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सोमवार, 24 अक्तूबर 2022

स्वीकार करो माँ


 #पापियों के रक्त की अनन्त क्षुधा,

सम्मुख प्रस्तुत है ,एक जीव धरा,

देह है मेरी पाप से खण्डित ,

आत्मा बोध; निर्लज्ज और गलित।


हर एक बूंद में कई रक्तबीज है,

एक मरे तो उगते कई भीत से,

मैं अपने कर्म से हारी हूँ,

जग में मैं बोझ एक भारी हूँ।


ये कराल खप्पर मुंड धारी,

भक्षण हेतु त्वम आह्वायामि,

रक्त से मेरे पात्र भरो ,

क्षुधा को अपनी शांत करो तुम।


कर मुझ पापन के,

  रक्त के स्न्नान,

कर दो मेरी देह,

 धूनी समान।


दूर करो इस देह धर्म से,

जीवन को इस कर्म खण्ड से,

संग लो अपने ,देह तत्व में ,

ले लो आत्मा ,आत्म शरण में।


🙏🏻🙏🏻🚩🚩🙏🏻🙏🏻


स्वीकार करो माँ ....

#डॉ_मधूलिका_मिश्रा_त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2022

तेरा तुझको अर्पण


 कितनी व्याकुल हूँ , क्या आप अनुभव कर पाए हो। संभवत: हां, तब भी इतनी निःशब्दता ???? 

जानती हूँ ; बहुत मज़बूत हो । यूँ ही कृष्ण नहीं बोलती आपको। वो छलिया जो सबमें मोह जगाकर खुद योगीश्वर हो गया। 

पर उनका क्या दोष ना जो उससे प्रेम किये, उसके नेह बन्धन में रहे। उन्हें क्यों रुलाया ,खुद का समीप्य देकर।  यही सत्य है की ईश्वर सदा ईश्वर ही होता। वो मानवीय भाव जगाता ,ताकि मानव ;मानव रह सके, पर उन्हें योगी होना नहीं सिखाता ,ताकि वो बंधे रहें संसार से। 

प्रेम मार्ग कठिन है ,शायद इसीलिए कोई स्री राधा नहीं होना चाहती। सब खुद को मीरा बनाती ,क्योंकि मीरा बस बिना अपेक्षा के समर्पण का नाम है। मीरा तो मूर्ति में कृष्ण को जी ली। राधा साथ होकर तड़पी। 

अच्छा तो हम  उपालंभ क्यों दे रहे । अगर अपेक्षा हीन हुए तो ,तो निःशब्द सब क्यों नहीं देखते और स्वीकार करते।

क्योंकि भक्ति एकतरफा मार्ग है , एकात्म कर्म। भगवान भक्त की सुध रखे न रखे ,भक्त तो अपनी साधना करता। ठीक वैसे ही जैसे घर के मंदिर में रखी बाल गोपाल की मूर्ति की भूख , शयन ,शीत की फिक्र एक मातृभाव से करते हैं भक्त । जबकि ये भी ज्ञात कि अगर वो ईश्वर तो इनकी फिकर करने की जरूरत हम क्षुद्र मानवों के बस की बात नहीं। पर भक्ति ऐसी ही होगी ।

स्वयं की अनुभूति और विवेक अनुसार।

 प्रभु आप ईश्वर रहें। मैं मीरा का प्रारब्ध जी लूंगी। अपेक्षा रहित भक्ति कर सकूंगी तो सम्भवत: आपका देवत्व भी संतुष्ट रहेगा और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण भी बच जाएगा। पर अपनी भक्ति से मुझे रोकने का प्रयास ना करियेगा। क्योंकि ये मेरी आत्मिक कमज़ोरी पर ,मेरी क्षुद्र अपेक्षाओं पर, मेरे जीर्ण इंसानी भाव पर मुझे विजय दिलाती है , भगवान के प्रति मेरा समर्पण ,और समरूप संघर्ष । जिसके साक्षी सिर्फ आप हो मेरे कृष्ण ।

क्षमा करना ,ये अपेक्षा नहीं ,बस समर्पित भाव था। जो आपको मानव रूप में बांध रहा था। मेरी सोच का स्तर संकीर्ण ही सही पर उसमे सिर्फ आपके ही भाव प्रवाह में होते। 

बोलना जरूरी था क्योंकि भाव ही तो निर्माल्य है और निर्मल भी।

तेरा तुझको अर्पण।

सोमवार, 3 अक्तूबर 2022

प्रेम से अपेक्षा की उपेक्षा करो

 

उम्मीद का जन्म प्रेम से होता है, जबकि प्रेम की मृत्यु का कारण अधिकांशत : उम्मीद ही होती है। 


अक्सर हम जब जीवन में हर तरफ से निराश होते हैं ,अपना जीवन व्यर्थ लगता ,कोई अपना महसूस नहीं होता,हर कदम असफलता ....और हम स्वयं को इस असफलता से उबार नहीं पाते। इस स्थिति में अगर प्रेम एक इंसान के रूप में आकर हमें थाम लेता। जो जीवन व्यर्थ लगता था ,अब उससे मोह हो जाता। वो हमें अपनी असफलता को पचा कर सफलता के लिए विश्वास दिलाने लगता। हम उत्साह से भर जाते हैं।लगता है कोई है जिसे हमारे होने ,न होने,दुखी होने,खुश होने का फर्क पड़ता है। 

मीलों दूर होने पर भी हमारे दिलों दिमाग मे उसकी ही सोच हर वक़्त चलती। यहां तक तो सब ठीक होता...... पर जिस प्रेम ने हमें वापस उम्मीद दी थी,अब हम उस प्रेम से उम्मीद लगाने लगते हैं। ये उम्मीदें अपेक्षाओं को जन्म देती, अपेक्षा अधिकार की मांग रखती। और यहीं से हम प्रेम को बंधन देने लगते। कल तक जो मुक्त रूप से अबाध हमारे साथ था ,धीरे धीरे हम उसे कैद करने लगते अपेक्षा में,उम्मीदों के साथ। और तब शुरू  होता वो दौर जब हम हमारे प्रेम से टूटने लगते। क्योंकि जब शुरुआत थी ,तब सिर्फ प्रेम था ,सब खूबसूरत था। पर ज्यों ज्यों हम अपेक्षाएं करते ,उनके पूर्ण होने और टूटने की संभावना लगभग बराबर होती। 

जब अपेक्षा टूटती तब हम सोचने लगते की शायद सामने वाले का प्रेम कम हो गया। हम तब उसकी परिस्थितियों की बजाय अपनी अपेक्षाओं के वश हो जाते। 

रूठना मानने जैसे प्यारे एहसास से अधिक शंका घर करने लगती, मान मनउअल का दौर खत्म होने लगता और और दर्प सरल भाषा मे ईगो बीच आने लगता। प्रेम के बीच खाइयां पड़ने लगती, और धीरे धीरे विवाद और अबोला और अंत मे दो दिल प्रेम को कोसते हुए अलग हो जाते....।


वास्तव में अपेक्षा किसी के लिए बेड़ी बन सकता। हम प्रेम को बदल देते हैं पारस्परिक व्यवहार में । अपने अधिकार को एकाधिकार बना लेने की जद्दोजहद न फिर प्रेम बाकी रहने देता न ही उम्मीद।और अंततः प्रेम दम तोड़ देता।


अगर वाकई हमें अपने प्रेम को प्रेम रहने देना है तो कोशिश यही रहनी चाहिए कि जिस प्रेम ने आपको उम्मीद दी थी, आप उससे उम्मीद रूपी अपेक्षा से मुक्त रखें। 

अगर प्रेम विशुद्ध है  तो हर स्थिति में आपके साथ होगा ,और अगर नहीं तो अपेक्षा की बेड़ी उसे और तेज़ी से आपसे दूर कर देती।

परखने से अक्सर रिश्ते कमजोर होते हैं। तो बिना उम्मीद के प्रेम को जियें। 

#ब्रह्मनाद

लेखन प्रकृति है

 #लेखन_प्रकृति_है 

लेखन एक ऐसा सृजन है ,जो विशुद्ध रूप से प्रकृति होता है। इसे मूल प्रवृत्ति भी मान सकते और रूपक भी। जो वास्तविक लेखक होता उसे सिर्फ लिखने की भावना होती।जब भावना अपने प्रमाद में हों। जब कलम खुद ब खुद थिरकने लगे, तब शब्द जेहन से सीधे कागज़ में उतरने को मचलने लगते। लेखन का मूल भावना होती। जो लोगों के कहने पर ,लोकप्रियता के लिए ,पसन्द किये जाने के लिए ,लाइक या कमेंट की भूख के लिए लिखते वो वास्तव में लेखक नहीं होते..... वो तो व्यापारी होते। जो डिमांड ,सप्लाई और प्रॉफिट के सिद्धांत पर कलम का व्यापार करते। 

इस व्यापार से हटकर कुछ लिखते स्वान्त्य सुखाय। जब तक उनके अंदर का ज्वार उन्हें मजबूर न करे ,तब तक वो कमल नहीं उठाते। उठाते भी तो जरूरी नहीं व्व अपना लेखन दूसरों के सामने रखें। वो तो अपने लेखन को वैसे ही पोषते जैसे किसी नवजात शिशु को काला टीका लगा कर खुद निहारकर मुस्कुराना। उस शिशु को हम लोगों को दिखाने का प्रयास नहीं करते। पर उस पर कैसी नजर पड़ रही उसका प्रभाव हमारे मन पर भी पड़ता।

लेखन एक चांद की तरह भी है, जो आकाश में अपनी ज्योत्स्ना के लिए उगता। क्या फर्क पड़ता कोई उसे पूरे वक़्त निहार रहा ,या कोई उसकी पूजा कर रहा ,या कोई उसे रात्रि का संकेत मानकर सोने चला जाता। कोई उसे प्रेमिका या प्रेमी के रूपक में निहारता। किसी के लिए विरह ,किसी के लिए मिलन का साक्षी बनाया जाता। कुछ गुनाह भी उसी के तले होते। 

चांद तो बस चांद है।कोई उसे क्या समझे, क्या माने,कोई देखे न देखे , इससे चांद फर्क नहीं पड़ता। इस चांद के उजले और स्याह पक्ष भी होते। उजले में जहां लोग उसे देखते ,पूजते,वहीं स्याह पक्ष में उससे पूरे बेखबर हो जाते। जैसे एक लेखक की ऐसी भावना जो वो लोगों के सामने कभी नहीं लाना चाहता।तब अपने ही एक सुरक्षित दायरे में बस खुद के प्रमाद को अभिव्यक्ति देता। उसके दुख ,तकलीफ बस अपने तक सीमित रख। 

ठीक वैसे जैसे चांद की रोशनी में दुनिया खिल जाती,पर अंधेरा सिर्फ व्व अपने पास रखता। उसकी रोशनी सर किसे क्या महसूस हो रहा ,क्या उपयोग हो रहा ,इससे भी चांद निर्लिप्त रहता है।।


लेखन को मिट्टी भी समझ सकते।जिसमें भावनाओं की फसलें बोई जाती हैं। हर मौसम की अलग फसल ,वैसे ही मनोस्थिति अनुसार भाव अनुरूप लेखन भी भिन्न। 


किसी अन्य उदाहरण की बात करें तो लेखन फूल की खुश्बू की तरह भी है। हर एक फूल की एक अलग खुश्बू.... किसी को मादक अच्छी लगती,किसी को सात्विक ,किसी को तीखी ,किसी को हल्की। पर पसन्द करने वाले के लिए फूल अपनी ख़ुशबू नहीं बदल देते।लेखन का कलेवर भी वही होता। असली लेखक पसन्द करने वालों के हिसाब से नहीं बल्कि अपनी नैसर्गिकता से खुश्बू लिए लिखता। किसी को क्या पसंद इससे उसे फर्क नहीं। 


लेखक अपने आप में एक स्वतंत्रता को जीता। जैसे प्रकृति स्वयं में पूर्ण और स्वतंत्र होती। उसके संसाधन को कौन किस तरफ से उपभोग करता इससे उसे फर्क नहीं पड़ता। उसका तो उद्देश्य परिपूर्ण रहना है। 

लेखन अपनी सहज स्थिति में  उत्कृष्ट सृजन होता है। जैसे स्वयं में एक ब्रम्हांड रच देना। जिसमे जीवन भी होता,मृत्यु भी, भय भी, भूख भी ,खुशी भी। अपेक्षा के बोझ तले हुए लेखन की यही सम्पूर्णता खत्म हो जाती ,क्योंकि उसे विशिष्ट भाव मे ढाला जाता। ऐसे में उसका विस्तार सिमट जाता ,सृजन तब व्यापार बन अपनी मूल प्रकृति को ही खो देता।और इस स्थिति में लेखक का लेखन -लेखन न होकर मजदूरी और मजबूरी बन जाता। 

और प्रकृति कभी मजबूर नहीं होती।उसकी ताकत उसकी नैसर्गिकता ही होती। और जो नैसर्गिक नहीं  वो बदलाव के साथ धीरे धीरे खत्म हो जाती।