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सोमवार, 9 अगस्त 2021

मोह और मसान

  


किसी की मृत्यु का अवसर; अक्सर मुझमें प्रश्नोत्तरी की लंबी श्रृंखला को उभार ही  देता है। जीवन के सत्य और तत्व को लेकर ताने बाने मस्तिष्क में उलझने लगते। कई प्रश्न अचानक ही समुद्र की ऊंची लहरों से उमड़ने लगते हैं। पर जवाब क्या होगा…. ये अज्ञात….। स्वयं में ही उलझे हुए ,स्वयं को  अपने ही तर्कों  से शांत करना कभी कभी खुद को छलने जैसा लगता। बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी भूखे बच्चे की माँ ,पतीले पर पानी छनकाते हुए खाना बनाने का स्वांग रचते हुए ,बच्चों के सोने की प्रार्थना करती। कुछ यूं होता अपने प्रश्न और अपने ही जवाब का। 


श्मशान में किसी चिता को जलाने का कर्म करने वाले इंसान को स्थिर रूप से सारी कर्म करते हुए देखकर मैं सोचने लग जाती हूँ,कि क्या इसके लिए मृत्यु को स्वीकार करना सिर्फ इसका काम??? क्या इसकी मनोस्थिति विचलित नहीं होती होगी?? क्या अपने किसी परिचित ,आत्मीय या पारिवारिक व्यक्ति की मृत्यु में भी इतना ही स्थिर व्यवहार रख पाता होगा। क्या इसके लिए मोह का भाव उतना प्रबल होता होगा ,जितना आम इंसान के लिए। 


बनारस में मणिकर्णिका जैसे  घाट पर लगातार जलती चिताओं के बीच अपने कर्म को पूर्ण करने वाले क्या मोह और सत्य के अंतर को सहज स्वीकार कर पाते होंगे??? वो मोक्ष की कामना से खुश होते होंगे या अपने के जाने के मोह से ग्रसित होकर दुख मनाते होंगे?????


कभी कभी लगता कि मोह ,मोक्ष से भी प्रबल वांछना है। सम्भवतः सन्सार को निश्चित गति  में चलने के लिए इसका होना अनिवार्य। हम खुद को स्थिरप्रज्ञ मानते हुए इससे दूर या निरपेक्ष होने के विचार को मानने और प्रसार के लिए प्रयासरत होते। किन्तु क्या बिना मोह के संसार सम्भव?????


हम शिव को भव बंधन से मुक्ति का मार्ग मानते ,पर ज्ञात ही है कि वही शिव ;सती की मृत देह को मोहवश लेकर फिरते रहे। सन्तुलन के ईश्वर साक्षात शिव… क्या इतने कमजोर थे कि सती की देह को सत्य मान लिए थे?????? इसका जवाब भी मुझे मोह ही लगता ,उनका सन्देश हो सकता यही रहा हो कि जीव के लिए मोह ,मोक्ष से भी पहले अनिवार्य। ताकि जीवन स्वांग न लगे। ताकि उसे जीने के लिए कारण बचे रहें। अगर मृत्यु सत्य तो जीवन का औचित्य क्या था…. किसी औचित्य को समझाने और उससे जुड़े रहने का भाव ही मोह के रूप में उभरता। 

शिव की इन लीलाओं को गूढ़ता से मनन करेंगे तो अर्थ स्पष्ट होगा कि मोह और जीवन -मोक्ष और मृत्यु के समानांतर और अनिवार्य भाव है। उसे नकारना समानान्तर सत्य को नकारने जैसे होगा। 

तो मोह को भी विशुद्ध रूप में स्वीकारें, जियें। जीवन  और जीवन के बाद भी अपने लिए,अपनों के लिए; मोह को मोक्ष से पहले सहज स्थान देना शुरू कर दीजिए। मोह कमजोरी नहीं ,जीवन का सबसे प्रबल भाव है। 

शिव और शव के बीच की कड़ी ;#मोह। 

✍️ डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद


बचपन को सच दिखाइए

 कहते हैं ,जीवन की नींव बचपन में ही पड़ जाती।हमें  बच्चे के व्यक्तित्व को किस रूप में ढालना ये उस पर निर्भर करता कि हम उसे क्या सिखाते। हम बच्चों के लिए उस पड़ाव में हद से ज्यादा रक्षात्मक हो जाते। कोई भी नकारात्मक विचार से उसे दूर रखने का प्रयास करते। कोई भी घटना जो हमें लगता कि  बच्चों के मन में प्रश्न जगा सकती,उससे दूर रखने का प्रयास करते। शारीरिक रूप से भी उसे कोई चोट न पहुंचे इसके लिए हम जरूरत से पहले ही मौजूद रहते। भूख -प्यास महसूस न हो इसका इंतज़ाम भी यथासंभव करते। परी कथाओं को सुनाकर उसे सुनहरे सपने और एक खूबसूरत दुनिया दिखाते। अक्सर  सफलता की होड़ में अग्रणी होने पर सफल बताते,और ये प्रयास भविष्य में भी उसे आगे और सफल रखेंगे ,ये समझाते रहते। 

कुल मिलाकर एक सुनहरा सा दायरा बना देते हैं जिसमें सच्चाई कम ,अपेक्षा ज्यादा होती। पर आज अगर मैं आपको कहूँ कि आप ऐसा करके एक इंसान को कमज़ोर बना रहे तो शायद आपको मुझ पर ही हंसी आएगी। 


फर्ज़ करिये एक बच्ची थी,बेहद कुशाग्र ,हर दिल अजीज़, हर काम में बेहतरीन, हँसमुख ,हर जगह महत्व पाने वाली। उसे सिखाया गया कि जीवन ऐसा ही होगा।तुम्हारी शर्तों पर जी सकोगी। हमेशा इन खूबियों के साथ वो छाई रहेगी,अपने सुनहरे दायरों में। एक वक्त तक उसे सब सच लगा। अपनी खूबियों ,सपनों से उसे प्यार था। उसका होना उसे कुदरत का उपहार लगता। को बड़ी हुई ,उसका विवाह हो गया।  सुनहरी दुनिया रंग बदलने लगी थी। उसकी खूबियों में पहले जहां उसकी वाहवाही होती थी,अब वो दम तोड़ने लगी थी। उनके लिए ही उसे ताने मिलते, जो उसे उसकी ताकत लगते थे।उसके सपनों को समर्पण का जामा पहनाने की अपेक्षा और कवायद हुई। उसके होने का मतलब ,सिर्फ दूसरों की इच्छा अनुसार ढलना। उसे समझ आया कि कल जिन बातों को लेकर उसे बताया गया कि ये तुम्हें सफलता की सीढ़ी है,वो अर्थहीन है। उसके सपने ,उसकी महत्वाकांक्षा ही आज उसका दम घोंट रहे थे। उसे अब लगने लगा कि काश उसकी आँखों में इतने बड़े सपने न डाले जाते,उसे ये न बताया जाता कि वो विशेष है। काश उसे बेहद आम बताया जाता ,उसे बोला जाता कि जीवन संघर्षों के नाम है।उसे  बताया जाता,की कर्म नहीं ,भाग्य ही प्रबल होता। जो उसकी विशेषता ,वो कोई गुण नहीं ,बल्कि सिर्फ विधा है। उसे ये ना बताया जाता कि तुम्हें कुछ विशेष करना है… काश उसे बताया जाता कि आम सा जीवन होना ही सच है। जिसमें कोई उद्देश्य नहीं हो सिर्फ एक नियमित दिनचर्या के अलावा। ऐसी स्थिति में वो ऐसी टूटी कि जिंदगी से ही उसका मोह भंग हो गया। 

वास्तव में जीवन का सच हमें बचपन से ही बताना चाहिए। बताना चाहिए कि हर कदम श्रेष्ठ होने पर भी जीवन मे सफल हो जाओ ये जरूरी नहीं। कोई लूज़र माना जाने वाला इंसान भी तुमसे बेहतर जिंदगी जी या साबित  हो सकता। बताना चाहिए कि तुम इतने भी विशेष नहीं ,तुम आम से इंसान हो ,जो कई अरबों में एक हो। हमेशा सपनों में मत रहो, एक आम सी दिनचर्या भी जिंदगी होती। हर वक़्त मत हाज़िर कर दीजिये उनके पंसद का खाना,तेज़ भूख महसूस होने दीजिए,प्यास महसूस होने दीजिए। उनकी मर्ज़ी मत चलने दीजिये,उन्हें  समझौते सिखाइये। रोने पर हमेशा अपना कंधा मत दीजिये ,बताइये की खुद चुप होना सीखना होगा। कहीं चोट लगने की स्थिति में आप आगे मत आइये, लगने दीजिये उसे चोट,ताकि कल वो किसी के भरोसे खुद को सम्हालने की कोशिश न करें। उसे परियों की कथाएं नहीं,असली जिंदगी की कहानियां बताइये। जिसमें दुःख हों,तकलीफ हों,बीमारी हो ,भूख हो। समाज से मिले तिरस्कार हो,जिनमें मृत्यु का भी जिक्र हो। ताकि कल जब उसे अपेक्षित कल न मिल पाए तो वो टूटे नहीं। बल्कि सहज ही असफलता को भी स्वीकार कर जीता रहे। उसे बताइये की हर कहानी का अंत सुखद नहीं होता,कुछ में त्रासदी भी होती। जिस दिन ये सब सीख लेंगे,जान जाएंगे यकीन मानिए,आतमघात की प्रवृत्ति खत्म हो जाएगी। 

क्योंकि तब उन्हें पता होगा #life_is_not_a_bed_of_roses…. तब कांटे उन्हें जीवन का अंग लगेगें। आखिर सुख से ज्यादा जीवन दुख ही देता। 

✍️डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रम्हनाद