(छायाचित्र : गूगल से साभार )
मृत्यु को मैंने कभी पूर्ण विराम की तरह नहीं देखा।वह मुझे सदैव एक दीर्घ, मौन और थके हुए जीवन का अंतिम विश्राम प्रतीत हुई है।जब कोई मनुष्य भीतर ही भीतर अनगिनत संघर्षों से गुजर चुका होता है,जब उसकी मुस्कान केवल संसार को आश्वस्त करने का माध्यम रह जाती है,
और जब जीवन का बोझ आत्मा तक उतर आता है,तब शायद मृत्यु उसे भय नहीं, अपितु शांति जैसी लगती होगी।मृत्यु ;कई वेदनाओं का अंत है ,जो कि जीवन में कतई संभव नहीं होता।
सामान्यतः कहा जाता है कि मृत्यु सब कुछ समाप्त कर देती है,परंतु सत्य तो यह है कि कुछ संबंध कभी समाप्त नहीं होते।वे देह की सीमाओं से परे जाकर स्मृतियों में बस जाते हैं।
किसी की आवाज़ फिर भी कानों में गूँजती रहती है,उसकी कही साधारण-सी बातें वर्षों बाद भी हृदय को छू जाती हैं,और उसका दिया हुआ स्नेह .....समय बीतने के बाद भी मन को पहले की तरह ही सहारा देता है।शायद इसी कारण अपनों का जाना केवल एक घटना नहीं होता,वह भीतर एक स्थायी रिक्तता छोड़ जाता है।
एक ऐसा शून्य, जिसे कोई शब्द, कोई उपस्थिति, कोई नया संबंध भर नहीं पाता।वे लोग फिर हर दिन महसूस होते हैं,कभी किसी परिचित सुगंध में, कभी किसी पुराने गीत में,तो कभी अकारण नम हो आई आँखों में।और तब मन यह स्वीकार कर लेता है कि मृत्यु केवल शरीर को दूर ले जाती है,प्रेम को नहीं।
वास्तव में प्रेम समय, दूरी और मृत्यु तीनों से अधिक स्थायी होता है।
#ब्रह्मनाद
#डॉ_मधूलिका
