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बुधवार, 4 मार्च 2026

मुस्कान झूठी है....


                      (छायाचित्र गूगल से साभार)


आवश्यक नहीं कि उत्सव केवल आँगन में उतरें, वे मन की देहरी पर भी चुपचाप आकर बैठ जाते हैं। बाहर रोशनी हो सकती है, रंग हो सकते हैं, हँसी की आवाजें गूंज सकती हैं... पर भीतर कहीं एक शांत, गहरा कोना ऐसा भी होता है जो अँधेरे से लिपटा रहता है। वह कोना किसी शोर में शामिल नहीं होता, बस चुपचाप सब देखता है।


बहुत उत्साह और उमंग के बीच भी मन का वही आत्मिक कोना अपनी अलग धड़कन रखता है। जब खुशी की दस्तक सुनाई देती है तो वहाँ एक हल्की सी कंपकंपी उठती है... जैसे अचानक कोई बंद खिड़की खोल दी गई हो और तेज रोशनी आँखों को चुभने लगे।


जब दुख साथ चलते-चलते स्वभाव बन जाए, तो वह अजनबी नहीं रहता। उसकी ठंडक, उसकी सख्ती, उसका सीधा सच मन को पहचान में आने लगता है। फिर खुशियाँ अपरिचित लगती हैं। वे जितनी चमकीली होती हैं, उतनी ही क्षणभंगुर भी। वे सहनशीलता को ढीला कर देती हैं... उम्मीद जगा देती हैं... और उम्मीद जब टूटती है तो चोट और गहरी लगती है।


दुख कम से कम झूठ नहीं बोलता। वह कोई ऊँचे सपने नहीं दिखाता, कोई रंगीन भविष्य नहीं रचता। वह बस उतना ही देता है जितना सामने है। उसकी जमीन कठोर है, पर ठोस है। उस पर खड़े होकर गिरने का डर कम होता है, क्योंकि वहाँ उड़ान का वादा ही नहीं होता।

शायद इसी कारण मन कभी-कभी उसी सच्ची, पर सूनी धरती को चुन लेता है। जहाँ रोशनी कम है, पर अपेक्षा  नहीं। जहाँ मुस्कानें कम हैं, पर दिखावा भी नहीं। जहाँ दर्द है, पर वह अपना है... और चाहे जितना भी भारी हो ,अपरिचित खुशी से हल्का ही लगता है।


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका 

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