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शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

डायटिंग Vs भुखमरी


 


हर भूख का अपना अलग सिद्धांत होता है।

एक भूख शरीर को सुंदर बनाने के लिए स्वेच्छा से चुनी जाती है, दूसरी भूख जीवन बचाने की विवशता बन जाती है। यही हमारी सभ्यता की सबसे गहरी और सबसे दर्दनाक विडंबनाओं में से एक है।

एक ओर वे लोग हैं जो वजन घटाने के लिए हजारों रुपये खर्च करते हैं। महंगे डाइट प्लान, विदेशी फल, ऑर्गेनिक भोजन, न्यूट्रिशनिस्ट और डायटीशियन की फीस... सब कुछ इसलिए कि पेट कम भरे। दूसरी ओर वे लोग हैं जिनकी पूरी दिनचर्या केवल इस प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमती है कि ........आज कुछ खाने को मिलेगा भी या नहीं? अमीर की थाली में कैलोरी गिनी जाती है,गरीब की थाली में रोटियाँ।

संपन्न व्यक्ति कहता है, "आज सिर्फ सलाद, फल या पनीर खाऊँगा।" उधर एक गरीब पिता सोचता है ......शाम को बच्चों के लिए एक वक्त का भोजन जुटा पाएगा या नहीं, और एक मासूम बच्चा मन ही मन दुआ करता है, काश... आज एक सूखी रोटी ही मिल जाए।

एक अमीर जिम में पसीना बहाकर चर्बी घटाता है, जबकि गरीब तपती धूप में मजदूरी करके पसीना बहाता है ताकि उसके घर का चूल्हा जल सके।एक ने भूख को #जीवनशैली बना लिया है,दूसरा भूख को #नियति की तरह ढो रहा है।

समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जिसे भोजन सहज उपलब्ध है, वह उससे बचने के उपाय खोज रहा है, और जिसे भोजन की सबसे अधिक आवश्यकता है, वह उसे पाने के लिए पूरी उम्र संघर्ष करता रहता है।

भूख जब शौक बन जाती है तो उसका नाम "डाइटिंग" रख दिया जाता है, और जब वही भूख विवशता बन जाती है तो उसे "गरीबी" कहा जाता है।

इतिहास गवाह है कि कई बार भुखमरी इंसान की पीड़ा से अधिक, दुनिया की संवेदनहीनता का दस्तावेज़ बन जाती है। भूख से तड़पते, जीवन और मृत्यु के बीच झूलते किसी बच्चे के पास मंडराते गिद्ध की तस्वीर पूरी दुनिया में प्रतिष्ठित पुरस्कार जीत लेती है। वह तस्वीर अखबारों की सुर्खियाँ बनती है....... आर्ट गैलरी में प्रदर्शनियों की शोभा बढ़ाती है...... उस पर लेख लिखे जाते हैं..... संगोष्ठियाँ होती हैं....... मानवता पर लंबे-लंबे भाषण दिए जाते हैं। लोग उसी तस्वीर के सहारे अपनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन भी कर देते हैं।

लेकिन विडंबना देखिए...तस्वीर अमर हो जाती है।पुरस्कार मिल जाते हैं।लेखकों की कलम चलती रहती है।दर्शकों की आँखें कुछ पल के लिए नम हो जाती हैं........ बस उस बच्चे की भूख वहीं की वहीं रह जाती है।तस्वीर संग्रहालयों तक पहुँच जाती है.........लेकिन रोटी उस बच्चे तक नहीं पहुँचती।

शायद हमारी सबसे बड़ी त्रासदी भूख नहीं, बल्कि वह संवेदना है जो शब्दों तक तो पहुँचती है, कर्म तक नहीं। हम पीड़ा को दूर करने से अधिक, उसका वर्णन करने में दक्ष हो गए हैं। भूख को समाप्त करने से अधिक, उसे चित्रों, लेखों और विमर्शों में सहेजने लगे हैं।

जिस दिन किसी भूखे बच्चे की तस्वीर पुरस्कार जीतने के बजाय उसकी थाली भरने का कारण बनेगी, शायद उसी दिन मानवता अपने वास्तविक अर्थ को प्राप्त करेगी।क्योंकि भूख का समाधान शब्दों से नहीं, रोटी से होता है।जब तक किसी भूखे की थाली में भोजन नहीं पहुँचता, तब तक हमारी सारी संवेदनाएँ, सारे भाषण और सारे पुरस्कार अधूरे हैं।

# डॉ_मधूलिका

#ब्रह्मनाद

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

अपूर्णता का सौंदर्य


 


जीवन की सर्वाधिक मनोहर अनुभूतियाँ कभी स्थाई नहीं होती । वो तो क्षणभर के लिए हमारे अस्तित्व को आलोकित करती हैं,हृदय के सूने प्रांगण में संवेदनाओं के पुष्प खिलाती हैं,और फिर समय की धारा में विलीन हो जाती हैं।


उनका अल्पकालिक होना ही उनके सौंदर्य का शाश्वत कारण है।जो सदा उपलब्ध रहे, वह सुविधा तो बन सकता है,पर विस्मय नहीं।जो प्रतिक्षण साथ रहे, वह आदत तो बन सकता है,पर प्रतीक्षा नहीं.........और जहाँ प्रतीक्षा नहीं, वहाँ मिलन की अभीष्ट आशा भी कहाँ?


सोचिए....यदि आकाश हर दिन अविरल वर्षा से भरा रहे!!!!!तो मेघों का संगीत भी एकरस प्रतीत होगा।धरती की प्यास तो समाप्त हो जाएगी, किंतु वर्षा का आकर्षण भी उसी के साथ विलुप्त हो जाएगा।परंतु जब वही वर्षा दीर्घकालीन तपन के पश्चात् धरती पर उतरती है तो केवल मिट्टी ही सौंधी नहीं महकती बल्कि मनुष्य की आत्मा भी तृप्ति की सुगंध से भर उठती है।यदि रात्रि में गहन तम का अस्तित्व न हो, तो प्रभात का स्वर्णिम धवल आलोक भी साधारण प्रतीत होगा।यदि वियोग का अनुभव न हो,तो मिलन की ऊष्मा अपना अर्थ खो देगी।यदि संघर्ष न हो,तो विजय का गौरव केवल एक घटना बनकर रह जाएगा, अनुभूति नहीं।


जीवन का परम आनंद प्रत्येक वस्तु को प्राप्त कर लेने में नहीं,अपितु उसके सीमित स्पर्श में निहित है।क्योंकि जो सहज ही प्राप्त हो जाए, उसका मूल्य धीरे-धीरे स्मृति से लुप्त हो जाता है; और जो कठिन प्रतीक्षा के पश्चात् मिले, वह साधारण होकर भी असाधारण बन जाता है।


माता का एक मौन स्नेहिल स्पर्श , पिता द्वारा काँधे पर रखा एक विश्वासपूर्ण हाथ, गुरु की एक प्रशंसापूर्ण दृष्टि, मित्र का कठिन समय में दिया गया साथ, संतान की निश्छल और मासूम मुस्कान,या किसी प्रियजन के साथ बिताया गया कुछ क्षणों का मौन... ये सब समय की दृष्टि से छोटे हो सकते हैं, किन्तु अनुभवों की दृष्टि से अनंत होते हैं।


इसी प्रकार स्वतंत्रता भी असीम होने पर उच्छृंखलता बन जाती है,धन असीम होने पर तृष्णा को जन्म देता है,और अधिकार असीम होने पर अहंकार का कारण बनता है।

इसलिए प्रकृति ने भी हर सौंदर्य को मर्यादा में बाँधा है।नदी अपने तटों के के सीमाओं के भीतर सुंदर है...... वीणा अपने तारों के संयम से मधुर है..…...और मनुष्य अपने संस्कारों की सीमाओं से गरिमामय है।


अपूर्णता कोई अभिशाप नहीं,वह तो ईश्वर का दिया हुआ वह रिक्त स्थान है,जहाँ आशा जन्म लेती है..... प्रयास आकार ग्रहण करता है ......

और जीवन निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा पाता है।


पूर्णता तृप्ति दे सकती है, पर गति नहीं। अपूर्णता पीड़ा दे सकती है, पर संभावना और प्रयास को दिशा भी वही देती है।और संभवतः इसी कारण ईश्वर ने इस सृष्टि को पूर्ण नहीं बनाया,जिससे मनुष्य खोजता रहे, सीखता रहे, आशाएँ करता रहे , प्रेम करता रहे, प्रतीक्षा करता रहे और जीता रहे।


जीवन का वास्तविक सौंदर्य इस तथ्य में नहीं कि हमारे पास कितना है,अपितु इस अनुभूति में है कि जो कुछ मिला, उसे हमने कितनी गहरी अनुभूति से जिया।


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका