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बुधवार, 26 अगस्त 2026

बचपन जीकर लौटी हूं


 बचपन जीकर लौटी हूं ( 26/08/26)


बचपन की सहेली से मिलना, जैसे अपने मायके को फिर से जी लेना होता है।

जिस सहेली के साथ बचपन से बड़े होने तक का सफर तय किया हो, उससे मिलना महज़ एक मुलाकात नहीं होती। वह तो उन बीते हुए वर्षों में लौट जाना होता है, जिन्हें हम समय की किसी अलमारी में बहुत संभालकर रख आए थे।

उसके सामने बैठते ही न जाने कहाँ से स्कूल की कक्षाएँ, कॉलेज की गलियाँ, टिफिन बाँटना, बेवजह खिलखिलाना, छोटी-छोटी शरारतें, रूठना-मनाना, अधूरे सपने और शादी से पहले की वह बेफिक्र दुनिया… सब लौट आती है। लगता है जैसे जिंदगी ने कुछ घंटों के लिए उम्र की सारी सीढ़ियाँ उतार दी हों और हम फिर वही छोटी-सी लड़की बन गए हों, जिसके पास जिम्मेदारियाँ नहीं, बस सपने और ढेर सारी हँसी थी।

बातों का सिलसिला शुरू होता है तो सिर्फ हम दोनों की बातें नहीं होतीं। उन पुरानी सहेलियों के नाम निकलते हैं, दोस्तों के चेहरे याद आते हैं, पुराने घरों की खिड़कियाँ, गलियाँ, स्कूल का रास्ता और जाने कितने परिचित चेहरे स्मृतियों में दस्तक देने लगते हैं। कुछ लोग अब पास नहीं हैं, कुछ शहर बदल गए, कुछ रिश्ते समय की भीड़ में कहीं पीछे छूट गए… लेकिन यादों में सब आज भी वैसे ही हैं।

और तब एहसास होता है कि उम्र चाहे कितनी भी आगे निकल जाए, बचपन हमारे भीतर कहीं चुपचाप बैठा रहता है। बस किसी अपनी सहेली की आवाज़, एक पुरानी बात या एक साथ बिताया हुआ कुछ समय उसे फिर से जगा देता है।

उसके साथ बैठकर लगता है कि हम आज की उम्र में नहीं, फिर उसी उम्र में हैं जहाँ चिंताएँ बहुत छोटी थीं और खुशियाँ बहुत बड़ी… जहाँ किसी सहेली का साथ ही पूरी दुनिया हुआ करता था।

शायद इसलिए बचपन की सहेली से मिलना, सिर्फ अपनी सहेली से मिलना नहीं है।यह अपने उस पुराने रूप से मिलना है, जिसे जिम्मेदारियों की जिंदगी में कहीं पीछे छोड़ आए हैं।यह उन गलियों में लौटना है जहाँ बचपन आज भी हमारा इंतज़ार करता है।

और शायद सबसे बढ़कर…

यह मायके को फिर से जी लेना है, कुछ घंटों के लिए ही सही।

क्योंकि कुछ सहेलियाँ सिर्फ दोस्त नहीं होतीं, वे हमारे बचपन का वह घर होती हैं, जहाँ लौटकर मन आज भी वैसा ही हो जाता है… निश्चिंत, निश्छल और बिल्कुल अपना।

#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका