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मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

मां की पाती : तुम्हारे जन्मदिन पर 12/12/23

 






प्रिय अन्वेषा / अनवू/ लड्डू/ बोबू/ पिकासोलाल / पुपुलाल, टीपाटी जी एंड so on........ , 


दुनिया के लिए 11 साल ,मेरे लिए 11 साल 9 महीने .... हां आज तुम्हारे अस्तित्व को आए इतना ही समय हो गया। तुम जीवन के एक और नए साल में प्रवेश ले रही हो।

बहुत मिली जुली सी भावनाएं आ रही हैं इस दिन को लेकर। यादें ताजा हो रही उस रात की जब दूसरे दिन तुम्हारे आने की तैयारी पूरी कर स्वागत करने हॉस्पिटल जाना था। वो डर,वो खुशी,वो आशाएं  .. सच कहूं तो आज भी वैसा ही है।

बस ये अब पता है की मेरी संतान लड़की है । जो आज से 11 साल पहले तुम्हारे आने के वक्त में मुझे नहीं पता था।

तुम्हारी पहली बार रोने की आवाज ,दुनिया का सबसे मधुर संगीत से भी मधुरतम था ,हालांकि उस वक्त के बाद कोशिश यही रही की कभी तुम्हें रोने ना दूं या हर वो कारण खत्म कर दूं जो तुम्हें रुला सकता।

कहते हैं औरत जब मां बनती उसका दोबारा जन्म होता... सच में ,एक बार मुझे तुम्हारी नानी ने जन्म दिया ,दोबारा मैं तुम्हारे साथ जन्मी।

आज मैं जो कुछ हूं ,तुम्हारे कारण हूं। तुमने मुझे असंभव को भी संभव करने की जिद सिखाई, तुमने मुझे इतना मजबूत बनाया कि मुझे किसी के सहारे के बिना कुछ करने की हिम्मत मिली । तुमने मुझे सिखाया की संभावनाओं को पार करके ही सफलता मिलती है ,ना की असफलता को आशंका से रुके रहने की। तुमने मेरे कमजोर पलों में मुझे मां की तरह प्यार किया, मुझे सम्हाला। मेरे गुस्से को झेलकर भी तुम मेरे लिए हमेशा उदार स्नेह दिखाती और जताती रही।तुम जैसी निश्छल आत्मा इस संसार में बिरली ही हैं।जिसे छल और दिखावा नहीं आता ,आता है तो बस थोड़े से प्यार के बदले अगाध स्नेह देना। अगर मैं ये कहूं की मैं तुम्हारी नहीं बल्कि तुम मेरी प्रेरणा हो तो कतई अतिशयोक्ति ना होगी। तुमने मुझे मेरी वास्तविक "जिंदगी" दी है ।

मैं बिलकुल नहीं चाहती की तुम मेरे जैसी बनो,बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि हर इंसान को  तुम्हारे  जैसा होने की कोशिश करना चाहिए। मुझे आज की "मैं" बनाने वाली तुम हो।वर्ना मैं एक बहुत आम सी मां बनती ,जिसकी आम सी अपेक्षाएं और बेहद आम सी संतुष्टि होती। तुमने मुझे एक पावन लक्ष्य की ओर भेजा ,जो तुम्हारे ना होने पर संभव ही नहीं था।मैं कितना कुछ बोलना चाहती ,तुम्हें बताना चाहती ,पर शब्द कम हो जा रहे या ये कहूं शब्द न्याय नहीं कर पाएंगे तुम्हारे वर्णन के लिए। आज ये लिखते , महसूसते  हुए पहला आंसू मेरी दाईं आंख से निकला ,क्योंकि मैं  बहुत खुश हूं ,पर दूसरा आंसू बाईं आंख से .... हां दुख का आंसू क्योंकि तुम्हारे जैसी बच्ची को मेरे जैसे मां मिली ,मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं । सच कहूं तो ये संसार ही तुम्हारे लायक नहीं , कुछ अपवाद छोड़ दिए जाएं तो इस संसार को तुम और तुम जैसे अन्य लोगों के लायक बनने के लिए सतयुग में वापस जाना पड़ेगा। इस झूठ, लालच ,दिखावे ,अंधानुकरण की दुनिया को तुम्हारे लायक बनने में युग बीत जाएंगे। खैर मुझे कहीं ना कहीं इस बात की भी राहत है कि तुम्हारे दायरे के चंद लोग ऐसे भी हैं जो तुम्हें दिल से स्वीकार कर तुम्हें हमेशा आगे बढ़ाने में मदद भी करते हैं ,फिर वो तुम्हारी प्यारी सी सहेलियां या दोस्त हों,या तुम्हारी टीचर्स या थेरेपिस्ट या कुछ अन्य बच्चों की  माएं जो तुम्हारी उपलब्धि को अपने बच्चे की उपलब्धि सी मानकर खुश होती।

खैर मेरा ये सब कुछ कहना बेमानी लगेगा क्योंकि मैं तुम्हारी मां हूं। पर जो लोग तुमसे जुड़े हैं,जिन्हें तुम अपने दायरे में आने देती हो ,वो जानते हैं की तुम कितनी जुझारू, मासूम और प्रेरक बच्ची हो। आज के शुभ दिन मैं बस यही दुआ करूंगी की तुम इस जीवन में सबके लिए हमेशा प्रेरणा बनकर रहो, संघर्ष से सफलता के लिए लोगों की आशाओं को तुमसे मजबूती मिलती रहे, स्वस्थ रहो,खिलती रहो। दुनिया की हर  खुशी और सफलता की कामना है तुम्हारी मां की ओर से... दुनिया के अस्तित्व तक तुम्हारा नाम हो.


 जन्मदिन मुबारक हो मेरी नन्ही सी जान ,मेरी राजकुमारी 😘🎂❤️🤗


-तुम्हारी मां

शुक्रवार, 17 नवंबर 2023

#बिछड़े_सभी_बारी_बारी

 



मैं नन्ही सी जान थी, मेरी आँखों मे दुनिया अजूबा थी, हर एक बात मेरे लिए कई सवाल बन जाती। जिन्हें मैं समझना चाहती थी। सब उस सवालों की मासूमियत में हंसते। कई जवाब आते ,जो अक्सर मिले जुले होते। कुल मिलाकर इतना तो मैं समझ ही गई थी ,अभी बहुत कुछ है जिसके लिए मुझे इस अवस्था से परे जाना होगा। कई सवाल जिनके लिए जवाब मैं खुद होऊंगी। तब मैं तारा थी, सबकी आंखों का ,मुझसे ही उनकी आंखों की चमक थी। 

मैं बड़ी हो चली ...... सितारे की शरारत कई बार किरकिरी भी लगने लगी थी। जो हांथों में पलती थी, उस पर हाँथ भी उठने लगे थे। क्या बोलना है, कैसे बोलना है ... हिदायतें मिलनी लगी। बचपन #बिछुड़ने लगा था। 


मैं किशोरावस्था में थी। बचपन के बाद उम्र का वो पड़ाव जो आपको खुद ही सन्देह में डाल देता है कि आप बच्चे हो या बड़े। किसी भी एक वर्गीकरण में आप फिट नही बैठते । और लड़की होना ....जैसे कोई सामाजिक पाप हो। आप अपने साथ मे पढ़ने वाले लड़के -दोस्तों को रास्ते मे देखकर मुस्कुरा नही सकते। उन्हें घर बुलाने ,उनके घर जाने में परहेज से सामने आने लगते। कल तक जिनके साथ हम बेझिझक स्कूल बेंच शेयर करते या टिफिन भी ,अचानक वो हमारे लिए अस्पर्श हो जाते। उसमे भी स्वयं में होने वाले शारीरिक परिवर्तन और उसके लिए कई तरह की सावधानियां......सच मे लगता था ,लड़की होना पाप से कम नहीं। कई बार रोते उस दर्द और विशेष तकलीफों से गुजरने पर। पर वो बताने नही,शर्म की बात थी (जैसे सिखाया गया ) ....किसी को पता ना चले कि हम मातृत्व धरण करने के पहले चरण में आ चुके हैं। कितना अंतर है एक मानवीय मादा और पशु- पक्षियों की मादा में। जो बात औरत को प्रकृति के रूप में पूर्णता दिलाती उसी बात को शर्म साबित कर दिया जाता। 

मैं अब सहज होती जा रही थी। मान बैठी थी ये नियति की हर औरत को तकलीफ झेलकर ही औरत साबित होने की शर्त पूरी करनी होती। 

घर से ना सही पर सामाजिक तौर पर मुझ पर प्रतिबंध लगने लगे थे। हंसना ,बोलना ,चलना ,उठना ,बैठना- बोलना सबके निर्धारित मापदंड के अनुसार ही खुद को ढालकर आप सामाजिक स्वीकार्य हो सकते हो। 

मैं विद्रोही थी। कुछ बातों का स्वभाविक विकास हो गया ,पर कई मैं कभी ना अपना सकी।


किशोरावस्था भी #बिछुड़ गई। कीमत मेरे बचपन की बलि। कहने के लिए जवानी सतरंगी होती है। पर एक आम लड़की के लिए जिस पर मर्यादाओं का पूर्वाग्रह हो ,उसके लिए किसी दंश से कम नहीं। कई जोड़े आंखें आपका पीछा ही करती रहती। बिन छुए भी शरीर का माप बताने को आतुर लोलुप आंखें। आपका हर कदम ,हर वक्तव्य ,हर बिखरती हंसी , आपके चरित्र प्रमाण पत्र तैयार करने वालों के लिए आंसर सीट सी होती ।।जिसपे सही गलत वो अपने नज़रिये से तय करते। 

परिवार आपके भविष्य के लिए आपके भावी साथी के चुनाव पर ही केंद्रित हो जाता। आप कोई भी हो,कुछ भी कर लो ,कहीं भी पहुंच जाओ, पर शायद सिर्फ विवाह ही ऐसा प्रमाण पत्र बन जाता जो आपके जीवन को सफल साबित कर सकता। भले उसमे आप अपनी बलि ही क्यों ना दे रहे हो। 

मासूमियत बिछड़ी, दोस्त बिछड़े , नैसर्गिकता बिछड़ी , सपने भी हांथों से छूट गए , और अब अपनो से बिछड़ने की बारी भी आ जाती। अपना घर जहाँ हर बात पर आपका हक था, हर चीज आपकी अपनी थी, जहाँ आपने अपने जन्म से जवानी तक का हर चरण ,हर अच्छा बुरा वक्त काटा, वो छोड़कर किसी अन्य के घर को अपना बनाने के लिए जाना होता। नियम यही है। घर पर नाजों से पलने वाली #गुड़िया ,हर काम मे थक जाने के डर से माफ कर दी जाने वाली बेटी एक ही दिन में किसी अन्य घर की सबसे जिम्मेदार इंसान बना दी जाती। ऐसे लगता जैसे उसके आने से पहले उस घर मे काम ही नही होता था। वो आई और अब हर बात सिर्फ उसके सर पर मढ़ दी जाती। बहू शब्द कितना भारी हो जाता। बेटी से बहु होने का सफर सिर्फ रस्म नही होती अपने अस्तित्व से बिछुड़ने सा जान पड़ता।

एक बहु से पत्नी,फिर माँ होने का सफर ना जाने हम खुद से कितने बिछड़ जाते ,पर दूसरों की खुशी में खोकर ही खुश। हम कौन......उसकी बेटी,उसकी बहु,उसकी पत्नी और इसकी माँ। सारी पहचानों में खुद को बांटकर अपने अस्तित्व को भूलकर बस कर्तव्य में खुश। 

याद है मुझे मेरी नानी मुझे अपनी बेटी (मेरी माँ) के नाम पर डिठौना बोलती थी। क्योंकि मेरी माँ ,हर काम मे बहुत तेज़ थी। और मैं सिर्फ पढ़ाई और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी में उस्ताद। और जब पहली बार शादी के बाद मेरी नानी को खबर मिली कि उनकी नवासी अकेले पूरे घर का काम करती, तेज़ तर्राट गुड़िया अपने सारे सपने भूलकर गृहिणी बनकर हर किसी का गुस्सा और झिड़की चुप होकर सुनती तो वो खुद को रोने से ना रोक पाई। खुद को ही कोसने लगी कि क्यों अपनी गुड़िया को डिठौना बोली,काश उनकी गुड़िया की किस्मत सदा डिठौना बन कर ही रहती। राजकुमारी सी गुड़िया ,राजकुमारी ही रहती।

एक बच्ची से औरत होने तक के सफर में कितना कुछ सहती एक औरत। 40 -50 की उम्र में आते तक ;उसके सपने बिछड़ते ,उसके अपने बिछड़ते,उसका मूल बिछड़ता, उसके संगी साथी बिछड़ते । और अंत मे उसके पास क्या बचता। कर्तव्यों की बेदी पर बिसूरति उसकी अपनी पहचान, सबसे घिरी होने पर भी अंदर सालता एकाकीपन का घाव ,आत्मनिरीक्षण के क्षणों में खुद को असफल पाने का दंश । या एक बलिदानी सफल गृहिणी का तमगा.... वक़्त बीतते उसका कोई अपना नही होता। एक घर होता था ,जो मायका हो जाता, एक और घर जो ससुराल होता..... आगे जो होगा बच्चों का घर होगा। उसके सपनो से सज़ा उसका अपना घर कहाँ होता। उसके एकाकीपन को भरने वाला ......उसका अपना कोना जो कहीं उसी में संरक्षित रखती, जिसमें दरीचों से छनकर ताज़ी हवा भी आती, जिसके सुराखों में से नीला आकाश अपनी एक झलक देता, जहाँ से थिरती धूप दिन का एहसास देती........सब कुछ बिछुड़ जाता एक औरत के औरत होने के सफर में ........हर उम्र अपनी कीमत उसके एक हिस्से को उससे काटकर वसूल कर ही लेती..... मैं अब वो सितारा हूँ जो दूसरों की खुशियों के लिए,उनकी चाह्ते पूरी करने के लिए कई बार फलक से टूट जाती हूँ। और मेरे अस्तित्व में बस बिखर जाती है राख ,मेरे अपने अरमानो की। 

अब जाकर कई सवालों के जवाब मिले , बेहतर होता बचपन मे ही रही आती,न दिमाग बढ़ता ना अवस्था। अब समझ आया कि 

#जो_बिछड़ती_जा_रही_वो_अवस्था_थी,#जो_अंत_में_साथ_होगी_वो_उम्र_होगी... और वही वफ़ागर होगी,खुद के साथ मुझे ले जाने के लिए। उम्र मुझसे बिछड़ेगी नहीं, क्योंकि जब ये संज्ञा मुझ पर लागू होगी तब मैं ही मुझसे बिछड़ चुकी होऊंगी। कई बारी बिछड़ने के बाद एक अंतिम बिछोह।

#डॉ_मधूलिका


#ब्रह्मनाद 

गुरुवार, 7 सितंबर 2023

सुरभाषी

 





#सुरभाषी

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सुरभाषी ,हां यही तो नाम था। घर पर उसे सुरु भी बुलाते थे।मुझे तो इस नाम और इस नाम वाली दोनों ने पहली ही बार मे बांध लिया था।

कई सालों बाद मेरे माँ के ननिहाल(माँ की नानी का घर) जाने का मौका लगा था।

वहां पहुंची तो पूरा गांव ही जैसे मेरे स्वागत में था, मैं सबके लिए "मान " थी।।बेटी की भी नवासी......

राजकुमारी से ठाठ थे मेरे। मैं शहर से गई थी ,तो गांव की हमउम्र और थोड़ा छोटी लड़कियों के आकर्षण और कौतूहल का केंद्र भी। सभी मुझसे मिलने आ रहे थे । प्यार लुटाते, ऐसा लग रहा था जैसे वहां द्वेष नाम की कोई जगह नहीं।

अरे हाँ ये तो मैं बताना ही भूल गई कि "सोनमढ़ी" नाम की जगह सड़क मार्ग से सम्पर्क में नही था। यहां जाने के लिए  नदी पार करना होता था ,साधन सिर्फ  नाव थी।

लौट कर आपको वापस लाती हूँ,सोनमढी में।


इस जन समूह में एक चेहरा ऐसा था जिसने घर में कदम रखते ही मुझे खुद से बांध लिया था।


एक किशोरी थी वो, अवस्था 17 के आस पास लग रही थी। रंग जैसे दूध में गुलाल मिला कर बनाया गया। आंखें किसी निश्छल पर डरी हुई हिरनी सी। बदन में उम्र की नई तरंग की कसावट और उतार चढ़ाव । कमर के पास उसकी कुर्ती फ़टी हुई थी जिसे छुपाने के वो भरसक प्रयास कर रही थी। उसके चेहरे की आभा ऐसी थी जैसे अलसाई सी चांदनी बिखरी हो। और एक खास बात उसके चेहरे पर गाल के किनारे की ओर एक बर्थ मार्क,जिसे गाँव में लहसुन बोलते हैं। और उस शांत किशोरी के चेहरे पर वो ऐसा लग रहा था जैसे किसी चंद्रमा के किनारे से कोई धूमकेतु निकलते हुए अपने निशान छोड़ गया हो।

एक और बात ने मुझे आकर्षित किया , उसके कमर पर चुनरी से बंधी बांसुरी जिस पर एक मोर पंख सजाया गया था।


किनारे बैठी वो भी नज़रें बचाकर मुझे निहारती ,कुछ संकोच,कुछ डर।

अब धीरे धीरे मुझे इस भीड़ का प्रयोजन समझ आया । ये सब मेरे सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन था। मैं डॉ जो थी। उनके लिए गर्व की बात थी। देशी गुलाब और गेंदे की माला पहनाकर सरपंच जी ने स्वागत किया। फिर बोला गया कि अब सुरु की बांसुरी सुनाई जाएगी। अब उस लड़की के आने का प्रयोजन समझ आया। उसे बुलाया गया.... सुरभाषी....आ, बजा अपनी बांसुरी। सुना अपराजिता बिटिया को। अरे डॉ हैं , सबको मौका नही मिलता इनके सामने आने का।

मैं अपलक उसे निहार रही थी, अचानक उस सहमी सी मुस्कान में उसकी दंत पंक्ति की झलक आकाशीय बिजली की चमक को मात दे गई। मैं सोच में थी क्या यह वाकई इतनी प्यारी या मुझे ही लग रही।

सुरु उठ कर सामने आई और कमर में बंधी बांसुरी निकाल कर स्वर फूंका। उसके होंठो की हरकत, चलायमान मृणाल दंड सी उंगलियां , और आधी खुली सी आंखें मुझे तो लगा ये राधा तो नहीं जो कृष्ण रंग में डूब कर इतनी मोहक हो गई। बांसुरी के स्वर में ऐसा दर्द सा लगा की कोई पाषाण भी बेवजह रोने लगे। स्वर लहरी टूटने से जब तन्द्रा भंग हुई तो सब करुणा में डूबे से नज़र आए। कुछ औरतों की आंखें नम थी।

तभी पीछे से एक तेज़ स्वर उभरा- कलमुँही कभी स्वर तो अपने भाग्य से अलग फूंका कर।

हम सबका ध्यान उसी औरत की ओर चल गया। जो पान खाए मुँह बिचका कर सुरभाषी को घूर रही थी।


महसूस तो ये हो रहा था जैसे वह  औरत अपने आग्नेय नेत्रों से सुरु को अभी भस्म कर देगी, फिर वह उस भीड़ से अलग होते हुए बाहर चली गई। वह हिरनी सी आंखों वाली लड़की डबडबाई आंखों से नीचे पलके किए हुए चुपचाप उस औरत के पीछे चली गई। बिना किसी अभिवादन के बिना किसी स्वर के। कुछ देर के लिए वहां खामोशी छा गई किसी ने कुछ भी नहीं कहा, फिर सरपंच साहब ने वापस एक तेज सांस लेकर कहा "अपराजिता बिटिया माफ कर देना कुछ लोग गंवार भी होते हैं ,पढ़ाई लिखाई का तो असर होता है ना बिटिया ।
मैंने चुपचाप मुस्कुरा कर उनकी बातों में सहमति का संकेत दिया। मेरा ध्यान अब भी सुरू की ओर था ।वह औरत कौन थी ??सुरु उसके पीछे क्यों गई ....यह तो समझ में आ गया था ,कि शायद वह सुरू की कोई अपनी ही है ;जिसका आधिपत्य सुरु पर चलता है।
 
घर से अब भीड़ छंटने लगी थी मै घर पर अकेली थी। अपनी नानी  और मौसी नानी से बात करते हुए पुराने दिन याद कर रही थी ,बचपन को जी रही थी। पर दिमाग के किसी कोने में सुरू ही चल रही थी। उसका रूप ,घटनाक्रम, उसकी आंखें ,उसकी बांसुरी मुझसे दूर ही नहीं हो रही थी ।सारी बातें करते-करते और सोचते सोचते ना जाने कब मेरी नींद लग गई ।जब आंखें खुली तो शाम हो चली थी ,अचानक मेरी मौसी -नानी ने मुझे आवाज दी बेटा अपरा देख सुरू आई  है बेटा।  तू उसके साथ चली जा, उसके घर। और मैंने पूछा कि नानी क्यों क्या हुआ??? कहां जाना है?? नानी मुस्कुरा के बोली बस तेरी डॉक्टर से दिखाने का अवसर आ गया है ।सुरू दरवाजे की ओट पर खड़ी हुई मुझे ही देख रही थी। मैंने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए अपना स्टेथोस्कोप  उठाया और दवाइयों वाला बैग भी । दरवाजे के पास खड़ी सुरू के पास जाकर मैंने कहा ;चलो कहां ले चल रही हो । सुरभाषी ने कोई जवाब नहीं दिया ,बस हल्के से मेरी ओर देखकर बुझी सी मुस्कान दी ।ऐसा लग रहा था जैसे वह मुस्कान नहीं है कई आंसुओं का बोझ लिए एक स्वर है ,जो बहुत कुछ बोलना चाहता है। सारे रास्ते सुरू ने मुझसे कोई बात नहीं की ।उस पगडंडी नुमा रास्ते में मैं उसके पीछे चल रही थी ।बीच बीच मे वह मुझे नजरें घुमा कर देख जरुर लेती थी ,कि मैं उसके पीछे आ रही हूं या नहीं। 
गांव के बारे में मैंने शुरू से कुछ सवाल भी किए पर वह हर बार हल्के से मुस्कुरा देती बिना कुछ बोले ।मैं खीज रही थी ,क्या अजीब लड़की है यह कुछ बोलती क्यों नहीं है ।पर सुरू अपने घर तक पहुंचने तक कुछ नहीं बोली ।
उसका घर ;घर कम  और खंडहर ज्यादा लग रहा था। दरिद्रता के निशानी अंदर कदम रखने से पहले ही दिखाई दे रही थी। इतना तो समझ आ चुका था कि सुरू के घर की माली स्थिति ठीक नहीं है ।अंदर घुसने से पहले ही एक सीलन भरा बदबू का झोंका नाक पर लगा ।यूं तो मैं डॉक्टर थी पर कई बार मन में जुगुप्सा जाग ही जाती है ।मुझे खुद पर ही शर्म आई कि मैं क्या मरीजों की सेवा करूंगी !! जो इस बदबू से ही घबरा गई। 
अंदर घुसने में मुझे वहीं महिला दिखाई दी ,जिसने सुरु को अभागी बोला था। गोल गठा चेहरा ,तांबई रंग ,बड़ी सी लाल बिंदी ,और पान रचे दांत।और किनारे चारपाई पर पड़े हुए एक जर्जर पुरुष काया जिसके शरीर मे हड्डी चमड़ी से होड़ ले रही थी, शरीर की सीमा तोड़ बाहर आने के लिए।....शायद वह सुरू के कोई अपने ही थे ।औरत देखते ही मुझे उठ खड़ी हुई आओ अपरा बिटिया आखिर सुरू तुमको ले आई दरअसल सुरू के बाप बहुत बीमार चल रहे हैं और हमारे गांव में आप आई हो और डॉक्टर हो। इसलिए मैंने ही सुरू को भेजा था आपको बुला लाने के लिए ।

मैंने घर का मुआयना किया कच्चा फर्श जो कि गोबर से लीपा हुआ था। एक विशेष तरह की सफेद मिट्टी जिसे छुही कहा जाता है; से गोबर के चारों ओर एक बाउंड्री सी बनाई गई थी ।कपड़ों को बांस पर रस्सी के सहारे लटका के बनाई गई अलगनी पर लटकाया गया था। साधन सुविधा के नाम पर महज कुछ बर्तन, चूल्हा ,चक्की और कांडी- मूसर था। खपरैल घर की दशा उसकी माली  स्थिति कोई भी अंदाजा लगा सकता था ।खैर मैंने उस स्त्री को मामी जी बोला और उनसे मैंने सुरू के बापू की स्थिति पूछी। मुआयना करने के बाद इतना समझ में आ गया कि सुरू के बापू को टीबी है, जो कि आप काफी बिगड़ चुकी है। प्राथमिक केंद्र में इतनी चिकित्सकीय सुविधा ना थी जिनसे की इस बीमारी की इस  अवस्था को रोकने को चाहिए । मैंने अपना कर्तव्य निभाया दवाइयां दी और वापस लौट पड़ी  ।लौटते वक्त सुरु की आंखें मुझसे धन्यवाद कह रही थी ।मैं अब भी नहीं समझ पा रही थी ,कि यह लड़की मुझसे बोली क्यों नहीं ।जो बात उसकी आंखें कह रही थी ;वह मुझसे भी बोल  भी सकती थी ।वह स्त्री जो सुुरू की मां ही होगी,उसे मुझे वापस छोड़ कर आने के लिए कहा। पर मैंने मना कर और अकेले ही वापस लौट आई। 


लौटते वक्त सुरु की आंखें मुझसे धन्यवाद कह रही थी ।मैं अब भी नहीं समझ पा रही थी ,कि यह लड़की मुझसे बोली क्यों नहीं ।जो बात उसकी आंखें कह रही थी ;वह मुझसे भी बोल  भी सकती थी ।


घर पहुंचते ही मुझे मासी-नानी से बहुत सारी बातें पूछने का मन था। सुरू मेरे मन में एक सवाल बन कर रह रही थी ।मासी नानी बरामदे में ही खड़ी हुई थी ,शायद मेरा ही इंतजार कर रही थी ।बरामदे में कदम रखते ही उन्होंने मेरे हाँथ से सारा सामान लिया और 2 मिनट बाद ही मेरे सामने चाय का कप हाजिर था। चाय लेते ही मैं नानी से पूछ पड़ी नानी यह सुरु कौन है? और वह औरत सुरू की क्या लगती है?? उसकी मां जैसी तो एक भी ना लगती।.....यह लड़की इतनी शांत क्यों रहती है ?कुछ बोलती क्यों नहीं?

।नानी ने एक तेज सांस ली और कहा सुरु  का नाम वाकई सुरभाषी नहीं अभागी होना चाहिए था । मेरी उत्सुकता बढ़ रही थी .......मैंने नानी से कहा कि मुझे पूरी बात बताइए ,आप क्यों ऐसा बोल रहे हो ?

नानी ने बताना शुरू किया वह औरत चंपा है और वह सुरू की सौतेली मां है ।सुरू का परिवार भी कभी बहुत सुखी हुआ करता था। उसके पिता शहर से सामान लेकर गांव में फेरी लगाकर बेचा करते थे ।मां भी सबके घर मे  छोटे-मोटे काम में  सहायता करती थी ।लोग बदले में उसकी अनाज या पैसे से मदद कर दिया करते थे ।थोड़ी बहुत जमीन भी थी जिसमें कभी फसल कभी मौसमी सब्जियां उगा लिया करते थे ।सुरू 3 साल की थी जब उसके दुर्भाग्य ने उसकी जिंदगी में कदम रखा ।दुर्गा पूजा के लिए शहर से झांकियां देखकर पूरा  गांव वापस  लौट रहा था।

सुरु के पिता कुछ खरीददारी के लिए शहर ही रुक गए। दोनों मां बेटी नदी के रास्ते गांव लौटने लगे ।सुरू को उसकी मां ने एक बांसुरी दिलाई थी ,सुरु उसको लेकर खुश थी बाल सुलभ जिज्ञासा और उत्साह से लबरेज थी।  वह बार-बार उसमें सांस फूंकती और उसकी मां उस बेसुर में ही सुर सुन ले रही थी । नाव में सुरू लहरों से खेलने लगी। छोटी बच्ची के हाथ पानी तक नहीं पहुंच रहे थे, उसने अपने शरीर को थोड़ा आगे किया और पानी छूने की कोशिश में वह नदी में गिर गई ।उसके गिरते ही सुरु कर मां ने अपनी बच्ची को बचाने के लिए छलांग लगा दी ।हालांकि उसे  तैरना नहीं आता था ।बहाव बहुत तेज था ,और नदी काफी गहरी ही है। नाव में बैठे कुछ अन्य लोग इन्हें बचाने के लिए कूद गए ।सुरू बचा ली गई पर ,उसकी मां न जाने बहाव में कहां चली गई ......

उसकी लाश भी बरामद ना हुई ।

सुरू के पिता ने लौटकर अपनी दुनिया उजड़ी हुई पाई ।सिर्फ इतना ही नहीं उस घटनाक्रम में सुरू के दिमाग में बहुत असर डाला ....उसके मुंह से आवाज निकलना ही बंद हो गई। गुमसुम उदास और खोई हुई रहने लगी ।शहर ले जाकर उसे डॉक्टर को भी दिखाया गया ,किसी तरह इलाज शुरू किया गया ,पर डॉक्टर ने बताया कि सुरु के दिमाग में सदमे का असर है ।जिसकी वजह से वह बोल नहीं पा रही । 

हां पर सुरू के साथ हरदम ही थी उसकी बांसुरी जो उसकी मां ने उसे दिलाई थी ।सुरू कभी-कभी उसमें ही स्वर फूंक ही देती थी ।डॉक्टर ने दिलासा दिया  कि इसकी आवाज़ वापस आ सकती है  ,और दवाइयां चल रही थी ।

किसी तरह दोनों बाप बेटी गृहस्थी रमा रहे थे ।पर बच्ची को अपने पीछे अकेले छोड़कर जाने से वह डरता था । काम नहीं करेगा तो क्या होगा ...खाएंगे कैसे ??यही सोचकर उसने दूसरों की सलाह से दूसरी शादी कर ली ।चंपा सुरू की दूर की मौसी थी ,जो कि परितक्त्या थी और पहली शादी से उसकी दो बेटियां थी ।दोनों सुरू से बड़ी थी ।शादी के बाद तो उसने सुरू को शुरुआत में बहुत प्यार दिया। धीरे-धीरे उसने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए ।दोनों बेटियां स्कूल जाती और सुरू घर का काम करती। बापू ने कई बार मना किया ,हर बार चंपा आत्महत्या की धमकी देकर उसका मुंह बंद करा देती ।वह धीरे-धीरे घर से और ज्यादा बाहर रहने लगा ,और सुरू पर अत्याचार बढ़ता चला जा रहा था दोनों बहने गूंगी कह शुरू का मजाक उड़ाती , पहनने के लिए उतरन दी जाती  ।सारे घर का काम सुरू से कराया जाता ।सुरू बिल्कुल अकेली हो चुकी थी ।उसके कोई साथी नहीं थे, ना घर ना बाहर ,ना स्कूल उसकी किस्मत में। अगर कोई साथ था तो ,बस वह बांसुरी जब वह बहुत दुखी हो जाती तो अपनी बांसुरी लेकर नदी के किनारे आम के बगीचे में चली जाती ,और अपने स्वरों से न जाने किसे पुकारती।


धीरे-धीरे वक्त बीता जमीन बेचकर सुरू की बहनों की शादी हुई ।इसी बीच सुरू के पिता बीमार हुए और फिर ऐसे खाट पकड़ी कि दोबारा नहीं उठे ।सुरू धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी ।उसके बांसुरी के स्वर और भी ज्यादा मार्मिक  हो चले थे। गांव के सम्पन्न लोग अपनी बेटियों की शादी में शहनाई की जगह सुरू को ही बांसुरी बजाने के लिए बुलाते हैं।  कठोर से कठोर प्राणी भी रो पड़े वह दर्द फूंकती सुुरु की बांसुरी । शायद उसका सारा दर्द उसी बांसुरी से झलकता था । चंपा उसकी सौतेली मां सुरू की बांसुरी के बदले मूल्य वसूल लेती थी ,और इसी शर्त पर वह उसे जाने भी देती थी। सुरू चाहकर भी उसका विरोध नहीं कर सकती थी ।विरोध करने पर जलती हुई लकड़ी से उसे आंकना, उसे पीटना आम हो चला था ।सुरू का अपना कहने वाला कोई नहीं , बाप है जो से अजनबी से बन गए,मां तो सौतेली ही रही ।इस अकेलेपन में सुरु ने साथी बनाया बांसुरी को ,नदी किनारे हलचल करती मछलियों ,बगीचे में  आम के पेड़ों को, उस पर बैठने वाले पक्षियों को और गायों को।

सब बताते हुए नानी की आंखें भर आईं थी,मैं बिल्कुल स्तब्ध थी। फूलों सी नाजुक सुरभाषी ने क्या कुछ झेला अपनी जिंदगी में।

दूसरे दिन मैंने शहर जा रहे मामा जी दवाइयों की लिस्ट दे दी,जो सुरु के बापू के लिए थी। शाम को मामा जी के आते जैसे ही दवाइयां मेरे हाँथ लगी; मैं तुरंत सुरु के घर की ओर लगभग दौड़ सी लगा दी।ना जाने क्यों मेरे मन के एक कोमल से कोने में सुरु किसी करुण मूर्ति सी विराजित हो चुकी थी। मैं उसकी तकलीफें हर कोशिश कर कम करना चाहती थी। जर्जर से दरवाज़े को थपथपाने की  आवाज़ से सुरु ने ही सांकल खोली। मुझे देखकर एक खुशी की चमक और भोली मुस्कान बिखेर कर इशारे से अंदर बुला कर हाँथ जोड़ कर अभिवादन किया।

मैंने उसके हांथ ने चूल्हा फूंकने वाली धौकनी देखी। शायद वो खाना बना रही थी। चंपा मामी अपने बीमार पति के बाजू से खाट पर बैठे हुए  अपने खुरदुरे और कटे फटे पैरों को बड़े जतन से महावर लगा कर संवार रही थी। मुझे देखके लाल कत्थई से दांत निकाल उठ कर मेरा स्वागत किया। मैंने उन्हें दवाइयों का थैला और हिदायत दी,और खाना बनाने में व्यस्त सुरु को आवाज़ देकर हाँथ हिलाकर वापस लौट पड़ी। अद्भुत सौंदर्य था सुरु का । लकड़ी की कालिख माथे पर फैल कर जैसे उस पसीने में डूबे चेहरे को नज़र से बचा रही थी।और उस पर बेतरतीब बंधे बालों की झूलती लत ,जैसे कोई नागिन किसी धवल वस्त्र पर बल खाए।


दूसरे दिन शाम को सुरु मुझे घर जी चौखट की ओट पर खड़ी दिखी। नानी से उसे इशारे से अंदर बुलाया, वो आज पहली बार मुझे थोड़ी सी खुश दिखी। आते ही उसने मेरे हांथों को पकड़ कर अपने माथे से लगा लिया। मैंने उसकी आँखों मे झिलमिलाते खुशी के आंसू देखे। समझ तो मैं गई थी कि ये धन्यवाद ज्ञापन का तरीका है। मैने उसे पगली बोल कर प्यार से उसके गालों में चपत लगाई। वो काफी देर तक मेरे कुर्सी का पाया पकड़ कर नीचे ही बैठी रही। बीच बीच मे अपनी निश्छल हंसी से जता जाती की में शामिल हूँ।

सुरु का अब लगभग रोज का शाम का यही क्रम था। उसका कुछ वक्त हमारे घर मे बीतता।4 दिन बाद सरपंच मामा जी अचानक घर आए ,और मुझे बताया कि गांव के बड़े मन्दिर में जन्माष्टमी का कार्यक्रम आयोजित होगा। और इस बार शहर से सेठ दीनदयाल(वो मन्दिर उनके ही किसी पूर्वज ने बनवाया था ) इस कार्यक्रम में खास तौर पर शामिल होंगे। सरपंच जी कार्यक्रमों के लेकर मुझसे मदद और सलाह चाहते थे।

मेरे मन मे यकायक एक नृत्यनाटिका का ख्याल आया। हां उसका केंद्र सुरभाषी ही थी। मेरी सलाह उन्हें  बहुत जँची। चंपा मामी की कमज़ोरी मुझे पता थी,अगले दिन कुछ रुपये उन्हें देकर सुरु के लिए मैंने इजाजत मांग ली।

गांव की कुछ अन्य लड़कियों ,छोटे लड़कों और सुरु की खास सहेलियों "गायों" के साथ मैंने पूरे जतन से नाटिका तैयार कराई। सुरु की बांसुरी अब मुस्कुरा रही थी।

जन्माष्टमी के दिन मंदिर के भव्य प्रांगण ने सारी तैयारियां हो चुकी थी। सेठ दीनदयाल तय समय से कुछ विलंब में पहुंचे। अभिजात्य से दमकता चेहरा,60 से 65 के बीच की अवस्था , सर के बाल उम्र के साथ उड़ चुके थे । आंखें भूरी और बड़ी शातिर सी लगी । उनके स्वागत के पश्चात ,मुख्य पूजा हुई और फिर नाटिका मंचन की बारी थी।सुरु थोड़ा डरी,पर मैंने उसे दिलासा दिया कि सिर्फ बांसुरी ही तो बजाना है। नाटिका के मंचन में सुरभाषी ने कृष्ण को साक्षात ही खुद में उतार लिया था। उसकी भव्य छवि ,बांसुरी के मधुर स्वर वहां मौजूद हर व्यक्ति को मंत्रमुग्ध कर चुके थे। इस नाटिका में सुरु की गाय सखियों ने बड़े अनुशासन से उसका साथ दिया। नाटिका खत्म होते ही सेठ जी मुक्त कंठ सराहना कर सुरु को बुला कर गले मे पहनी हुई सोने की चेन उतार कर इनाम स्वरूप दिया। जिसे भीड़ में खड़ी चंपा मामी ने मंच पर जाकर सबके सामने ही छीनते हुए ,सेठ जी का चरण वंदन किया। सेठ जी की नज़र सुरु पर ही थी।

कार्यक्रम के अंत मे मुझे उनसे मिलाया गया। और वो गांव के विकास के लिए कुछ मदद की घोषणा करते हुए रवाना हुए। भण्डारे के बाद सब अपने घर का रुख किये। उस रात मेरे कानों में सिर्फ सुरु की बांसुरी गूंज रही थी,और बन्द आंखों में उसकी कृष्ण रूप छवि।

अगले दिन सुरु दोपहर ही घर पर पहुंच गई। और ना जाने साधिकार मुझे खींचते हुए कहां ले जाने लगी। थोड़ी देर में मुझे इसका जवाब मिल गया। वो सुरु का इस गांव में अपना खास कोना था, उसके दोस्त और सखियों का।

हाँ नदी किनारे आम का बगीचा , वहाँ ठहरी गायों का झुंड और नदी किनारे उछलती मछलियां। शायद वो सुरु की बांसुरी में नाचती थी।

मैंने देखा सुरु ने आम के पत्तों को विशेष तरह मोड़ कर ताले नुमा आकृति बनाई है। और लगभग पेड़ हर डाल में लटकाया हुआ है। मेरे पूछने पर उसने इशारे से बताया कि ये उन पेड़ो और गायों से अपने रिश्ते और प्यार को इन तालों के रूप में सुरक्षित  कर रही है,ये उसी का प्रतीक। उस दिन सुरु ने उन मछलियों का विशेष उछलकूद मुझे दिखाई जो उसकी बांसुरी ओर कूदती थीं। मैंने सम्भवतः सुरु के उस विशेष आरक्षित कोने में खुद का स्थान निश्चित कर लिया था।

तीसरे दिन मुझे वापस लौटना था , क्योंकि मेरी पहली पोस्टिंग के लिए मुझे तैयारी ज निकलना था। सुरु को पता चलते ही उसकी आँखों की गंगा जमुना रुकने का नाम ही नही ले रही थी। मैंने सुरु से लौटते वक्त वादा लिया कि वो खुश रहेगी और वापस बोलने की कोशिश भी करेगी। नदी के रास्ते वापस लौटते हुए सुरु मुझे तब तक दिखाई दी जब तक मेरी नाव दृष्टि सीमा से पार ना हो गई। मैं लौट आई थी अपने घर के अलावा एक और अपनी बना कर।

वापस आकर मैं काम मे कुछ यूं उलझी की काफी वक्त तक सीतामढ़ी की कोई खबर ना ले पाई।पर मेरे ख्यालों से सुरु कभी गई ही नहीं।

लगभग 11 महीने बाद हमें एक स्वास्थ्य शिविर ने जाने का आदेश मिला। सारे नव पदस्थापना वाले डॉक्टर उसमे निश्चित दिन की ड्यूटी पूरी करेंगे। मैं तो ये खबर पाकर ख़ुश हो गई......क्यों???? क्यों वो गांव सीतामढ़ी के नजदीक था। और मैने तय किया कि घर पर ही रुक कर कैम्प आया- जाया करूँगी।

सुरु अचानक ही मेरे दिमाग मे हावी होने लगी। उससे मिलने के लिए मैं बेताब हो रही थी। मैं गांव पहुंची और मुझे देखकर घर और अब खिल गए। थकान की वजह से मैं दोपहर खाना खाकर सो गई थी। अचानक मुझे थोड़ी देर में सुरु की बांसुरी की स्वर लहरी सुनाई दी। मैं खुशी से उठ बैठी।

नानी ने अचानक मुझे जगा पाकर कारण पूछा । मैंने बोला मुझे सुरु से मिलना है ,उसकी बांसुरी मुझे सुनाई दी।

नानी  घबरा कर बोली ,चुप कर कहीं कोई बांसुरी नही है।

नानी  की स्थिति देखकर इतना तो मैं समझ गई थी कि कहीं कुछ दुखद हुआ। मेरे लाख पूछने पर भी उन्होंने ना बताया।

शाम को जब मैं सुरभाषी से मिलने उसके घर जाने को तैयार हुई तब नानी का सब्र भी चुक गया। उनकी रुलाई सी फूट पड़ी। उन्होंने रोते हुए बताया सुरु अब नही रही। मुझे यकीन ना हुआ। मैं अवाक सी रह गई। नानी ने बताना की मेरे जाने के कुछ दिन बाद सेठ जी वापस गांव आए थे। सीधे सुरु के घर गए ,और विवाह का प्रस्ताव दिया। उसके बापू तैयार ना थे पर चंपा के आगे किसी की एक ना चली । सेठ जी ने एक नियत दिन पर सुरु को शहर बुला कर शादी करने का वादा कर वापस चले गए। सुरु का तो सब कुछ जैसे दांव पर था। तुम्हारे जाने के बाद वो खुश रहने की कोशिश करती थी, रोज मन्दिर जाकर बांसुरी बजाती ,शायद वापस बोलने की आशा से। 15 दिन करीब वो उसी बागीचे में रोती रहती। कभी गायों के पास .....उसकी तकलीफ ना वो बोल सकती थी ,और जिसे समझना चाहिए था वो पत्थर की बनी थी। गांव वाले चंपा को समझाए तो उल्टा उन्हें सुरु के भाग्य के दुश्मन ठहराकर अपशब्द बोलती।

हर दोपहर सुरु की बांसुरी के करुण स्वर सबका हृदय उद्वेलित करने लगे। मर्म पर कुछ तोड़ से जाते,पर सब बस सुन सकते थे कुछ कर नही पाए। सेठ जी का भी डर ,सो उनसे कौन बैर मोल ले। नियत तिथि पर सेठ जी का मुनीम शादी का जोड़ा-गहने और नगद रुपये लेकर सुरभाषी के घर उसे शहर ले जाने को हाज़िर हुआ। चंपा ने पैसे चट से अपने पास रख सुरु को जोड़ा पहनने का आदेश दिया। सुरु के मना करने पर उसके बापू सहित खुद को मार लेने की धमकी देकर उसे जोड़ा पहनाया। सुरु रोए जा रही थी,और चंपा उत्साहित। तैयार कर ज्यों ही उसे घर से बाहर भेजने का वक़्त आया सुरु की आर्तनाद और रुलाई  अपने बापू से लिपट कर इस स्वर में फूटी की पत्थर भी फट जाए।

सुरु देहरी को दोनों हांथों से थाम कर खुद को वहीं रोकने का प्रयास कर रही थी और चंपा उसे बाहर की ओर खींच रही थी। इस प्रयास में देहरी की कीलें सुरु की हथेलियों को लहूलुहान कर चुकी थी। इस रोकने और खींचे जाने की कवायद में चंपा ने जोर से दरवाजा बंद किया और सुरु की एक तेज़ चीख गूंज गई। लहूलुहान हाँथ और दर्द से तड़पती सुरु अचानक उठ कर बगीचे की ओर भागी। मुनीम और चंपा उसके पीछे भागे। सुरु आम के हर पेड़ से लिपट कर बस रोए जा रही थी, ऐसा लग रहा था कि उस मजबूर की पुकार सिर्फ वही सुन सकते ,सिर्फ वही उसके अपने। गायों के झुंड ने उसे घेर लिया था जैसे  उसकी रक्षा कर रहे हों,और पक्षियों ने ऐसा कलरव किया कि कान फटने को थे। चम्पा और मुनीम उस तक पहुंच ही ना पा रहे थे। सुरभाषी हर एक गाय को गले से लगाकर रो रही थी।

उसके हांथों से बहते खून ने पेड़ों और गायों के शरीर पर ऐसे छाप बना दी थी जैसे विदा होती बेटी घर छोड़ने पर सिंदूर रचे हांथा बनाती।

ना जाने कितना कुछ बोलना चाहती होगी सुरभाषी, कितने मनुहार, कितनी प्रार्थना अपनों से खुद को दूर ना भेजने के लिए। उसके दिल मे जो घुमड़ रहा था वो शायद कोई नही सुन सका था सिर्फ उन मूक पेड़ों, गायों और पक्षियों के सिवा। सिर्फ उसकी  मूक विदाई के साथी प्रकृति के सिर्फ  मूक अंग ही बने। जो सिर्फ संवेदना और करुणा महसूस कर सकते थे। सुरभाषी के दिल मे उड़ रहे भावनाओं के तूफान को शब्द नही थे, उसे समझा वही जो बोल नही सकते थे। सुरभाषी बस बेतहासा बिलख रही थी।

अब तक मुंशी ने अन्य मातहतों के साथ मिलकर गायों को मारकर भागना शुरू किया। कील लगे मोटे लट्ठ गायों को घाव भी देने लगे और चोट भी ,और वो चोट सुरु के दिल दिमाग और ज्यादा लगी। सुरु तड़प सी उठी और खुद चुपचाप मुनीम की ओर बढ़ चली। अंतिम बार उसने पलट कर बगीचे को देखा ,गायों को सहलाकर प्यार किया,सजल आंखों से उन पक्षियों को देखा जैसे कह रही हो कि सिर्फ मेरी विदाई तुम सब ही समझ और महसूस कर पाए।ना जाने कितने शब्द उस अंतिम चितवन से वो बोल गई। गायों के रँभाने का स्वर बहुत तेज़ हो चुका था पर सुरभाषी अब वो शान्त हो चुकी थी, धीरे से चलते हुए नदी के किनारे पहुंची जहां वो मछलियों को आटा खिलाती। अपने हाँथ से किनारे की गीली मिट्टी लेकर गोली सी बनाकर नदी में डाल दी,मछलियां उस दिन उछली नहीं थी,किनारे पानी मे पड़े उसके पैर के आस पास ही झुंड़ बनाकर शांत थी।

सुरभाषी बेझिल कदम से खोई हुई सी नाव पर जाकर बैठ गई,फिर धीरे से अपने कपड़ों से बांसुरी निकाल के एक बार स्वर लगाई और उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जैसे वो अपना तर्पण ही कर दी हो,बिल्कुल वही भाव । गांव के सभी उसे हाँथ हिलाकर नम आंखों से विदाई दिए ,पर वो मूर्तिवत जड़ ही चली गई। उसके चेहरे पर हांथों से निकला खून लगा हुआ था, ऐसा लगा कि जैसे कोई उदास सी सिंदूर लगी दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन होने वाला है।


एक हफ्ते बाद नदी में उसी बगीचे के किनारे वाली जगह में सुरु का मृत शरीर तैरता हुआ मिला। गांव में हंगामा मचा हुआ था। उसके कलाई में रस्सी से बंधे होने का निशान गाढ़ा था। पर किसी ने कुछ ना कहा इस मौत पर, हां चंपा के घड़ियाली आंसू जरूर सबने घृणा से देखे। सेठ जी की कोठी पर माली का काम करने वाले गांव के ही हल्कू ने बताया कि 1 हफ्ते तक रोज़ उस कोठी से चीखें सुनाई देती थी सेठ जी की गालियों के स्वरों के बीच, जिसमे गूंगी और बाप की औकात का खास उल्लेख होता। हर सुबह गुलाब की सैकड़ों कुचली हुई कलियां कोठी के कचरे के ढेर से निकलती थी।।

सुरु लौट चुकी थी उस नदी में प्रवाहित अपनी आत्मा के पास , अपने सबसे प्यारे साथियों के पास। पर उसके स्वर अब मूक नहीं थे। हर रोज उसकी बांसुरी गूंज रही थी ,उसके आत्मीयों के सानिध्य में।

हां सुरभाषी के बांसुरी के सुर अब बिन बजे ही हर किसी को सुनाई देते थे। वो अब इतने मुखर थे कि उन्हें अब शांत नहीं कराया जा सकता था...........हां सुनो,वो अब भी गूंज रहे मेरे कानों में एक आर्त स्वर से। मैनें कान बन्द कर लिए,पर सुरभाषी के सुर गूंज ही रहे........................


#ब्रह्मनाद 

-डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

जन्माष्टमी विशेष





 कृष्ण,

हम सनातनियों....अरे ये गलत कहा मैंने....सनातनी नहीं तथाकथित हिंदू....अपनी सुविधानुसार कृष्ण का नाम , छवि का उपयोग किसी की रंगीली छवि या कूल ड्यूडवाली #प्लेबॉय छवि के लिए करते हैं। 


आश्चर्य होता है की कि उनका नाम; उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व या कृतित्व को भूलकर कुछ पढ़े- लिखे अनपढ़ अपने गलत कार्यों या सोच को उच्च दिखाने के लिए बोलते। हास्य...... नहीं नहीं मुझे तो रणनीति लगती ,एक ऐसी छवि को दूषित करने के लिए जिसके अनुयाई सिर्फ भारत में नहीं , वरन पूरे विश्व में संभवतः सबसे अधिक होंगे। 

 इस तुलना करते वक्त हम भूल जाते हैं कि कृष्ण होने का अर्थ ; यातना सहते हुए मां की कोख से जन्म लेकर तुरंत उनसे दूर होना था... जब पालक के स्नेह में आकंठ डूबे थे तो जन्मस्थल के प्रति कर्तव्य हेतु उन्हें अपनी यशोदा मां , साथी ग्वाल बाल ,गोपियां और प्राणवल्लभा राधा को छोड़ना पड़ा...

गोकुल छोड़ा फिर मथुरा के होके भी नहीं रह पाए ।

कुछ न कुछ छूटता ही रहा... नहीं  छूटा तो ईश्वर होकर भी सीमाओं को निभाते हुए कर्म और कर्तव्य करते हुए सदा अधरों पर खिलती उनकी मोहक मुस्कान । 


हर स्थितियों में जीवंतता को बनाए रखना , कभी हार नहीं मानना यही तो कृष्ण ने अपने जीवन में दर्शाया और सिखाया.....भावों से पूर्ण होकर भी कर्म हेतु सम्पूर्ण त्याग।

आसान नहीं थी ये यात्रा ...... राम से चलकर कृष्ण होने की पूर्णता जीना...।

राम राजा हैं ,कृष्ण राज्य के स्थापक। राम ने मर्यादा से बांध कर रखा स्वयं को .....कृष्ण मर्यादा की सीमा को बांधना सिखाए ...उसके बाद दंड का प्रावधान भी...शिशुपाल याद है ना। 


राम रण में अपनों के लिए बिलखते हैं ,अस्थिर चित्त होते हैं ,कृष्ण अपने सबसे प्रिय की भी आहुति से पीछे नहीं हटते। अभिमन्यु याद है ना।


राम ने स्वयं को माया के बस हो जाने की मर्यादा रखी , और कृष्ण ने भ्रम को तोड़ने की चेष्टाएं। पूतना ,बकासुर याद हैं ना।


राम सामाजिक मूल्यों के लिए लड़ते हैं, कृष्ण समाज में मानव के अधिकार के  लिए....... पांडव याद हैं ना..


 राम ने लोक के लिए एक स्त्री - स्वयं की पत्नी को त्यागा..और कृष्ण से लोक से त्याग की स्थिति की स्त्रियों को पत्नी का स्थान दिया... १८, ०००रानियां याद हैं ना। 



कृष्ण ने सदैव धर्म को कर्म से निभाकर आदर्श स्थिति स्थापित की।  सर्वशक्तिमान होने पर भी एक दुखी मां के श्राप को सहर्ष स्वीकार किया। क्योंकि वो धर्म स्थापना की उनके वंश के विनाश का कारण होना था। 


वो क्या था की बांसुरी से ही सबको मोहित करने की क्षमता वाले कृष्ण ने सदा के लिए बांसुरी त्याग दी थी? देह से अलग आत्मिक प्रेम की पराकाष्ठा का उदाहरण , त्रिकाल दर्शी होने पर भी वर्तमान के अनुरूप व्यतीत होना....विनाश के फन पर लास्य का आनंद जीवित रखना .... प्रतिपल त्याग करते हुए भी स्वयं में सृष्टि हो जाना ....ये कृष्ण हैं। 


तो अब जब भी कृष्ण से तुलना कर स्वयं को सही सिद्ध करने का प्रयास करें तो एक बार स्मरण करिएगा की रास रचैया क्यों योगेश्वर होकर

*महाभारत* के सारथी हुए । और जब आप स्वयं इन प्रश्नों के उत्तर खोज लेंगे तो अपनी तुलना की चेष्टा क्षुद्र प्रयास लगेगा।

*कृष्ण का जीवन आत्मसमिधा- आत्महवि का सफल कार्मिक यज्ञ है*।



जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

#ब्रह्मनाद

#डॉ मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी 

मंगलवार, 29 अगस्त 2023

रक्षाबंधन विशेष अगस्त २०२३


 

होssssss
कभी भैया ये बहना ना पास होगी,
कहीं परदेश बैठी उदास होगी।

बचपन में इस गीत को सुनकर मैं और छोटा भाई  आंसू बहाकर इमोशनल दिखाने का नाटक करते फिर दोनों ही बहुत हंसते थे। उस दिन हमारी लड़ाई होना भी तय  होता था। एक दूसरे से मुंह फुलाए राखी नहीं बांधने - बंधाने की धमकी और अंत में मेरे भैया लिखी हुई बड़ी सी चमकीली फोम वाली राखी बांधने की धमकियास्त्र से राखी की शुरुआत होती। तब दिन अलग थे, हम साथ थे ,एक जगह ,एक छत के नीचे। जीवन में संघर्ष के नाम पर बस पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करना और सबसे आगे रहना ही पता था। राखी गीत ;तब हम दोनों को एक दूसरे को खिजाने का साधन थे। ना तब उन गानों की गहराई समझते ना ,ना ही उसके शब्दों से ज्यादा भाव ग्रहण करने की स्थिति।
खूब मार कुटाई करते एक दूसरे के साथ।कहने को भाई मुझसे छोटा पर लड़ते हुए दोनों बराबर के बन जाते। मां से सजा मिलने पर भी ढीठ जैसे एक दूसरे को चिढ़ाते और सजा की तीव्रता और पीड़ा को कम करने का उपाय भी ढूंढ कर एक दूसरे को बताते। जैसे की गर्मी की तपती छत पर बिना स्लीपर के खड़ा करने की सजा मिलने पर छत पर गिरे पत्तों को इकट्ठा कर पैरों के नीचे रखकर राहत पाना......... और भी बहुत कुछ यादें इस राखी के त्यौहार के आते ही महकने लगती । तपती धरती पर गिरी पहली बारिश के बाद की सौंधी सी खुशबू जैसी। जो बेचैन भी करती ,सुखद भी लगती।
समय के पहिए की बदली चाल से आज राखी के दिन भी  अपनी- अपनी जिम्मेदारियों के चलते हम दोनों बहुत दूर हैं। रास्ते में गुजरते हुए या नेपथ्य में चलती TV में राखी गीत बरबस ही आंख नम कर जाते । कभी भैया ये बहना ना पास होगी, कहीं परदेश बैठी उदास होगी, अब बस गाना नहीं बचा ,बल्कि वो भाव बन गया जो सबकी नजरों से बचाते हुए नम आंखों की कोरों से चुपके से ढलक कर गालों  तक अनायास ही चला आता। अब उन गानों को सुनकर हंसी नहीं आती, टीस उठती है ,की जिम्मेदारियां कितनी बड़ी हो जाती कि एक रिश्ते की डोर के दो सिरों पर जुड़े दो लोग चाह कर भी नहीं मिल पाते।
सच में कई राखियां अब इन गीतों को सुनकर बस गालों पर बनी आंसुओं के चिन्हों के साफ करने पर गुजर जाती।
बचपन की लड़ाइयां अब नाजुक एहसास का खजाना लगते। राखी से जुड़ी यादें ,वो उत्साह..... सपने होकर भी सबसे कीमती दौलत लगते। अब अगर किसी राखी में भाई पूछेगा की क्या चाहिए तुम्हें तो बोलूंगी एक बार ही सही वो बचपन की राखी का एहसास वापस ले आओ।

सच में राखी बचपन की मासूमियत समेटे ,सबसे खूबसूरत वक्त की थाती जैसे सुरक्षित रखने वाला त्योहार है।जिसके रेशमी धागों के स्नेह और शीतल स्पर्श को लाखों  शुभकामनाओं और आशीर्वाद के साथ अपने भाई की कलाई में हर साल खुद सजाना हर बहन की चाहत होती है।
खैर आज भाई से दूर बैठी हर बहन की तरफ से यह कामना करूंगी कि बहन की राखी; भाई की याद में नहीं ,बल्कि भाई के साथ में ही बीते । गानों के अर्थ भी समझे जाए पर भाई और बहन के साझे स्नेह के सानिध्य में। जिसमें अपने भाइयों की अपनी  नजरों से बलाऐं उतारते हुई बहने लाड़ ने भरकर शगुन के लिए लड़ें ,मनुहार करें , और भाई को राखी से लिपटे ढेरों सद्भावी कामनाओं और रिश्ते की मिठास से हमेशा परिपूर्ण रखें।
मेरे भाई सहित सभी बहनों के भाईयों की खुशियों और सफलता की कामना करती हूं और सभी के लिए  इस पर्व की निरंतरता अक्षुण्य रखने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हूं.....
गुनगुनाते हुए........
चंदा रे ,मेरे भैया से कहना .....
बहना याद करे। 🙂

तुम्हारी बहन
#गुड़िया
#ब्रह्मनाद
#डॉ_मधूलिका

शनिवार, 10 जून 2023

खुशियों का खग्रास


 घनीभूत पीड़ाओं के विषम ज्वार..... 

नहीं होते नियंत्रित ,चांद की कलाओं से।

जीवन के उतार-चढ़ाव,

अक्सर दोहराए जाते,

शापित हो अनुप्रासों में।


अनचाहे ही अक्सर ये डुबो जाते,

काली पुतलियों से सजे ,

एक जोड़ी सफेद कटोरों को,

एक नमक से भरे ,खारे एहसासों में।।


कई अनमनी अभिव्यक्तियां सहसा,

रोक ली जाती हैं ,होंठों के कोरो पर आकर,

बहुत कुछ छुपा कर ,

दर्द झलक ही जाता,बदनुमा से दागों में।।


चीत्कार कर उठती जब आत्मा,

कई मूक यंत्रणाओं में,छलक ही उठता प्रमाद,

लाल डोरों से चमकती ,

आंखों की चिंगारियों में।।


संघनित, ऊष्मित ...

आत्मिक घावों से रिसती मवाद,

थिरने लगी है अब ,कही गहरे , 

किसी तलहटी को तलाशते ,

जहां ना शेष हो कोई अवसाद,

बैचेनियों को मिले, 

सासों का अंतिम ग्रास ,

क्या सांसों संग ही अब पूरा होगा,

जीवन के खुशियों का खग्रास ।


#डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद 

सोमवार, 5 जून 2023

अनन्त


 तुम मेरी सोच में रहते हो ,या मैं तुम्हारी सोच में जीती हूँ। हर वक़्त तुमको सोचती हूँ ,या सोच की वजह से ही मैं रहती हूँ।

यहां वाक्य नहीं भावना महत्वपूर्ण है। किसी के होना , उसके लिए सोचना ,उसे याद करते रहना ही किसी का जीवन बन जाता है। 

एक विद्वान का कहना था कि "ईश्वर और मनुष्य ने एक दूसरे को देखा और दोनों के मुँह से निकला कि अहा, मेरी कृति".... । मनुष्य को अपनी क्षमता से परे जाने के लिए ,अपनी असफलता के दुखड़े को रोने के लिए, आगे बढ़ने की आस बनाए रखने के लिए एक स्तम्भ चाहिए होता। इसलिए उसने ईश्वर को गढ़ा। फिर तर्क आता कि हमें किसने गढ़ा.... ईश्वर /पराशक्ति।जिसे हम परिभाषित न कर सकें, जिसके आगे हमारी सोच न जा सके, जिसके होने से ही हमें अपने अस्तित्व का आसरा मिला...... वही ईश्वर। पता नहीं हमने गढ़ा या वो था या है या हमने ढूंढा। बस आस्था के अनुसार हम उसी का हिस्सा ,और वो हर वक़्त हममें रहता। आस्था में तर्क नहीं होते। इसलिए हम कभी खोजने का प्रयास ही नहीं करते।

अगर वो नहीं होता ......तो जिक्र ही नहीं होता....और अगर वो है तो अन्य किसी बात की फिक्र ही कहाँ.... । 

निश्चित ही प्रेम भी किसी घोर आस्तिक की उपज है। जिसने माना कि प्रिय के बिना हम कुछ नहीं। उसका होना ही हमारा होना है।हमारे सुख ,दुख ,प्रमाद ,अवसाद सबसे उससे ही शुरू ,उससे ही खत्म.... । प्रेम में हम जिसकी वजह से हैं, वो हमारे ही वजूद का एक अंग जिसके बिना जीवन नहीं। मानिए जैसे संसार और जीवन। एक दूसरे के हिस्सा और एक दूसरे बिना अस्तित्वहीन। अगर जीवन न हो तो इस निर्जीव संसार की परिकल्पना इतनी अद्भुत और रोमांचक कहाँ लगने वाली!!!! और अगर ये संसार न हो तो जीवन कहाँ से आएगा। 

तभी तो अनंत की परिकल्पना एक लेटे हुए 8 जैसी है। गूंथा हुआ ....ऐसा जिसका छोर न खोजा जा सके। कहाँ शुरू हुआ ,कहाँ खत्म ये ज्ञात ही नहीं होता। यही तो प्रेम का भी संकेत.... प्रेमी और प्रेमिका ,जीवन और संसार से..... कौन किसमें कुछ नहीं कहा जा सकता। ये चक्र भी अनन्त है, संसार के अस्तित्व की तरह.... जहाँ स्वयं 0 होकर भी अनन्त की परिकल्पना को सार्थक कर लिया जाए.... वही ब्रम्हांड है ....वही संसार .....वही प्रेम है। 

#डॉ_मधूलिका 

#ब्रह्मनाद

गुरुवार, 1 जून 2023

नदी और जीवन का मौन


 धीरे-धीरे चुप हो चली हूँ। अगर काम और बच्ची के लिए बात करना मजबूरी न हो तो शायद दिन भर में 1 वाक्य भी ना बोलूं। शुक्र है कि इस दौर की सुविधाओं में मोबाइल के जरिये सन्देश भेज कर बात कह देने का विकल्प आ गया,वरना मन मार कर बोलना पड़ता ही। 


कभी हमेशा हंसती थी। शायद ही कभी चेहरे की मुस्कान वाली मांसपेशियों को राहत मिलती रही हो। तकलीफ भी रहे तो पता नहीं क्यों ये मुस्कान अपना ठिकाना नहीं छोड़ती थी। ढीठ किरायेदार की तरह मकान खाली करने को ही तैयार न होती थी।साथ ही ये संक्रामक भी हुआ करती थी....दूसरों को भी मुस्कुराते रहने की बीमारी लगा ही देती थी।

पता नहीं कब अचानक अंदर से जीवंत सी नदी गायब ही हो गई। नदी जीवंतता की निशानी होती हैं।उछलती ,मचलती ,कभी पूरे पाट पर फैली,कभी एक छोटे से जगह से भी रास्ता तलाश लेती। पत्थर रास्ते मे हों तो उससे भिड़ती नहीं,किसी न किसी तरह पार कर ही लेती। विपरीत स्थिति में सिकुड़ जाती तो वक़्त आते ही वापस अपना यौवन पा कर वर्जनाएं तोड़ कर बढ़ जाती।अब वो जीवंत भाव खुद में सागर में बदलता महसूस हो रहा।जैसे कहीं गहरी खोती चली जा रही हूँ।कभी ज्वार भाटा की तरह भावना उमड़ भी जाती तो ऊंचाई से उठने वाली लहरों की तरह वापस बहुत गहराई में चली जाती। सागर जैसे सब कुछ समा कर शांत बना रहता ,अपनी गहराई में न जाने कितना कुछ समेटे,अब धीरे धीरे मैं भी वही बन रही। 

कहते हैं कि अधजल गघरी छलकती है....सम्भवतः मैं ऐसी ही थी।जब मैं का भाव प्रबल था ,अपनी जानकारी का दर्प था .....तब मैं वाचाल और बेवजह हंसने वाली थी।

किनारों पर उथली हूँ पर जितना गहरी जाती जा रही, सब कुछ ऊपर से थमता सा जा रहा, ज्ञात होती जा रही अपनी अज्ञानता ,कमियां ,थोथापन ।सम्भवतः  कोई बदलाव अब न बहुत उत्साह देता न ही कोई दुख ;कोई गहरी चोट। और आसूं..... उसी के खारेपन का सागर बना हुआ। कई मीठे पानी की नदियों की मौत और अंत ऐसे ही हुआ है। गहराई में घुलती हुई ,अपने ही सभी दुखो से जन्मे आसुओं के साथ शांत होती हुई .... अथाह सागर में बदल जाती। और फिर उनका पुर्नजन्म कभी नही होगा।उनकी जीवंतता फिर कभी नही वापस आती। उसकी कल -कल गति एक गहरी चुप्पी में बदल जाती। और वो चुप्पी हमें चीखती हुई लगती।कई भावानाओं की धारा की शांत करने सागर में बदलने की दशा..... ऊपर हलचल भीतर बस थमी हुई गहराई और शांति। 

 तब वो अनन्त में शून्य हो जाती और फिर खुद की ही गहराई में खोती चली जाती। विलीन हो जाती कोलाहल से गुजर कर .......नाद में । 


#डॉ_मधूलिका 

#ब्रह्मनाद

मंगलवार, 30 मई 2023

कल...... एक मृगतृष्णा

 *मैं तुमसे बाद में बात करूँगी/करूँगी। 

*कल ये काम कर लेंगे।

*कल से पक्का नया रूटीन फॉलो करूंगा /करूँगी।

*कल से जल्दी उठेंगे।

*कल पक्का तय करेंगे कि आगे क्या करना...... 


और हर आज ;वही कल होता है जिस कल की हमने कल बातें की थी। अफ़सोस हम कल में टालते जाते.... कल के आसरे में बैठे रहते ,और वो कल कभी नहीं आता। हां इस कल को पाने की जद्दोजहद में हम आज को जरूर खो देते। आज की निश्चितता को कल की आस में नजरअंदाज करते रहते। 

इस कल के चक्कर में हम बस खोते ही चले जाते....... कई अपनों को ,और सपनों के लिए हकीकत को। 

कल कभी आ ही नहीं पाता। और हम अन्तहीन दौड़ते ही चले जाते।ये कल हमसे हमारे एक कदम आगे ही रहता।जब -जब हाँथ बढते तो लगता हम इसे पकड़ लेंगे।पकड़ में आता तो सपने हकीकत बन जाते..... पर  ये एक छलावा रहता ,एक मृगतृष्णा.... हम आगे देखने के चक्कर मे अपने नीचे की जमीन भी खो देते। और फिर औंधे मुंह गिरते। निगाहें फिर भी उसी कल की ओर लगी रहती, और वो हमसे उतनी ही दूरी पर खड़ा रहता ,जितना हमारे सफर की शुरुआत में था।


जब तक आंख खुलती....... कल खो चुका होता ,बीत चुके कल में। और हम एक पेंडुलम बन चुके होते कल और कल के बीच । तब वर्तमान भी पहुंच से छूट चुका होता और हमारा आधार ......... एक ट्रेडमिल की तरह हमें ऐसी दौड़ में ले जाता ,जहाँ हम दौड़ते तो रहते अनवरत ,पर कहीं पहुंच नहीं पाते। कल ....... कभी नहीं आता ,समझ तब आता ,जब आज कल में बदल जाता और हाँथ और आँखें दोनों खाली ..........

और फिर एक दिन कल की ओर ताकते हुए हम आज से कल में बदल कर इस दुनिया के अस्तित्व में ही आंकड़े से गायब हो जाते।

#डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद 

बुधवार, 24 मई 2023

चाय और तुम

 

       (तस्वीर:- साभार गूगल)


चाय और तुम्हारे साथ .....दुनिया में इससे बेहतर सुकूं शायद ही मुझे दोबारा नसीब हो। किसी गहरी घाटी की किसी अंतिम छोर पर टेंट लगाकर जतन से जुटाकर लाई गई कुछ सूखी लकड़ियों और पत्थर के ढेरों  से बनाए गए चूल्हे पर चढ़ी हुई चाय....।


 हल्की ठंडक का एहसास.... मुँह से निकलता धुंआ और आँखों में बरसों से ठहरी नमी रहकर रहकर बाहर निकलने को बेताब..... उन लकड़ियों की आंच से तुम्हारा दिव्य चेहरा लाल सा दिख रहा। जैसे अभी किसी युद्ध से तपकर लौटे हो और शौर्य अब तक उबल रहा हो। पर तुम्हारी आंखे मासूमियत के साथ मुझे और उबलती चाय को तक रही हैं। एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है। तुम होंठों को हिलाने की नाकाम कोशिश कर ,चुप हो रहा जाते।जैसे बोलना बहुत कुछ हो ,पर छोर न मिल रहा हो। 


मैं तुम्हारी आँखों मे ही खोई हुई हूँ। तुम चेहरे और आँखो के इशारे से मुझसे पूछते.... क्या हुआ ।और मैं सर डुलाकर मना कर फिर चाय को ताकने लगती। अंदर एक शोर से है। इस मुलाकात से पहले क्या क्या नहीं सोचा था। ढेर बात करूँगी ,ढेर सवाल .... कुछ शिकायतें।और अब जैसे उस शोर को अंदर के निर्वात ने ग्रस लिया। 


तुम्हारी आंखें और हाँथ मेरी नजरें रह रह कर इनपर टिक जाती। हां बस इनसे ही तो मेरा परिचय हुआ था। चेहरे से नहीं।वो ही मुझे मेरे लगे... मुझे यूँ ताकते पाकर तुम्हारे होंठों  पर मुस्कान खेल जाती और मैं झेंप कर उन जलती लकड़ीयों को खोतने लगती। तुम धीरे से मेरे पास सरकते और मेरे हांथ को अपने हांथों में लेकर दबा लेते।जैसे मुझे यकीन दिला रहे हो...हां ये मैं ही हूँ। उस ठंडक वाले एहसास में तुम्हारे हांथों की नरमी और गर्मी मुझे अंदर तक सिजा रही है।


अचानक चाय खौलती और जलने की मीठी सी खुशबू हम दोनों ने नाक में समाती। हल्के धुएं से आंखें लाल और आंसू भरी हो जाती ,जिनकी आड़ में मैं अपने आंसुओं को भी पोछ लेती।


छान कर चाय की गिलास तुम्हारे हांथों में पकड़ा देती।जिसे तुम जैकेट की आस्तीन पंजों तक खींचकर उसके बीच पकड़ लेते। पहला घूंट लेने के लिए मैं गिलास को थामे तुम्हारे हांथों को तुम्हारे होंठों की ओर करती और एक चुस्की के बाद मैं चुस्की लेती।

वो बड़ी सी गिलास से 2 चुस्कियों के बीच हम दोनों चुप्पी में भी ढेर बातें कर ले रहे। तुम्हारे होंठों को छूने के बाद जब गिलास मेरे होंठों तक आती तो मानो तुम्हारा मन उमड़ कर उस एक चुस्की चाय में पिघल जाता।चाय की खत्म होने वाली अंतिम चुस्की मैं तुम्हें ही पीने को देती,कहते हैं  खाने पीने का अंतिम घूंट और कौर ,तृप्ति का होता है। मैं वो तृप्ति तुम्हारे नाम कर देती हूँ। 


मेरे जीवन की क्षुधा तुम हो, मेरे आत्मा की प्यास तुम हो .... और उससे तो मैं कभी तृप्त ही नहीं हो पाऊंगी। मैं घूंट घूंट अपनी आंखों से तुम्हें पी रही हूँ। मेरी आत्मा तृप्त होने की बजाय और क्षुधातुर हो रही है। 

हम दोनों उठ खड़े हुए तुमने अपनी बाहों के सहारे मुझे जमीन से कुछ ऊपर उठा लिया।देखा आज मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे। तुम्हारे होंठों पर अपने होंठ रख मैं आंखें बंद कर लेती हूँ।और आंसुओं की दो जोड़ा धार उस निर्जन में भागीरथी से भी प्रचंड तरीके से बह निकली। 

उद्वेग काबू करके एक दूसरे के माथे पर बोसा रख तुम वापस मुझे जमीन के हवाले कर देते। तुम्हारे बलिष्ट हांथों से होते हुए मेरा चेहरा तुम्हारी हथेलियों में समा गया। जिन्हें मैं नेमत समझ कर चूम रही हूँ। आंखें आखों में कैद हो गई है। हम दोनों अपने अपने रास्तों के रुख करते । बस इतना हो बोल पाते .....अपना ख्याल रखना।

मैं पहले नहीं मुड़ सकी.... इसलिए तुम एक झटके से मुड़ कर तेज़ कदमों से निकल गए।मैं वहीं खड़ी देखती रही जब तक तुम्हारा अक्स् ओछ्ल न हो गया। 

ये मेरी अंतिम चाय थी....उस वक़्त तक के लिए जब तक तुम दोबारा मुझे नहीं मिल जाते। हर शाम की चाय की चुस्कियों से एक  के होंठों  से दूसरे के होंठों तक चुप सी बातें करने को।


#डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद 

बुधवार, 3 मई 2023

नानी और अक्षय तृतीया : एक संस्मरण


 मेरे लिए अक्षय तृतीया या अख्ति का बचपन से बस एक अर्थ था.. मिट्टी के बने  गुड्डे -गुड़िया का एक खूबसूरत जोड़ा लेकर आना ,उनकी ख़ूबसूरत सी ड्रेस बनवाना और कुछ पकवान बनाकर मंडप सजाकर उनकी शादी करवाना । बरा बरसात के दिन उनकी गांठ खोली जाती और वो दिन भी मौहल्ले की सखियों या अपनी चचेरी -ममेरी बहनों के साथ उत्सव सा लगने लगता। 

साल भर बाद उन्हें पूजा के साथ विसर्जित कर फिर दूसरे जोड़े को लाकर उनकी पूजा और विवाह। कितना प्यारा बचपन था ,जब माटी के ये खिलौने ,कुछ जरी लगी उनकी पोशाकें, बरा ,पुआ , गुलगुला इतनी खुशी और उत्साह दे जाते थे जो बड़े बड़े होते होते किसी भी उत्सव किसी भी पोशाक,किसी भी खिलौने से नहीं मिल सके। 


इस विशेष दिन से जुड़ी एक खास याद नानी की है,जिन्हें मैं और सारे बच्चे बाई बोलते थे। बचपना जाते हुए इन गुड्डे गुड़ियों के त्यौहार से दूर करता गया ,पर नानी.... मेरे लिए हर साल गुड़िया -गुड्डा का जोड़ा लाकर शादी कराके पूजा करना न भूलती। चूंकि ये दिन गर्मी की छुट्टियों की दौरान आता था इसलिए अक्सर हमें ये नानी के घर मे ही मिलता। 


वक़्त के साथ जब हम अपनी दुनिया में व्यस्त होते गए...हर गर्मी की छुट्टी अब नानी के यहाँ भी नहीं जा पाते थे... पर नानी अब भी मेरे लिए वो रीत निभाती जा रहीं थी। मैं जब नानी के यहाँ जाती वो उस सजे हुए गुड्डा -गुड़िया को मेरे सामने कर देतीं। और मैं नानी से कहती कि अब मैं बड़ी हो गई हूं इससे नही खेलती।और वो हंसती की जब तक जिंदा हूँ मेरे लिए तुम खिलौने से खेलने वाली गुड़िया ही रहोगी। जब नहीं रहूँगी तभी बन्द होगा ये रिवाज। याद है मुझे ,जब छोटी थी तो कई बार साल भर उस गुड्डे -गुड़िया की कभी नाक ,कभी मुकुट, कभी हाँथ का हिस्सा खेलते हुए टूट ही जाता था। पर मन  उस टूटे हुए खिलौने से कभी न उकताता। बड़े होने पर वो एक कोने में पड़े -पड़े मुझे चुपचाप ताकते रहते। 


आज अखबारों में ,बाजारों में ये गुड्डे -गुड़िया के जोड़े देख कर नानी की याद आ रही। उनके जाने के बाद से किसी ने मेरे लिए अख्ति पूजन नहीं किया।किसी ने मेरे लिए मिट्टी के उस जोड़े का पूजन कर मुझे सौंपने के लिए नही सहेजा। एक मिट्टी की बनी  स्नेह से डूबी काया ,आज बहुत याद आ रही है।क्योंकि वो मेरे बचपन से जुड़ा सबसे खूबसूरत रिश्ता और एहसास था।

बाई  आप ,उस मिट्टी के जोड़े से जुड़ी जो खुशी आपने मेरे  लिए अपने जीवन रहने तक सहेजा अब उसके लिए तरसती हूँ। न अब खुश होना इतना आसान है न ही कोई मेरे लिए सहेज कर रखने वाली आप रही। 

 बाई आप ,आपके दहबरा और गुलगुला ,और वो गुड्डे -गुड़िया....मेरे जीवन मे एक बड़ी रिक्तता बन गए हैं।जो अब मेरे जीवन के अंत तक रिक्त ही रहेंगे। आज आप बहुत याद आ रही हो.......😓

#डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद 


गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

एक प्रेयसी का रूपांतरण

 वो सुबह जागने से लेकर ,सोने के बाद तक मेरे साथ रहते हैं। सुबह का पहला ख्याल रात्रि के अंतिम पहर का स्वप्न भी है। सुबह नींद खुलते ही एक टीस सी उठती, खुद में एक ख़लिश सी महसूस होती लगती। हर वक़्त उन्हें अपने पास चाहती ,एक साये की तरह साथ रहना चाहती जो अंधेरे में उनमें ही समा जाती। तकिए की बजाय उनके हांथों का सिरहाना हो, कभी वो मेरे सीने पर सर रखकर इतनी निश्चिन्त नींद लें कि सुबह उठने पर उनके चेहरे  और कनपटी का वो तरफ पसीने से तर मिले जो मुझे स्पर्श कर रहा था । 


दोनों में से किसी एक कि नींद खुले तो दूसरे को खुद की ओर हल्की मुस्कान और ढेर स्नेह से तकते हुए पाए। सुबह अपना अक्स आईने से पहले उनकी आंखों में देखूं। कभी उनके कांधों पर अपने हाँथ रख उनकी बलिष्ठ भुजाओं में बेफिक्र झूल सी जाऊं,इस भरोसे से साथ कि वो ताउम्र मुझे कभी गिरने न देंगे।  उनके थकान से चूर पसीने से तर बदन की खुशबू अपने बदन में समेट कर उन सी महकती रहूं। मैं अपना हर दिन आभाष नहीं बल्कि स्पर्श कर अनुभव में बिताना चाहती हूं। जीना चाहती हूं उन्हें अपनी हर सांस ,हर चितवन ,हर मुस्कान , हर छुअन में। 


न जाने कबसे  यही  सब ख्वाब संजोए वक़्त को उसकी गति से दौड़ने से रोक नहीं पा रही हूँ। जितना शिद्दत से पकड़ना चाहती उतनी तेज़ी से फिसल जाता है।वो जब आए थे तब उम्र और उसके निखार का ओज चरम पर था। जब मुस्कान आकर्षण के दायरे को समेट कर होठों में सिमट जाती थी। हर तकलीफ को परे रख मुस्कुराते रहने की जिद थी। शायद एक अल्हड़ता थी जो उस वक़्त जीवित थी। अब परिपक्वता से आगे बढ़ती हुई एक प्रौढ़ स्त्री हो चुकी हूं। जिसकी मुस्कान अब मोहक नहीं डरावनी दिखती। क्योंकि अब उम्र की रेखाएं कई तिर्यक काट के रूप में उभरने लगती। बहुत कुछ उम्र के साथ खोती सी जा रही। बाहरी और भीतरी परिवर्तनों का दौर जैसे बीत सा गया अपनी अंतिम परिणीति पाने के लिए। अब ठहरी हुई गम्भीरता कहीं गहरे घर कर रही। सेल्फी में अब दंतपंक्ति भी नहीं दिखती।याद करके मुस्कुराना पड़ता। अब दिखती है तो एक गम्भीर , निरुत्साही ,जीवन को बस काटने की सोच लिए हुए  एक औरत ,जो अब प्रेयसी होने की सोच से कहीं अंदर धंसी सोच में जीने लगी। प्रेयसी होती तो लड़ती, हक मांगती, रूठती ,मनाए जाने को आतुर रहती, नखरे दिखाती। पर अब प्रेयसी नहीं बची। बदल चुकी हूँ उस औरत में आकाश की तरह अपने प्रिय के लिए छा जाना चाहती ताकि उसे जीवन की चुभती धूप से बचा सके,और धरती की तरह थाम लेना चाहती रुकने के लिए एक मजबूत आधार देकर ,उसे ठौर बना देने के लिए। जो मेरा मालिक ...उसके लिए अब प्रेयसी नहीं ...... माँ का वात्सल्य समेट कर ,दोस्त का धैर्य समेट कर, बहन सी चंचल और विनोदिनी और अंत मे अपना सब कुछ उनके लिए समर्पण और विसर्जन कर देने वाली अर्धांगिनी होने   वांछना शेष। 


एक आस अब तक शेष है ..... क्योंकि अब तक सांस शेष है.... मैं बसूं उसमें उसकी रूह की तरह, और रहूं उसके सीने में उसकी धड़कन की तरह। ❤️

#डॉ_मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद 


सोमवार, 24 अप्रैल 2023

#विश्व_पुस्तक_दिवस




किताबें और मैं:)

मैं अक्सर किताबें पढ़ते हुए कहीं खो जाती हूँ। दरअसल मैं पढ़ती नही हूँ , मैं किताबों को जीने लगती हूँ। उनके किरदारों में ढल जाती हूँ।मैं #पीताम्बरा पढ़ती ,तो मीरा हो जाती, मैं खो देती खुद को आराध्य कृष्ण में। मुझे संसार बेमानी लगने लगता। उस पीड़ा को जीती जो मीरा ने जी थी, उतनी उदात्त और उदारमना भी हो उठती। 

मैं #कृष्ण_की_आत्मकथा पढ़ती तो कृष्ण हो उठती। ईश्वर नहीं ,महामानव जिसकी सहायता कई साधारण मानवों और कई नाटकीय घटनाक्रम सहित प्रकृति भी करती,ईश्वरत्व पाने को। 

#सोमनाथ में कभी अभिजात्य जीती ,कभी पीड़ा । मैंने उस महान काल को खुद में गुजरता महसूस किया। सोमनाथ के गर्भगृह पर पाया खुद को, तो  शिव के सम्मुख  ,पूरे नगर के सामने कला प्रदर्शन को प्रस्तुत ;एक देवदासी की किंचित निराश किन्तु उद्दीप्त आभा की प्रतिदीप्ति खुद में महसूस की,अंत मे मातृभूमि छोड़ने की व्यथा भी। 

#शेखर पढ़ते हुए मैं विद्रोही हो उठी, व्यवस्था और आडम्बर से दूर , रूढ़ियों को खुद में गलाती हुई ,मैं विद्रोही हो गई। 


कभी मैं द्रौपदी का द्वंद जी, कभी कर्ण का त्याग,कभी उर्मिला सी जड़ हो गई।  मैंने आदिवासियों का सहज जीवन जिया, कभी उनमे ढल कर जंगल मे खो गई। कभी शरदचन्द्र की रचनाओं की  सदहृदयी बड़ी कोठी की मालकिन हुई,कभी किसी मुनीम की मासूम सी बेटी जो कौतूहल से हवेली में कदम रखते हुए किसी लक्ष्मी पुत्र की नज़र में आ जाती। आगे उसकी जिंदगी सिर्फ भूल भुलैया बन जाती। 


मधुशाला के रहस्य को छायावादी बना कर उसका खुद में प्रकृतिकरण किया। हर नायक का संघर्ष , हर नायिका का त्याग, अंतर्द्वंद्व ,ना जाने कितने भाव मुझे खुद में जगह देते हैं। खुद में खोकर नायकत्व पाने को। 


कभी भुवाली के सेनिटोरियम की मरीज की सेविका होती, कभी डॉ । शिवानी के रूप में प्रस्तावना लिखती ,तो उसकी काली मोटी पर अल्हड़, जिंदादिल  नायिका भी  । उसकी सद्यस्नाता नायिका तो सदा मुझमे ही रहती है। 

मैंने जापान की दुर्दशा देखी। मैंने यूरेनियम खदानों की विकिरण की मार झेली। मैं कभी मूक पर आंखों से बोलने वाली पात्र हुई, कभी अपने चुके अभिजात्य को याद करती और उसके दम्भ को अब तक अपनी अकड़ में जीती बुढ़िया भी।

ना जाने कितना कुछ जीती हूँ इन किताबों में। जितनी किताबे पढ़ती गई,उतने ही किरदार में ढलती गई। कभी राष्ट्रवादी,कभी आक्रांता . ..कभी पतित ,कभी पावन ,कभी सन्यासी हुई ,कभी संसारी। सारे रस खुद में पाई। कवित्त की प्रेरणा बनी तो कभी लेखक हुई। कितने भूखंडों का विस्तार मुझमे हुआ,कितने फूलों की खुशबू मुझमे समाई। 

दुनिया मे रहकर भी ,एक अलग दुनिया मुझमे बसने लगती। जो लोगों के लिए अनदेखी होती ,पर मेरी आत्मिक अनुभूति होती।


उस वक़्त तुम मुझे नहीं ढूंढ सकते। मैं #मैं नही बचती।।मैं किताब जीती हुई किरदार हो जाती हूँ।


हां मैं किताबे पढ़ती नहीं, #मैं_किताबें_जीती_हूँ। 


©®डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

गुरुवार, 20 अप्रैल 2023

अपने अपने युद्ध



कोई बाह्य युद्ध मे रत तो कोई आंतरिक से जूझ रहा है। घरों में रहने वालों के चारदीवारियों के भीतर का युद्ध,एक कमरे में रहते हुए अलग-अलग लोगों का भी युद्ध एक तरह का नहीं होता है। 


कुछ अपनी परिस्थितियों से युद्ध कर रहे होते हैं। तो कुछ अपने ही मन में एक युद्ध निरंतर जी रहे होते। कुछ भाग्य से लड़ रहे होते, कुछ ईश्वर से युद्ध मे होते...... उनकी लिखी नियति को अस्वीकार कर अपने ध्येय को पूर्ण करने के लिए। जितने लोग, उतनी ही सपने और उतने ही युद्ध। कोई किसी से दूर जाने का युद्ध लड़ रहा तो कोई किसी को पास लाने के लिए अपने आस पास के लोगों से....कोई त्रिशंकु सा अपनी ही मनोस्थिति के बीच युद्धरत। कोई पहचान का युद्ध कर रहा ,कोई अधिकार का ,कोई अस्तित्व का । 


हथियार सबके भिन्न होते हैं... कुछ के इतने मारक के एक जीव समूह का विनाश करते ,कुछ परिवेश का और कुछ खुद के लिए भी घाती। घृणा ,क्रोध , प्रेम , सामंजस्य , अभद्रता और न जाने कैसे -कैसे हथियार ।


 अंदर युद्ध ,बाहर युद्ध ,जीवन वास्तव में सरल नहीं बल्कि एक रनक्षेत्र है। बाहर होने वाले युद्ध की भर्त्सना होती ,शान्ति के प्रयास होते। कुछ पक्ष ,कुछ विपक्ष में होते। किंतु अंदर के युद्ध ......उसका क्या ???

 

 क्या यह सम्भव नहीं कि अंदर के युद्ध जीत कर हम बाहर युद्ध की स्थिती ही न बनने दें । सम्भव क्या?????? असम्भव है....। जीवन एक समर है ,जहां धरती पर पहली सांस लेते ही शुरू हो जाते अंतहीन युद्ध.... जब तक आस है ,जब तक सांस है।