#मौन_की_यात्रा
हां पीड़ा जनित मौन का पर्वत,एक बर्फ के पहाड़ सा होता है। घनीभूत सर्द जमी हुई भावनाएं।
असीमित मापों में एक से रंग में छुपी.....निस्पंदित, निर्जीव, निस्पर्शय...।
अन्तस् में अक्सर ,भावनाओं के भूचाल को थामने के लिए कठोर पाषाण धरातल का निर्माण हो ही जाता है। पर मौसम कई बार बर्फ को पिघला ही जाता है। एकीकृत ,आत्मिक पीड़ाओं को किसी की आत्मीयता की ऊष्मा पिघलाने ही लगती । और मौन ठीक पिघल कर वैसे ही प्रवाहित होने लगता जैसे कोई कल-कल की ध्वनि संग बहता कोई पहाड़ी सोता। कई अवरोधों को पारकर अपना मार्ग निश्चित कर ही लेता। उसका उद्देश्य तब सिर्फ प्रवाह ही बचता ,क्योंकि गति स्पंदन की पर्याय जो होती।
कठोरता जो कि समय के दिए हुए घावों का आवरण बनी रही,अब वो हिमस्खलित नदियों सी पिघल ही जाती,कई अनदेखे,अनचीन्हे धरातलों को पार कर बढ़ चलती,एक निश्चित दैव गति के लिए।उसे पता उसकी नियति उसका विलय ही है....पर वह अस्तित्व के सूर्य का अस्त नहीं है.... वो ना जाने कितनों को जीवन देने के लिए पिघली।
एक वक्त जब वो अपना मूल ....... खो देगी ,पर तब उसका व्यक्तित्व विशाल हो उठेगा... । जो नदी थी ,वो सागर हो जाएगी..फिर ऊष्मा से संघनित होगी,फिर बादल ,फिर बारिश, और फिर कहीं जमी बर्फ अपने कतरे- करते में पिघलाती रहेंगी ,मौन को .....जीवन को जीवंत रखने के लिए....... मौन से स्पंदित ध्वनि तक की यात्रा में।
#ब्रह्मनाद
#डॉ_मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी
