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शनिवार, 26 दिसंबर 2020

स्त्री - नजरिया

मुक्तक ,क्षणिकाएँ ) 

1# .देवताओं का भोग,

इंसान की भोग्या,

प्रारब्ध तेरा ,

देवदासी सा।।


2#.ससुराल की मर्यादा,

मायके का मान,

फिर भी बनी रही,

तू सजावटी सामान।


3#.सरस्वती की पुत्री,

और दुर्गा का भान,

बलात तुझे जुटाना ही होगा,

लक्ष्मी का सम्मान।।


4#.वस्त्र विन्यास तेरा ,

बस होगी तेरी पहचान,

6 गजी साड़ी में,छुपा रखेगी ,

समाज के दोहरे आयाम।।


रविवार, 26 नवंबर 2017

सेल्फ़ी

पता नही क्यों पर मैं अपनी सेल्फ़ी लेने के बाद संतुष्ट नही होती। कुछ ना कुछ कमियां हमेशा ही दिखती हैं। सैकड़ों में एक भी तस्वीर नही भाती हमको। शायद इसलिए क्योंकि उस वक़्त हम खुद को अपने नज़रिये से देखते हैं और कभी आत्म मुग्ध नही हो पाते। बिलकुल वैसा ही गणित जिंदगी में भी लागू कर पाएं तो कितना अच्छा होगा। सैकड़ों जनहित/परोपकारी कार्यों को करने के बाद भी हम संतुष्ट और संतृप्त ना हो। जैसे ढेर सारी सेल्फ़ी डिलीट कर देते हैं वैसे ही अपने अच्छे कर्मो का लेखा जोखा भुला कर और बेहतर करने का प्रयास करें ।नेकी कर दरिया में डाल टाइप फीलिंग।


दोनों स्थिति में आत्म मुग्धता स्व प्रवंचना है। काश की मेरे सत्कर्मों की सेल्फ़ी में संतुष्ट रहूँ पर कभी संतृप्त ना होऊं

स्त्री गंध / या प्रेम की ग्रंथि

मैं जब जब प्रेम बोलती,
तुम तन क्यों चुनते हो??
मेरे भावों की भाषा में,
भोगों के संवाद क्यों बुनते हो???
मन के असीम धरातल को,
तुम बांधते रहे सदा ,
कुछ दैहिक ज्यामितीय रचनाओं में।
मैं जब बनना चाही,
तुम्हारी रात का अंत ,
होकर सुबह की अतिशा,
तुमने मुझे चाँद में बांध दिया।
जब भी रुकना चाही ,
तुम्हारी अलसाईं सुबह में ,
ओस की ताजगी बनकर ,
तुमने मुझे अख़बार बना दिया।
शाम ,जब मैं तुममे ढलना चाहती थी,
तुम्हारे टूटनों को ,
खुमारी में गढ़ना चाहती थी।
तुमने फिर ढूंढना ,
शुरू कर दिया,
मेरी स्त्री गंध का स्रोत ।
क्या तुम नहीं जान पाते,
मेरे प्रेम का आधार मन है।
तन जल्द ही रीत जाता है,
इन सांसारिक खेलों के ,
दैनिक क्रमों से।
क्यों ना ये होता की ,
तुम ढूंढ लेते मुझमे ,
प्रेम की ग्रंथि।
मन जब तुम बांध लेते,
तन भी उस संग,
बन जाता बंधुआ तुम्हारा।
मन मेरा आकाश है,
जो तुममे छाना चाहता है।
तन जब रीत जाए,
तब तुम्हें अपनाना ,
चाहता है,
मेरा तन ,प्रत्याशा में ,
मेरे मन को,
चुने जाने की स्थिति में।
बोलो अब तुम ,
क्या चुनना चाहोगे???
तुम ही चुनो अब,
स्त्री गंध /
या प्रेम की ग्रंथि ।।

उन्मुक्त मन का आसमान ...


.हाँ मेरे पास भी है मेरा अपना आसमान ,
जिसमे सितारों की तरह दिखते हैं,
मेरे अरमान,
आकार है उसमे ,
पर विस्तार नही...
मेरा अपना है वो.पर वो एक संसार नही ,कुछ सीमित सा,/कुछ अदृश्य सा ,,,दुनिया से अब भी अछूता ...तुमने देखा ना होगा....?????देखोगे कैसे...!!!!!!!वो एकांत है ,,एकाकी है ,मेरे आँखों में बसता है,मेरी सोच का रस्ता है...मर्यादाओं से घिरा, वो छुपा है,,इन् चारदीवारियों पर टिकी ,एक छत के नीचे,बिलकुल मेरे अतीत की तरह .मेरे ह्रदय की कठोर दीवारों के भीतर छिपे मर्म की तरह ..जहाँ रोज मैं उडती हूँ..अपने कटे पंखों को सोच में समेट कर...तुम्हारे बन्धनों की सीमाओं में ....
उन्मुक्त मन का मेरा भी,
है . .एक खुला आसमान .
चार दीवारी से घिरा ,
पर बस मेरा ,,,,सिर्फ मेरा
है एक आसमान ...



मैं रोज;मैं होने का,
स्वांग रचती हूँ। 

मैं जब मैं होती, खुद को जीती।
स्वांग में ढोती हूँ, कई अनचाहे सम्बन्ध।।


मैं जब मैं होती,होती एक उन्मुक्त सोच।
स्वांग रचते ही ,ढोने लगती कई कोढ़ सी कुरीतियां।।

मैं ,मैं होने पर जीती,एक स्वछन्द मन।
स्वांग में घुसते ही ,होती अनुगामित तन।।

मैं ,जब मैं होती,मुझमे छाता एक अनंत आसमान।
स्वांग जीते ही मुझे समेट लेती,कई अवांछनीय मर्यादाएं।।

मैं ,मुझ में होने पर खुशी से जीती ,कई कड़वे सच ।
स्वांग में ढककर , परोसने होते कई मीठे से झूठ।।

हाँ मैं ;मैं के स्वांग में ,
मैं होकर भी संतुष्ट नही होती।
क्योंकि मुझे ;नही भाते ,
उपमाओं के अलंकार।।

मैं होना चाहती,
निराभरण ,पारदर्शी ,
एक आत्मा सी।

मैं ,मैं में तब होउंगी संतृप्त,
जब तुम बाध्य ना करोगे,
मेरे स्वांग को सराहा कर,
मुझे सिर्फ मैं में ही स्वीकार कर।।

अन्यथा मेरा "मैं " तत्पर ,
उद्द्यत रहेगा ।
खुद में सर्वांग होने को,
मैं के आत्म बोध में ,
"मैं" का मुक्तिबोध जीने को।।

टैबू -2



इस शीर्षक पिछले भाग "इनबॉक्स" में आप सबकी बेहतरीन बहुआयामी टिप्पणियों ने मुझे इस दूसरे भाग "शारीरिक सम्बन्ध" को लिखने के लिए प्रोत्साहित किया।
ये शब्द सामने आते ही हम सबके दिमाग मे अलग अलग तरह के ख्याल आने लगते हैं। कुछ के लिए निषेध, कुछ के लिए कर्तव्य ,कुछ के लिए जीवन का विशेष और अनिवार्य पहलू और कुछ की दृष्टि में मज़ेदार विषय।
दअरसल ये सब आपके माहौल और परवरिश पर निर्भर करता। की आप किस विषय को कैसा सोचते। सभ्यता के विकास के साथ साथ हम जैसे जैसे अपग्रेडेशन की सीढ़ियां चढ़ते गए ,कुछ क्षेत्रों में हमारे सोच के दायरे सिकुड़ते चले गए।
मानव जीवन के चार पुरूषार्थ में धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष को माना गया। और जो विषय पुरुषार्थ में शामिल वो त्याज्य कैसे हो सकता?????
दरअसल काम मानसिक ,शारीरिक और भावनात्मक स्तर पर ही पूर्णता पाता। 
आपको लग रहा होगा कि मैंने क्यों ये विषय चुना। तो जरा अपने आस पास देखिए,खबरों पर नज़र डालिये। बलात्कार ,अवैध गर्भपात ,छेड़छाड़ जैसी घटनाएं , यौन हिंसा क्या आपको व्यथित नही करती???? 
अगर देखा जाए तो काफी हद तक इसके लिए हमारे बनाए गए दायरे या टैबू जिम्मेदार हैं। एक उम्र में आने के बाद लगभग हर किसी की स्वाभाविक उत्सुकता इस विषय पर होती। किन्तु अपनी शंकाओं के समाधान के लिए उचित संसाधनों और मार्गदर्शन के अभाव में गलत माध्यमो के द्वारा अधकचरा और निम्न स्तरीय साहित्य का सहारा लेते। 
हमारा सामाजिक और पारिवारिक परिवेश भी ऐसा होता कि हम अपने अभिभावकों से या किसी बड़े से इस संबंध में बात करना खास निषेध पाते। 
परिणामस्वरूप प्रकृति का एक अनमोल वरदान ,अभिशाप में बदल जाता। जो सम्बन्ध जीव के अस्तित्व को निरंतरता प्रदान करते , वो किसी की मान ,मर्यादा, भावनाओं और जीवन पर संकट बन जाते ।
तो कैसे रोका जा सकता।
रोकना तो सम्भव नही पर इन सम्बंधों के बारे में संतुलित और सरल जानकारी देकर काफी हद तक हम नियंत्रित कर सकते। इसे टैबू की तरह बच्चों के सामने प्रस्तुत न करें । बल्कि इसका परिवारिक ,सामाजिक जीवन मे प्रभाव बताएं । उन्हें हर पहलू बता कर चुनाव के लिए बोलिए। 
ये सिर्फ बच्चों के लिए नही बल्कि उस वयस्कों पर भी लागू होता जो निजी सम्बन्धों में किसी किस्म की समस्या महसूस करते किन्तु उचित सलाह के लिए योग्य सम्बंधित से सम्पर्क में झिझक महसूस करते और अपना जीवन नरक कर लेते।
जो आपके जीवन का अनिवार्य पहलू उसके बारे में सही जानकारी से झिझकना ,स्वयम के जीवन और खुशियों से झिझकना जैसे हैं। 
आपको सही स्रोत और जानकारी आपको जीवन के प्रत्येक पहलू में सफल और उत्कृष्ट बना सकता । याद रखें चरित्र निर्माण स्वयम की कमजोरी को छिपा कर नहीं,बल्कि उन पर विजय प्राप्त कर किया जाता।
स्वस्थ रहें, सुलझे हुए रहें ।
शुभरात्री माता मधुमयी की ओर से। 💐

टैबू -1

आज एक मित्र से बात करते हुए मुझे अचानक दिमाग मे दो ऐसे विषय मिले जिन पर चर्चा करना बहुत जरूरी है ,पर हम उससे किनारा काट लेते।
सामाजिक तौर पर हम इन्हें "टैबू" मान लेते। जबकि दोनों हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़े विषय हैं।
एक विषय है "इनबॉक्स " और दूसरा है "शरीरिक सम्बन्ध" ...
अरे आश्चर्य नहीं करिये। । मैं इन दोनों के विषय मे बात करने को टैबू नही मानती।
Fb में अक्सर महिलाएं और लड़कियां ,कभी कभी पुरुष (कुछ विशेष क्षद्म महापुरुष) भी इन्बॉक्स में बात करने को एक विशेष तरह का निषेध बना कर रखते। इनबॉक्स में पिंग करने की बात करते ही यूँ उछलते जैसे बिच्छु ने उन्हें डंक मार दिया हो। हां ये सच है कि सबका नज़रिया अलग होता। पर इनबॉक्स को लेकर गलत धारणा बना लेना भी गलत सोच है। अगर आपसे पूछूँ की क्या बुराई है बात करने में तो जवाब होगा लोग आपकी सहजता का सोचे बिना परेशान करते ,तारीफ करते फालतू।
कुछ हद तक मान सकती हूँ ,पर अपनी सहजता और प्राथमिकता तय करना हमारे हाँथ में है। जिससे हम असहज हों उनसे क्षमा मांग कर अपना मत रख दें। तब भी समस्या हो तो मैसेज ब्लॉक करने का बहुत अच्छा विकल्प है।
दअरसल इनबॉक्स हमारे मन के उस कोने जैसा होता जहां हम सभी की उपस्थिति को सहज नही लेते। जैसे आपके घर के आंतरिक कक्षों में सबका प्रवेश नही हो सकता।
मैं अपने मामले में बताऊँ तो हां ,इनबॉक्स में बात करती। पर सबसे मैं भी सहज नही होती। वहाँ मैं उनसे ही सम्वाद करती जो मेरे लिए इतने आत्मीय होते की उनके सामने बिना लाग लपेट के अपने अंदर के सच को बेझिझक बोल सकूं। वो जो मुझे समझाईश दे सकें । मुझे हक से डांट सके। मैं उनकी जिंदगी का एक हिस्सा होऊं जिससे वो भी अपने सुख ,दुख, सपने बोल सकें।
मेरे लिए इनबॉक्स
और कई बार जो लोग बहुत मुखरता से इनबॉक्स को नकारते वो लोग मुझे फेक लगते। या तो वो सम्वेदना हीन होते या अतिव्यवहारिक ,या इनबॉक्स के प्रति उनके मन मे कोई पूर्वाग्रह या डर होता।
टैबू नहीं ,बहुत ही खास कोना है।
दोस्तों इनबॉक्स के प्रति नज़रिये को बदलिए। आपको आपका खास कोना कैसे सजाना ये आप तय कर सकते। कुछ आत्मीय रिश्ते, दोस्त और सुकून के पल तो आपकी भी चाहत ना ????????????

साधिका की वेदना

सुनो ,मेरे विचार निरभ्र आकाश नहीं,ये है विदीर्ण ,अधकृत ,अपरिमित से ही सही ,पर इसे बान्धा हुआ है मैंने एक जाने पहचाने से निश्चित आकार में ।
सुनो मन मेरा कोई हिम स्खलित उच्छ्रंखल जल धारा नहीं, ये एक अंत सलिला सा है। जो कई सतहों से विवर्तन से गुजरता। क्या ये अलौकिक पयोधि का निश्चित प्रारब्ध पाएगा??
इन समस्त गुण दोष से प्रस्तर भिंनित मेरी अर्ध निम्लित दृष्टि ;विवर,आक्रांत ,निर्वापित वर्जना की सीमा से परे देखना चाह रही है। विपन्न भाव और म्लान स्मृति की स्वामिनी मैं ,अब चाह रही है एक प्रतष ,प्रतकर्य ,वैयक्तिक सन्निधाता।
बिल्कुल विपन्नाव की तीव्र वांछना होती एक सहज ,विपरिक्रान्त ,औदार्य प्रश्रय । सम्भवत: भंवर से लड़ती उसकी परिणीति भी यही शांति होती।
मेरी व्याकुल सी दृष्टि विस्तीर्ण भाव से भृंग बनकर निर्निमेष तुम्हें ही निहारती है। हे मधुसूदन , अब स्वीकार कर लो एक आराधिका के पार्थिव पूजन और प्रेमपगे भावों को। मुझे मोक्ष नहीं, भक्ति दो।

तुम्हारी साधिका की वेदना

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

फिर से

शंख फिर से फूंक दो ,दो प्रेरणा इस देश में,
ज्ञान का प्रकाश दो ,दो सभ्यता इस देश में..
संसार में हम ढूंढते हैं आज ऐसा आदमी ,
इंसान खुद को कह सके; मिलता नही वो आदमी..
मर्यादा का पाठ भूले,राम के इस देश में...

असुर तांडव कर रहे हैं ,मानवों के वेश में ...
तो शंख फिर से फूंक दो ,दो प्रेरणा इस देश में,
ज्ञान का प्रकाश दो ,दो सभ्यता इस देश में..

 डॉ मधूलिका

वापसी

लो लौट ही आए,फिर
ख्यालों की दुनिया में हम।
हकीकतों के,
मुखौटे भी,
यहाँ चेहरों से ,
ज्यादा स्याह हैं ।।
(डॉ.मधूलिका)

संवेदना

"संवेदना तुम कहाँ हो?
स्थितियां कहती है,
तुम नहीं रही.
क्या यही एक सत्य है....
तुम विदीर्ण हुई??
तुम विलुप्त हुई????
देखा था,
मानवता में तुम्हारा वास था,
मर्यादा तुम्हारा लिबास था.
हर सांस में वेदना का साथ था ..
जुबां पर "दया-करुणा" का वास था ।
हमें यकीन है ;तुम अशेष हो,
बिन चुके ,बिना रीते,
जीवंत हो, लौट आओ।।
वेदना को,
तुम्हारी तलाश है,
मर्यादा को ,
तुम्हारे लौट आने की आस है ,
दया-करुणा,
तुम बिन उदास हैं...
मानवता को ,
तुमसे ही जीवन की आस है.......
संवेदना "तुम कहाँ हो"?
(डॉ. मधूलिका)

विप्लव गान

कवि तुम विप्लव गान लिखो,
उत्सव नही आह्वान लिखो।
अधरों पर तुम रस ना लिखना,
वीरों के यश गान लिखो।
बसंत पर्व पर प्रणय ना लिखना,
साहस, शौर्य ,बलिदान लिखो।
प्रणयी की मनुहार ना लिखना,
मातृभू पे उत्सर्गों के प्रमाण लिखो।
कवि तुम विप्लव गान लिखो,
उत्सव नही ,आह्वान लिखो।।

(नमन माँ भारती और उनके उन पुत्रों को जो अपने प्राणों का उत्सर्ग कर ,हमें उत्सव मनाने के अवसर जुटाते हैं।जय हिंद की सेना)
(डॉ.मधूलिका)

अंदाज़

अधूरी ख्वाहिशों के सफ़र...
और धुंधले से कई ख्वाब।
जिंदगी मैंने देखे,
बस तेरे यही अंदाज़ ।।
शुभरात्रि
(डॉ. मधूलिका)

मुट्ठी भर आसमान

जीने दो मुझे,
कुछ मुट्ठी भर अरमान ,
पैरों के नीचे थोड़ी जमीन,
और सर पर ,
एक टुकड़ा आसमान ,
ना समझो मुझे तुम , ,
देवियों के समान ,
बस जीने दो मुझे,
अब बन कर इंसान ।।

(डॉ.मधूलिका)

तमाशा

रुसवा दिल ,तनहा ख्वाब,
नम सी आँखे ,
और शिकवे हज़ार...
पत्थरों के जंगल में ,
जज्बातों का बाज़ार... 
मुहब्बतों का ये तमाशा.
हमसे ना हो सकेगा ...
मुहब्बतों का ये तमाशा.
हमसे ना हो सकेगा ...

(डॉ. मधूलिका )

आक्रोश

धुंधली दृष्टि,आंसुओं से।
उबलता खून ,धमनियों में।
अभी तरलता, कभी विरलता,
अभी डूबता,कभी उबरता।
अभी कठोर,कभी आक्रांत,
अभी कोलाहल,कभी एकांत।
अन्तस् ,अनंत सा।
विचार,शून्य सा।।
उंगलियों के पोरों से ,
छिटकते कई भाव।
प्रवाह है निरंतर,
हाँ पर रुके हैं ,
भावों के प्रमाद।।
(डॉ. मधूलिका)

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

अच्छा होगा

टेढ़ी-मेढ़ी , ऊंची नीची पगडण्डी सा
ये सफ़र.
अब थम जाए, तो अच्छा होगा ,
उधडा-उजड़ा , रंगहीन सा
ये निर्झर ,
बंध जाए, तो अच्छा होगा ,
मन -साधन ,माया और मोह का ,
ये चक्कर ,
थम जाए ,तो अच्छा होगा ,
कर्म-क्रोध ,धर्म और द्वेष का ,
ये गह्वर ,
सूख जाए, तो अच्छा होगा
नीरस - विकल , वीतराग सा
ये जीवन
अंत होए, तो अच्छा होगा ,
विनय,आराधन ,शाश्वत सुख , संयोग समाधी ..
का अनंतिम,
ज्ञान मिले, तो अच्छा होगा ,
जीवन का जो मोह छूट कर ,
मृत्यु का ,
अंतिम स्पंदन ,
मिल जाए ,तो अच्छा होगा...
(डॉ. मधूलिका )

गुरुवार, 16 जून 2016

फूल पत्ती कवियत्री

एक मुक्तक , जिसे गद्य या पद्य विधा से अलग भाव से पढियेगा। हाँ इसमें रस और प्रवाह का पूर्णतः अभाव है। ये कविता नही आत्मकथा है,एक फूल -पत्ती कवियत्री का।
सुधार सुझाव आमंत्रित।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
कल्पनाएं अनंत की ,,,
पर दुबके होते हैं ,
एक कमरे के कोने में।।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
सपने सजाते हैं ,पलकों पर।
पर बेझिल होती हैं ,
छुप के रोती हुई ,
आंसुओं के बोझ से।।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
सहेजती कोमल भाव,
सजाती ख्याल फूलों से,
जीती हैं रोज ,
कांटो सी सच्चाई।।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
तुम्हारे अमर्यादित हास्य की,
एकमात्र नायिका,
भोगती हैं,
कई पीड़ित सम्बन्ध ।।
हम फूल पत्ती कवियत्री।।
नापते हैं ,ख्यालों में दुनिया,
हम सिमटे होते हैं,
बस दो जोड़े "सामानांतर" ,
दीवारों से। ।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
परोसते रूमानी मुक्तक,
मुस्काते हैं तस्वीर में,
और गढ़ते एक,
गुड़िया सी छवि।।
कभी जी कर देखना,
इच्छाओं को समर्पण का,
जामा पहनाकर।
हम फूल पत्ती कवियत्रियों ,
का सच ...
खिड़की से दृश्य को,
दुनिया समझती।
और हक़ में हमारे बस,
एक टुकड़ा ,आकाश का,,,
और एक कतरा धूप।।
(डॉ. मधुलिका)

ईश्वर

अचानक मोबाइल पर रिंग आई, हमने जैसे ही हैलो कहा ; दूसरी तरफ से माँ की आवाज़ आई " गुड़िया तुमने कॉल किया था ?" दिमाग में तो तुरंत उत्तर दिया- नही. पर दिल ने कहा हाँ ।
तो हमने उत्तर दिया ,नही । दरअसल अक्सर हम अपने घर ( मायके) पर फ़ोन पर मिस कॉल देते हैं, वहां से हमारे नेटवर्क में फ्री कॉल की सुविधा के कारण माँ या पापा बेक कॉल कर लेते हैं ।और आज मेरे बिना मिस कॉल के ही कॉल आ गया था।
मेरी आवाज़ सुनते ही माँ ने दूसरा प्रश्न दागा; "तुम्हारी तबियत ख़राब है क्या?" मैं अवाक रह गई, माँ को कैसे पता चल गया ! दरअसल 8 दिन पूर्व फर्श पर पानी के कारण मैं फिसल गई थी, पहले दर्द कम था पर नजरन्दाज़ी के कारन गुरूवार से तकलीफ काफी बढ़ गई थी,और मैं बस डॉ के पास से दिखा कर वापस आई ही थी की माँ ने कॉल किया ।
रुलाई को भरसक रोकते हुए मैंने जवाब दिया हाँ ,घुटने के पास लिगामेंट रप्चर हैं, और सब बाईयां सामूहिक अवकाश पर चली गईं। आराम की बजाय काम और बढ़ गया।
माँ ने बेहद संयत स्वर में बोला की औरतों के साथ यही होता है। कोई नई बात नही ,और फिर उन्होंने ये बताया की उनके पैर की उँगलियाँ शून्य हो रही हैं। मेरी तकलीफ का सुनते ही बोलीं की मैं समझ सकती हूँ की तुम्हें क्या महसूस हो रहा होगा।
पर मैं जानती हूँ माँ की ये आप "समझ" नही बल्कि "महसूस" कर रही होगी । मेरी तकलीफ को मुझसे भी ज्यादा । और एक मैं जिसे ये पता भी नही की माँ किस तकलीफ में है। कितनी स्वार्थी संतान निकली मैं।उनकी महीनों से चली आ रही तकलीफ की मुझे कोई जानकारी नही। और मेरी 2 दिन पुरानी तकलीफ उन्हें समझ आ गई। बस माँ से ढेरो अपेक्षा, बदले में सिर्फ अपनी तकलीफें ही देती हूँ उन्हें ,मानसिक रूप से झेलने को।
सिर्फ माँ ही है वो जो अपनी सारी तकलीफ भुला कर आपके गम / तकलीफ जीना चाहती है। सिर्फ वही है जिसके पहलू में रोकर हमको शांति मिल सकती है। सिर्फ वही है ,जो कोरी सांत्वना नही देती ,बल्कि आपकी तकलीफ को ख़त्म करने का हर प्रयास करती है।
सच में माँ से बढ़कर कोई नही। ईश्वर भी नही।
माँ वाकई तुम महान हो, दुनिया में ईश्वर के अस्तित्व पर मुझे सदा सदेह रहता है। पर तुम मेरी ईश्वर हो ,इसका प्रमाण जुटाने के लिए मुझे प्रयास भी नही करना पड़ता। तुम ही मेरी ईश्वर।
मेरी पूजा की पहली अधिकारी "सिर्फ तुम हो माँ"
Missing u "माँ" 

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

भूटान यात्रा संस्मरण- पहाड़ों से पहला साक्षात्कार ( भाग -7...अंतिम )

दिनांक 8 मार्च ,,,, वापसी  की तैय्यारी  शुरू हुई. सुबह बेझिल मन से पैकिंग हुई. पर अभी उत्साह चुका नही था. क्योंकि अभी एक और स्थान शेष था...."पारो "...भूटान  का इकलौता एअरपोर्ट भी यही है. कुछ रोमांच शेष था...तो पूर्वनियोजित कार्यक्रम के अनुसार हम सुबह 8.30 पर थिम्पू को विदा कहने को तैयार  थे... वापसी में  ये जगह और भी  प्यारी लगने लगी. ऐसा लगा जैसे मन का एक हिस्सा यही छूटा जा  रहा है...अपना कुछ महत्वपूर्ण  सामान  खोया  सा महसूस हुआ... वापस लेकर आ  रहे थे कुछ खुशनुमा यादें.... और फिर  सफ़र के वही संगी फिर मिले जो आते वक़्त मिले  थे...आकाश  को छूते पहाड़...और कल कल बहती थिम्पू नदी.. 

थिम्पू के "ताशी दिलेक " कहते ही पारो और थिम्पू नदी का संगम स्थान और उस पर बने ब्रिज को पार कर हम दाहिनी ओर के रास्ते में पारो  की ओर बढे .चुज़ोम  के बाद   ही वांगचु नदी का पुल पार किया.. जिस पर लहराते "प्रेयर फ्लैग " मन को आपने साथ उड़ा ले जाते हैं..हवा की गति से. कहते हैं की इन प्रेयर फ्लैग पर लिखी प्रार्थनाओं को ईश्वर तक पहुँचाने का काम ये हवाएं ही करती हैं... देखा हमने हवा को भी काम बता दिया...यहाँ वहां यूँ ही मत डोलो....जाओ हम इंसानों की प्रार्थना, हमारे सन्देश हमारे ईश्वर तक पहुँचाओ :) ....

ओल्ड पारो रोड के बिलकुल पहले हमें फिर से बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन की दान्तक (dantak ) कैंटीन दिखी. पर अभी पेट पूजा किये हुए ज्यादा वक़्त नही बीता था इसलिए वहां रुकना व्यर्थ लगा...और हम जल्द ही पारो एअरपोर्ट के नज़दीक थे....बिलकुल इसी वक़्त एक एयरोप्लेन में दिखाई दिया... पहाड़ों के बीच एक इंसानों की बनाई चिड़िया...
पर ये क्या....वाह .. :D सड़क से  बिलकुल लगी हुई हवाई पट्टी (रन वे ) पर एक हवाईजहाज उड़ान भरने की तैय्यारी में दिखा. पतिदेव ने झट से गाड़ी किनारे लगा कैमरा निकाल इस पल को कैद करने के लिए तैयार हो गए...अब इसमें क्या खास हो सकता है...?
ये पूछिए की क्या खास नही था...? रनवे पर दौड़ लगाकर ऊपर उठने के बाद पहाड़ो से घिरी इस जगह पर ऐसा लग रहा था की जैसे कोई पक्षी अपने डैने खोले उनसे टकराने जा रहा हो और अचानक उसे किसी की याद दिशा बदलने पर मजबूर कर देती है और वो तिरछा होकर लहराते हुए अपने नीड़ का रुख कर लेता है... अब तक मैंने इससे ज्यादा रोमांचक  टेकऑफ नही देखा...
इस बड़ी चिड़िया के फुर्र होने के बाद हमने पारो शहर का एक चक्कर लगाया...हालाँकि यहाँ पर विश्वविख्यात " टाइगर नेस्ट मोनेस्ट्री " है ,पर बिटिया को गोद में लिए हुए एक कठिन चढ़ाई पर ट्रेक करते हुए जाना मेरे लिए असंभव था. पतिदेव ने भी वहां घूमने का विचार त्याग दिया ,,शायद इसलिए भी की दोबारा आने का तीव्र आकर्षण बरक़रार रहे..तो हमने पारो रुकने का भी विचार त्यागा और शहर का एक चक्कर लगा वापस स्वदेश का रुख किया...इस पूरे शहर में लगभग सड़क से सामानांतर चलती हुई पारो नदी एक सन्देश देती हुई सी लगी...."सुनो मुझ जैसे बनो....निश्चल ,पारदर्शी , उत्साही और प्रवाहमान.." जो हो गया उसे भूल कर आगे बढ़ते जाओ...राह की बाधाओं को पानी की तरह तरल व्यव्हार से जीतो...
यहाँ की नदियों को सच में प्रकृति का आशीर्वाद मिला हुआ है...प्रदूषण से दूर एकदम शुद्ध... पारदर्शिता इतनी की उनमे पड़े हुए कंकड़ भी आप देख कर ही गिन सकते हो....ऐसा लग रहा था जैसे शीशा का द्रवीय रूप है ये... कुछ देर हम मंत्रमुग्ध से पारो नदी के शुद्ध और निश्चल प्रवृत्ति/प्रवाह को ही निहारते रहे... फिर बिटिया का ख्याल...उसकी भूख की फ़िक्र...तो वापस चलना ही पड़ा .
इस बार  हमारी कार के साथ कई विदेशी सैलानियों की गाड़ी भी कारवां में शामिल हो गई जो थोड़ी देर पहले एअरपोर्ट पर उतरे थे... कुछ वही रुके होंगे बाक़ी की गाड़ियाँ थिम्पू की ओर रवाना हुई ,,जो हमारी गाड़ी की सहयात्री और कुछ प्रतिद्वंदी बनी..वापसी में  थिम्पू -पारो नदी के संगम पुल पर कुछ बाइकर दिखे..अतिउत्साही ...हवा से बातें करते हुए.. स्वतंत्र..निर्भीक...जीवन को रफ़्तार के साथ जीने का जज्बा लिए हुए.. वाह हमें भी  रफ़्तार से भर गई उनकी बाइक की गति... साएँ....साएँ...ज़ूम....ज़ूम ..
चलिए हम अब बढ़ चुके वापस अपने देश की ओर...वही दृश्यावली वही मोहक नज़ारे...पर पहले मिलने आए थे..अब धीरे धीरे पीछे छूटने लगे...बिछड़ने लगे..वो बर्फ की चूनर सरकाती पर्वत -माला  दुल्हन अब भी हमें निहार रही थी ,,एक आस के साथ...की वापस मिलने आओगी ना..? मुझे भूलना नही.... :'(
 
लगभग 1.30 पर दान्तक कैंटीन पहुँच कर हमने डोसा और बिटिया को मैगी खिलाई...वहां पर एक स्थानीय परिवार (   फ़ुएन्त्शोलिन्ग निवासी)  थोड़ी ही देर में हमसे या .. उन्होंने बताया की  बच्चे  की  गर्मी  नही  सहन  कर पा  रहे  हैं  इसलिए  वो थिम्पू जा रहे  हैं..वो काफी सह्रदयी लोग थे..लौटते हुए उन्होंने हमें संथला ( संतरा :) ) की विदाई दी.. जो की बिटिया को खाने के लिए दिया गया था... बेटी -बहू ,दो छोटे प्यारे से बच्चे और वो अंकल- आंटी हमरी यादों माँ हिस्सा बनने जा रहे थे.. और हाँ एक शब्द भी..केटा /केटी ( लड़का/लड़की ) जो उन्होंने हमें सिखाया :)
तो अब हम केटी को लेकर सिलीगुड़ी की ओर रवाना हुए.रास्ते पहचाने हुए थे शायद इसीलिए सफ़र अपेक्षाकृत छोटा महसूस हुआ .शाम 7 बजे हम सिलीगुड़ी पहुंच चुके. फिर उन्हीं कर्मों की पुनरावृत्ति ........जो अब तक आप जान चुके हैं .:)
9 मार्च को हम सिलीगुड़ी से 11.45 पर चलकर शाम 7 बजे मुजफ्फरपुर पहुंचे. होटल और रास्ते देखे सुने थे ,इसलिए कोई भी असुविधा ना हुई..
इलाहाबाद रीवा रोड की दुर्दशा से सहमे हुए हमने अपना यात्रा मार्ग परिवर्तित करने का मन बना लिया था , तो लिहाज़ा हमने दुसरे दिन सुबह 9 बजे मुजफ्फरपुर से लखनऊ/कानपूर की ओर रुख किया... यह यात्रा में लगने वाले समय पर निर्भर था की हमारा आज का गंतव्य क्या होता...लखनऊ या कानपूर..?
दोपहर 3 बजे हम फ़ैजाबाद (अयोध्या ) में भोजन कर 5.30 पर लखनऊ पहुँच चुके थे ,हमारे पास अभी भी कुछ वक़्त शेष था और सूरज की रोशनी की उपलब्धता थी..इसलिए हमने गाड़ी सीधे कानपूर की ओर रखी..लखनऊ के एअरपोर्ट रोड के बाइपास से गुजरते वक़्त वहां के नज़ारे भारत के महानगरों सा भ्रम दे रहे थे ,कहीं ना कहीं ये भी नए महानगरों की होड़ में दिखा..7.30 पर हम कानपूर में थे. शहर की बजाय हमने रिंग रोड के पास ही सुविधाजनक होटल लिया.
दिनांक 11 मार्च ....10.30 हम  निकले आज घर वापस पहुँचने के सफ़र में...वाया झाँसी( दोपहर 2 बजे) शाम 8.30 बजे हम अपने शहर (जबलपुर) अपने घर पर थे.इसके लिए सडको की अच्छी स्थिति के शुक्रगुजार हैं हम .. :p
पूरे सफ़र की थकान और कुछ असुविधाओं के बाद भी मन हो रहा था की काश ये सफ़र कभी ख़त्म ना होता  ....
मन अब भी बैचेन है ...उस प्राकृतिक सानिध्य में वापस जाने के लिए जो अब भी अनछुआ है...जहाँ अब भी मूल संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ है...दुर्गम स्थान  भी मानसिक शांति को जनक  हैं... और हाँ मेरे लिए तो मेरा पहला अनुभव था ना उस बर्फ की चूनर वाली  दुल्हन से मिलने का...जो लौटते हुए मेरी अभिन्न सखी बन गई थी ...जिसकी छवि मेरी आँखों में बसी हुई है... मन अब भी उसी  शांति में खोया है,,जहाँ गाड़ियों का एक हॉर्न भी ना सुना था....सुने तो सिर्फ प्राकृतिक स्वर ......
मुझे वो वापस बुला रहे हैं..मैं जाऊंगी भी ...ये देखने की क्या आधुनिकता का दंश उस घूंघट वाली दुल्हन की सुरम्यता नष्ट कर सकता है..कहीं  वो अनछुआ प्राकृतिक सौन्दर्य विकास की बलि तो ना चढ़ जाएगा...
भगवां करे ऐसा ना हो..क्योंकि जो शांति मैंने महसूस की वो चाहती हूँ की मेरी पीढियां भी महसूस करे..अन्वेषा भी होश सम्हालने औए सक्षम होने पर वहां जाए,,,औए वापस आकर जब वो अपना अनुभव लिखे तो मुझे ऐसा लगे की मेरा अनुभव ही बस थोड़े से रूपांतरण के बाद आया है...क्योंकि यादें वैसी ही रहती हैं..जैसा हम अनुभव कर आए हैं...यादें....रूपांतरित नही होती.यथावत रहती हैं.....चिरकाल तक ... :)
बस अब यादें शेष.... :)
थिम्पू में एक शाम....अन्वेषा 


थिम्पू से वापसी में ..एक दृश्य 

सिलीगुड़ी पहुँचने से पहले रास्ते में.....सूरज हुआ मद्धम <3

वापसी में ..एक दृश्य 

ललितपुर के पास ,बेतवा नदी 

ललितपुर के पास ,बेतवा नदी 

पारो एअरपोर्ट ....एक झलक 

पारो एअरपोर्ट पर उड़ान भरता विमान 

पारो एअरपोर्ट से  उड़ान भरता विमान 

पहाड़ों के बीच उड़ान 

पहाड़ों के बीच उड़ान 


पहाड़ों के बीच उड़ान 


लो पहुंचा आकाश में :)

पारो नदी 

पारो एअरपोर्ट 

अन्वेषा को विमान दिखाते हम 

वो देखो आकाश में......

मंत्रमुग्ध से हम 

दन्तक /दान्तक कैन्टीन ,पारो 

पारो के बाज़ार में .....बस यूँ ही.


थिम्पू और पारो नदी का संगम स्थल.

पारो  की ओर.

हमारा स्वागत :)

कुछ दूरी और जानकारी...

कार  के अन्दर से भी ...क्लिक :)

फिर मिली रफ़्तार ,,,,,,,,ज़ूम ... :) 

ये नज़ारे रोकते हैं राहें 

8००० फीट से भी ज्यादा ऊँचाई पर...

ताशी देलेक ......बाय बाय थिम्पू :(

थिम्पू -पारो रोड का एक दृश्य 

ये खंडहर कभी ताज महल था क्या ? :)

वांगचु नदी का पुल 

दान्तक कैन्टीन के पास एक दृश्य 

प्रार्थना स्थल.



कानपूर से घर की ओर सफ़र की शुरुआत...अन्वेषा और सुयश 

3927 km. यादों की दूरी