हर भूख का अपना अलग सिद्धांत होता है।
एक भूख शरीर को सुंदर बनाने के लिए स्वेच्छा से चुनी जाती है, दूसरी भूख जीवन बचाने की विवशता बन जाती है। यही हमारी सभ्यता की सबसे गहरी और सबसे दर्दनाक विडंबनाओं में से एक है।
एक ओर वे लोग हैं जो वजन घटाने के लिए हजारों रुपये खर्च करते हैं। महंगे डाइट प्लान, विदेशी फल, ऑर्गेनिक भोजन, न्यूट्रिशनिस्ट और डायटीशियन की फीस... सब कुछ इसलिए कि पेट कम भरे। दूसरी ओर वे लोग हैं जिनकी पूरी दिनचर्या केवल इस प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमती है कि ........आज कुछ खाने को मिलेगा भी या नहीं? अमीर की थाली में कैलोरी गिनी जाती है,गरीब की थाली में रोटियाँ।
संपन्न व्यक्ति कहता है, "आज सिर्फ सलाद, फल या पनीर खाऊँगा।" उधर एक गरीब पिता सोचता है ......शाम को बच्चों के लिए एक वक्त का भोजन जुटा पाएगा या नहीं, और एक मासूम बच्चा मन ही मन दुआ करता है, काश... आज एक सूखी रोटी ही मिल जाए।
एक अमीर जिम में पसीना बहाकर चर्बी घटाता है, जबकि गरीब तपती धूप में मजदूरी करके पसीना बहाता है ताकि उसके घर का चूल्हा जल सके।एक ने भूख को #जीवनशैली बना लिया है,दूसरा भूख को #नियति की तरह ढो रहा है।
समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जिसे भोजन सहज उपलब्ध है, वह उससे बचने के उपाय खोज रहा है, और जिसे भोजन की सबसे अधिक आवश्यकता है, वह उसे पाने के लिए पूरी उम्र संघर्ष करता रहता है।
भूख जब शौक बन जाती है तो उसका नाम "डाइटिंग" रख दिया जाता है, और जब वही भूख विवशता बन जाती है तो उसे "गरीबी" कहा जाता है।
इतिहास गवाह है कि कई बार भुखमरी इंसान की पीड़ा से अधिक, दुनिया की संवेदनहीनता का दस्तावेज़ बन जाती है। भूख से तड़पते, जीवन और मृत्यु के बीच झूलते किसी बच्चे के पास मंडराते गिद्ध की तस्वीर पूरी दुनिया में प्रतिष्ठित पुरस्कार जीत लेती है। वह तस्वीर अखबारों की सुर्खियाँ बनती है....... आर्ट गैलरी में प्रदर्शनियों की शोभा बढ़ाती है...... उस पर लेख लिखे जाते हैं..... संगोष्ठियाँ होती हैं....... मानवता पर लंबे-लंबे भाषण दिए जाते हैं। लोग उसी तस्वीर के सहारे अपनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन भी कर देते हैं।
लेकिन विडंबना देखिए...तस्वीर अमर हो जाती है।पुरस्कार मिल जाते हैं।लेखकों की कलम चलती रहती है।दर्शकों की आँखें कुछ पल के लिए नम हो जाती हैं........ बस उस बच्चे की भूख वहीं की वहीं रह जाती है।तस्वीर संग्रहालयों तक पहुँच जाती है.........लेकिन रोटी उस बच्चे तक नहीं पहुँचती।
शायद हमारी सबसे बड़ी त्रासदी भूख नहीं, बल्कि वह संवेदना है जो शब्दों तक तो पहुँचती है, कर्म तक नहीं। हम पीड़ा को दूर करने से अधिक, उसका वर्णन करने में दक्ष हो गए हैं। भूख को समाप्त करने से अधिक, उसे चित्रों, लेखों और विमर्शों में सहेजने लगे हैं।
जिस दिन किसी भूखे बच्चे की तस्वीर पुरस्कार जीतने के बजाय उसकी थाली भरने का कारण बनेगी, शायद उसी दिन मानवता अपने वास्तविक अर्थ को प्राप्त करेगी।क्योंकि भूख का समाधान शब्दों से नहीं, रोटी से होता है।जब तक किसी भूखे की थाली में भोजन नहीं पहुँचता, तब तक हमारी सारी संवेदनाएँ, सारे भाषण और सारे पुरस्कार अधूरे हैं।
# डॉ_मधूलिका
#ब्रह्मनाद

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