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बुधवार, 22 मार्च 2023

अनंत पथ...

 यूँ तो जीवन और मृत्यु का ये पथ अनंत होता है। और हर किसी का पथ और उसका अंतिम मुकाम निर्धारित होता है। मैं भी अनंत काल के इस जन्म मृत्यु के क्रम की यात्रा में हूँ। ये यात्रा मेरे लिए सामान्य समतल पथ की गाथा नहीं है ,इस यात्रा में मैं अंतहीन अंधेरों के कई वर्तुल,तीक्ष्ण मोड़ वाले वृत्ताकार पथ पर तुम्हारे एक ऊदीप्त प्रकाश पुंज से पहचान पाकर ; तुम तक पहुंचने की राह तय कर रही हूँ।

केंद्र सदा तुम ही रहे.......जब चली थी ;तब भी , जब खत्म होउंगी; तब भी...अनन्तकाल से मैं तुमसे निकलकर ,तुम तक आने की यात्रा करती हूँ। 

जब - जब तुमसे इस पथ पर दूरियां बढ़ी ,मेरा एहसास शीत के प्रभाव में सर्द होता गया, तुम्हारे नजदीक आने की निश्चित आवृतियों के दौरान मैं ऊर्जामयी हो उठती। ।मैं अपनी गति के साथ भी तुम्हारे सापेक्ष स्थिर ही रहती। ये मेरा भ्रम था कि नियति की मैं लगातार गति करती रही ,तुम तक आने के प्रयास में, पर एक निश्चित तयशुदा स्थिति से....मुझमें उद्विग्नता नहीं। डरती हूँ,मेरी तेज़ गति कहीं मुझे तुम्हारे ऊष्मीय एहसासों की परिधि से ही ना दूर कर दे। इसलिए कभी सीमा अतिक्रमण का साहस भी ना कर पाई।

मेरा तो यूँ भी मुझमे कुछ नहीं है। मेरा प्राकट्य तुम्हारे ही वैचारिक संलयन के प्रकाश में सम्भव होता। मेरा हर परिवर्तन तुम्हारे ही प्रभाव से होता। मैं खुद के केंद्र में भी सदा तुम्हें ही पाती, और मेरे आस पास के संसार का केंद्र भी तुम्ही होते। 


कई बार इस परिधीय मार्ग में यह महसूस होता कि मैं  तुम्हारे पूर्व से पश्चिम में आकर अस्त हो रही,किन्तु अगले ही क्षण, समय की न्यूनतम इकाई की चंचलता और तत्परता से तुम मेरे दूसरे आयाम को पुनः पूर्व बना जाते हो। पश्चिम में डूबती मैं फिर से प्रकाशवान होकर पूर्व की परिकल्पना में जीवित हो उठती। 


जानती हूँ ,इस अनंत विस्तार में  कोटि -कोटि जैविक पिंडों के बीच तुमने मुझे चुना वरना मेरा सामर्थ्य तो एक टूटे सितारे  का भी नहीं था। कहा जाता है कि भक्त अपनी प्रकृति अनुसार भगवान चुनता। पर मेरी क्या बिसात जो मैं स्वयं की प्रकृति अनुसार तुम्हें गढूं, तुम्हें चुनूँ!!!!!! तुमने मुझे चुन कर मुझे देवत्व दे दिया। 

अब बस मैं अपना अंत चाहती हूँ, तुममे उसी तरह समा कर जैसे जल के दो अणुओं में कोई भेद न मिल पाता। बिल्कुल वैसे जैसे स्थूलता सूक्ष्म रूप से मिलकर अपरिमित हो जाती। बिल्कुल वैसे जैसे जीवन के बाद आत्मा और परमात्मा में कोई अंतर ना होता।तब तक  करती रहूंगी इस तय परिधि पर ,निश्चित नियति की यात्रा....जिसका आदि भी तुम थे ,अंत भी तुम होंगे.......... अंतिम सत्य भी और अनन्तिम भी।


तुम्हारी मीरा ।

#डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद 


जीना या जी ना ?


 बहुत बैचेनी होती,जब प्रकट में शांत और मन में बहुत कुछ उमड़ रहा हो।ऐसा लगता जैसे ज्वालामुखी फटने से पहले या भूकंम्प आने से पहले जो स्थिति होती,वही स्वयं में उस वक़्त जीते है। 

बोलना और शांत हो जाना सरल होता। चुप रहना और उसे सालते जाना ,प्रतिपल आंतरिक विस्फोट को जीते रहने की स्थिति होती। ऐसे में क्या ध्यान शांति देता।कतई नहीं ,अंदर से अशांत को हम कैसे स्थिर कर सकते। मन भी कितना अजीब होता,जब खुश तो दुनिया अपनी लगती,जीवन मोहक लगता। जब नाखुश तब जैसे स्वयं भी निर्जीव लगने लगते। जैसे चाभी भरा एक खिलौना ,जिसे दिन से रात तक निश्चित गति से बस उसके लिए निर्धारित कामों को करने के लिए चाभी भरी गई।

उद्देश्य क्या,संतुष्टि क्या,उस काम से खुशी क्या...... इन सब बातों से परे बस उसे अनवरत चलते रहना है। जैसे शरीर एक जीवन को सिर्फ ढो रहा। 

जीवन ढोना और जीना ,उतना ही अंतर जैसे अंदर से प्रकाश,शांति महसूस करना और खुद को शांत दिखाने का अंतर। बनावट सदा घातक होती। स्वयं के साथ अपने से जुड़े लोगों और समाज के लिए भी। हर वक़्त खुद के होने का स्वांग अन्तत: एक दिन खुद को कहीं गहरे दबा कर बस नाटकीय व्यक्तित्व बना देता। जिसके लिए जीवन सिर्फ और सिर्फ बिना अनुभूति के सांस लेना बचता।


#डॉ_मधूलिका

#ब्रम्हनाद 

गुरुवार, 9 मार्च 2023

मैं वैदेही

 



मेरे अवतारी ईश्वर को समर्पित- 


सुनो मेरे मनुज तन देव् अवतारी,

यदि तुमने निश्चित किया मेरा ,

परित्याग अपरिहारी,

तो रचना होगा ,

मुझे वैदेही सा विधान ,

तुम्हारे समर्पण को देने ,

राम की मर्यादा सा प्रतिमान।।


तो सुनो मैं करती स्वाहुत यज्ञ का आह्वान ,

अपनी अभिलाषाओं का करती हूँ ,देहावसान।

त्याग कर समस्त रक्त औ विधिक सम्बन्धों का,

लेकर तुम्हारे निर्णय की समिधा का दान ।।


तब होएंगी ,कुछ निश्चित आहुतियां,

सम सम भाव कुछ तय आवृतियाँ,

तब यम को मिलेगा प्रथम दान,

हृदय स्पंदन की आहुति ,हो निष्प्राण।

दूजा मिलेगा अग्नि को स्थान,

जब तन होगा चिता पर विराजमान ,

अंतिम भाव मिलेगा जल को ,

भस्मीभूत जब अस्तित्व अवसान ।


तब तुम करना ,मेरा भावों से तर्पण,

स्मृति पिंड से करना ,पिंडदान।

मोक्ष नही मुझ दासी की कामना,

पिय संग हृदय रहे बस मेरी वांछना ,

तब होउंगी ,मैं सकल तुम्हारी,

देह से अलग ,समष्टि विस्तारी।


मैं तुममे होऊं ; तुम्हारी समभाग ,

होगा पुरुष तन ,एक स्त्री का भान ,

मैं  होऊं अद्वैत  का सूक्ष्म परिमाण,

तुम स्थूल के रहोगे अपरिमित मान,


हाँ मैं वैदेही सा प्रारब्ध रचूंगी,

"विदेह" हो तुम्हारी देह बसूंगी,

"विदेह" हो तुम्हारी देह बसूंगी।


✍️ डॉ मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद