पेज

बुधवार, 24 जून 2026

अंतरराष्ट्रीय फेयरी दिवस

 


                   (छायाचित्र गूगल से साभार) 



बचपन में परियों की जादुई दुनिया पर इतना यकीन था जितना कि खुद के अस्तित्व पर।कई कहानियां सुनी थी कि परियाँ आसमान से उतरती हैं, अपनी जादुई छड़ी से खुशियाँ बिखेरती हैं और फिर ओझल हो जाती हैं। खूबसूरत चेहरा ,परफेक्ट मुस्कान ,लंबें काले भूरे बाल, नीली या भूरी आँखे , जहान भर की मासूमियत समेटे एक छवि सपनों में मुस्काती। 

कभी कभी लगता काश मां भी परी होती,तो मैं भी परी बनकर पैदा होती। थोड़े बड़े हुए तो आँखें और मन उन्हीं परियों को अपने आस पास ढूंढते। कभी किसी सुंदरी लड़की या स्त्री को देखकर अनायास ही उसके जादुई पंखों के छिपे होने की बात पर खुद को ही बहाने देने लगते । कभी किसी का स्वभाव देखकर लगा ये पक्का परी ही होगी।


 बड़े होने पर जाना कि परियाँ कहीं दूर - दूर तक नहीं रहतीं,वे सिर्फ काल्पनिक कहानियों की एक किरदार हैं।तब भी पता नहीं क्यों मन के एक कोने में विश्वास हो चला था कि उनका अस्तित्व सच है ,सिर्फ कहानी नहीं। समझ आया कि वे हमारे घरों में रहती हैं...कभी माँ बनकर रात भर जागती हैं...... कभी बहन बनकर मन की उदासी चुरा लेती हैं....... कभी बेटी बनकर घर में मासूम मुस्कान की नई धूप ले आती हैं, तो कभी दादी-नानी बनकर अपने अनुभवों से जीवन की मुश्किलों को हल करने की राह दिखाती हैं।खुद भूखे रह जाती,पर उनके रहते घर पर कोई भूखा नहीं रह पाता। बीमार हो तो माथे या कमर पर पटका बांध एक कप चाय के साथ बाकी कामों के लिए एकदम मुस्तैद हो जाती हैं।रात भर बुखार से तपने के बाद भी सुबह बच्चों के टिफिन के लिए कोई देरी नहीं करती.....। आप कैसी हो जवाब में हल्के से मुस्कुराकर " मै अच्छी हूं " ही कहती है। पुरानी साड़ी खुद पर लपेट कर बच्चों के लिए नए कपड़े लाकर संतुष्ट हो जाती है। अपने हजारों सपने ,ख्वाहिशें दिल दिमाग में दफन कर पति और बच्चों की सुविधाओं ,सपनों के लिए जीती जाती है। 


उनके पास पंख नहीं होते, लेकिन पूरे परिवार के सपनों को उड़ान देती हैं। उनके पास जादुई छड़ी नहीं होती, फिर भी वे आँसुओं को मुस्कान में और बिखरे हुए मकान को सुकून भरे घर में बदल देती हैं।

वो पहले दूसरों की चिंता करती हैं..... और उस सूची में अगर कोई अंतिम होता है तो वो खुद होती हैं । उनका प्रेम किसी अतिरिक्त प्रदर्शन का मोहताज नहीं होता, वह तो दीपक की उस लौ की तरह होती हैं ,जो स्वयं जलकर भी सबको प्रकाश देती रहती हैं।


आज International Fairy Day पर उन सभी स्त्रियों को प्रणाम, जो किसी कहानी की परी नहीं, बल्कि हमारे जीवन का सबसे सुंदर और सबसे सच्चा चमत्कार हैं।जो शायद किसी की परियों वाली कहानियों की नायिका नहीं होती,पर उनके बिना हमारा जीवन परी कथाओं जैसे खूबसूरत भी नहीं हो पाता। 

हो सकता है लोग घर की महिलाओं को कभी परियाँ नहीं माने ... पर सच यही है, यदि इस धरती पर परियों का कोई रूप है, तो वह निस्संदेह उन्हीं का है। 

🧚‍♀️✨

#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका 

गुरुवार, 11 जून 2026

मौन_की_यात्रा


 #मौन_की_यात्रा


हां पीड़ा जनित मौन का पर्वत,एक बर्फ के पहाड़ सा होता है। घनीभूत सर्द जमी हुई भावनाएं। 

असीमित मापों में एक से रंग में छुपी.....निस्पंदित, निर्जीव, निस्पर्शय...।


अन्तस् में अक्सर ,भावनाओं के भूचाल को थामने के लिए कठोर पाषाण धरातल का निर्माण हो ही जाता है। पर मौसम कई बार बर्फ को पिघला ही जाता है। एकीकृत ,आत्मिक पीड़ाओं को किसी की आत्मीयता की ऊष्मा पिघलाने ही लगती । और मौन ठीक पिघल कर वैसे ही प्रवाहित होने लगता जैसे कोई कल-कल की ध्वनि संग बहता कोई पहाड़ी सोता। कई अवरोधों को पारकर अपना मार्ग निश्चित कर ही लेता। उसका उद्देश्य तब सिर्फ प्रवाह ही बचता ,क्योंकि गति स्पंदन की पर्याय जो होती। 


कठोरता जो कि समय के दिए हुए घावों का आवरण बनी रही,अब वो हिमस्खलित नदियों सी पिघल ही जाती,कई अनदेखे,अनचीन्हे  धरातलों को पार कर बढ़ चलती,एक निश्चित दैव गति के लिए।उसे पता उसकी नियति उसका विलय ही है....पर वह अस्तित्व के सूर्य का अस्त नहीं है.... वो ना जाने कितनों को जीवन देने के लिए पिघली। 

एक वक्त जब वो अपना मूल ....... खो देगी ,पर तब उसका व्यक्तित्व विशाल हो उठेगा... । जो नदी थी ,वो सागर हो जाएगी..फिर ऊष्मा से संघनित होगी,फिर बादल ,फिर बारिश, और फिर कहीं जमी बर्फ अपने कतरे-  करते में पिघलाती रहेंगी ,मौन को .....जीवन को जीवंत रखने के लिए....... मौन से स्पंदित ध्वनि तक की यात्रा में।


#ब्रह्मनाद

#डॉ_मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी