अदृश्य सा ,,,दुनिया से अब भी अछूता ...तुमने देखा ना होगा....?????देखोगे कैसे...!!!!!!!वो एकांत है ,,एकाकी है ,मेरे आँखों में बसता है,मेरी सोच का रस्ता है...मर्यादाओं से घिरा, वो छुपा है,,इन् चारदीवारियों पर टिकी ,एक छत के नीचे,बिलकुल मेरे अतीत की तरह .मेरे ह्रदय की कठोर दीवारों के भीतर छिपे मर्म की तरह ..जहाँ रोज मैं उडती हूँ..अपने कटे पंखों को सोच में समेट कर...तुम्हारे बन्धनों की सीमाओं में ....
उन्मुक्त मन का मेरा भी,
है . .एक खुला आसमान .
चार दीवारी से घिरा ,
पर बस मेरा ,,,,सिर्फ मेरा
है एक आसमान ...



मैं रोज;मैं होने का,
स्वांग रचती हूँ। 

मैं जब मैं होती, खुद को जीती।
स्वांग में ढोती हूँ, कई अनचाहे सम्बन्ध।।


मैं जब मैं होती,होती एक उन्मुक्त सोच।
स्वांग रचते ही ,ढोने लगती कई कोढ़ सी कुरीतियां।।

मैं ,मैं होने पर जीती,एक स्वछन्द मन।
स्वांग में घुसते ही ,होती अनुगामित तन।।

मैं ,जब मैं होती,मुझमे छाता एक अनंत आसमान।
स्वांग जीते ही मुझे समेट लेती,कई अवांछनीय मर्यादाएं।।

मैं ,मुझ में होने पर खुशी से जीती ,कई कड़वे सच ।
स्वांग में ढककर , परोसने होते कई मीठे से झूठ।।

हाँ मैं ;मैं के स्वांग में ,
मैं होकर भी संतुष्ट नही होती।
क्योंकि मुझे ;नही भाते ,
उपमाओं के अलंकार।।

मैं होना चाहती,
निराभरण ,पारदर्शी ,
एक आत्मा सी।

मैं ,मैं में तब होउंगी संतृप्त,
जब तुम बाध्य ना करोगे,
मेरे स्वांग को सराहा कर,
मुझे सिर्फ मैं में ही स्वीकार कर।।

अन्यथा मेरा "मैं " तत्पर ,
उद्द्यत रहेगा ।
खुद में सर्वांग होने को,
मैं के आत्म बोध में ,
"मैं" का मुक्तिबोध जीने को।।

टैबू -2



इस शीर्षक पिछले भाग "इनबॉक्स" में आप सबकी बेहतरीन बहुआयामी टिप्पणियों ने मुझे इस दूसरे भाग "शारीरिक सम्बन्ध" को लिखने के लिए प्रोत्साहित किया।
ये शब्द सामने आते ही हम सबके दिमाग मे अलग अलग तरह के ख्याल आने लगते हैं। कुछ के लिए निषेध, कुछ के लिए कर्तव्य ,कुछ के लिए जीवन का विशेष और अनिवार्य पहलू और कुछ की दृष्टि में मज़ेदार विषय।
दअरसल ये सब आपके माहौल और परवरिश पर निर्भर करता। की आप किस विषय को कैसा सोचते। सभ्यता के विकास के साथ साथ हम जैसे जैसे अपग्रेडेशन की सीढ़ियां चढ़ते गए ,कुछ क्षेत्रों में हमारे सोच के दायरे सिकुड़ते चले गए।
मानव जीवन के चार पुरूषार्थ में धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष को माना गया। और जो विषय पुरुषार्थ में शामिल वो त्याज्य कैसे हो सकता?????
दरअसल काम मानसिक ,शारीरिक और भावनात्मक स्तर पर ही पूर्णता पाता। 
आपको लग रहा होगा कि मैंने क्यों ये विषय चुना। तो जरा अपने आस पास देखिए,खबरों पर नज़र डालिये। बलात्कार ,अवैध गर्भपात ,छेड़छाड़ जैसी घटनाएं , यौन हिंसा क्या आपको व्यथित नही करती???? 
अगर देखा जाए तो काफी हद तक इसके लिए हमारे बनाए गए दायरे या टैबू जिम्मेदार हैं। एक उम्र में आने के बाद लगभग हर किसी की स्वाभाविक उत्सुकता इस विषय पर होती। किन्तु अपनी शंकाओं के समाधान के लिए उचित संसाधनों और मार्गदर्शन के अभाव में गलत माध्यमो के द्वारा अधकचरा और निम्न स्तरीय साहित्य का सहारा लेते। 
हमारा सामाजिक और पारिवारिक परिवेश भी ऐसा होता कि हम अपने अभिभावकों से या किसी बड़े से इस संबंध में बात करना खास निषेध पाते। 
परिणामस्वरूप प्रकृति का एक अनमोल वरदान ,अभिशाप में बदल जाता। जो सम्बन्ध जीव के अस्तित्व को निरंतरता प्रदान करते , वो किसी की मान ,मर्यादा, भावनाओं और जीवन पर संकट बन जाते ।
तो कैसे रोका जा सकता।
रोकना तो सम्भव नही पर इन सम्बंधों के बारे में संतुलित और सरल जानकारी देकर काफी हद तक हम नियंत्रित कर सकते। इसे टैबू की तरह बच्चों के सामने प्रस्तुत न करें । बल्कि इसका परिवारिक ,सामाजिक जीवन मे प्रभाव बताएं । उन्हें हर पहलू बता कर चुनाव के लिए बोलिए। 
ये सिर्फ बच्चों के लिए नही बल्कि उस वयस्कों पर भी लागू होता जो निजी सम्बन्धों में किसी किस्म की समस्या महसूस करते किन्तु उचित सलाह के लिए योग्य सम्बंधित से सम्पर्क में झिझक महसूस करते और अपना जीवन नरक कर लेते।
जो आपके जीवन का अनिवार्य पहलू उसके बारे में सही जानकारी से झिझकना ,स्वयम के जीवन और खुशियों से झिझकना जैसे हैं। 
आपको सही स्रोत और जानकारी आपको जीवन के प्रत्येक पहलू में सफल और उत्कृष्ट बना सकता । याद रखें चरित्र निर्माण स्वयम की कमजोरी को छिपा कर नहीं,बल्कि उन पर विजय प्राप्त कर किया जाता।
स्वस्थ रहें, सुलझे हुए रहें ।
शुभरात्री माता मधुमयी की ओर से। 💐

टैबू -1

आज एक मित्र से बात करते हुए मुझे अचानक दिमाग मे दो ऐसे विषय मिले जिन पर चर्चा करना बहुत जरूरी है ,पर हम उससे किनारा काट लेते।
सामाजिक तौर पर हम इन्हें "टैबू" मान लेते। जबकि दोनों हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़े विषय हैं।
एक विषय है "इनबॉक्स " और दूसरा है "शरीरिक सम्बन्ध" ...
अरे आश्चर्य नहीं करिये। । मैं इन दोनों के विषय मे बात करने को टैबू नही मानती।
Fb में अक्सर महिलाएं और लड़कियां ,कभी कभी पुरुष (कुछ विशेष क्षद्म महापुरुष) भी इन्बॉक्स में बात करने को एक विशेष तरह का निषेध बना कर रखते। इनबॉक्स में पिंग करने की बात करते ही यूँ उछलते जैसे बिच्छु ने उन्हें डंक मार दिया हो। हां ये सच है कि सबका नज़रिया अलग होता। पर इनबॉक्स को लेकर गलत धारणा बना लेना भी गलत सोच है। अगर आपसे पूछूँ की क्या बुराई है बात करने में तो जवाब होगा लोग आपकी सहजता का सोचे बिना परेशान करते ,तारीफ करते फालतू।
कुछ हद तक मान सकती हूँ ,पर अपनी सहजता और प्राथमिकता तय करना हमारे हाँथ में है। जिससे हम असहज हों उनसे क्षमा मांग कर अपना मत रख दें। तब भी समस्या हो तो मैसेज ब्लॉक करने का बहुत अच्छा विकल्प है।
दअरसल इनबॉक्स हमारे मन के उस कोने जैसा होता जहां हम सभी की उपस्थिति को सहज नही लेते। जैसे आपके घर के आंतरिक कक्षों में सबका प्रवेश नही हो सकता।
मैं अपने मामले में बताऊँ तो हां ,इनबॉक्स में बात करती। पर सबसे मैं भी सहज नही होती। वहाँ मैं उनसे ही सम्वाद करती जो मेरे लिए इतने आत्मीय होते की उनके सामने बिना लाग लपेट के अपने अंदर के सच को बेझिझक बोल सकूं। वो जो मुझे समझाईश दे सकें । मुझे हक से डांट सके। मैं उनकी जिंदगी का एक हिस्सा होऊं जिससे वो भी अपने सुख ,दुख, सपने बोल सकें।
मेरे लिए इनबॉक्स
और कई बार जो लोग बहुत मुखरता से इनबॉक्स को नकारते वो लोग मुझे फेक लगते। या तो वो सम्वेदना हीन होते या अतिव्यवहारिक ,या इनबॉक्स के प्रति उनके मन मे कोई पूर्वाग्रह या डर होता।
टैबू नहीं ,बहुत ही खास कोना है।
दोस्तों इनबॉक्स के प्रति नज़रिये को बदलिए। आपको आपका खास कोना कैसे सजाना ये आप तय कर सकते। कुछ आत्मीय रिश्ते, दोस्त और सुकून के पल तो आपकी भी चाहत ना ????????????

साधिका की वेदना

सुनो ,मेरे विचार निरभ्र आकाश नहीं,ये है विदीर्ण ,अधकृत ,अपरिमित से ही सही ,पर इसे बान्धा हुआ है मैंने एक जाने पहचाने से निश्चित आकार में ।
सुनो मन मेरा कोई हिम स्खलित उच्छ्रंखल जल धारा नहीं, ये एक अंत सलिला सा है। जो कई सतहों से विवर्तन से गुजरता। क्या ये अलौकिक पयोधि का निश्चित प्रारब्ध पाएगा??
इन समस्त गुण दोष से प्रस्तर भिंनित मेरी अर्ध निम्लित दृष्टि ;विवर,आक्रांत ,निर्वापित वर्जना की सीमा से परे देखना चाह रही है। विपन्न भाव और म्लान स्मृति की स्वामिनी मैं ,अब चाह रही है एक प्रतष ,प्रतकर्य ,वैयक्तिक सन्निधाता।
बिल्कुल विपन्नाव की तीव्र वांछना होती एक सहज ,विपरिक्रान्त ,औदार्य प्रश्रय । सम्भवत: भंवर से लड़ती उसकी परिणीति भी यही शांति होती।
मेरी व्याकुल सी दृष्टि विस्तीर्ण भाव से भृंग बनकर निर्निमेष तुम्हें ही निहारती है। हे मधुसूदन , अब स्वीकार कर लो एक आराधिका के पार्थिव पूजन और प्रेमपगे भावों को। मुझे मोक्ष नहीं, भक्ति दो।

तुम्हारी साधिका की वेदना

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

फिर से

शंख फिर से फूंक दो ,दो प्रेरणा इस देश में,
ज्ञान का प्रकाश दो ,दो सभ्यता इस देश में..
संसार में हम ढूंढते हैं आज ऐसा आदमी ,
इंसान खुद को कह सके; मिलता नही वो आदमी..
मर्यादा का पाठ भूले,राम के इस देश में...

असुर तांडव कर रहे हैं ,मानवों के वेश में ...
तो शंख फिर से फूंक दो ,दो प्रेरणा इस देश में,
ज्ञान का प्रकाश दो ,दो सभ्यता इस देश में..

 डॉ मधूलिका

वापसी

लो लौट ही आए,फिर
ख्यालों की दुनिया में हम।
हकीकतों के,
मुखौटे भी,
यहाँ चेहरों से ,
ज्यादा स्याह हैं ।।
(डॉ.मधूलिका)

संवेदना

"संवेदना तुम कहाँ हो?
स्थितियां कहती है,
तुम नहीं रही.
क्या यही एक सत्य है....
तुम विदीर्ण हुई??
तुम विलुप्त हुई????
देखा था,
मानवता में तुम्हारा वास था,
मर्यादा तुम्हारा लिबास था.
हर सांस में वेदना का साथ था ..
जुबां पर "दया-करुणा" का वास था ।
हमें यकीन है ;तुम अशेष हो,
बिन चुके ,बिना रीते,
जीवंत हो, लौट आओ।।
वेदना को,
तुम्हारी तलाश है,
मर्यादा को ,
तुम्हारे लौट आने की आस है ,
दया-करुणा,
तुम बिन उदास हैं...
मानवता को ,
तुमसे ही जीवन की आस है.......
संवेदना "तुम कहाँ हो"?
(डॉ. मधूलिका)

विप्लव गान

कवि तुम विप्लव गान लिखो,
उत्सव नही आह्वान लिखो।
अधरों पर तुम रस ना लिखना,
वीरों के यश गान लिखो।
बसंत पर्व पर प्रणय ना लिखना,
साहस, शौर्य ,बलिदान लिखो।
प्रणयी की मनुहार ना लिखना,
मातृभू पे उत्सर्गों के प्रमाण लिखो।
कवि तुम विप्लव गान लिखो,
उत्सव नही ,आह्वान लिखो।।

(नमन माँ भारती और उनके उन पुत्रों को जो अपने प्राणों का उत्सर्ग कर ,हमें उत्सव मनाने के अवसर जुटाते हैं।जय हिंद की सेना)
(डॉ.मधूलिका)

अंदाज़

अधूरी ख्वाहिशों के सफ़र...
और धुंधले से कई ख्वाब।
जिंदगी मैंने देखे,
बस तेरे यही अंदाज़ ।।
शुभरात्रि
(डॉ. मधूलिका)

मुट्ठी भर आसमान

जीने दो मुझे,
कुछ मुट्ठी भर अरमान ,
पैरों के नीचे थोड़ी जमीन,
और सर पर ,
एक टुकड़ा आसमान ,
ना समझो मुझे तुम , ,
देवियों के समान ,
बस जीने दो मुझे,
अब बन कर इंसान ।।

(डॉ.मधूलिका)

तमाशा

रुसवा दिल ,तनहा ख्वाब,
नम सी आँखे ,
और शिकवे हज़ार...
पत्थरों के जंगल में ,
जज्बातों का बाज़ार... 
मुहब्बतों का ये तमाशा.
हमसे ना हो सकेगा ...
मुहब्बतों का ये तमाशा.
हमसे ना हो सकेगा ...

(डॉ. मधूलिका )

आक्रोश

धुंधली दृष्टि,आंसुओं से।
उबलता खून ,धमनियों में।
अभी तरलता, कभी विरलता,
अभी डूबता,कभी उबरता।
अभी कठोर,कभी आक्रांत,
अभी कोलाहल,कभी एकांत।
अन्तस् ,अनंत सा।
विचार,शून्य सा।।
उंगलियों के पोरों से ,
छिटकते कई भाव।
प्रवाह है निरंतर,
हाँ पर रुके हैं ,
भावों के प्रमाद।।
(डॉ. मधूलिका)