जीवन की सर्वाधिक मनोहर अनुभूतियाँ कभी स्थाई नहीं होती । वो तो क्षणभर के लिए हमारे अस्तित्व को आलोकित करती हैं,हृदय के सूने प्रांगण में संवेदनाओं के पुष्प खिलाती हैं,और फिर समय की धारा में विलीन हो जाती हैं।
उनका अल्पकालिक होना ही उनके सौंदर्य का शाश्वत कारण है।जो सदा उपलब्ध रहे, वह सुविधा तो बन सकता है,पर विस्मय नहीं।जो प्रतिक्षण साथ रहे, वह आदत तो बन सकता है,पर प्रतीक्षा नहीं.........और जहाँ प्रतीक्षा नहीं, वहाँ मिलन की अभीष्ट आशा भी कहाँ?
सोचिए....यदि आकाश हर दिन अविरल वर्षा से भरा रहे!!!!!तो मेघों का संगीत भी एकरस प्रतीत होगा।धरती की प्यास तो समाप्त हो जाएगी, किंतु वर्षा का आकर्षण भी उसी के साथ विलुप्त हो जाएगा।परंतु जब वही वर्षा दीर्घकालीन तपन के पश्चात् धरती पर उतरती है तो केवल मिट्टी ही सौंधी नहीं महकती बल्कि मनुष्य की आत्मा भी तृप्ति की सुगंध से भर उठती है।यदि रात्रि में गहन तम का अस्तित्व न हो, तो प्रभात का स्वर्णिम धवल आलोक भी साधारण प्रतीत होगा।यदि वियोग का अनुभव न हो,तो मिलन की ऊष्मा अपना अर्थ खो देगी।यदि संघर्ष न हो,तो विजय का गौरव केवल एक घटना बनकर रह जाएगा, अनुभूति नहीं।
जीवन का परम आनंद प्रत्येक वस्तु को प्राप्त कर लेने में नहीं,अपितु उसके सीमित स्पर्श में निहित है।क्योंकि जो सहज ही प्राप्त हो जाए, उसका मूल्य धीरे-धीरे स्मृति से लुप्त हो जाता है; और जो कठिन प्रतीक्षा के पश्चात् मिले, वह साधारण होकर भी असाधारण बन जाता है।
माता का एक मौन स्नेहिल स्पर्श , पिता द्वारा काँधे पर रखा एक विश्वासपूर्ण हाथ, गुरु की एक प्रशंसापूर्ण दृष्टि, मित्र का कठिन समय में दिया गया साथ, संतान की निश्छल और मासूम मुस्कान,या किसी प्रियजन के साथ बिताया गया कुछ क्षणों का मौन... ये सब समय की दृष्टि से छोटे हो सकते हैं, किन्तु अनुभवों की दृष्टि से अनंत होते हैं।
इसी प्रकार स्वतंत्रता भी असीम होने पर उच्छृंखलता बन जाती है,धन असीम होने पर तृष्णा को जन्म देता है,और अधिकार असीम होने पर अहंकार का कारण बनता है।
इसलिए प्रकृति ने भी हर सौंदर्य को मर्यादा में बाँधा है।नदी अपने तटों के के सीमाओं के भीतर सुंदर है...... वीणा अपने तारों के संयम से मधुर है..…...और मनुष्य अपने संस्कारों की सीमाओं से गरिमामय है।
अपूर्णता कोई अभिशाप नहीं,वह तो ईश्वर का दिया हुआ वह रिक्त स्थान है,जहाँ आशा जन्म लेती है..... प्रयास आकार ग्रहण करता है ......
और जीवन निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा पाता है।
पूर्णता तृप्ति दे सकती है, पर गति नहीं। अपूर्णता पीड़ा दे सकती है, पर संभावना और प्रयास को दिशा भी वही देती है।और संभवतः इसी कारण ईश्वर ने इस सृष्टि को पूर्ण नहीं बनाया,जिससे मनुष्य खोजता रहे, सीखता रहे, आशाएँ करता रहे , प्रेम करता रहे, प्रतीक्षा करता रहे और जीता रहे।
जीवन का वास्तविक सौंदर्य इस तथ्य में नहीं कि हमारे पास कितना है,अपितु इस अनुभूति में है कि जो कुछ मिला, उसे हमने कितनी गहरी अनुभूति से जिया।
#ब्रह्मनाद
#डॉ_मधूलिका
