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सोमवार, 13 जून 2022

 #ये_बारिशें_तुम_जैसी_हैं 



बारिश और तुम्हारा ना जाने क्या रिश्ता है,हर  साल मौसम  की पहली बारिश तुम्हारे नाम होती है।दो साल पहले जब डॉ के क्लिनिक से भीगते हुए सेंटर वापस लौटी ,तुम्हारा मैसेज ब्लिंक हुआ..... कहाँ हो आप??? जवाब दिया ,बारिश में भीगते हुए लौटी अभी ,पूरी तर हूँ..... । स्क्रीन पर दोबारा आपका जवाब ...अहा बारिश ...पर कैसे मानूं आप भीगे हो,सेल्फी भेजिए।

और मैं ना जाने क्यों सारी झिझक छोड़कर, आपको साड़ी में भीगी हुई ...खुद की सेल्फी भेज दी। आपका जवाब आ गया,प्रकृति खुद में सराबोर ..भीगी, कितनी प्यारी लगती है। कोई बनावट नही,कोई आभूषण नहीं ,फिर भी बेहद प्यारी। 


आपका जवाब पढ़कर एकबारगी खुद से प्यार हो गया(हालांकि खुद को मैं कभी नही भायी) .... रियर व्यू मिरर में खुद को देखकर मुस्कुरा उठी.... । यूँ तो बारिश में अकेले ,खाली सड़कों पर घूमते हुए भीगना बड़ा पसन्द था,पर आज बारिश कुछ खुमारी सी बरसा गई। पता नहीं क्यों पलकें कुछ बेझिल सी थी,हया का बोझ था उनमे। लगा ये बादल नहीं ,तुम ही हो ,जो मुझे सराबोर कर गए। 

पिछली बार भी कुछ ऐसा हुआ कि जिस दिन पहली बारिश थी,कुछ दिनों की व्यस्तता में गुम आप उसी दिन लौटे। कभी कभी लगता ये मेघ आपके ही दूत....#मेघदूतम की कृति आपकी अपनी है। जब जब आप आते ,ये पहले सन्देशा ले आते...***सुनो भद्रे,हिय में बसने वाले पिय आ गए** .... और मन उन्मत्त हो उठता उस मोर की तरह जो बादल देखकर नाचने लगता। तुम्हारे आने की वो खुशबू,जो धरती खुद के सौंधेपन से मुझमें समा देती...,।


मेरे सूखे ,झुलसे अतृप्त मन को सदा ही अपने नेह से यूँ ही लहलहा देते हो,जैसे पहली बारिश से धरती....हां एक उमस सी भी महसूस होती, जो प्रतीक्षा की आतुरता सी बढ़ती ही जाती....पर बारिश के साथ तुम्हारा आना ही मुझे संतृप्त कर जाता..... आजकल पहली बारिश में भीगना मुझे तुम्हारा एहसास करा जाता। जहाँ मैं रोते रोते हंसने लगती...जहाँ अंदर का दाह शांत हो जाता, जहाँ कोर कोर सीज जाता,तुम्हारे  होने के एहसास है.....जिसमें मैं दोनो हांथो को खोलकर समेट लेना चाहती,तुम्हारे प्यार का एक एक कतरा... और तुमने ही तो कहा था ना...बारिश पड़े तो भीगिये। तो भीग रही हूँ ,आज फिर तुममे ,तुम्हारे एहसासों की बारिश में......हां, पहले मुझे बारिश पसन्द थी;पर अब बारिश से प्यार है। हां ये बारिश जब जब आएगी, मुझे तुममें भिगो के जाएगी,तुम कहीं भी रहो, ये मुझे तुम्हारे बेहद करीब होने का एहसास दिला ही जाएगी.....। 

ये बादल भी तो देखो ना आज फिर तुम्हारे ही प्यार की बूंदे बरसा गया....हां मैं आज फिर भीगी हूँ......

 💭✍️⛈️⛈️⛈️⛈️⛈️🌈☔🌧️🌨️


#ब्रह्मनाद 

#डॉ. मधूलिका

रविवार, 12 जून 2022

आदी_से_अनंत

 #आदी_से_अनंत





अनकही पर कई बार सुनी हुई है ,

मेरी कहानी प्रेम की....

वो शुरू तो होती है अक्सर,

सप्त स्वरों के लयकारे सी,

कई रागों और रागनियों से सजी,

जिसका मुझे कोई ज्ञान भी नहीं,

कई आरोह - अवरोह से गुंजायमान ,

किसी वीणा के तारों से उठते,

मृदुल टँकार से झंकृत,

निनाद में परिवर्तित आरोह में....

एक गूंज में बदलकर ..

जो स्थायी का परावर्तन है...

जैसे किसी मंदिर के घण्टे की ध्वनि,

गूंजती रहती है ,

उसके दोलन के खत्म होने के बाद भी।

गूंज वो जो अनन्त का हिस्सा है।

जो निरन्तर समाती रहती ,

कानों, हृदय और मस्तिष्क के,

कृष्ण विवर में,

वो खोती नहीं ,

समा जाती है,

मेरे सर्वांग कण -कण में,

मैं चलायमान भी ,

और स्थायी भी हूँ,

उस प्रेम के ज्ञात ,

हर भाव मे हूँ। 


ये प्रेम पैदा नहीं किया,

इसे तो तुमने ही जगाया है,

चिरकाल,चिरनिद्रा में लीन,

योगनिद्रा और समाधिस्थ की दशा से। 

तुमने प्रवाहित किया एक अनन्त सा,

जीवन स्रोत...

जिसका आदि तो है...किन्तु अंत अज्ञात।

हां तुमने ही गढ़ी, 

मेरे प्रेम घट की अनन्त गहराइयाँ।

जिसमें देव-सरिता ,

प्रवाहित हुई,लेकर सहस्त्र धाराएं,

समाहित हुई ,

कई महाकाव्यों की,

लिखित गद्य रचनाएं,

कोटि-कोटि यज्ञों की,

संचित पुण्य सर्जनाएँ। 


जिसमे कई बार समा चुका ,

अनन्त गीताओं का सार,

असंख्य क्षीरसागरों की ,

नील आद्रताऐं,

अंतरिक्ष के तारों की ,

अनगिनत संख्याएँ,

उपनिषद के मूल भाव की,

तत्व सहित व्याख्याएं,

ज्ञात - अज्ञात जीवन की,

सत्य या सोची गई अभिकल्पनाएँ।

हाँ मेरे प्रेम को तुमने विस्तार दे दिया,

कई कल्पों में भी जो ना लिखा जा पाए,

एक ऐसा विचार दे दिया।

मेरा प्रेम सिर्फ प्रेम नहीं, 

प्रकृति का अपररूप है,

जब जब जीवन हंसेगा इसमें,

 प्रेम की ही स्वर लहरी होगा। 


हमारा प्रेम  शिव का,

शाश्वत अवतार है.

समय से परे,

और तम के पार है,

जिसका प्रारम्भ तो ज्ञात ..

किन्तु अन्त नहीं, 

जो भी उसकी सीमाएं हैं,

वो बस अनन्त रही.....

बस अनंत रही..।

#ब्रह्मनाद 

#डॉ. मधूलिका 

मैं तुम्हारी ख्वाहिश का तारा

मैं_तुम्हारी_ख़्वाहिश_की_तारा









 सुनो हर दीवाली जब तुम मुझे करीब पाना चाहते हो। मेरे नाम का एक दिया जला लिया करना। यकीन मानो मैं बुझते बुझते भी तुम्हारे आस पास रोशनी रखूंगी। और एक दिया और जलाना मेरे ही नाम का।उसको आकाशदीप बना कर छोड़ देना दूर गगन की यात्रा में। जीवन की ज्योत खत्म होने के बाद मैं किसी सितारे का रूप लेकर उसमे जगमगाऊंगी। हर रात मैं तुम्हें देखा करूँगी,और कभी किसी रोज जब दुनियावी रोशनी तुम्हें उकताने लगे तो कहीं किसी नदी या तालाब के किनारे चले आना। मैं झिलमिलाती हुई तुमसे खामोशी से बातें करूँगी। और इन अनगिनत तारों की छांव में दूंगी तुम्हें हर रात एक पुरसुकून नींद का वादा और जब वो पूरा होगा तो सुबह तुम्हें सूरज की सुनहरी किरण हल्के से छूकर तुम्हें जगाएँगी।हां तब मैं तुम्हें नजर न आऊंगी, पर मैं इस उजली रोशनी के घूंघट तले तब भी तुम्हें देखती रहूँगी,अनवरत,अनंत तक,मेरे अंत तक।

🌠#ब्रह्मनाद 

#डॉ. मधूलिका 

                                         घनीभूत पीड़ाओं के विषम ज्वार




घनीभूत पीड़ाओं के विषम ज्वार..... 

नहीं होते नियंत्रित ,चांद की कलाओं से।

जीवन के उतार-चढ़ाव,

अक्सर दोहराए जाते,

शापित हो अनुप्रासों में।


अनचाहे ही अक्सर ये डुबो जाते,

काली पुतलियों से सजे ,

एक जोड़ी सफेद कटोरों को,

एक नमक से भरे ,खारे एहसासों में।।


कई अनमनी अभिव्यक्तियां सहसा,

रोक ली जाती हैं ,होंठों के कोरो पर आकर,

बहुत कुछ छुपा कर ,

दर्द झलक ही जाता,बदनुमा से दागों में।।


चीत्कार कर उठती जब आत्मा,

कई मूक यंत्रणाओं में,छलक ही उठता प्रमाद,

लाल डोरों से चमकती ,

आंखों की चिंगारियों में।।


संघनित, ऊष्मित ...

आत्मिक घावों से रिसती मवाद,

थिरने लगी है अब ,कही गहरे , 

किसी तलहटी को तलाशते ,

जहां ना शेष हो कोई अवसाद,

बैचेनियों को मिले, 

सासों का अंतिम ग्रास ,

क्या सांसों संग ही अब पूरा होगा,

जीवन के खुशियों का खग्रास ।

#ब्रह्मनाद 

#डॉ. मधूलिका 


 #चुम्बन 


हां ,कह सकते हैं इसे दैहिक अनुरक्तियाँ,

एक जोड़ी रक्ताभ मृदुल पंखुड़ी....

और कोमल भावों से सजी, 

कुछ स्वैच्छिक अभिव्यक्तियाँ।।


ना ही भौतिक सीमाओं के अतिक्रमण के उपालम्भ,

ना ही वांछना, ना ही अनिवार्यता के निर्मम दम्भ,

ना अनुस्वारों के प्रयोग  ,ना ही कोई अभिव्यंजना,

बस भाव प्रवणता और  प्रबल आवेगों की व्यंजना,

हृदय के अवगुंठनों को प्रकट करती वैचारिक गतियां।।


हां, नहीं आवश्यक होती इसमें कई मर्तबा, 

भाव अनुसार देह की संकल्पना ,

पर सम्मिलित रहती हैं.. 

हृदय के रक्त के नियमित घुलती ,

श्वासों के  आरोह- अवरोह की विलम्बित गतियां।।


एक जोड़ी अनिमेष दृगों से भी,प्रकट हो जाती है ,

चुम्बन की  आनुषंगिक,

 व्यवहारिक विभक्तियाँ,

आत्मिक सहजता से ही गढ़ पाते हैं,

ये अलौकिक भावनात्मक कृतियाँ।।


किसी नैसर्गिक ,किसी मान्य,

और किसी आत्मिक सम्बन्ध के ,

क्रमशः मस्तक ,कपोल,और स्मित पर,

प्रारब्ध के अमिट लेख की तरह दर्ज होते,

बिना स्पर्श की चुंबन सदृश्य ,

स्नेहिल अनिमेष दृष्टियां।।


भावों में कई दफा गुथी,

कई अवलंबित सम्बन्धों की,

कुछ अनगढ़ भ्रांतियां,

चुंबन सदा नहीं करता व्यक्त ,

कुछ सीमित दैहिक अभिव्यक्तियाँ,

देह के पार भी जब ,

आत्मा में  अंकित करता,

नेह ,एक समर्पित सर्जना,

तब इसे मिल ही जाती,

देव् निर्माल्य की सी अनुरक्तियाँ।।


#ब्रह्मनाद 

#डॉ. मधूलिका 

सोमवार, 16 मई 2022

#अप्प_दीपो_भव


 

भगवान बुद्ध के अनुसार धम्म यानी धर्म वही है जो सबके लिए ज्ञान के द्वार खोल दे और ज्ञानी वही है जो अपने ज्ञान की रोशनी से सबको रोशन करे। 

जब बुद्ध से उनके  शिष्य आनन्द ने पूछा कि जब  जब आप या कोई आप जैसा पृथ्वी पर नहीं होगा तब हम कैसे अपने जीवन को दिशा दे सकेंगे ....कैसे सत्य की ओर बढ़ेंगे? 


भगवान बुद्ध ने असीम शांति समेटे हुए जवाब दिया – “अप्प दीपो भव” अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो खुद भी प्रकाशवान हों और , दूसरों को भी उस प्रकाश में सच दिखाएं। 


परन्तु क्या दीपक बनना सरल  है? स्वयं को हर पल मिटाते हुए अंधेरे से लड़ते रहने को कृतसंकल्पित .....अधिकांशतः  लोग सूरज को नमन करते... परन्तु बिरले होते जो सूरज के सामने भी दीपक जलाकर श्रद्धा दिखाते ।इसलिए नहीं कि सूरज के सामने दिए को कमतर साबित करें....बल्कि इस लिए की दोनों खुद में सुलगते हुए दूसरे को प्रकाशित करते... और दीपक जला कर हम सूर्य और दीप दोनों को यह जताते की सूर्य हमने अंधेरे से लड़ने के लिए तुम तो नहीं पर तुम्हारे प्रेरक भाव से एक दीपक बना लिया ।जब तुम हमारे पक्ष में नहीं होते, यही दीपक हमें सहारा देता अंधेरे के खिलाफ । सूर्य एक ही होता....पर दीपक हर वो इंसान हो सकता जिसने ज्ञान को आत्मसात कर लिया। खुद को स्थिति के अनुसार तान कर ,समस्त अशुद्धताओं से संयत बाती बना लिया।

आत्मा को निचोड़ कर स्व और जन कल्याण के तेल में खुद को भिगो लिया।फिर वो स्थिति और कुप्रथाओं ,से संघर्ष करता । अंधेरे में दृष्टि की जद तक प्रकाश देने की जद्दोजहद में आशाओं को बनाए रखने टिमटिमाता रहता।

झंझावातों में कभी बुझते बुझते और तेज़ी से प्रकाशित होने लगना।वास्तव में ये अब बहुत प्रासंगिक हो रहा।

फेक स्माइल, फ़िल्टर और सेल्फी की दुनिया मे सिमटे लोग अब सिर्फ तस्वीरों में मुस्कुराते दिखते।

उन्हें  सीखना चाहिए इस दिए से वास्तविक संघर्ष । लाख आंधी हों, बारिश हो ,अंधेरा हो,वो स्वयं के प्रकाश को बनाए रखने के लिए संकल्प ले रखता। जब तक सांस है तब तक आस है .....जैसा हर पल खुद के अस्तित्व को बाती की अंतिम बिंदु और तेल की अंतिम बूंद तक पूर्ण करने की जिद......।स्वयं के जीवन में दूसरों को निराशा ,क्षोभ ,स्वप्रवंचना के अंधियारे से बाहर निकालने के लिए तत्पर एक छोटा सा दीपक। जिसे पता वो बस कुछ क्षण ही अपनी महत्ता साबित कर पाएगा...बावजूद उसके वो अपना कर्म नहीं छोड़ता। उसे पता वो जाएगा पर एक नई लौ सौंप कर।याद है ना दीवाली में हम कैसे एक लौ से दूसरे को जलाते ,भले  हवा उन्हें बुझाने की कोशिश करती....एक दीपक दूसरे को प्रकाशित कर जाता।


 इन महान सीखों के बाद तकलीफ इस बात की बचती की सनातनी बुद्ध ने बौद्ध बनाया ,दीपक बनने का संदेश दिया।खुद को माध्यम बनाकर दूसरों के लिए मार्ग प्रकाशित करने का संदेश दिया.... पर उनके अनुयायी ही ये दीपक दूसरों के जीवन ,शान्ति को ध्वस्त करने के उपयोग में ला रहे। सम्प्रदाय का ये जहर क्या रंग लेगा अगर बुद्ध को इसका जरा भी अंदाज़ हुआ होता,तो निश्चित रूप से वो यही कहते कि जो दीपक बन तुम खुद तक ही सीमित रखना। दूसरों को प्रकाशित करना तुम्हारे बस का नहीं,बस खुद के अंधेरे को ही खत्म करने का प्रयास करना।बुद्ध सम्भवतः भूल गए थे....चिराग तले अंधेरा.... वो प्रकाश देकर गए....हमने उसके तले अंधेरा चुना। 

🙏

#डॉ मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद

सोमवार, 9 मई 2022

#संस्मरण #किस्सा_नवमीं_के_परीक्षा_परिणाम_का

 #संस्मरण

#किस्सा_नवमीं_के_परीक्षा_परिणाम_का


बात तब की है जब हम 9th का एग्जाम दिए। KG1 से क्लास 8th तक जब जब रिजल्ट आता था हम घोषणा से पहले ही हाँथ में मिठाई का डिब्बा लिए स्कूल पहुंचते थे। पहला स्थान हमारा ही था। 

पर ये साल मेरे लिए कुछ नया लेकर आने वाला था। सुबह सुबह तैयार होकर एक नई ड्रेस पहनी। हालांकि मेरा मानना था वो ड्रेस मेरे लिए मनहूस है,उसमे कभी अच्छी खबर नहीं मिलती थी,पर माता राम ने गुस्से में मुझे वही पहनने को दी। 

खैर हम आनन फानन स्कूल पहुंचे ,उत्साह में लबरेज। सहेलियां ,सीनियर, जूनियर सब पहले ही बधाई देने लगी। मैं भी हांथो में मिठाई का डब्बा लिए उत्साह में उस हॉल में पहुंच गई जहाँ रिजल्ट बताते हैं।

6th क्लास से रिजल्ट की घोषणा शुरू हुई। जैसे ही हमारी क्लास का no आया मैं लगभग उठ के खड़ी ही हो रही थी कि मेरा नाम पुकारा जाएगा। चेहरे पर मुस्कान थी ,और मिठाई के डब्बे की पैकिंग खोल ली थी। और घोषणा हुआ 9th में प्रथम स्थान कीर्ति गुप्ता..द्वितीय पर हमारा नाम था। तीसरे में अपर्णा श्रीवास्तव।

मुझे तो पहले नाम की घोषणा के बाद जैसे सुनाई देना ही बंद हो गया। लगा चक्कर आ जाएगा। मिठाई का डब्बा दुख में नीचे गिर गया। पूरी मिठाई फर्श पर फैल है ,जो स्कूल की आया आंटी जल्द समेटने लगी। 2 सहेलियों ने पकड़ कर स्टेज में पहुंचाया ,और मैं अपनी एक स्नेही मैडम को पकड़ कर जोर जोर से रो रही थी। 

सब मुझे समझाए जा रहे थे कि सिर्फ 1 no का फर्क है।।वो भी प्रेक्टिकल मार्क्स के कारण । इतने दुख की बात नहीं ये। थ्योरी में तुम भी आगे हो। पर मेरे मन मे तो ये ही था कि पहले स्थान पर मेरा नाम ना पुकारा गया। कमज़ोर दिल की होती तो पक्का मुझे हार्ट अटैक ही आना था उस दिन। (जीवन की पहली हार सी महसूस हुई वो) 

     क्लास में 2nd पोजिशन के बावजूद लग रहा था सब मुझ पर हंस रहे हैं। मेरे मज़ाक उड़ा रहे। मैं किसी से आंखें नहीं मिला पा रही थी। चलते चलते एक मैडम जो प्रेक्टिकल इंचार्ज थी उन्होंने कहा ,इस बार मिठाई का डब्बा कहाँ है ,मैंने रोते रोते ही उन्हें  जवाब दिया आपकी चहेती से मंगाइये मैडम जिसने टॉप किया। उन मैडम को मुझसे पता नही क्या खुन्नस थी ,चूंकि मैं 5th तक प्राइवेट स्कूल में पढ़ी थी ,और उन मैडम को लगता था कि ऐसे स्कूल में पढ़े बच्चे घमंडी होते। (हालांकि बाद में मैं उनकी सबसे फेवरेट हो गई थी)।

स्कूल से मेरे घर के बीच मे सिर्फ एक सड़क का फासला था। तब हम किराए के एक घर मे रहते थे। मैं लगभग #दहाड़ें_मारकर रोए जा रही थी। और घर तक उसी स्थिति में पहुंची। नाक से भी रोने के कारण बुलबुले निकल रहे थे,आंखे लाल और सूज गई थी। घर के नीचे जो शॉप्स थी,उनके मालिक जिन्होंने मुझे बचपन से गोद मे खिलाया था ,सब मेरी हालत देखकर डर गए थे ,सब मेरे पीछे पीछे घर आ गए, सब पूछ रहे गुड़िया क्या हुआ और मैं बस ऐसे रोए जा रही जैसे सब बर्बाद हो गया। माँ घर से मेरा रोना सुनकर बदहवास बाहर आई। मेरी स्थिति देखकर सबको लगा मैं शायद #सप्लीमेंट्री या #फेल हुई 🤣🤣🤣

जब असलियत पता चली तो सब ठहाका मार के हंस पड़े। मैं अब भी हिचकी ले लेकर रो रही थी। मेरे एक फेवरेट वाले अंकल ने खुद से सबके लिए मिठाई मंगाई और सबको खिलाया पर मुझे तो वो विष ही लग रही थी। 

अंततः माँ ने समझाया कि अगर इसे असफलता मान रही हो तो समझो कि तुम्हारी मेहनत कम थी। पर चूंकि वो प्रेक्टिकल में आगे गई तो तुम कहीं पीछे नहीं हो। माँ ने उस दिन एक बात और कही की #अपने_दोस्तों_की_सफलता_को_पचाना_सीखो। 


उन लड़कियों का भी सोचो जो हर बार आकर तुम्हें खुशी से बधाई देती हैं। अगर सब तुम्हारे जैसे हो जाएं तो कोई अच्छा दोस्त ही ना रहे । पढ़ाई में प्रतिस्पर्धा अच्छी पर प्रतिद्वंद्विता होना गलत है। तुमने अपनी सहेलियों को भी बधाई नहीं दी होगी। और जीवन मे हमेशा आप सबसे ऊंचे रहो, ये जरूरी नहीं ।इसलिए कभी- कभी कमतरी को भी अपनाना जरूरी। माँ ने काफी देर तक कई पहलू मुझे समझाए। हालांकि इस बात ने मुझे काफी तोड़ दिया था। पर मेरे और बड़े होते तक इस बात को खुद में ढाल चुकी थी,की अपनी सफलता से पहले दूसरों की सफलता की खुशी मन से मानो तभी आप लोगों के लिए अच्छे दोस्त साबित हो सकते। दोस्तों की खुशियां भी अब अपनी महसूस होने लगी। ये मेरी एक असफलता से मिली सीख थी।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

ब्रह्मचर्य : #एक_वैचारिक_विश्लेषण

 #ब्रह्मचर्य : #एक_वैचारिक_विश्लेषण


नवरात्र का द्वितीय दिन ,माता ब्रह्चारिणी का है। मुख्यतः ध्वनित शब्द है #ब्रम्हचर्य । वास्तव में ब्रम्हचर्य क्या है ,इसको लेकर हम तरह तरह के विचार रखते। खासकर देह से जुड़े नियम ।

#ब्रह्म जो सृष्टि की शुरुआत करते ,जो कण कण  में व्याप्त हैं। मतलब भौतिक में व्याप्त ,वो  ब्रह्म है। तो जो निर्वात है ,वहाँ क्या है , कौन है??? दो भौतिक अणुओं के मध्य रिक्तता में क्या ,क्या वो वाकई रिक्त है??? जो उसके मध्य बसता वो #शिव है। 


सम्भवतः हम ब्रह्मचर्य का अर्थ काम  सम्बंधित क्रियाओं पर नियंत्रण से या उन्हें  सीमा में बांध लेना समझते। पर क्या ब्रह्मचर्य का अर्थ इतना संकुचित हो सकता है...!!!!  जो स्त्री की योनि ,और पुरुष के लिंग की प्राकृतिक क्रियाओं के नियंत्रण से समझा जा सके। 


 ब्रह्म का मतलब है ,"सृष्टि "....।सामान्यतः  ब्रह्म और शिव को हम धार्मिक शब्दावली से जोड़ कर देखते हैं। किंतु ये सिर्फ हमारी भाषायी बाध्यता है। जो मानसिकता को शिव / ब्रह्म होने से रोकती है। दरअसल शिव वो जो #अजन्मा है । और जो अजन्मा है ;उसकी मृत्यु भी नहीं होना। जो अरचित है, असीमित है, आयाम रहित है । तो ब्रह्मचर्य का मतलब सीमित भौतिक परिमाणों से परे हो जाना । सृष्टि में शिव हो जाना। 

सृष्टि में जो रिक्तता वही शिव है,और वही आत्मनियंत्रण का स्रोत और निरन्तरता का कारण भी है। 

प्रसंगवश आपको बताते हैं ब्रह्मचर्य को सामान्य तरीके से समझने के लिए एक घटना-

पर्वतराज की पुत्री पार्वती ने जब शिव का मानसिक वरण किया तो विवाह हेतु उन्हें पाने के लिए तप करना शुरू किया। शिव को साधन नही मोह सकते थे तो राजकुमारी ने राजसी वैभव ,वस्त्र ,आभूषणों,व्यंजनों  का त्याग कर तप करना शुरू किया। पहले देह को पत्तियों से ढकना शुरू किया और 2 पत्ती भोजन के रूप में ग्रहण की। तब उन्हें पुकारा गया #द्विपर्णा ।

महादेव नहीं मिले .......।

अब उन्होंने 1 पत्ती से तन ढकना और 1 का भोजन लिया ,वो #एकपर्णा हुईं। शिव नहीं आए........।

अंत मे देह की सुध त्यागकर ,1 पत्ती का भोजन भी छोड़ दिया, लोक आचरण ,मान , प्रश्न की सीमाओं से परे, अपेक्षाओं से ऊपर उठीं, लौकिक रूप में अलौकिक हो गईं....तब #अपर्णा को #शिव की प्राप्ति   हुई। शिव की शक्ति हुई,ब्रह्मचर्य से गृहस्थ का पालन किया। यही था *ब्रह्मचर्य* जब सारे भौतिक आचरण की सीमाओं का त्याग हुआ ,वो शिव हो  गईं। 


**ब्रह्मचर्य** का वास्तविक अर्थ है ,चक्रीय गतियों और संसार के परे हो जाना। भौतिक मान्यताओं से #निरपेक्ष , #मानसिक_वेदना का भाव ना हो, #आकारिकी के असामान्य बातें आपको असहज ना कर सकें, जब कोई सांसारिक भाव आपको अपने भौतिक प्रभाव में न ले सके। 


आप सीमित नहीं, #असीमित हो जाएं। वर्जनाओं से मानसिक #अप्रभावी हों । जब आप #अनन्त, #आयामरहित ,#अपरिमित ,#अतुल्य,#अहर्निश गतिकारी, #अनिमेष किन्तु वैयक्तिक मुक्त ,#अनिकेत किन्तु औदार्य प्रश्रय युक्त हो तो आप शिव होंगे ... वही वास्तविक ब्रह्मचर्य होगा. ...... आत्मानुशासन .... आत्मनियमन ,आत्मनियंत्रण ।

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

ऑटिज़्म अवेयरनेस दिवस

 मैंने कई साल पहले एक मूवी देखी थी, "अंजली" ... उस वक़्त उस मूवी की लीड एक्ट्रेस जो कि एक बच्ची थी उसकी क्यूटनेस में ही खोई रही, मुझे उसकी स्टोरी उस वक़्त नही समझ आई थी। कुछ साल पहले कुछ और मूवी मुझे अंजली की याद दिला गई।"तारे ज़मीन पर", " माय नेम इज खान", "कोई मिल गया" और बर्फी ।

इनके किरदारों में एक समानता मिली ,सामाजिक व्यवहार और संवाद में दक्ष नही दिखे। इन मूवी के  किरदारों  बारे में खोज करने पर एक विशेष शब्द सामने आया "AUTISM" ( ऑटिज़्म) ..........


संवाद जीवन में बहुत विशेष भूमिका अदा करता है। ये ऐसा जरिया जिसके माध्यम से हम दूसरों से जुड़ते,अपनी इच्छाएँ, अपेक्षाएं सामने रखते ,और एहसास भी प्रकट करते।


ऑटिज़्म / ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर एक ऐसा शब्द या शब्दावली  है ;जो क्षेत्रगत  व्यवसायिक दक्ष लोगों के द्वारा उन बच्चों के लक्षणों के लिए प्रयोग में लाया जाता जिन्हें सामाजिक व्यवहार ,खेलने, संवाद में समस्याएं होती। जो अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने में भी सक्षम नही होते। 

इसमे विभिन्न लक्षणों को भिन्नत करने के लिए S.P.D., A .S.D.  ,ADHD, P.D.D. ,Asperger syndrome, Hyperlexia, और Semantic pragmatic disorder  जैसे टर्म प्रयुक्त होते। 


आज वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस डे है। मैं अभिभावकों से इन लक्षणों पर ध्यान देने के लिए अनुरोध  करती हूँ। खासकर #18 महीने से  3वर्ष तक की आयु के बच्चों में। यह समस्या समय पर उचित समाधान न मिलने पर गम्भीर रूप धारण कर सकती है। इसकी सचेत रहिए । इसलिए इन लक्षण पर बच्चे को परखें: - 


- अर्थपूर्ण वाक्य बनाने में काफ़ी कठिनाई ,

- दूसरों द्वारा बोले गए वाक्यों को दोहराने की प्रवृत्ति,

- अपनी बात समझने के लिए  संकेतों का ज्यादातर इस्तेमाल करना

- संचार के लिए भाषा ज्ञान कम या बिल्कुल न सीख पाना। 

- अपनी ज़रूरतों, भावनाओं को समझा न पाना या प्रकट न कर पाना। 


- प्रश्न को दोहराना ,कई बार सही उत्तर न दे पाना।


-अकेले खेलने की प्रवृत्ति , गोल गोल घूमने वाली वस्तुओं की ओर ज्यादा ध्यान देना।

-दिनचर्या में अचानक हुए बदलावों में स्वीकारता नहीं।

-अपने शरीर को आपके शरीर से या बेड या कोई भी दो वस्तुओं के बीच दबाव देने का प्रयास। 

- अपने नाम को पुकारे जाने पर प्रतिक्रिया न देना।

- ध्वनि, गंध, स्वाद, देखना और सुनने जैसे सम्वेदी व्यवहार में असामान्य प्रतिक्रिया।  

- अपने ही हांथों से खेलते रहना- पक्षी की तरह फड़फड़ाते रहना , ताली बजाना ।

- उनसे संवाद करते समय आखों के कोने से किसी अन्य ओर देखने।

 आप जिसे गम्भीर समझें, ज़रूरी नहीं  वो गम्भीर हो और आप जिसे मामूली समझे वो सामान्य ही हों।इसके लिए जरूरी है पूर्ण चिकित्सकीय परीक्षण । ताकि अगर वाकई समस्या है तो समय पर निदान और समाधान मिले।


पहली बार सन् 1938 में वियना युनिवर्सिटी के हास्पिटल में कार्यरत हैंस एस्परजर ने आटिज्म शब्द का इस्तेमाल किया था । एस्परजर उन दिनों आटिज्म स्प्रेक्ट्रम (ए.एस.डी.) के एक प्रकार पर खोज कर रहे थे । बाद में 1943 में जॉन हापकिन हास्पिटल के कॉनर लियो ने सर्वप्रथम ‘आटिज्म ‘ को अपनी रिपोर्ट में वर्णित किया था कॉनर ने ग्यारह बच्चों में पाई गई एक जैसी व्यवहारिक समानताओं पर आधारित रिर्पोट तैयार की थी। और ये लाईलाज बीमारी तीसरी सबसे आमफ़हम शारीरिक और मानसिक विकलांगता है।


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■ #ऑटिज़्म तंत्रिका संबंधी विकलांगता है जो दिमाग के सामान्य विकास में बाधा पहुँचाती है। इससे संचार, सामाजिक अंतःक्रिया, संज्ञान और व्यवहार पर असर पड़ता है। ऑटिज़्म को एक स्प्रेक्ट्रम विकार माना जाता है क्योंकि इसके लक्षण और विशेषताएँ कई मिलेजुले तरीक़ों से प्रकट होते हैं जो बच्चों को अलग अलग ढंग से प्रभावित करते हैं। कुछ बच्चों में गंभीर समस्या आ सकती है और उन्हें मदद की ज़रूरत रहती है जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो हल्कीफुल्की मदद के साथ स्वतंत्र रूप से अपना कामकाज स्वयं ही कर पाते है।


ऑटिज़्म की सही सही वजह तो अब तक पता नहीं चली है लेकिन शोध बताते हैं कि ये आनुवंशिक और परिस्थितिजन्य या पर्यावरणजनित कारकों की मिलीजुली वजह से हो सकता है। पर्यावरणीय या परिस्थिति से जुड़ी वे विभिन्न स्थितियाँ हैं जो मस्तिष्क के विकास पर असर डालती है। ये जन्म के पहले या जन्म के फ़ौरन बाद उत्पन्न हो सकती हैं। ये भी देखा गया है कि बच्चे के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को नवजात दिनों में कोई नुकसान पहुँचने से भी ऑटिज़्म हो सकता है।


ऑटिज़्म एक जीवनपर्यंत की स्थिति है और इसका कोई इलाज नहीं है। लेकिन सही थेरेपी और सही इंटरवेंशन से बच्चे को ज़रूरी कौशल सीखने में मदद मिल सकती है जिनसे वे अपनी ज़िंदगी को बेहतर बना सकते हैं। चूंकि 18 महीने की उम्र या उससे पहले ही बच्चे में ऑटिज़्म का पता चल सकता है लिहाज़ा बच्चे के बेहतर विकास के लिए काफ़ी पहले से मदद मुहैया कराई जा सकती है।

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■ मातापिता के लिए महत्त्वपूर्ण नोटः- 


"" ऐहतियाती क़दम के तौर पर, माता पिता बाल रोग विशेषज्ञों को ऐसे रूटीन विकास संबंधी टेस्ट करने के लिए कह सकते हैं जिनसे ये पता चल सके कि बच्चे का शारीरिक मानसिक और भाषाई विकास ठीक से हो रहा है या नहीं. ""


ऑटिज़्म की पहचान का कोई एक मेडिकल टेस्ट उपलब्ध नहीं है लेकिन कुछ विशिष्ट आकलन और जाँच, इस विकार के होने की पुष्टि कर सकती हैं ऐसी ही कुछ जाँचों में शामिल हैं -


• शारीरिक और तंत्रिका तंत्र के परीक्षण

• ऑटिज़्म डायगनोस्टिक इंटरव्यू- रिवाइज़्ड (एडीआई-आर)

• ऑटिज़्म डायगनोस्टिक ऑबज़र्वेशन शेड्यूल (एडीओएस)

• चाइल्डहुड ऑटिज़्म रेटिंग स्केल (सीएआरएस)

• जिलियम ऑटिज़्म रेटिंग स्केल

• परवेसिव डेवलेपमेंटल डिसऑर्डर स्क्रीनिंग टेस्ट

• क्रोमोसोम असमान्यता को चेक करने के लिए जेनेटिक परीक्षण

• संचार, भाषा, बोलचाल, संचालन, पढ़ाई लिखाई में प्रदर्शन, संज्ञानात्मक कौशल से जुड़े टेस्ट

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किसी बच्चे में ऑटिज्म  का पता चलता है कि तो उसके अभिभावकों को स्वयं के लिए यह दुनिया खत्म सी महसूस होने लगती है। भावनात्मक और मानसिक यंत्रणा का दौर होता है ये। फिर शुरू होता है इलाज , इंटरवेंशन और थेरेपी के लिए लगभग अंतहीन लगने वाले चक्कर। घर पर ढेर सारे समझौते ,अपने व्यक्तिगत उद्देश्यों की बलि देते हुए कई अभिभावक इससे सामंजस्य बनाने की कोशिश करते हैं।पारिवारिक सदस्यों ,आदतों को भी बच्चे के हिसाब से बदला जाता है। अलग दिनचर्या अलग योजनाएं बनती है। इस तरह से एक अन्य बच्चे के मुकाबले ऑटिज़्म वाले बच्चे को पालना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।  

लेकिन अगर सही समय पर इसके बारे में जानकारी मिल सके तो इस स्थिति से निपटना अपेक्षाकृत सरल होगा।


इन हालात में, अभिभावक या देखरेख करने वाले व्यक्ति के तौर पर आप :-


*ऑटिज़्म के बारे में पढ़े और जानें पर ध्यान रखें हर बच्चा अलग है तो जरूरी नहीं कि नेट पर किसी अन्य के बारे में दी गई जानकारी और टिप्पणी आपके बच्चे पर भी लागू हों। नकारात्मक साहित्य से बचें। आप रेमेडीज/ समाधान की तरफ ध्यान दें। 


* बच्चे सहित परिवार में सभी दिनचर्या निश्चित करें ताकि बच्चे को अनावश्यक तनाव न हो ।उसे पूर्व आभास रहे कि आपका अलग कदम क्या होगा। 


*बच्चे ,परिवार के सदस्यों और जरूरत पड़े तो स्वयं के लिए भी मनोचिकित्सक से  काउंसलिंग लें। आप भी इंसान हैं ,भावनाओं का ज्वार आपको भी परेशान कर सकता है। 


*एक विशेष जरूरत वाले बच्चे के लिए आपको भी भावनात्मक रूप से मदद और साझा करने की आवश्यकता होती है। ऐसे समूहों से जुड़े जिनमें इस स्थिति से गुजर रहे माता पिता शामिल हों। सब आपस मे जानकारी साझा करें, एक - दूसरे की मदद करें। 


*आपके स्थान अपर थेरेपी की व्यवस्था न हो तो  प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर गतिविधियोंके बारे में सीख सकते हैं जिससे बच्चे के साथ काम करने में आपको मदद और मार्गदर्शन मिले। 


* ये न सोचें कि बच्चा आपको सुन नहीं रहा और उससे बात करना बंद न करें।बल्कि लगातार उससे हर चीज ,हर घटना के बारे में बताएं। रास्ते से गुजरते समय भी आप लगभग कॉमेंट्री जैसी करते रहें। ये उसे दिमाग मे नए शब्द और घटनाओं के तारतम्य को सिखाएगा।


*प्रिटेंड प्ले, इमेजनरी प्ले भी सिखाए। एक ही खिलौने से अलग अलग तरह से खेलना सिखाएं। अलग अलग कॉन्सेप्ट 

दीजिये।


* शुरुआत में बच्चे की रुचि अनुसार सोलो गेम से शुरू करके धीरे धीरे समूह में खेलने वाले गेम की तरफ लाइये। इससे बच्चे अपनी बारी का इंतज़ार करने के अलावा नियम भी सीखने लगेंगे। 


*बातचीत में  वाक्य छोटे और सरल निर्देशों वाले रखें।ताकि बच्चे को समझना आसान हो।


*शुरुआत में वो बच्चे जिन्हें भाषा या संवाद में कठिनाई हो ,उनके लिए कम्युनिकेशन कार्ड बना कर रखें। इसके माध्यम से उन्हें अपनी बातें ,जरूरत साझा करना सिखाइये।


*बच्चों को मदद  माँगने के तरीके सिखाइये।


*पहले बच्चे को समझाए फिर बोलने का प्रयास कराएँ। ताकि सही शब्द प्रयोग करना आए।


*छोटे से छोटे सफल प्रयास पर भेज बच्चे को बहुत उत्साहित कर उसे इनाम भी देना है। याद रखें ये इनाम हमेशा कोई भौतिक वस्तु न हो, बल्कि कई बार उसकी पसंदीदा गतिविधि या भाव भी हो।


*बच्चे को आप हमेशा #स्पून_फीडिंग( जरूरत से पहले ही पूर्ति) न कराएं। उसे प्रोत्साहित करिये अपनी जरूरत को प्रकट करने के लिए उसके बाद उसकी मदद करें। याद रखें आपको बच्चे को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाना है न की निर्भर ।


*आपका शारीरिक मानसिक  बेहतर होना स्वास्थ बच्चे के लिए भी जरूरी है ,इसलिए खुद पर भी ध्यान दें। 


#सामाजिक व्यवहार के लिए :- 

 1 बच्चे को घर व बाहर के लोगों से मिलाएं ।


2.  बच्चे को पार्क  या किसी हॉबी क्लास में ले जाएं।


3. दूसरों से संवाद के लिए प्रेरित करें। प्रॉम्प्टिंग कि स्थिति को हटाते जाएं। 


4.बच्चे के ऐसे व्यवहार जो बार बार दोहरा रहा हो,उसे नजरअंदाज न करें और उसे किसी भी प्रकार से व्यस्त करें ताकि उसका ध्यान उस एक गतिविधि से हटे।बच्चे को अकेलेपन की स्थिति में न छोड़े।


5.बच्चे के गलत व्यवहार को नजरअंदाज न करें। आप उसे विभिन्न तरीकों से समझाने का प्रयास करें कि उसके द्वारा की गई  गतिविधि ने आपको /अन्य को नुकसान पहुंचाया।गुस्से और दुख को दिखाने के लिए शारीरिक हावभाव के अलावा विजूअल कार्ड का इस्तेमाल करें।बच्चे की वीडियो या फ़ोटो( अवांछित व्यवहार के दौरान) लेकर रखें और समझाते समय इसे दिखाएं। 


 6.बच्चे के साथ  नज़र मिला कर बात करने की कोशिश करे,उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए उसके रुचि की वस्तु अपने चेहरे के पास रख बात करें। 


7. हर सही प्रयास के लिए प्रोत्साहित करना कभी न भूलें ।


8. बच्चे का  अधिक गुस्सा या अधिक चंचलता दिखे तो उसे शारीरिक व्यायाम ,खेल सम्बन्धी गतिविधि में लगाएं। इससे अलावा यदि उसकी गतिविधि स्वयं या अन्य को शारीरिक क्षति पहुंचाने के स्तर पर हों तो मनोचिकित्सक से सम्पर्क करें।


👉 ऑटिज़्म को अभिशाप के रूप में न लें। हर बात के दो पहलू होते हैं। इससे ग्रस्त व्यक्ति  विशेष विधा ,क्षेत्र में ध्यान केंद्रित करने की अनूठी क्षमता रखते हैं।उन्हें कुछ विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से खुद को अद्वितीय साबित करने का अवसर दे सकते हैं। कोई भी सम्पूर्ण नहीं होता , इस डिसॉर्डर के साथ जीने वालों में कई मशहूर हस्तियां जुड़ी हुई , निकोल टेस्ला, अमेडस मोजार्ट,  आइंस्टीन , हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति महामहिम कलाम साहब , प्रियंका चोपड़ा, ह्रितिक रोशन ,अभिषेक बच्चन जैसे लोगों ने इस अक्षमता को हरा कर खुद को  अपनी क्षणताओं के अग्रणी स्थान पर काबिज किया। 


प्रकृति ने जब कोई भेदभाव नहीं रखा तो कहीं न कहीं हमारा भेदभाव पूर्ण व्यवहार प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ ही जाएगा।और प्रकृति जब विरोध करती है तो त्रासदियों को जन्म देती है। सम्हलकर... सोचकर ..... अपना कर .... अनुकूल व्यवहार करें।


*समस्या होना जीवन का अंत नही होता, समाधान से उसे जीतना ही जीवन है।*

सोमवार, 9 अगस्त 2021

मोह और मसान

  


किसी की मृत्यु का अवसर; अक्सर मुझमें प्रश्नोत्तरी की लंबी श्रृंखला को उभार ही  देता है। जीवन के सत्य और तत्व को लेकर ताने बाने मस्तिष्क में उलझने लगते। कई प्रश्न अचानक ही समुद्र की ऊंची लहरों से उमड़ने लगते हैं। पर जवाब क्या होगा…. ये अज्ञात….। स्वयं में ही उलझे हुए ,स्वयं को  अपने ही तर्कों  से शांत करना कभी कभी खुद को छलने जैसा लगता। बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी भूखे बच्चे की माँ ,पतीले पर पानी छनकाते हुए खाना बनाने का स्वांग रचते हुए ,बच्चों के सोने की प्रार्थना करती। कुछ यूं होता अपने प्रश्न और अपने ही जवाब का। 


श्मशान में किसी चिता को जलाने का कर्म करने वाले इंसान को स्थिर रूप से सारी कर्म करते हुए देखकर मैं सोचने लग जाती हूँ,कि क्या इसके लिए मृत्यु को स्वीकार करना सिर्फ इसका काम??? क्या इसकी मनोस्थिति विचलित नहीं होती होगी?? क्या अपने किसी परिचित ,आत्मीय या पारिवारिक व्यक्ति की मृत्यु में भी इतना ही स्थिर व्यवहार रख पाता होगा। क्या इसके लिए मोह का भाव उतना प्रबल होता होगा ,जितना आम इंसान के लिए। 


बनारस में मणिकर्णिका जैसे  घाट पर लगातार जलती चिताओं के बीच अपने कर्म को पूर्ण करने वाले क्या मोह और सत्य के अंतर को सहज स्वीकार कर पाते होंगे??? वो मोक्ष की कामना से खुश होते होंगे या अपने के जाने के मोह से ग्रसित होकर दुख मनाते होंगे?????


कभी कभी लगता कि मोह ,मोक्ष से भी प्रबल वांछना है। सम्भवतः सन्सार को निश्चित गति  में चलने के लिए इसका होना अनिवार्य। हम खुद को स्थिरप्रज्ञ मानते हुए इससे दूर या निरपेक्ष होने के विचार को मानने और प्रसार के लिए प्रयासरत होते। किन्तु क्या बिना मोह के संसार सम्भव?????


हम शिव को भव बंधन से मुक्ति का मार्ग मानते ,पर ज्ञात ही है कि वही शिव ;सती की मृत देह को मोहवश लेकर फिरते रहे। सन्तुलन के ईश्वर साक्षात शिव… क्या इतने कमजोर थे कि सती की देह को सत्य मान लिए थे?????? इसका जवाब भी मुझे मोह ही लगता ,उनका सन्देश हो सकता यही रहा हो कि जीव के लिए मोह ,मोक्ष से भी पहले अनिवार्य। ताकि जीवन स्वांग न लगे। ताकि उसे जीने के लिए कारण बचे रहें। अगर मृत्यु सत्य तो जीवन का औचित्य क्या था…. किसी औचित्य को समझाने और उससे जुड़े रहने का भाव ही मोह के रूप में उभरता। 

शिव की इन लीलाओं को गूढ़ता से मनन करेंगे तो अर्थ स्पष्ट होगा कि मोह और जीवन -मोक्ष और मृत्यु के समानांतर और अनिवार्य भाव है। उसे नकारना समानान्तर सत्य को नकारने जैसे होगा। 

तो मोह को भी विशुद्ध रूप में स्वीकारें, जियें। जीवन  और जीवन के बाद भी अपने लिए,अपनों के लिए; मोह को मोक्ष से पहले सहज स्थान देना शुरू कर दीजिए। मोह कमजोरी नहीं ,जीवन का सबसे प्रबल भाव है। 

शिव और शव के बीच की कड़ी ;#मोह। 

✍️ डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रह्मनाद


बचपन को सच दिखाइए

 कहते हैं ,जीवन की नींव बचपन में ही पड़ जाती।हमें  बच्चे के व्यक्तित्व को किस रूप में ढालना ये उस पर निर्भर करता कि हम उसे क्या सिखाते। हम बच्चों के लिए उस पड़ाव में हद से ज्यादा रक्षात्मक हो जाते। कोई भी नकारात्मक विचार से उसे दूर रखने का प्रयास करते। कोई भी घटना जो हमें लगता कि  बच्चों के मन में प्रश्न जगा सकती,उससे दूर रखने का प्रयास करते। शारीरिक रूप से भी उसे कोई चोट न पहुंचे इसके लिए हम जरूरत से पहले ही मौजूद रहते। भूख -प्यास महसूस न हो इसका इंतज़ाम भी यथासंभव करते। परी कथाओं को सुनाकर उसे सुनहरे सपने और एक खूबसूरत दुनिया दिखाते। अक्सर  सफलता की होड़ में अग्रणी होने पर सफल बताते,और ये प्रयास भविष्य में भी उसे आगे और सफल रखेंगे ,ये समझाते रहते। 

कुल मिलाकर एक सुनहरा सा दायरा बना देते हैं जिसमें सच्चाई कम ,अपेक्षा ज्यादा होती। पर आज अगर मैं आपको कहूँ कि आप ऐसा करके एक इंसान को कमज़ोर बना रहे तो शायद आपको मुझ पर ही हंसी आएगी। 


फर्ज़ करिये एक बच्ची थी,बेहद कुशाग्र ,हर दिल अजीज़, हर काम में बेहतरीन, हँसमुख ,हर जगह महत्व पाने वाली। उसे सिखाया गया कि जीवन ऐसा ही होगा।तुम्हारी शर्तों पर जी सकोगी। हमेशा इन खूबियों के साथ वो छाई रहेगी,अपने सुनहरे दायरों में। एक वक्त तक उसे सब सच लगा। अपनी खूबियों ,सपनों से उसे प्यार था। उसका होना उसे कुदरत का उपहार लगता। को बड़ी हुई ,उसका विवाह हो गया।  सुनहरी दुनिया रंग बदलने लगी थी। उसकी खूबियों में पहले जहां उसकी वाहवाही होती थी,अब वो दम तोड़ने लगी थी। उनके लिए ही उसे ताने मिलते, जो उसे उसकी ताकत लगते थे।उसके सपनों को समर्पण का जामा पहनाने की अपेक्षा और कवायद हुई। उसके होने का मतलब ,सिर्फ दूसरों की इच्छा अनुसार ढलना। उसे समझ आया कि कल जिन बातों को लेकर उसे बताया गया कि ये तुम्हें सफलता की सीढ़ी है,वो अर्थहीन है। उसके सपने ,उसकी महत्वाकांक्षा ही आज उसका दम घोंट रहे थे। उसे अब लगने लगा कि काश उसकी आँखों में इतने बड़े सपने न डाले जाते,उसे ये न बताया जाता कि वो विशेष है। काश उसे बेहद आम बताया जाता ,उसे बोला जाता कि जीवन संघर्षों के नाम है।उसे  बताया जाता,की कर्म नहीं ,भाग्य ही प्रबल होता। जो उसकी विशेषता ,वो कोई गुण नहीं ,बल्कि सिर्फ विधा है। उसे ये ना बताया जाता कि तुम्हें कुछ विशेष करना है… काश उसे बताया जाता कि आम सा जीवन होना ही सच है। जिसमें कोई उद्देश्य नहीं हो सिर्फ एक नियमित दिनचर्या के अलावा। ऐसी स्थिति में वो ऐसी टूटी कि जिंदगी से ही उसका मोह भंग हो गया। 

वास्तव में जीवन का सच हमें बचपन से ही बताना चाहिए। बताना चाहिए कि हर कदम श्रेष्ठ होने पर भी जीवन मे सफल हो जाओ ये जरूरी नहीं। कोई लूज़र माना जाने वाला इंसान भी तुमसे बेहतर जिंदगी जी या साबित  हो सकता। बताना चाहिए कि तुम इतने भी विशेष नहीं ,तुम आम से इंसान हो ,जो कई अरबों में एक हो। हमेशा सपनों में मत रहो, एक आम सी दिनचर्या भी जिंदगी होती। हर वक़्त मत हाज़िर कर दीजिये उनके पंसद का खाना,तेज़ भूख महसूस होने दीजिए,प्यास महसूस होने दीजिए। उनकी मर्ज़ी मत चलने दीजिये,उन्हें  समझौते सिखाइये। रोने पर हमेशा अपना कंधा मत दीजिये ,बताइये की खुद चुप होना सीखना होगा। कहीं चोट लगने की स्थिति में आप आगे मत आइये, लगने दीजिये उसे चोट,ताकि कल वो किसी के भरोसे खुद को सम्हालने की कोशिश न करें। उसे परियों की कथाएं नहीं,असली जिंदगी की कहानियां बताइये। जिसमें दुःख हों,तकलीफ हों,बीमारी हो ,भूख हो। समाज से मिले तिरस्कार हो,जिनमें मृत्यु का भी जिक्र हो। ताकि कल जब उसे अपेक्षित कल न मिल पाए तो वो टूटे नहीं। बल्कि सहज ही असफलता को भी स्वीकार कर जीता रहे। उसे बताइये की हर कहानी का अंत सुखद नहीं होता,कुछ में त्रासदी भी होती। जिस दिन ये सब सीख लेंगे,जान जाएंगे यकीन मानिए,आतमघात की प्रवृत्ति खत्म हो जाएगी। 

क्योंकि तब उन्हें पता होगा #life_is_not_a_bed_of_roses…. तब कांटे उन्हें जीवन का अंग लगेगें। आखिर सुख से ज्यादा जीवन दुख ही देता। 

✍️डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

#ब्रम्हनाद

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

स्त्री - नजरिया

मुक्तक ,क्षणिकाएँ ) 

1# .देवताओं का भोग,

इंसान की भोग्या,

प्रारब्ध तेरा ,

देवदासी सा।।


2#.ससुराल की मर्यादा,

मायके का मान,

फिर भी बनी रही,

तू सजावटी सामान।


3#.सरस्वती की पुत्री,

और दुर्गा का भान,

बलात तुझे जुटाना ही होगा,

लक्ष्मी का सम्मान।।


4#.वस्त्र विन्यास तेरा ,

बस होगी तेरी पहचान,

6 गजी साड़ी में,छुपा रखेगी ,

समाज के दोहरे आयाम।।


रविवार, 26 नवंबर 2017

सेल्फ़ी

पता नही क्यों पर मैं अपनी सेल्फ़ी लेने के बाद संतुष्ट नही होती। कुछ ना कुछ कमियां हमेशा ही दिखती हैं। सैकड़ों में एक भी तस्वीर नही भाती हमको। शायद इसलिए क्योंकि उस वक़्त हम खुद को अपने नज़रिये से देखते हैं और कभी आत्म मुग्ध नही हो पाते। बिलकुल वैसा ही गणित जिंदगी में भी लागू कर पाएं तो कितना अच्छा होगा। सैकड़ों जनहित/परोपकारी कार्यों को करने के बाद भी हम संतुष्ट और संतृप्त ना हो। जैसे ढेर सारी सेल्फ़ी डिलीट कर देते हैं वैसे ही अपने अच्छे कर्मो का लेखा जोखा भुला कर और बेहतर करने का प्रयास करें ।नेकी कर दरिया में डाल टाइप फीलिंग।


दोनों स्थिति में आत्म मुग्धता स्व प्रवंचना है। काश की मेरे सत्कर्मों की सेल्फ़ी में संतुष्ट रहूँ पर कभी संतृप्त ना होऊं

स्त्री गंध / या प्रेम की ग्रंथि

मैं जब जब प्रेम बोलती,
तुम तन क्यों चुनते हो??
मेरे भावों की भाषा में,
भोगों के संवाद क्यों बुनते हो???
मन के असीम धरातल को,
तुम बांधते रहे सदा ,
कुछ दैहिक ज्यामितीय रचनाओं में।
मैं जब बनना चाही,
तुम्हारी रात का अंत ,
होकर सुबह की अतिशा,
तुमने मुझे चाँद में बांध दिया।
जब भी रुकना चाही ,
तुम्हारी अलसाईं सुबह में ,
ओस की ताजगी बनकर ,
तुमने मुझे अख़बार बना दिया।
शाम ,जब मैं तुममे ढलना चाहती थी,
तुम्हारे टूटनों को ,
खुमारी में गढ़ना चाहती थी।
तुमने फिर ढूंढना ,
शुरू कर दिया,
मेरी स्त्री गंध का स्रोत ।
क्या तुम नहीं जान पाते,
मेरे प्रेम का आधार मन है।
तन जल्द ही रीत जाता है,
इन सांसारिक खेलों के ,
दैनिक क्रमों से।
क्यों ना ये होता की ,
तुम ढूंढ लेते मुझमे ,
प्रेम की ग्रंथि।
मन जब तुम बांध लेते,
तन भी उस संग,
बन जाता बंधुआ तुम्हारा।
मन मेरा आकाश है,
जो तुममे छाना चाहता है।
तन जब रीत जाए,
तब तुम्हें अपनाना ,
चाहता है,
मेरा तन ,प्रत्याशा में ,
मेरे मन को,
चुने जाने की स्थिति में।
बोलो अब तुम ,
क्या चुनना चाहोगे???
तुम ही चुनो अब,
स्त्री गंध /
या प्रेम की ग्रंथि ।।

उन्मुक्त मन का आसमान ...


.हाँ मेरे पास भी है मेरा अपना आसमान ,
जिसमे सितारों की तरह दिखते हैं,
मेरे अरमान,
आकार है उसमे ,
पर विस्तार नही...
मेरा अपना है वो.पर वो एक संसार नही ,कुछ सीमित सा,/कुछ अदृश्य सा ,,,दुनिया से अब भी अछूता ...तुमने देखा ना होगा....?????देखोगे कैसे...!!!!!!!वो एकांत है ,,एकाकी है ,मेरे आँखों में बसता है,मेरी सोच का रस्ता है...मर्यादाओं से घिरा, वो छुपा है,,इन् चारदीवारियों पर टिकी ,एक छत के नीचे,बिलकुल मेरे अतीत की तरह .मेरे ह्रदय की कठोर दीवारों के भीतर छिपे मर्म की तरह ..जहाँ रोज मैं उडती हूँ..अपने कटे पंखों को सोच में समेट कर...तुम्हारे बन्धनों की सीमाओं में ....
उन्मुक्त मन का मेरा भी,
है . .एक खुला आसमान .
चार दीवारी से घिरा ,
पर बस मेरा ,,,,सिर्फ मेरा
है एक आसमान ...



मैं रोज;मैं होने का,
स्वांग रचती हूँ। 

मैं जब मैं होती, खुद को जीती।
स्वांग में ढोती हूँ, कई अनचाहे सम्बन्ध।।


मैं जब मैं होती,होती एक उन्मुक्त सोच।
स्वांग रचते ही ,ढोने लगती कई कोढ़ सी कुरीतियां।।

मैं ,मैं होने पर जीती,एक स्वछन्द मन।
स्वांग में घुसते ही ,होती अनुगामित तन।।

मैं ,जब मैं होती,मुझमे छाता एक अनंत आसमान।
स्वांग जीते ही मुझे समेट लेती,कई अवांछनीय मर्यादाएं।।

मैं ,मुझ में होने पर खुशी से जीती ,कई कड़वे सच ।
स्वांग में ढककर , परोसने होते कई मीठे से झूठ।।

हाँ मैं ;मैं के स्वांग में ,
मैं होकर भी संतुष्ट नही होती।
क्योंकि मुझे ;नही भाते ,
उपमाओं के अलंकार।।

मैं होना चाहती,
निराभरण ,पारदर्शी ,
एक आत्मा सी।

मैं ,मैं में तब होउंगी संतृप्त,
जब तुम बाध्य ना करोगे,
मेरे स्वांग को सराहा कर,
मुझे सिर्फ मैं में ही स्वीकार कर।।

अन्यथा मेरा "मैं " तत्पर ,
उद्द्यत रहेगा ।
खुद में सर्वांग होने को,
मैं के आत्म बोध में ,
"मैं" का मुक्तिबोध जीने को।।

टैबू -2



इस शीर्षक पिछले भाग "इनबॉक्स" में आप सबकी बेहतरीन बहुआयामी टिप्पणियों ने मुझे इस दूसरे भाग "शारीरिक सम्बन्ध" को लिखने के लिए प्रोत्साहित किया।
ये शब्द सामने आते ही हम सबके दिमाग मे अलग अलग तरह के ख्याल आने लगते हैं। कुछ के लिए निषेध, कुछ के लिए कर्तव्य ,कुछ के लिए जीवन का विशेष और अनिवार्य पहलू और कुछ की दृष्टि में मज़ेदार विषय।
दअरसल ये सब आपके माहौल और परवरिश पर निर्भर करता। की आप किस विषय को कैसा सोचते। सभ्यता के विकास के साथ साथ हम जैसे जैसे अपग्रेडेशन की सीढ़ियां चढ़ते गए ,कुछ क्षेत्रों में हमारे सोच के दायरे सिकुड़ते चले गए।
मानव जीवन के चार पुरूषार्थ में धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष को माना गया। और जो विषय पुरुषार्थ में शामिल वो त्याज्य कैसे हो सकता?????
दरअसल काम मानसिक ,शारीरिक और भावनात्मक स्तर पर ही पूर्णता पाता। 
आपको लग रहा होगा कि मैंने क्यों ये विषय चुना। तो जरा अपने आस पास देखिए,खबरों पर नज़र डालिये। बलात्कार ,अवैध गर्भपात ,छेड़छाड़ जैसी घटनाएं , यौन हिंसा क्या आपको व्यथित नही करती???? 
अगर देखा जाए तो काफी हद तक इसके लिए हमारे बनाए गए दायरे या टैबू जिम्मेदार हैं। एक उम्र में आने के बाद लगभग हर किसी की स्वाभाविक उत्सुकता इस विषय पर होती। किन्तु अपनी शंकाओं के समाधान के लिए उचित संसाधनों और मार्गदर्शन के अभाव में गलत माध्यमो के द्वारा अधकचरा और निम्न स्तरीय साहित्य का सहारा लेते। 
हमारा सामाजिक और पारिवारिक परिवेश भी ऐसा होता कि हम अपने अभिभावकों से या किसी बड़े से इस संबंध में बात करना खास निषेध पाते। 
परिणामस्वरूप प्रकृति का एक अनमोल वरदान ,अभिशाप में बदल जाता। जो सम्बन्ध जीव के अस्तित्व को निरंतरता प्रदान करते , वो किसी की मान ,मर्यादा, भावनाओं और जीवन पर संकट बन जाते ।
तो कैसे रोका जा सकता।
रोकना तो सम्भव नही पर इन सम्बंधों के बारे में संतुलित और सरल जानकारी देकर काफी हद तक हम नियंत्रित कर सकते। इसे टैबू की तरह बच्चों के सामने प्रस्तुत न करें । बल्कि इसका परिवारिक ,सामाजिक जीवन मे प्रभाव बताएं । उन्हें हर पहलू बता कर चुनाव के लिए बोलिए। 
ये सिर्फ बच्चों के लिए नही बल्कि उस वयस्कों पर भी लागू होता जो निजी सम्बन्धों में किसी किस्म की समस्या महसूस करते किन्तु उचित सलाह के लिए योग्य सम्बंधित से सम्पर्क में झिझक महसूस करते और अपना जीवन नरक कर लेते।
जो आपके जीवन का अनिवार्य पहलू उसके बारे में सही जानकारी से झिझकना ,स्वयम के जीवन और खुशियों से झिझकना जैसे हैं। 
आपको सही स्रोत और जानकारी आपको जीवन के प्रत्येक पहलू में सफल और उत्कृष्ट बना सकता । याद रखें चरित्र निर्माण स्वयम की कमजोरी को छिपा कर नहीं,बल्कि उन पर विजय प्राप्त कर किया जाता।
स्वस्थ रहें, सुलझे हुए रहें ।
शुभरात्री माता मधुमयी की ओर से। 💐

टैबू -1

आज एक मित्र से बात करते हुए मुझे अचानक दिमाग मे दो ऐसे विषय मिले जिन पर चर्चा करना बहुत जरूरी है ,पर हम उससे किनारा काट लेते।
सामाजिक तौर पर हम इन्हें "टैबू" मान लेते। जबकि दोनों हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़े विषय हैं।
एक विषय है "इनबॉक्स " और दूसरा है "शरीरिक सम्बन्ध" ...
अरे आश्चर्य नहीं करिये। । मैं इन दोनों के विषय मे बात करने को टैबू नही मानती।
Fb में अक्सर महिलाएं और लड़कियां ,कभी कभी पुरुष (कुछ विशेष क्षद्म महापुरुष) भी इन्बॉक्स में बात करने को एक विशेष तरह का निषेध बना कर रखते। इनबॉक्स में पिंग करने की बात करते ही यूँ उछलते जैसे बिच्छु ने उन्हें डंक मार दिया हो। हां ये सच है कि सबका नज़रिया अलग होता। पर इनबॉक्स को लेकर गलत धारणा बना लेना भी गलत सोच है। अगर आपसे पूछूँ की क्या बुराई है बात करने में तो जवाब होगा लोग आपकी सहजता का सोचे बिना परेशान करते ,तारीफ करते फालतू।
कुछ हद तक मान सकती हूँ ,पर अपनी सहजता और प्राथमिकता तय करना हमारे हाँथ में है। जिससे हम असहज हों उनसे क्षमा मांग कर अपना मत रख दें। तब भी समस्या हो तो मैसेज ब्लॉक करने का बहुत अच्छा विकल्प है।
दअरसल इनबॉक्स हमारे मन के उस कोने जैसा होता जहां हम सभी की उपस्थिति को सहज नही लेते। जैसे आपके घर के आंतरिक कक्षों में सबका प्रवेश नही हो सकता।
मैं अपने मामले में बताऊँ तो हां ,इनबॉक्स में बात करती। पर सबसे मैं भी सहज नही होती। वहाँ मैं उनसे ही सम्वाद करती जो मेरे लिए इतने आत्मीय होते की उनके सामने बिना लाग लपेट के अपने अंदर के सच को बेझिझक बोल सकूं। वो जो मुझे समझाईश दे सकें । मुझे हक से डांट सके। मैं उनकी जिंदगी का एक हिस्सा होऊं जिससे वो भी अपने सुख ,दुख, सपने बोल सकें।
मेरे लिए इनबॉक्स
और कई बार जो लोग बहुत मुखरता से इनबॉक्स को नकारते वो लोग मुझे फेक लगते। या तो वो सम्वेदना हीन होते या अतिव्यवहारिक ,या इनबॉक्स के प्रति उनके मन मे कोई पूर्वाग्रह या डर होता।
टैबू नहीं ,बहुत ही खास कोना है।
दोस्तों इनबॉक्स के प्रति नज़रिये को बदलिए। आपको आपका खास कोना कैसे सजाना ये आप तय कर सकते। कुछ आत्मीय रिश्ते, दोस्त और सुकून के पल तो आपकी भी चाहत ना ????????????

साधिका की वेदना

सुनो ,मेरे विचार निरभ्र आकाश नहीं,ये है विदीर्ण ,अधकृत ,अपरिमित से ही सही ,पर इसे बान्धा हुआ है मैंने एक जाने पहचाने से निश्चित आकार में ।
सुनो मन मेरा कोई हिम स्खलित उच्छ्रंखल जल धारा नहीं, ये एक अंत सलिला सा है। जो कई सतहों से विवर्तन से गुजरता। क्या ये अलौकिक पयोधि का निश्चित प्रारब्ध पाएगा??
इन समस्त गुण दोष से प्रस्तर भिंनित मेरी अर्ध निम्लित दृष्टि ;विवर,आक्रांत ,निर्वापित वर्जना की सीमा से परे देखना चाह रही है। विपन्न भाव और म्लान स्मृति की स्वामिनी मैं ,अब चाह रही है एक प्रतष ,प्रतकर्य ,वैयक्तिक सन्निधाता।
बिल्कुल विपन्नाव की तीव्र वांछना होती एक सहज ,विपरिक्रान्त ,औदार्य प्रश्रय । सम्भवत: भंवर से लड़ती उसकी परिणीति भी यही शांति होती।
मेरी व्याकुल सी दृष्टि विस्तीर्ण भाव से भृंग बनकर निर्निमेष तुम्हें ही निहारती है। हे मधुसूदन , अब स्वीकार कर लो एक आराधिका के पार्थिव पूजन और प्रेमपगे भावों को। मुझे मोक्ष नहीं, भक्ति दो।

तुम्हारी साधिका की वेदना

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

फिर से

शंख फिर से फूंक दो ,दो प्रेरणा इस देश में,
ज्ञान का प्रकाश दो ,दो सभ्यता इस देश में..
संसार में हम ढूंढते हैं आज ऐसा आदमी ,
इंसान खुद को कह सके; मिलता नही वो आदमी..
मर्यादा का पाठ भूले,राम के इस देश में...

असुर तांडव कर रहे हैं ,मानवों के वेश में ...
तो शंख फिर से फूंक दो ,दो प्रेरणा इस देश में,
ज्ञान का प्रकाश दो ,दो सभ्यता इस देश में..

 डॉ मधूलिका

वापसी

लो लौट ही आए,फिर
ख्यालों की दुनिया में हम।
हकीकतों के,
मुखौटे भी,
यहाँ चेहरों से ,
ज्यादा स्याह हैं ।।
(डॉ.मधूलिका)

संवेदना

"संवेदना तुम कहाँ हो?
स्थितियां कहती है,
तुम नहीं रही.
क्या यही एक सत्य है....
तुम विदीर्ण हुई??
तुम विलुप्त हुई????
देखा था,
मानवता में तुम्हारा वास था,
मर्यादा तुम्हारा लिबास था.
हर सांस में वेदना का साथ था ..
जुबां पर "दया-करुणा" का वास था ।
हमें यकीन है ;तुम अशेष हो,
बिन चुके ,बिना रीते,
जीवंत हो, लौट आओ।।
वेदना को,
तुम्हारी तलाश है,
मर्यादा को ,
तुम्हारे लौट आने की आस है ,
दया-करुणा,
तुम बिन उदास हैं...
मानवता को ,
तुमसे ही जीवन की आस है.......
संवेदना "तुम कहाँ हो"?
(डॉ. मधूलिका)

विप्लव गान

कवि तुम विप्लव गान लिखो,
उत्सव नही आह्वान लिखो।
अधरों पर तुम रस ना लिखना,
वीरों के यश गान लिखो।
बसंत पर्व पर प्रणय ना लिखना,
साहस, शौर्य ,बलिदान लिखो।
प्रणयी की मनुहार ना लिखना,
मातृभू पे उत्सर्गों के प्रमाण लिखो।
कवि तुम विप्लव गान लिखो,
उत्सव नही ,आह्वान लिखो।।

(नमन माँ भारती और उनके उन पुत्रों को जो अपने प्राणों का उत्सर्ग कर ,हमें उत्सव मनाने के अवसर जुटाते हैं।जय हिंद की सेना)
(डॉ.मधूलिका)

अंदाज़

अधूरी ख्वाहिशों के सफ़र...
और धुंधले से कई ख्वाब।
जिंदगी मैंने देखे,
बस तेरे यही अंदाज़ ।।
शुभरात्रि
(डॉ. मधूलिका)

मुट्ठी भर आसमान

जीने दो मुझे,
कुछ मुट्ठी भर अरमान ,
पैरों के नीचे थोड़ी जमीन,
और सर पर ,
एक टुकड़ा आसमान ,
ना समझो मुझे तुम , ,
देवियों के समान ,
बस जीने दो मुझे,
अब बन कर इंसान ।।

(डॉ.मधूलिका)

तमाशा

रुसवा दिल ,तनहा ख्वाब,
नम सी आँखे ,
और शिकवे हज़ार...
पत्थरों के जंगल में ,
जज्बातों का बाज़ार... 
मुहब्बतों का ये तमाशा.
हमसे ना हो सकेगा ...
मुहब्बतों का ये तमाशा.
हमसे ना हो सकेगा ...

(डॉ. मधूलिका )

आक्रोश

धुंधली दृष्टि,आंसुओं से।
उबलता खून ,धमनियों में।
अभी तरलता, कभी विरलता,
अभी डूबता,कभी उबरता।
अभी कठोर,कभी आक्रांत,
अभी कोलाहल,कभी एकांत।
अन्तस् ,अनंत सा।
विचार,शून्य सा।।
उंगलियों के पोरों से ,
छिटकते कई भाव।
प्रवाह है निरंतर,
हाँ पर रुके हैं ,
भावों के प्रमाद।।
(डॉ. मधूलिका)

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

अच्छा होगा

टेढ़ी-मेढ़ी , ऊंची नीची पगडण्डी सा
ये सफ़र.
अब थम जाए, तो अच्छा होगा ,
उधडा-उजड़ा , रंगहीन सा
ये निर्झर ,
बंध जाए, तो अच्छा होगा ,
मन -साधन ,माया और मोह का ,
ये चक्कर ,
थम जाए ,तो अच्छा होगा ,
कर्म-क्रोध ,धर्म और द्वेष का ,
ये गह्वर ,
सूख जाए, तो अच्छा होगा
नीरस - विकल , वीतराग सा
ये जीवन
अंत होए, तो अच्छा होगा ,
विनय,आराधन ,शाश्वत सुख , संयोग समाधी ..
का अनंतिम,
ज्ञान मिले, तो अच्छा होगा ,
जीवन का जो मोह छूट कर ,
मृत्यु का ,
अंतिम स्पंदन ,
मिल जाए ,तो अच्छा होगा...
(डॉ. मधूलिका )

गुरुवार, 16 जून 2016

फूल पत्ती कवियत्री

एक मुक्तक , जिसे गद्य या पद्य विधा से अलग भाव से पढियेगा। हाँ इसमें रस और प्रवाह का पूर्णतः अभाव है। ये कविता नही आत्मकथा है,एक फूल -पत्ती कवियत्री का।
सुधार सुझाव आमंत्रित।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
कल्पनाएं अनंत की ,,,
पर दुबके होते हैं ,
एक कमरे के कोने में।।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
सपने सजाते हैं ,पलकों पर।
पर बेझिल होती हैं ,
छुप के रोती हुई ,
आंसुओं के बोझ से।।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
सहेजती कोमल भाव,
सजाती ख्याल फूलों से,
जीती हैं रोज ,
कांटो सी सच्चाई।।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
तुम्हारे अमर्यादित हास्य की,
एकमात्र नायिका,
भोगती हैं,
कई पीड़ित सम्बन्ध ।।
हम फूल पत्ती कवियत्री।।
नापते हैं ,ख्यालों में दुनिया,
हम सिमटे होते हैं,
बस दो जोड़े "सामानांतर" ,
दीवारों से। ।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
परोसते रूमानी मुक्तक,
मुस्काते हैं तस्वीर में,
और गढ़ते एक,
गुड़िया सी छवि।।
कभी जी कर देखना,
इच्छाओं को समर्पण का,
जामा पहनाकर।
हम फूल पत्ती कवियत्रियों ,
का सच ...
खिड़की से दृश्य को,
दुनिया समझती।
और हक़ में हमारे बस,
एक टुकड़ा ,आकाश का,,,
और एक कतरा धूप।।
(डॉ. मधुलिका)

ईश्वर

अचानक मोबाइल पर रिंग आई, हमने जैसे ही हैलो कहा ; दूसरी तरफ से माँ की आवाज़ आई " गुड़िया तुमने कॉल किया था ?" दिमाग में तो तुरंत उत्तर दिया- नही. पर दिल ने कहा हाँ ।
तो हमने उत्तर दिया ,नही । दरअसल अक्सर हम अपने घर ( मायके) पर फ़ोन पर मिस कॉल देते हैं, वहां से हमारे नेटवर्क में फ्री कॉल की सुविधा के कारण माँ या पापा बेक कॉल कर लेते हैं ।और आज मेरे बिना मिस कॉल के ही कॉल आ गया था।
मेरी आवाज़ सुनते ही माँ ने दूसरा प्रश्न दागा; "तुम्हारी तबियत ख़राब है क्या?" मैं अवाक रह गई, माँ को कैसे पता चल गया ! दरअसल 8 दिन पूर्व फर्श पर पानी के कारण मैं फिसल गई थी, पहले दर्द कम था पर नजरन्दाज़ी के कारन गुरूवार से तकलीफ काफी बढ़ गई थी,और मैं बस डॉ के पास से दिखा कर वापस आई ही थी की माँ ने कॉल किया ।
रुलाई को भरसक रोकते हुए मैंने जवाब दिया हाँ ,घुटने के पास लिगामेंट रप्चर हैं, और सब बाईयां सामूहिक अवकाश पर चली गईं। आराम की बजाय काम और बढ़ गया।
माँ ने बेहद संयत स्वर में बोला की औरतों के साथ यही होता है। कोई नई बात नही ,और फिर उन्होंने ये बताया की उनके पैर की उँगलियाँ शून्य हो रही हैं। मेरी तकलीफ का सुनते ही बोलीं की मैं समझ सकती हूँ की तुम्हें क्या महसूस हो रहा होगा।
पर मैं जानती हूँ माँ की ये आप "समझ" नही बल्कि "महसूस" कर रही होगी । मेरी तकलीफ को मुझसे भी ज्यादा । और एक मैं जिसे ये पता भी नही की माँ किस तकलीफ में है। कितनी स्वार्थी संतान निकली मैं।उनकी महीनों से चली आ रही तकलीफ की मुझे कोई जानकारी नही। और मेरी 2 दिन पुरानी तकलीफ उन्हें समझ आ गई। बस माँ से ढेरो अपेक्षा, बदले में सिर्फ अपनी तकलीफें ही देती हूँ उन्हें ,मानसिक रूप से झेलने को।
सिर्फ माँ ही है वो जो अपनी सारी तकलीफ भुला कर आपके गम / तकलीफ जीना चाहती है। सिर्फ वही है जिसके पहलू में रोकर हमको शांति मिल सकती है। सिर्फ वही है ,जो कोरी सांत्वना नही देती ,बल्कि आपकी तकलीफ को ख़त्म करने का हर प्रयास करती है।
सच में माँ से बढ़कर कोई नही। ईश्वर भी नही।
माँ वाकई तुम महान हो, दुनिया में ईश्वर के अस्तित्व पर मुझे सदा सदेह रहता है। पर तुम मेरी ईश्वर हो ,इसका प्रमाण जुटाने के लिए मुझे प्रयास भी नही करना पड़ता। तुम ही मेरी ईश्वर।
मेरी पूजा की पहली अधिकारी "सिर्फ तुम हो माँ"
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