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रविवार, 31 मई 2026

Happy birthday Papa


 जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ पापा, ❤️

बचपन में हमने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि आपका जन्मदिन कब आता है। न कभी केक काटा गया, न कोई विशेष उत्सव हुआ। शायद उस दौर में जीवन की प्राथमिकताएँ कुछ और थीं। जब हर दिन संघर्षों से भरा हो, जब परिवार की ज़रूरतें पूरी करना ही सबसे बड़ा लक्ष्य हो, तब अपने जन्मदिन को याद रखना और उसे मनाना भी एक विलासिता जैसा ही लगता होगा।

हालांकि जब हमारी कुछ चेतना जागृत हुई तब आपके और मां के जन्मदिन की तारीख पता किया ,जो शायद आप लोग खुद भूल चुके थे। आपको विश करने और बहुत छोटे उपहार के साथ शुरुआत हुई... और फिर आपको भी अपने जन्मदिन में हमारी शुभकामना का इंतजार रहने लगा। 


आज सोचती हूँ कि आपने कितनी कठिन राहों पर चलकर अपना जीवन बनाया। अपने हिस्से की कितनी इच्छाएँ, कितने सपने और कितनी खुशियाँ त्यागकर हमारे लिए साधन और सुविधाएँ जुटाईं। उस समय हम शायद यह सब समझने की उम्र में नहीं थे।

सब कहते हैं कि मैं बचपन में आपकी सबसे अधिक लाड़ली थी। मेरी एक छोटी-सी उदासी भी आपको बेचैन कर देती थी। मैं रोती थी तो आप मुझे चुप कराने के लिए पूरा घर सिर पर उठा लेते थे। अब सोचती हूँ कि माँ सचमुच बहुत धैर्यवान थीं, वरना मेरी शरारतों और आपके अत्यधिक दुलार से परेशान होकर कभी भी मायके का टिकट कटवा सकती थीं। 😊


समय के साथ हम बड़े हुए और कुछ दूरियाँ भी आ गईं। उस समय आपकी सावधानियाँ, आपकी चिंताएँ और आपकी रोक-टोक हमें पीढ़ियों का अंतर लगती थीं। लेकिन आज समझ आता है कि वह अंतर नहीं था, वह आपके प्रेम का दूसरा रूप था। शायद जिन अभावों और असुरक्षाओं से आप स्वयं गुज़रे, आपने ठान लिया था कि आपके बच्चों को उनका सामना न करना पड़े। आप हमारे चारों ओर एक सुरक्षा कवच बुनना चाहते थे और हम उसे बंधन समझ बैठते थे।

जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक समय होता है। आज जब स्वयं एक बच्चे के जीवन की ज़िम्मेदारी हमारे हाथों में है, तब आपकी हर चिंता, हर सावधानी और हर निर्णय का अर्थ पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो गया है। अब समझ आता है कि माता-पिता अपने बच्चों के जीवन में आने वाली छोटी-से-छोटी पीड़ा को भी स्वयं पर लेना चाहते हैं।

बहुत-सी बातें हैं जो शायद मैं कभी आपसे सीधे नहीं कह पाऊँगी। लेकिन जब भी जीवन की राह में पीछे मुड़कर देखती हूँ, आपकी अनगिनत त्यागपूर्ण छवियाँ मन को भर देती हैं। हम शायद कभी शब्दों में व्यक्त न कर पाएँ कि आपने हमारे लिए कितना कुछ किया। पर अन्वू के जीवन में आने के बाद यह अनुभूति और गहरी हो गई है कि इस संसार में माता-पिता जैसा निस्वार्थ त्याग कोई नहीं कर सकता।

माँ अपने प्रेम को आँसुओं, स्पर्श और आलिंगन से व्यक्त कर देती है, लेकिन पिता अक्सर मौन रहते हैं। वे अपनी इच्छाओं को पीछे रखकर, अपने सपनों को टालकर, बच्चों की ज़रूरतों और खुशियों को पूरा करते हैं। माँ जीवन की धरती बनती है, तो पिता उस आकाश की तरह होते हैं जिसकी छाया हर परिस्थिति में हमारे साथ रहती है।

पापा, आज आपको देखकर एक और बात मन को बहुत छूती है। आपने घर में आई बहू को कभी परंपराओं और रूढ़ियों की सीमाओं में बाँधने की कोशिश नहीं की। जिस अपनत्व, सम्मान और खुले दिल से आप उसे बेटी की तरह स्वीकार कर रहे हैं, वही सच्चे पितृत्व की पहचान है। पिता केवल जन्म देने वाले नहीं होते, वे वह व्यक्ति होते हैं जो हर बच्चे को सुरक्षा, सम्मान और स्नेह देना जानते हैं। आपके लिए रिश्तों का आधार अधिकार नहीं, अपनापन है। यही आपकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।

समय के साथ परिवार बड़ा हुआ है। आपके स्नेह के हिस्सेदार भी बढ़े हैं। लेकिन आश्चर्य यह है कि आपका प्रेम कभी बँटा नहीं, बल्कि हर नए रिश्ते के साथ और विस्तृत होता गया। जैसे दीपक से कई दीप जल जाएँ और फिर भी उसकी लौ कम न हो, वैसे ही आपका स्नेह हर नए सदस्य के साथ और उज्ज्वल होता गया है।

आज आपके जन्मदिन पर ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि आपके जीवन के सभी अधूरे सपने पूरे हों। आपको उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और लंबी आयु प्राप्त हो। आने वाले वर्षों में आप वही सम्मान, प्रेम और संतोष अनुभव करें जिसके आप सच्चे अधिकारी हैं।

मुझे आपके संघर्षों पर, आपके साहस पर और सबसे अधिक आपके विशाल हृदय पर गर्व है।

जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ पापा। 🤗❤️🎂

आपकी गुड़िया 

#ब्रह्मनाद

#डॉ_मधूलिका 

गुरुवार, 28 मई 2026

मोह और आध्यात्मिकता


              (छायाचित्र : गूगल से साभार)



मनुष्य सदैव दो दिशाओं के बीच खड़ा रहा है।एक दिशा उसे संसार की ओर खींचती है, जहाँ संबंध हैं, इच्छाएँ हैं, उपलब्धियों का आकर्षण है और स्वयं को सिद्ध करने की अंतहीन आकांक्षा है। वहीं दूसरी दिशा अंतस की गहराई की ओर ले जाती है, जहाँ मौन है.....उत्तर की प्रत्याशा में जन्मते प्रश्न हैं....और उस सत्य की खोज है जो परिवर्तन से परे है।इन्हीं दोनों के मध्य खड़ा मनुष्य अक्सर पूछता है....क्या आध्यात्मिकता भी मोह है?

यदि गहराई से देखा जाए, तो मोह केवल किसी व्यक्ति, वस्तु या सुख से जुड़ाव नहीं है। मोह वह सूक्ष्म आग्रह है, जिसमें मन स्वयं को स्थायी देखना चाहता है।वह हर उस चीज़ को पकड़ लेना चाहता है जो क्षणभंगुर है।यही कारण है कि कभी मनुष्य के रूप में हम धन में अमरत्व खोजते हैं.... कभी प्रेम में...... कभी संबंधों में .....कभी यश में और अंततः ईश्वर में। किंतु आध्यात्मिकता तब मोह बन जाती है, जब वह केवल भय से उपजी हुई हो।जब हम मृत्यु से डरकर, अकेलेपन से ऊबकर या चुनौतियों से हारकर ईश्वर की शरण में जाते हैं , तब साधना भी एक प्रकार का अवलंबन मात्र रह जाती है।हम मुक्ति नहीं चाहते, केवल अपने टूटते हुए अस्तित्व को बचाना चाहते हैं।और ऐसी अवस्था में ध्यान, पूजा, व्रत और तप भी भीतर के भय को ढकने का माध्यम बन जाते हैं।

परंतु वास्तविक आध्यात्मिकता वहाँ आरंभ होती है, जहाँ पकड़ समाप्त होने लगती है। जहाँ हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि जीवन परिवर्तनशील है........शरीर नश्वर है.....संबंध अस्थायी हैं और समय किसी के लिए नहीं रुकता।इसी स्वीकृति के बाद जो शांति जन्म लेती है, वही अध्यात्म है।

आध्यात्मिकता संसार से भागना नहीं है।यह संसार को उसके वास्तविक रूप में देख पाने की क्षमता है। यह वह दृष्टि है, जिसमें मनुष्य प्रेम करता है, पर स्वामित्व नहीं चाहता.....कर्तव्य निभाता है, पर अहंकार नहीं पालता.......संबंधों में रहता है, पर उनमें स्वयं को नहीं खोता....... स्वयं के अंदर की यात्रा करता है,पर स्थायित्व नहीं खोता ।  

मोह बाँधता है, जबकि अध्यात्म मुक्त करता है।मोह कहता है ,“यह मेरा है।”अध्यात्म कहता है कि “कुछ भी स्थायी नहीं, क्षण भंगुर है ....फिर भी सब सुंदर है।“ क्योंकि सुंदरता जड़ता में नहीं, अनुभव में बसती है।जीवन भी निरंतर बदलता रहता है,फिर भी हर क्षण अपने भीतर एक अनमोल अर्थ और सौंदर्य समेटे होता है।

हमारा सबसे बड़ा भ्रम यह है कि नश्वर होकर भी अनश्वर होने का स्वप्न देखते हैं ।मिट्टी से बने होकर भी समय को चुनौती देना चाहते हैं ।शायद इसी कारण हम चमत्कारों में सत्य से ज्यादा विश्वास करना चाहते हैं.... विज्ञान में अमरता खोजते हैं, कभी स्मृतियों में और कभी ईश्वर में।

वास्तव में सत्य यह है कि आध्यात्मिकता अमरत्व की चेष्टा करने की नहीं, बल्कि नश्वरता को शांत मन से स्वीकार कर लेने की कला है। और जब यह स्वीकृति आ जाती है, तब मोह धीरे-धीरे विलीन होने लगता है और भीतर एक गहरा, निर्मल मौन जन्म लेता है। 


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका

मंगलवार, 19 मई 2026

प्रेम : मृत्यु अंत नहीं

 


(छायाचित्र : गूगल से साभार ) 

मृत्यु को मैंने कभी पूर्ण विराम की तरह नहीं देखा।वह मुझे सदैव एक दीर्घ, मौन और थके हुए जीवन का अंतिम विश्राम प्रतीत हुई है।जब कोई मनुष्य भीतर ही भीतर अनगिनत संघर्षों से गुजर चुका होता है,जब उसकी मुस्कान केवल संसार को आश्वस्त करने का माध्यम रह जाती है,

और जब जीवन का बोझ आत्मा तक उतर आता है,तब शायद मृत्यु उसे भय नहीं, अपितु शांति जैसी लगती होगी।मृत्यु ;कई वेदनाओं का अंत है ,जो कि जीवन में कतई संभव नहीं होता। 

सामान्यतः कहा जाता है कि मृत्यु सब कुछ समाप्त कर देती है,परंतु सत्य तो यह है कि कुछ संबंध कभी समाप्त नहीं होते।वे देह की सीमाओं से परे जाकर स्मृतियों में बस जाते हैं।

किसी की आवाज़ फिर भी कानों में गूँजती रहती है,उसकी कही साधारण-सी बातें वर्षों बाद भी हृदय को छू जाती हैं,और उसका दिया हुआ स्नेह .....समय बीतने के बाद भी मन को पहले की तरह ही सहारा देता है।शायद इसी कारण अपनों का जाना केवल एक घटना नहीं होता,वह भीतर एक स्थायी रिक्तता छोड़ जाता है।

एक ऐसा शून्य, जिसे कोई शब्द, कोई उपस्थिति, कोई नया संबंध भर नहीं पाता।वे लोग फिर हर दिन महसूस होते हैं,कभी किसी परिचित सुगंध में, कभी किसी पुराने गीत में,तो कभी अकारण नम हो आई आँखों में।और तब मन यह स्वीकार कर लेता है कि मृत्यु केवल शरीर को दूर ले जाती है,प्रेम को नहीं। 

वास्तव में प्रेम समय, दूरी और मृत्यु तीनों से अधिक स्थायी होता है। 

#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका