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रविवार, 12 मई 2024

हमारा मदर्स डे


 


सच कहूं तो मुझे अंग्रेजी वाला मदर डे कभी समझ ना आया।जब तक खुद मां नहीं बनी, उसके बाद समझ आया की इस दुनिया में बीज के रूप में आने के बाद से बच्चे का हर दिन मदर्स डे ही होता है। अगर रिश्तों को सैलरी देने का रिवाज होता तो "मां" जितनी सैलरी इस दुनिया में किसी को नहीं मिलती।ना जाने कितनी भूमिकाएं एक साथ निभाती, बिना जताए की वो खुद को ही हमारे लिए भूल सी जाती। 

साहब हम उस जमाने की पौध हैं ,जिन्हें मां ने जी भर के डंडों और झाड़ू से भी कूटा है 🤭 और बिना दिन विशेष सेलिब्रेशन के  मां का महत्व जिया है। खास बात  ये कि मां के द्वारा पीटे जाने पर  हमें चुप नहीं कराया जाता था , बल्कि ना चुप होने पर फिर से कूटा जाता था। उस समय  PTM में टीचर से शिकायत नहीं होती थी, बल्कि टीचर घर आ कर शिकायत करके फिर मां के हांथ तबियत से पिटवाते थे। 


#हम तब ग्रीटिंग, गिफ्ट और केक देकर ,

एक दिन को मां को समर्पित नहीं कर पाते थे, 

पर हां जिस दिन मां उदास हो  उस दिन ,

हम बिन बोले सारे काम समय से निपटाते थे,

अपने कपड़े - किताबें बिना टोके,

सही जगह जमा जाते थे। 


घर पर जिस दिन मां की डांट नहीं खाते थे,

उस दिन की शांति हमें अन्दर से डराती थी।

उस दिन खाना मां बिना कुछ पूछे ही बनाती थी।

दिन भर छोटी बातों पर भिड़ते हम बच्चे भी,

उस दिन कुछ ज्यादा ही अनुशासित बन जाते थे। 

मां गुस्सा है या दुखी है ,

कुछ समझ नहीं पाते थे।

मां से जाकर पूछ पाएं उनकी तकलीफ,

कभी भी वो हिम्मत जुटा नहीं पाते थे,

पर चुपचाप काम में लगी मां की आंखें देख,

हम बच्चे सब समझ ही जाते थे।

दिन भर कई बड़ों के ताने  सुनकर भी, 

पीड़ाएं चुप से आसुओं में बहा जाती थी।


कभी - कभी पापा को वो भी,

साड़ी ना दिलाने का ताना  दे जाती थी, 

पर जब हांथ में पैसे आए तो ,

कई जगह उन्हें छुपाती थी।


लाख हसरतें उसकी भी थी लेकिन,

पर अपने लिए कहां कुछ ले आती थी। 


चुपके से जोड़ के जमा किए पैसों से,

कभी हम बच्चों की यूं ही की फरमाइश , 

कभी राशन, कभी बिजली का बिल ,

कभी मेहमानो के खर्चों की ,

छोटी बड़ी कीमतें चुकाती थी, 

हां पर कभी पड़ोसन की नई साड़ी देख ,

थोड़ी सी ललचाती  भी थी। 

पर बच्ची की नई फ्रॉक या,

 बेटे की वो चमचम साइकिल ,

 वो साड़ी भी ज्यादा सुख पाती थी। 


हां सच है ,

कि जिस दिन हम उससे पीटे जाते थे ,

वो हमसे ज्यादा आंसू बहाती थी।

 रात को फिर हमारी पसंद का कुछ,

 विशेष व्यंजन बना आवाज लगाती थी।


हां ये सच है कि,

मेरी मां  टेक्नोलॉजी में थी थोड़ी अनाड़ी, 

स्मार्ट फोन और कंप्यूटर की नहीं थी उनको जानकारी।


एक छोटी सी मोटे गत्ते वाली डायरी में,

कुछ खास अवसरों की तारीखें लिखी जाती थी, 

फिर उन तारीखों में सुबह सुबह से,

वो बस  रसोई में पाई जाती थी।


तब सेल्फी में मुस्कुराने के जमाने नहीं थे ,

वो सबकी खुशियां ही अपने चेहरे में सजाती थी।

सबको भरपेट खिला और पड़ोस में भिजवा कर ही

मां के मन को एक विशेष तृप्ति आती थी।


हां ये सच है की ,

हमने मदर डे एक दिन में पहले कभी मनाया नहीं था,

क्योंकि मां हमारी हर दिन को त्यौहार बनाया था।


#ब्रह्मनाद

#डॉ_मधूलिका

शुक्रवार, 10 मई 2024

#मैं _कबाड़ी


 


#मैं_कबाड़ी 


मां मुझे कबाड़ी कहती थीं…. वैसे सच कहूं तो हूं ,अब भी 😊। इस शब्द के पीछे मेरी छोटी -छोटी पुरानी चीजें सहेज कर रखने की आदत थी ।पुरानी चिट्ठियां ,किसी सहेली का दिया हुआ बिना ढक्कन का सूखी स्याही वाला पैन, किसी सहपाठी की हैंडमैड ग्रीटिंग , कुछ छोटे छोटे तोहफ़े,जो न तो उपयोग किए गए और न ही अलग किए गए, एक पुरानी स्लैम बुक ,जिसकी लिखावट पेज के पीलेपन के साथ कहीं गाढ़ी और कहीं धुंधली सी होने लगी, किसी कॉपी के पेज की किनार फाड़ कर लिखा हुआ ट्रांसफर होने वाली सहेली का एड्रेस ,डायरी में दबे कुछ सूखे फूल ,कुछ मोर पंख और एक खास पेड़ की सूखी पत्ती;जिसे विद्या कहते, पहला स्क्रेच किया हुआ रिचार्ज कूपन , पहले बोर्ड एग्जाम में लगी पासपोर्ट साइज फोटो, एक पन्ने- पन्ने अलग हो रही पर सहेज कर रखी डायरी, कुछ अदला बदली कर मिले हुए स्टीकर ,हांथ से बनाई गई राखी, रंगोली के बिंदुओं के मिला कर बने कुछ डिजाइन और मेंहदी के भी डिजाइन ,गुड़िया के कपड़े , पीतल की नथ बेंदी जो पहली बार स्कूल एनुअल डे में डांस परफॉर्मेंस में पहनी थी,एक कढ़ाई किया रुमाल ,एक क्लिप जिसकी जोड़ी खोने के बाद भी वो फेंकी ना गई। 

कुल मिलाकर बचपन की मेरी यही जमा पूंजी थी। मेरे लिए खजाना ,मां के लिए कबाड़ । हर बार दिवाली की सफाई में मेरे पुराने नोट्स और खिलौने की पेटी के साथ एक छोटी पेटी इन सामानों से भरी हुई निकलती।मां के निर्देश के साथ की काम की चीज रखो,बाकी बांट दो या फेंक दो। पर मुझे तो सब काम का लगता। भले ही us ट्रांसफर पर गई सहेली ने ना मुझे ना मैने उसे कोई लैटर लिखा पर उसका एड्रेस मुझसे फेंका ना गया। मैं उन्हें धूप दिखाई ,पेटी साफ करती और वो वापस साल भर के लिए अपना स्थान ले लेते। 

दीवाली की सफाई का ये बोझिल थकाने वाला दौर मेरे बड़े होने पर मुझे कहीं न कहीं उत्साहित कर जाता था ,इस सो कॉल्ड कबाड़ के कारण….. मैं एक एक समान छूती,देखती,पढ़ती। और मुस्कराते हुए पिछले कई सालों का सफर उस एक या दो घंटे में कर लेती। 

अरे नहीं टाइम ट्रैवल नहीं ,बल्कि डाउन टू मेमोरी लेन 😊


मैं उस क्षण में पहुंच जाती जब वो जमा की हुई चीजें वर्तमान में किसी प्रसंग के बीच में थीं। कभी उन्हें छू कर ,देख कर मैं मुस्कुरा उठती ,कभी किसी भावुक क्षण में जा पहुंचती और आंखों के कोर भीग जाते। 

वर्तमान में इतिहास को जीना सदा सरल नहीं होता।क्योंकि उसमें ऐसा बहुत कुछ होता जो रेत की तरह मुट्ठी से निकल चुका होता ,जो हम बार बार जीना चाहते और कुछ ऐसा भी जो हम पेंसिल की लिखावट की तरह इरेजर से मिटा देना चाहते।पर इतिहास पाषाण शिला पर दर्ज लेख होता ,आप चाहो ना चाहो वो अपना अस्तित्व दिखाता ,वक्त से साथ धूलिम हो सकता पर अमिट…….। 

खैर मेरा ये कबाड़ मेरे लिए एक पैरलर यूनिवर्स था। जिसमें कई बार मैं अपना बचपन जीती।

खिलौने के पेटी की बात करूं तो कुछ जिद से मिले कुछ रसोई के लिए मेरा इंट्रेस्ट जगाने की पहल के लिए मेरे ननिहाल से मिले रसोई के सामना का छोटा छोटा रेप्लिका….कुछ मिट्टी से मुझे जोड़ने के लिए दादी के द्वारा बनाए गए मिट्टी के खिलौने, पड़ोस की हम उम्र लड़की की मुझे जलाने के लिए खरीदी गई गुड़िया के जवाब में मेरी जिद से खरीदी गई गुड़िया। पूरी पेटी भरी हुई थी कई यादों से , हां इसमें एक कोना उन कॉमिक्स का भी था जो अदला बदली के दौरान उनके असली मालिकों द्वारा भुला दी गई थी। 

मुझे याद है जब मेरे पीजी करने के दौरान मैं दीवाली की सफाई में होस्टल से घर नहीं पहुंच पाई थी ,तब मां ने मेरे खिलौने की पेटी हमारे घर में काम करने वाली बाई जिन्हें हम चाची बोलते थे ;उनकी बेटी को दे दी थीं। जब मैं घर पहुंची और पता चला की मां ने वो खिलौने दे दिए तो लगा अचानक बचपन का एक हिस्सा टूट कर अलग हो गया जीवन से। मेरे शरीर में जो बचपन जी रहा था अचानक वो वयस्कता की ओर बढ़ने लगा। हंसमुख व्यवहार कहीं ना कहीं गंभीरता के आवरण से ढकने लग गया था। जैसे कोहरे ने असली दृश्य मतलब असली मधु को ढंक लिया। जो आज तक खुद को उसी कोहरे में ही ढंकी पा रही। 

हां कुछ स्मृतियां मां के पास भी थीं। एक सितारे वाली पुरानी साड़ी, कुछ ब्लैक एंड व्हाइट फोटोज और कुछ पुराने गहने। पर उनका बचपन उतना कबाड़ नहीं जोड़ पाया था जितना मेरे पास था ,जिसे बिखेर कर वो स्मृतियों की सफर का टिकट कटा सकें। 

मैं बड़ी होने लगी ,मन बचपन में ही जीना चाहता था। पर अफसोस उस सुखद कबाड़ की जगहें हमें सजावटी सामान भरना सिखाया जाने लगता। पुराने एल्बम की तस्वीरें भी धुंधली पड़ने लगती ,पन्ने फटने लगते ,जीवन के नए चरण में नई स्मृतियां जड़ जमाई गई स्मृतियों को उखाड़ कर अलग करने का प्रयास करने लगती। 

कल जो मेरे लिए खजाना था ,वक्त उसे कबाड़ बना देता और फिर कई वर्षो बाद हमारे ही लोगों के लिए वो कबाड़ भी अप्रासंगिक हो जाता। शायद हमने भी ऐसी कई खजानों को कबाड़ बना कर अप्रासंगिक किया होगा। 

जीवन यही है शिला लेख धूमिल होने लगते … हां मिटते नहीं पर कुछ अनजानी नजरों के लिए कोई मायने भी नहीं रखते । अगर इन स्मृतियों को कबाड़ और फिर अप्रासंगिक होने से बचाना चाहते हैं तो कोशिश यही रहना चाहिए की कुछ ऐसा दे जाओ जो एंटीक की भांति सहेज लिया जाए और लोग उसके लिए इतिहास भी खोजें।खैर मैं अपने कबाड़ को सोच का अब भी कभी - कभी खोल लेती…….अपने ख्यालों में। भौतिक रूप से अब मैं अपनी बिटिया की चीजें सहेजने लगी हूं,अच्छी बात ये है वो कबाड़ी है पर बहुत सी स्थितियों में वो वर्तमान को महत्व देती और कबाड़ को खुद से अलग करने में कोई परहेज नहीं करती। मैं संतुष्ट हूं की बहुत से लोगों की कटु स्मृति वो मेरी तरह नहीं सहेजेगी,बल्कि वो आगे बढ़ते रहेगी ,इतिहास से भविष्य की ओर। 


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका 

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

मुखर खंडहर


 खंडहरों की मूक मुखरता ,इंसान की फितरत को कई बार आत्माहीन पत्थर साबित करते हैं। हर ऐसी जगह जहाँ शोषण हुआ, नरसंहार हुआ ,सुनाई देता है एक ऐसा शोर जो निःशब्दता और निर्जनता में भी चीखता रहता ।

         कुछ इंसान भी ऐसे चलते- फिरते खंडहर होते हैं ।जिनमें से कुछ अत्याधिक वाचाल होते हैं। मानो वो स्वयं की रिक्तता का अनुभव करने से कतरा रहे हों। लगातार हंसते -बोलते हुए भी वो स्वयं में एक अभिशप्त गाथा की यंत्रणा के दंश को लगातार जी रहे होते। 

         उन लगातार बोलते होंठों पर, उन पर सजी मुस्कान के स्वांग के पार जा सको तो जरा झांकना उनकी आंखों में। जहाँ अंदर से उनमें न जाने कितनी दरारें दिखाई देंगी।

 एक उदासी का वटवृक्ष ,कई शाखाओं के साथ उनके समूचे व्यक्तित्व में गहरी जड़ें जमाए मिलेगा। चहल -पहल से घिरे एक दायरे के अंदर कितनी निर्जनता होती ये सिर्फ एक खण्डर को पता होता या खण्डहर नुमा इंसानों को। परत दर परत उधड़ती अस्तित्व की परतें ,जमीदोंज होकर भी जो उसके कारुणिक अनुभव को किसी को नहीं बता पाती।इतिहास लिख दिए जाते.... पर बस कयास से। ये खण्डर हमेशा डरते हैं अपनी आप बीती को फिर से सुन कर हर बार एक नई मौत जीने से........।

 #ब्रह्मनाद 

#मधूलिका

मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस डे



                       (छाया चित्र साभार गूगल)


किसी बच्चे में ऑटिज्म  का पता चलता है कि तो उसके अभिभावकों को स्वयं के लिए यह दुनिया खत्म सी महसूस होने लगती है। भावनात्मक और मानसिक यंत्रणा का दौर होता है ये। फिर शुरू होता है इलाज , इंटरवेंशन और थेरेपी के लिए लगभग अंतहीन लगने वाले चक्कर। घर पर ढेर सारे समझौते ,अपने व्यक्तिगत उद्देश्यों की बलि देते हुए कई अभिभावक इससे सामंजस्य बनाने की कोशिश करते हैं।पारिवारिक सदस्यों ,आदतों को भी बच्चे के हिसाब से बदला जाता है। अलग दिनचर्या अलग योजनाएं बनती है। इस तरह से एक अन्य बच्चे के मुकाबले ऑटिज़्म वाले बच्चे को पालना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।  

लेकिन अगर सही समय पर इसके बारे में जानकारी मिल सके तो इस स्थिति से निपटना अपेक्षाकृत सरल होगा।


इन हालात में, अभिभावक या देखरेख करने वाले व्यक्ति के तौर पर आप :-


*ऑटिज़्म के बारे में पढ़े और जानें पर ध्यान रखें हर बच्चा अलग है तो जरूरी नहीं कि नेट पर किसी अन्य के बारे में दी गई जानकारी और टिप्पणी आपके बच्चे पर भी लागू हों। नकारात्मक साहित्य से बचें। आप रेमेडीज/ समाधान की तरफ ध्यान दें। 


* बच्चे सहित परिवार में सभी दिनचर्या निश्चित करें ताकि बच्चे को अनावश्यक तनाव न हो ।उसे पूर्व आभास रहे कि आपका अलग कदम क्या होगा। 


*बच्चे ,परिवार के सदस्यों और जरूरत पड़े तो स्वयं के लिए भी मनोचिकित्सक से  काउंसलिंग लें। आप भी इंसान हैं ,भावनाओं का ज्वार आपको भी परेशान कर सकता है। 


*एक विशेष जरूरत वाले बच्चे के लिए आपको भी भावनात्मक रूप से मदद और साझा करने की आवश्यकता होती है। ऐसे समूहों से जुड़े जिनमें इस स्थिति से गुजर रहे माता पिता शामिल हों। सब आपस मे जानकारी साझा करें, एक - दूसरे की मदद करें। 


*आपके स्थान अपर थेरेपी की व्यवस्था न हो तो  प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर गतिविधियोंके बारे में सीख सकते हैं जिससे बच्चे के साथ काम करने में आपको मदद और मार्गदर्शन मिले। 


* ये न सोचें कि बच्चा आपको सुन नहीं रहा और उससे बात करना बंद न करें।बल्कि लगातार उससे हर चीज ,हर घटना के बारे में बताएं। रास्ते से गुजरते समय भी आप लगभग कॉमेंट्री जैसी करते रहें। ये उसे दिमाग मे नए शब्द और घटनाओं के तारतम्य को सिखाएगा।


*प्रिटेंड प्ले, इमेजनरी प्ले भी सिखाए। एक ही खिलौने से अलग अलग तरह से खेलना सिखाएं। अलग अलग कॉन्सेप्ट 

दीजिये।


* शुरुआत में बच्चे की रुचि अनुसार सोलो गेम से शुरू करके धीरे धीरे समूह में खेलने वाले गेम की तरफ लाइये। इससे बच्चे अपनी बारी का इंतज़ार करने के अलावा नियम भी सीखने लगेंगे। 


*बातचीत में  वाक्य छोटे और सरल निर्देशों वाले रखें।ताकि बच्चे को समझना आसान हो।


*शुरुआत में वो बच्चे जिन्हें भाषा या संवाद में कठिनाई हो ,उनके लिए कम्युनिकेशन कार्ड बना कर रखें। इसके माध्यम से उन्हें अपनी बातें ,जरूरत साझा करना सिखाइये।


*बच्चों को मदद  माँगने के तरीके सिखाइये।


*पहले बच्चे को समझाए फिर बोलने का प्रयास कराएँ। ताकि सही शब्द प्रयोग करना आए।


*छोटे से छोटे सफल प्रयास पर भेज बच्चे को बहुत उत्साहित कर उसे इनाम भी देना है। याद रखें ये इनाम हमेशा कोई भौतिक वस्तु न हो, बल्कि कई बार उसकी पसंदीदा गतिविधि या भाव भी हो।


*बच्चे को आप हमेशा #स्पून_फीडिंग( जरूरत से पहले ही पूर्ति) न कराएं। उसे प्रोत्साहित करिये अपनी जरूरत को प्रकट करने के लिए उसके बाद उसकी मदद करें। याद रखें आपको बच्चे को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाना है न की निर्भर ।


*आपका शारीरिक मानसिक  बेहतर होना स्वास्थ बच्चे के लिए भी जरूरी है ,इसलिए खुद पर भी ध्यान दें। 


#सामाजिक व्यवहार के लिए :- 

 1 बच्चे को घर व बाहर के लोगों से मिलाएं ।


2.  बच्चे को पार्क  या किसी हॉबी क्लास में ले जाएं।


3. दूसरों से संवाद के लिए प्रेरित करें। प्रॉम्प्टिंग कि स्थिति को हटाते जाएं। 


4.बच्चे के ऐसे व्यवहार जो बार बार दोहरा रहा हो,उसे नजरअंदाज न करें और उसे किसी भी प्रकार से व्यस्त करें ताकि उसका ध्यान उस एक गतिविधि से हटे।बच्चे को अकेलेपन की स्थिति में न छोड़े।


5.बच्चे के गलत व्यवहार को नजरअंदाज न करें। आप उसे विभिन्न तरीकों से समझाने का प्रयास करें कि उसके द्वारा की गई  गतिविधि ने आपको /अन्य को नुकसान पहुंचाया।गुस्से और दुख को दिखाने के लिए शारीरिक हावभाव के अलावा विजूअल कार्ड का इस्तेमाल करें।बच्चे की वीडियो या फ़ोटो( अवांछित व्यवहार के दौरान) लेकर रखें और समझाते समय इसे दिखाएं। 


 6.बच्चे के साथ  नज़र मिला कर बात करने की कोशिश करे,उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए उसके रुचि की वस्तु अपने चेहरे के पास रख बात करें। 


7. हर सही प्रयास के लिए प्रोत्साहित करना कभी न भूलें ।


बच्चे का गुस्सा या अधिक चंचलता दिखे तो उसे शारीरिक व्यायाम ,खेल सम्बन्धी गतिविधि में लगाएं। इससे अलावा यदि उसकी गतिविधि स्वयं या अन्य को शारीरिक क्षति पहुंचाने के स्तर पर हों तो मनोचिकित्सक से सम्पर्क करें।

 

सोमवार, 11 मार्च 2024

स्वाद जिंदगी का


                             (छायाचित्र साभार गूगल)


चॉकलेट खाने का असली सुकून तो तुम्हारे साथ ही मिलेगा। जब मुझे मेरे और मोटे होने की कोई फिक्र न हो।

पर सच कहूं तो ये सिर्फ एक बहाना है। एक चॉकलेट लवर को पता होता चॉकलेट खाने का अनुभव क्या होता।


बहुत सुकून से मुंह में लार के साथ घुलता एक मखमली एहसास और बहुत ही हल्के से कड़वापन के साथ फैलती मिठास । हर एक बाइट के साथ दिमाग में खुशी और सुकून वाला हार्मोंस का रिलीज होना जो बस ये एहसास दे की ये पल बस सुकून से डूबा हो।और ये महसूस करना भला तुम्हारे बिना संभव है क्या..... ? 

मैं चॉकलेट तो खा लूंगी पर वो सिर्फ स्वाद की इन्द्री का सुख होगा। तुम्हारे साथ या पास होकर चॉकलेट खाना मतलब उस एहसास का स्वाद से शुरू होकर शरीर के हर भाग में महसूस करना। जिस कड़वेपन का जिक्र किया वो जरूरी है,थोड़ी सी दूरी....जो मिठास मतलब मिलन को और विशेष और तीव्र भाव बना देती।


हां तुम्हारे साथ चॉकलेट खाना मतलब .... साथ ,सुकून, शांति, खुशी, अल्हड़, बचपन , लापरवाही , रोमांच,उत्तेजना और कतरा - करता घुलता तुम्हारे पास होने के  एहसास का मीठापन ......

#ब्रह्मनाद

©® डॉ_मधूलिका_मिश्रा_त्रिपाठी

अपना टाइम आएगा

 



गली बॉय मूवी का गाना ,बिटिया बड़े मजे लेकर सुनती है.... अपना टाइम आएगा। उसमें एक लाइन है , तू नंगा ही तो आया है ;क्या घंटा लेकर जाएगा। 

कहने को हल्के फुल्के तरीके से रैप म्यूजिक में ये गाना लिखा - गाया गया ।पर जब सोचने में आते तो लगता जिंदगी की कितनी बड़ी हकीकत है । पैदा हुआ तो पास में कुछ नहीं था ,तन पर कपड़ा भी नहीं ,सांसे भी मां से मिली थी। 

फिर शुरू होता जिंदगी का सफर। कितने भाव , कितने कलुष,कितने झूठे अभिमान ,कितने द्वेष ,कितने द्वंद,कितने औकात और पहुंच से दूर के सपने , कहने को अपने , परिचित , पड़ोसी , दोस्त , सहयोगी , परिवार..... । 

कई जीवन से भी कीमती सपने जीने की चाहत में अभी गुजर रहे वक्त को नजरंदाज करते ,सबसे गुजरते हुए बारी आती.... टाइम आने की .जिस टाइम की चाहत थी वो नहीं ,बल्कि वो टाइम जब बस टाइम ही नहीं होता हमारे पास... अब सबसे बड़ा सच का सामना करना होता जो शायद जीवन का सबसे मुश्किल काम होता। लाइन याद आई .... क्या घंटा लेकर जाएगा... जिस शरीर में जीवन शुरू किया वो भी उस वक्त शरीर नहीं मिट्टी कहलाने लगता। उसे भी छोड़कर जाना पड़ता। साथ क्या है ?????? कुछ नहीं , जिसके लिए जीवन भर भागते रहे ,लड़ते रहे , रूठते रहे ,गिरते उठते किसी तरह सब पाने की जद्दोजहद .... खत्म हुआ तो हांथ खाली और जिस्म भी खाली। 

आंखें शून्य में ताकती रह जाती और आसमान ;अनंत बन जाता। 

कितना भंगुर है जीवन । कब सांस का सफर खत्म हो ये भी नहीं पता और हम ना जाने कितने भाव (अच्छे -बुरे) और सपने पाले रहते। लिखते हुए सोच रही कि ये ड्राफ्ट पूरा हो सकेगा ? क्या इतनी मोहलत होगी? क्या ये सोच साझा कर सकने की मोहलत होगी....? जबाव नामालूम । जीवन कभी कभी छलावा लगता ,लगता जो दिख रहा वो सच नहीं ,भ्रम है। हम भ्रम जी रहे ।इसमें ही हम हमारी सबसे बड़ी खुशियां खोज लेते हैं। और फिर सच की सोच से डरते.... जीवन सच में श्रोडिंगर की बिल्ली और बक्सा लगता , आप आंख बंद करो मेरा अस्तित्व विलुप्त.... आंखें खोलो हम सामने.....। क्या सच ,क्या भ्रम,जितना सोचते उलझते ही जाते .... पर ये जिंदगी मरने भी आसानी से नहीं देती..... लाखों बार जीने की सजा मिलती ही है ,एक बार सुकून से मरने के लिए। मिट्टी को यही छोड़ जाने के लिए ....कई कई बार एक ही शरीर के भाव की मृत्यु और पुनर्जन्म .... । 

गाने का स्वर तेज हो चुका है...... अपना टाइम आएगा... 🙂

#ब्रह्मनाद 

©® डॉ_मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी 

बुधवार, 6 मार्च 2024

#घृणा


                            (छायाचित्र साभार : गूगल)



प्रेम और घृणा मानवीय भावों में परस्पर पूरक किंतु विपरीत पहलू हैं। ये सहज भाव चेतना बोध के साथ ही जीवन मे अपना बोध कराने लगते। पर प्रेम की अपेक्षा  घृणा  ज्यादा जीवंत भाव, जीवट है,स्वयं को बचाए रखने का इसमें।   किसी भी हृदय की धरती संभवत किसी अन्य भाव के लिए उपजाऊ हो ना हो, घृणा उसमें अपना बीज बो ही लेती है । बंजर होने की स्थिति में भी इसे ना जाने मन में कौन सी खाद मिल जाती है?????  प्रेम बेल को सीचना पड़ता है, पनपाना पड़ता है ,विशेष स्थितियां देनी होती हैं, फूलने के लिए बचाना पड़ता है ;परिस्थितियों की मार से ,ग़मों की धूप से ....... पल पल सहेजते हुए ही बढ़ सकता है प्रेम।  पर घृणा  नागफनी सी ; बंजर में भी उग जाती है। उसे नहीं चाहिए ,कोई देख-रेख ,खास रखरखाव .... वह तो परजीवी सी ,आप में ही उग जाएगी ,अचानक ।और  पोषण लेगी .... आपके ही अस्तित्व को दरकिनार कर अपना आधार बना लेगी। 

अगर इसे दुर्गुण मानकर ; जीवन से निकाल फेंकने की कोशिश करेंगे तो, वास्तव में संसार इसके बिना नरक सा हो जाएगा । पाखंड और धूर्तता का नाश करने वाली यही घृणा है । गर्व ,क्रोध का आतंक ना हो; घृणा का एक विस्तृत क्षेत्र ना हो ,तो जीवन निश्रृंखल हो जाएगा। 

यह तो वह वृत्ति है ,जो प्रकृति ने आत्मरक्षा के लिए दी है । इससे निजात तभी संभव है ; जब आप ही अस्तित्व विहीन हो जाए । ये ऐसी वृत्ति जो विवेक के साथ पनपने पर ;प्रेम सदृश उच्च हो जाती हैं । जब हमें तामसी वृत्ति  से घृणा हो ,जब हमें धूर्तता से घृणा हो ,जब हमें पाखंडी से घृणा हो, तो इस घृणा के परिणाम दिव्य और अलौकिक हो जाते हैं। 

 बलात्कार से घृणा करने वाला कभी उस नीच कर्म को नहीं करेगा उल्टा उसे रोकने के लिए उसे मिटाने के लिए सदैव अग्रसर रहेगा । 

घृणा का उग्र रूप ; भय है , और परिष्कृत रूप; विवेक ।कई ऐसे प्राणी है ,जो घृणास्पद माने जाने वाले साधनों में भी स्वयं के जीवन वृत्त को निभाते हैं । जीवन रक्षा का साधन दूसरों से उत्पन्न घृणा ही  होती है । उनके अस्तित्व के लिए ,उनके साधनों के प्रति ,हमारी घृणा भी आवश्यक है । उदाहरण के लिए "शूकर", उसके जीवन यापन का तरीका भी आपको पता है ..... यहां पर कह सकते हैं कि उसके अस्तित्व के लिए थोड़ी घृणा होना स्वाभाविक और आवश्यक है ,वरना उसके अस्तित्व पर संकट पैदा हो जाएगा।

एक वैचारिक विचलन की स्थिति को निर्मित करने के लिए ;किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की नींव रखने के लिए ;यदि प्रेम के संदर्भों की आवश्यकता है ,तो एक अन्य पूरक तत्व भी अनिवार्य है - #घृणा_की_क्षमता .....…. एक कभी न मरने वाली ,घोर मारक क्षमता।  किंतु इस घृणा के स्वरूप को घोर तटस्थ और सात्विक होना आवश्यक है । प्रेरित घृणा का निर्देशन आपके विवेक से नहीं होगा अपितु उस स्थिति में किसी अन्य की मानसिक त्रास का निर्वाहन कर रहे होंगे । एक ऐसी घृणा ; जिसका अनुभव हम अपने सचेतन मस्तिष्क से करते ,अन्यथा वह हमारी चेतना को हरकर हमें क्रूरता और निकृष्टता का दास बना देती है ।

जब घृणा सर्व भंजक, आग्नेय उत्साह की तरह काम करती ,तब उसमें हमारे अस्तित्व का विशेष पहलू हमारे व्यक्तित्व का विलोप हो जाता है ,और ज्वार की तरह वह समेट लेती है ;किनारे पर सहेजी गई हर मानवीय कोमल  भावनाओं को।
घृणा, जो अधोमुखी प्रवृत्ति मानी जाती है जो विनाश करती है; विरोधी भावों , का यदि उसका उचित बुद्धि विवेक युक्त प्रयोग किया जाए तो; यह युगांतकारी शक्ति,  दुखांतकारी हो जाएगी । जिस दिन शीतल बौद्धिक घृणा पनपेगी उस वक़्त ही वह सर्वग्राह्य और सर्वस्वीकार्य हो जाएगी । लोग उससे डरेंगे नहीं,  उसे अपनाना चाहेंगे । वह प्रमाद नहीं, प्रेरणा का स्वरूप ले लेगी । और फिर युगांतर के क्रांतिक परिवर्तन को फलीभूत करेगी । चूंकि घृणा प्रेम सी ही अनंत है ,निरंतर है , नित्य है .   तो क्यों ना इस अंतकरण के उपकरण को, हथियार की बजाय; साधन बना लें। एक दिव्य पावन अस्त्र स्वयं को साधने का । 
अहम् ब्रम्हास्मि 🙏🙏

#ब्रह्मनाद 
©® डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

मां की पाती : तुम्हारे जन्मदिन पर 12/12/23

 






प्रिय अन्वेषा / अनवू/ लड्डू/ बोबू/ पिकासोलाल / पुपुलाल, टीपाटी जी एंड so on........ , 


दुनिया के लिए 11 साल ,मेरे लिए 11 साल 9 महीने .... हां आज तुम्हारे अस्तित्व को आए इतना ही समय हो गया। तुम जीवन के एक और नए साल में प्रवेश ले रही हो।

बहुत मिली जुली सी भावनाएं आ रही हैं इस दिन को लेकर। यादें ताजा हो रही उस रात की जब दूसरे दिन तुम्हारे आने की तैयारी पूरी कर स्वागत करने हॉस्पिटल जाना था। वो डर,वो खुशी,वो आशाएं  .. सच कहूं तो आज भी वैसा ही है।

बस ये अब पता है की मेरी संतान लड़की है । जो आज से 11 साल पहले तुम्हारे आने के वक्त में मुझे नहीं पता था।

तुम्हारी पहली बार रोने की आवाज ,दुनिया का सबसे मधुर संगीत से भी मधुरतम था ,हालांकि उस वक्त के बाद कोशिश यही रही की कभी तुम्हें रोने ना दूं या हर वो कारण खत्म कर दूं जो तुम्हें रुला सकता।

कहते हैं औरत जब मां बनती उसका दोबारा जन्म होता... सच में ,एक बार मुझे तुम्हारी नानी ने जन्म दिया ,दोबारा मैं तुम्हारे साथ जन्मी।

आज मैं जो कुछ हूं ,तुम्हारे कारण हूं। तुमने मुझे असंभव को भी संभव करने की जिद सिखाई, तुमने मुझे इतना मजबूत बनाया कि मुझे किसी के सहारे के बिना कुछ करने की हिम्मत मिली । तुमने मुझे सिखाया की संभावनाओं को पार करके ही सफलता मिलती है ,ना की असफलता को आशंका से रुके रहने की। तुमने मेरे कमजोर पलों में मुझे मां की तरह प्यार किया, मुझे सम्हाला। मेरे गुस्से को झेलकर भी तुम मेरे लिए हमेशा उदार स्नेह दिखाती और जताती रही।तुम जैसी निश्छल आत्मा इस संसार में बिरली ही हैं।जिसे छल और दिखावा नहीं आता ,आता है तो बस थोड़े से प्यार के बदले अगाध स्नेह देना। अगर मैं ये कहूं की मैं तुम्हारी नहीं बल्कि तुम मेरी प्रेरणा हो तो कतई अतिशयोक्ति ना होगी। तुमने मुझे मेरी वास्तविक "जिंदगी" दी है ।

मैं बिलकुल नहीं चाहती की तुम मेरे जैसी बनो,बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि हर इंसान को  तुम्हारे  जैसा होने की कोशिश करना चाहिए। मुझे आज की "मैं" बनाने वाली तुम हो।वर्ना मैं एक बहुत आम सी मां बनती ,जिसकी आम सी अपेक्षाएं और बेहद आम सी संतुष्टि होती। तुमने मुझे एक पावन लक्ष्य की ओर भेजा ,जो तुम्हारे ना होने पर संभव ही नहीं था।मैं कितना कुछ बोलना चाहती ,तुम्हें बताना चाहती ,पर शब्द कम हो जा रहे या ये कहूं शब्द न्याय नहीं कर पाएंगे तुम्हारे वर्णन के लिए। आज ये लिखते , महसूसते  हुए पहला आंसू मेरी दाईं आंख से निकला ,क्योंकि मैं  बहुत खुश हूं ,पर दूसरा आंसू बाईं आंख से .... हां दुख का आंसू क्योंकि तुम्हारे जैसी बच्ची को मेरे जैसे मां मिली ,मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं । सच कहूं तो ये संसार ही तुम्हारे लायक नहीं , कुछ अपवाद छोड़ दिए जाएं तो इस संसार को तुम और तुम जैसे अन्य लोगों के लायक बनने के लिए सतयुग में वापस जाना पड़ेगा। इस झूठ, लालच ,दिखावे ,अंधानुकरण की दुनिया को तुम्हारे लायक बनने में युग बीत जाएंगे। खैर मुझे कहीं ना कहीं इस बात की भी राहत है कि तुम्हारे दायरे के चंद लोग ऐसे भी हैं जो तुम्हें दिल से स्वीकार कर तुम्हें हमेशा आगे बढ़ाने में मदद भी करते हैं ,फिर वो तुम्हारी प्यारी सी सहेलियां या दोस्त हों,या तुम्हारी टीचर्स या थेरेपिस्ट या कुछ अन्य बच्चों की  माएं जो तुम्हारी उपलब्धि को अपने बच्चे की उपलब्धि सी मानकर खुश होती।

खैर मेरा ये सब कुछ कहना बेमानी लगेगा क्योंकि मैं तुम्हारी मां हूं। पर जो लोग तुमसे जुड़े हैं,जिन्हें तुम अपने दायरे में आने देती हो ,वो जानते हैं की तुम कितनी जुझारू, मासूम और प्रेरक बच्ची हो। आज के शुभ दिन मैं बस यही दुआ करूंगी की तुम इस जीवन में सबके लिए हमेशा प्रेरणा बनकर रहो, संघर्ष से सफलता के लिए लोगों की आशाओं को तुमसे मजबूती मिलती रहे, स्वस्थ रहो,खिलती रहो। दुनिया की हर  खुशी और सफलता की कामना है तुम्हारी मां की ओर से... दुनिया के अस्तित्व तक तुम्हारा नाम हो.


 जन्मदिन मुबारक हो मेरी नन्ही सी जान ,मेरी राजकुमारी 😘🎂❤️🤗


-तुम्हारी मां

शुक्रवार, 17 नवंबर 2023

#बिछड़े_सभी_बारी_बारी

 



मैं नन्ही सी जान थी, मेरी आँखों मे दुनिया अजूबा थी, हर एक बात मेरे लिए कई सवाल बन जाती। जिन्हें मैं समझना चाहती थी। सब उस सवालों की मासूमियत में हंसते। कई जवाब आते ,जो अक्सर मिले जुले होते। कुल मिलाकर इतना तो मैं समझ ही गई थी ,अभी बहुत कुछ है जिसके लिए मुझे इस अवस्था से परे जाना होगा। कई सवाल जिनके लिए जवाब मैं खुद होऊंगी। तब मैं तारा थी, सबकी आंखों का ,मुझसे ही उनकी आंखों की चमक थी। 

मैं बड़ी हो चली ...... सितारे की शरारत कई बार किरकिरी भी लगने लगी थी। जो हांथों में पलती थी, उस पर हाँथ भी उठने लगे थे। क्या बोलना है, कैसे बोलना है ... हिदायतें मिलनी लगी। बचपन #बिछुड़ने लगा था। 


मैं किशोरावस्था में थी। बचपन के बाद उम्र का वो पड़ाव जो आपको खुद ही सन्देह में डाल देता है कि आप बच्चे हो या बड़े। किसी भी एक वर्गीकरण में आप फिट नही बैठते । और लड़की होना ....जैसे कोई सामाजिक पाप हो। आप अपने साथ मे पढ़ने वाले लड़के -दोस्तों को रास्ते मे देखकर मुस्कुरा नही सकते। उन्हें घर बुलाने ,उनके घर जाने में परहेज से सामने आने लगते। कल तक जिनके साथ हम बेझिझक स्कूल बेंच शेयर करते या टिफिन भी ,अचानक वो हमारे लिए अस्पर्श हो जाते। उसमे भी स्वयं में होने वाले शारीरिक परिवर्तन और उसके लिए कई तरह की सावधानियां......सच मे लगता था ,लड़की होना पाप से कम नहीं। कई बार रोते उस दर्द और विशेष तकलीफों से गुजरने पर। पर वो बताने नही,शर्म की बात थी (जैसे सिखाया गया ) ....किसी को पता ना चले कि हम मातृत्व धरण करने के पहले चरण में आ चुके हैं। कितना अंतर है एक मानवीय मादा और पशु- पक्षियों की मादा में। जो बात औरत को प्रकृति के रूप में पूर्णता दिलाती उसी बात को शर्म साबित कर दिया जाता। 

मैं अब सहज होती जा रही थी। मान बैठी थी ये नियति की हर औरत को तकलीफ झेलकर ही औरत साबित होने की शर्त पूरी करनी होती। 

घर से ना सही पर सामाजिक तौर पर मुझ पर प्रतिबंध लगने लगे थे। हंसना ,बोलना ,चलना ,उठना ,बैठना- बोलना सबके निर्धारित मापदंड के अनुसार ही खुद को ढालकर आप सामाजिक स्वीकार्य हो सकते हो। 

मैं विद्रोही थी। कुछ बातों का स्वभाविक विकास हो गया ,पर कई मैं कभी ना अपना सकी।


किशोरावस्था भी #बिछुड़ गई। कीमत मेरे बचपन की बलि। कहने के लिए जवानी सतरंगी होती है। पर एक आम लड़की के लिए जिस पर मर्यादाओं का पूर्वाग्रह हो ,उसके लिए किसी दंश से कम नहीं। कई जोड़े आंखें आपका पीछा ही करती रहती। बिन छुए भी शरीर का माप बताने को आतुर लोलुप आंखें। आपका हर कदम ,हर वक्तव्य ,हर बिखरती हंसी , आपके चरित्र प्रमाण पत्र तैयार करने वालों के लिए आंसर सीट सी होती ।।जिसपे सही गलत वो अपने नज़रिये से तय करते। 

परिवार आपके भविष्य के लिए आपके भावी साथी के चुनाव पर ही केंद्रित हो जाता। आप कोई भी हो,कुछ भी कर लो ,कहीं भी पहुंच जाओ, पर शायद सिर्फ विवाह ही ऐसा प्रमाण पत्र बन जाता जो आपके जीवन को सफल साबित कर सकता। भले उसमे आप अपनी बलि ही क्यों ना दे रहे हो। 

मासूमियत बिछड़ी, दोस्त बिछड़े , नैसर्गिकता बिछड़ी , सपने भी हांथों से छूट गए , और अब अपनो से बिछड़ने की बारी भी आ जाती। अपना घर जहाँ हर बात पर आपका हक था, हर चीज आपकी अपनी थी, जहाँ आपने अपने जन्म से जवानी तक का हर चरण ,हर अच्छा बुरा वक्त काटा, वो छोड़कर किसी अन्य के घर को अपना बनाने के लिए जाना होता। नियम यही है। घर पर नाजों से पलने वाली #गुड़िया ,हर काम मे थक जाने के डर से माफ कर दी जाने वाली बेटी एक ही दिन में किसी अन्य घर की सबसे जिम्मेदार इंसान बना दी जाती। ऐसे लगता जैसे उसके आने से पहले उस घर मे काम ही नही होता था। वो आई और अब हर बात सिर्फ उसके सर पर मढ़ दी जाती। बहू शब्द कितना भारी हो जाता। बेटी से बहु होने का सफर सिर्फ रस्म नही होती अपने अस्तित्व से बिछुड़ने सा जान पड़ता।

एक बहु से पत्नी,फिर माँ होने का सफर ना जाने हम खुद से कितने बिछड़ जाते ,पर दूसरों की खुशी में खोकर ही खुश। हम कौन......उसकी बेटी,उसकी बहु,उसकी पत्नी और इसकी माँ। सारी पहचानों में खुद को बांटकर अपने अस्तित्व को भूलकर बस कर्तव्य में खुश। 

याद है मुझे मेरी नानी मुझे अपनी बेटी (मेरी माँ) के नाम पर डिठौना बोलती थी। क्योंकि मेरी माँ ,हर काम मे बहुत तेज़ थी। और मैं सिर्फ पढ़ाई और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी में उस्ताद। और जब पहली बार शादी के बाद मेरी नानी को खबर मिली कि उनकी नवासी अकेले पूरे घर का काम करती, तेज़ तर्राट गुड़िया अपने सारे सपने भूलकर गृहिणी बनकर हर किसी का गुस्सा और झिड़की चुप होकर सुनती तो वो खुद को रोने से ना रोक पाई। खुद को ही कोसने लगी कि क्यों अपनी गुड़िया को डिठौना बोली,काश उनकी गुड़िया की किस्मत सदा डिठौना बन कर ही रहती। राजकुमारी सी गुड़िया ,राजकुमारी ही रहती।

एक बच्ची से औरत होने तक के सफर में कितना कुछ सहती एक औरत। 40 -50 की उम्र में आते तक ;उसके सपने बिछड़ते ,उसके अपने बिछड़ते,उसका मूल बिछड़ता, उसके संगी साथी बिछड़ते । और अंत मे उसके पास क्या बचता। कर्तव्यों की बेदी पर बिसूरति उसकी अपनी पहचान, सबसे घिरी होने पर भी अंदर सालता एकाकीपन का घाव ,आत्मनिरीक्षण के क्षणों में खुद को असफल पाने का दंश । या एक बलिदानी सफल गृहिणी का तमगा.... वक़्त बीतते उसका कोई अपना नही होता। एक घर होता था ,जो मायका हो जाता, एक और घर जो ससुराल होता..... आगे जो होगा बच्चों का घर होगा। उसके सपनो से सज़ा उसका अपना घर कहाँ होता। उसके एकाकीपन को भरने वाला ......उसका अपना कोना जो कहीं उसी में संरक्षित रखती, जिसमें दरीचों से छनकर ताज़ी हवा भी आती, जिसके सुराखों में से नीला आकाश अपनी एक झलक देता, जहाँ से थिरती धूप दिन का एहसास देती........सब कुछ बिछुड़ जाता एक औरत के औरत होने के सफर में ........हर उम्र अपनी कीमत उसके एक हिस्से को उससे काटकर वसूल कर ही लेती..... मैं अब वो सितारा हूँ जो दूसरों की खुशियों के लिए,उनकी चाह्ते पूरी करने के लिए कई बार फलक से टूट जाती हूँ। और मेरे अस्तित्व में बस बिखर जाती है राख ,मेरे अपने अरमानो की। 

अब जाकर कई सवालों के जवाब मिले , बेहतर होता बचपन मे ही रही आती,न दिमाग बढ़ता ना अवस्था। अब समझ आया कि 

#जो_बिछड़ती_जा_रही_वो_अवस्था_थी,#जो_अंत_में_साथ_होगी_वो_उम्र_होगी... और वही वफ़ागर होगी,खुद के साथ मुझे ले जाने के लिए। उम्र मुझसे बिछड़ेगी नहीं, क्योंकि जब ये संज्ञा मुझ पर लागू होगी तब मैं ही मुझसे बिछड़ चुकी होऊंगी। कई बारी बिछड़ने के बाद एक अंतिम बिछोह।

#डॉ_मधूलिका


#ब्रह्मनाद 

गुरुवार, 7 सितंबर 2023

सुरभाषी

 





#सुरभाषी

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सुरभाषी ,हां यही तो नाम था। घर पर उसे सुरु भी बुलाते थे।मुझे तो इस नाम और इस नाम वाली दोनों ने पहली ही बार मे बांध लिया था।

कई सालों बाद मेरे माँ के ननिहाल(माँ की नानी का घर) जाने का मौका लगा था।

वहां पहुंची तो पूरा गांव ही जैसे मेरे स्वागत में था, मैं सबके लिए "मान " थी।।बेटी की भी नवासी......

राजकुमारी से ठाठ थे मेरे। मैं शहर से गई थी ,तो गांव की हमउम्र और थोड़ा छोटी लड़कियों के आकर्षण और कौतूहल का केंद्र भी। सभी मुझसे मिलने आ रहे थे । प्यार लुटाते, ऐसा लग रहा था जैसे वहां द्वेष नाम की कोई जगह नहीं।

अरे हाँ ये तो मैं बताना ही भूल गई कि "सोनमढ़ी" नाम की जगह सड़क मार्ग से सम्पर्क में नही था। यहां जाने के लिए  नदी पार करना होता था ,साधन सिर्फ  नाव थी।

लौट कर आपको वापस लाती हूँ,सोनमढी में।


इस जन समूह में एक चेहरा ऐसा था जिसने घर में कदम रखते ही मुझे खुद से बांध लिया था।


एक किशोरी थी वो, अवस्था 17 के आस पास लग रही थी। रंग जैसे दूध में गुलाल मिला कर बनाया गया। आंखें किसी निश्छल पर डरी हुई हिरनी सी। बदन में उम्र की नई तरंग की कसावट और उतार चढ़ाव । कमर के पास उसकी कुर्ती फ़टी हुई थी जिसे छुपाने के वो भरसक प्रयास कर रही थी। उसके चेहरे की आभा ऐसी थी जैसे अलसाई सी चांदनी बिखरी हो। और एक खास बात उसके चेहरे पर गाल के किनारे की ओर एक बर्थ मार्क,जिसे गाँव में लहसुन बोलते हैं। और उस शांत किशोरी के चेहरे पर वो ऐसा लग रहा था जैसे किसी चंद्रमा के किनारे से कोई धूमकेतु निकलते हुए अपने निशान छोड़ गया हो।

एक और बात ने मुझे आकर्षित किया , उसके कमर पर चुनरी से बंधी बांसुरी जिस पर एक मोर पंख सजाया गया था।


किनारे बैठी वो भी नज़रें बचाकर मुझे निहारती ,कुछ संकोच,कुछ डर।

अब धीरे धीरे मुझे इस भीड़ का प्रयोजन समझ आया । ये सब मेरे सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन था। मैं डॉ जो थी। उनके लिए गर्व की बात थी। देशी गुलाब और गेंदे की माला पहनाकर सरपंच जी ने स्वागत किया। फिर बोला गया कि अब सुरु की बांसुरी सुनाई जाएगी। अब उस लड़की के आने का प्रयोजन समझ आया। उसे बुलाया गया.... सुरभाषी....आ, बजा अपनी बांसुरी। सुना अपराजिता बिटिया को। अरे डॉ हैं , सबको मौका नही मिलता इनके सामने आने का।

मैं अपलक उसे निहार रही थी, अचानक उस सहमी सी मुस्कान में उसकी दंत पंक्ति की झलक आकाशीय बिजली की चमक को मात दे गई। मैं सोच में थी क्या यह वाकई इतनी प्यारी या मुझे ही लग रही।

सुरु उठ कर सामने आई और कमर में बंधी बांसुरी निकाल कर स्वर फूंका। उसके होंठो की हरकत, चलायमान मृणाल दंड सी उंगलियां , और आधी खुली सी आंखें मुझे तो लगा ये राधा तो नहीं जो कृष्ण रंग में डूब कर इतनी मोहक हो गई। बांसुरी के स्वर में ऐसा दर्द सा लगा की कोई पाषाण भी बेवजह रोने लगे। स्वर लहरी टूटने से जब तन्द्रा भंग हुई तो सब करुणा में डूबे से नज़र आए। कुछ औरतों की आंखें नम थी।

तभी पीछे से एक तेज़ स्वर उभरा- कलमुँही कभी स्वर तो अपने भाग्य से अलग फूंका कर।

हम सबका ध्यान उसी औरत की ओर चल गया। जो पान खाए मुँह बिचका कर सुरभाषी को घूर रही थी।


महसूस तो ये हो रहा था जैसे वह  औरत अपने आग्नेय नेत्रों से सुरु को अभी भस्म कर देगी, फिर वह उस भीड़ से अलग होते हुए बाहर चली गई। वह हिरनी सी आंखों वाली लड़की डबडबाई आंखों से नीचे पलके किए हुए चुपचाप उस औरत के पीछे चली गई। बिना किसी अभिवादन के बिना किसी स्वर के। कुछ देर के लिए वहां खामोशी छा गई किसी ने कुछ भी नहीं कहा, फिर सरपंच साहब ने वापस एक तेज सांस लेकर कहा "अपराजिता बिटिया माफ कर देना कुछ लोग गंवार भी होते हैं ,पढ़ाई लिखाई का तो असर होता है ना बिटिया ।
मैंने चुपचाप मुस्कुरा कर उनकी बातों में सहमति का संकेत दिया। मेरा ध्यान अब भी सुरू की ओर था ।वह औरत कौन थी ??सुरु उसके पीछे क्यों गई ....यह तो समझ में आ गया था ,कि शायद वह सुरू की कोई अपनी ही है ;जिसका आधिपत्य सुरु पर चलता है।
 
घर से अब भीड़ छंटने लगी थी मै घर पर अकेली थी। अपनी नानी  और मौसी नानी से बात करते हुए पुराने दिन याद कर रही थी ,बचपन को जी रही थी। पर दिमाग के किसी कोने में सुरू ही चल रही थी। उसका रूप ,घटनाक्रम, उसकी आंखें ,उसकी बांसुरी मुझसे दूर ही नहीं हो रही थी ।सारी बातें करते-करते और सोचते सोचते ना जाने कब मेरी नींद लग गई ।जब आंखें खुली तो शाम हो चली थी ,अचानक मेरी मौसी -नानी ने मुझे आवाज दी बेटा अपरा देख सुरू आई  है बेटा।  तू उसके साथ चली जा, उसके घर। और मैंने पूछा कि नानी क्यों क्या हुआ??? कहां जाना है?? नानी मुस्कुरा के बोली बस तेरी डॉक्टर से दिखाने का अवसर आ गया है ।सुरू दरवाजे की ओट पर खड़ी हुई मुझे ही देख रही थी। मैंने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए अपना स्टेथोस्कोप  उठाया और दवाइयों वाला बैग भी । दरवाजे के पास खड़ी सुरू के पास जाकर मैंने कहा ;चलो कहां ले चल रही हो । सुरभाषी ने कोई जवाब नहीं दिया ,बस हल्के से मेरी ओर देखकर बुझी सी मुस्कान दी ।ऐसा लग रहा था जैसे वह मुस्कान नहीं है कई आंसुओं का बोझ लिए एक स्वर है ,जो बहुत कुछ बोलना चाहता है। सारे रास्ते सुरू ने मुझसे कोई बात नहीं की ।उस पगडंडी नुमा रास्ते में मैं उसके पीछे चल रही थी ।बीच बीच मे वह मुझे नजरें घुमा कर देख जरुर लेती थी ,कि मैं उसके पीछे आ रही हूं या नहीं। 
गांव के बारे में मैंने शुरू से कुछ सवाल भी किए पर वह हर बार हल्के से मुस्कुरा देती बिना कुछ बोले ।मैं खीज रही थी ,क्या अजीब लड़की है यह कुछ बोलती क्यों नहीं है ।पर सुरू अपने घर तक पहुंचने तक कुछ नहीं बोली ।
उसका घर ;घर कम  और खंडहर ज्यादा लग रहा था। दरिद्रता के निशानी अंदर कदम रखने से पहले ही दिखाई दे रही थी। इतना तो समझ आ चुका था कि सुरू के घर की माली स्थिति ठीक नहीं है ।अंदर घुसने से पहले ही एक सीलन भरा बदबू का झोंका नाक पर लगा ।यूं तो मैं डॉक्टर थी पर कई बार मन में जुगुप्सा जाग ही जाती है ।मुझे खुद पर ही शर्म आई कि मैं क्या मरीजों की सेवा करूंगी !! जो इस बदबू से ही घबरा गई। 
अंदर घुसने में मुझे वहीं महिला दिखाई दी ,जिसने सुरु को अभागी बोला था। गोल गठा चेहरा ,तांबई रंग ,बड़ी सी लाल बिंदी ,और पान रचे दांत।और किनारे चारपाई पर पड़े हुए एक जर्जर पुरुष काया जिसके शरीर मे हड्डी चमड़ी से होड़ ले रही थी, शरीर की सीमा तोड़ बाहर आने के लिए।....शायद वह सुरू के कोई अपने ही थे ।औरत देखते ही मुझे उठ खड़ी हुई आओ अपरा बिटिया आखिर सुरू तुमको ले आई दरअसल सुरू के बाप बहुत बीमार चल रहे हैं और हमारे गांव में आप आई हो और डॉक्टर हो। इसलिए मैंने ही सुरू को भेजा था आपको बुला लाने के लिए ।

मैंने घर का मुआयना किया कच्चा फर्श जो कि गोबर से लीपा हुआ था। एक विशेष तरह की सफेद मिट्टी जिसे छुही कहा जाता है; से गोबर के चारों ओर एक बाउंड्री सी बनाई गई थी ।कपड़ों को बांस पर रस्सी के सहारे लटका के बनाई गई अलगनी पर लटकाया गया था। साधन सुविधा के नाम पर महज कुछ बर्तन, चूल्हा ,चक्की और कांडी- मूसर था। खपरैल घर की दशा उसकी माली  स्थिति कोई भी अंदाजा लगा सकता था ।खैर मैंने उस स्त्री को मामी जी बोला और उनसे मैंने सुरू के बापू की स्थिति पूछी। मुआयना करने के बाद इतना समझ में आ गया कि सुरू के बापू को टीबी है, जो कि आप काफी बिगड़ चुकी है। प्राथमिक केंद्र में इतनी चिकित्सकीय सुविधा ना थी जिनसे की इस बीमारी की इस  अवस्था को रोकने को चाहिए । मैंने अपना कर्तव्य निभाया दवाइयां दी और वापस लौट पड़ी  ।लौटते वक्त सुरु की आंखें मुझसे धन्यवाद कह रही थी ।मैं अब भी नहीं समझ पा रही थी ,कि यह लड़की मुझसे बोली क्यों नहीं ।जो बात उसकी आंखें कह रही थी ;वह मुझसे भी बोल  भी सकती थी ।वह स्त्री जो सुुरू की मां ही होगी,उसे मुझे वापस छोड़ कर आने के लिए कहा। पर मैंने मना कर और अकेले ही वापस लौट आई। 


लौटते वक्त सुरु की आंखें मुझसे धन्यवाद कह रही थी ।मैं अब भी नहीं समझ पा रही थी ,कि यह लड़की मुझसे बोली क्यों नहीं ।जो बात उसकी आंखें कह रही थी ;वह मुझसे भी बोल  भी सकती थी ।


घर पहुंचते ही मुझे मासी-नानी से बहुत सारी बातें पूछने का मन था। सुरू मेरे मन में एक सवाल बन कर रह रही थी ।मासी नानी बरामदे में ही खड़ी हुई थी ,शायद मेरा ही इंतजार कर रही थी ।बरामदे में कदम रखते ही उन्होंने मेरे हाँथ से सारा सामान लिया और 2 मिनट बाद ही मेरे सामने चाय का कप हाजिर था। चाय लेते ही मैं नानी से पूछ पड़ी नानी यह सुरु कौन है? और वह औरत सुरू की क्या लगती है?? उसकी मां जैसी तो एक भी ना लगती।.....यह लड़की इतनी शांत क्यों रहती है ?कुछ बोलती क्यों नहीं?

।नानी ने एक तेज सांस ली और कहा सुरु  का नाम वाकई सुरभाषी नहीं अभागी होना चाहिए था । मेरी उत्सुकता बढ़ रही थी .......मैंने नानी से कहा कि मुझे पूरी बात बताइए ,आप क्यों ऐसा बोल रहे हो ?

नानी ने बताना शुरू किया वह औरत चंपा है और वह सुरू की सौतेली मां है ।सुरू का परिवार भी कभी बहुत सुखी हुआ करता था। उसके पिता शहर से सामान लेकर गांव में फेरी लगाकर बेचा करते थे ।मां भी सबके घर मे  छोटे-मोटे काम में  सहायता करती थी ।लोग बदले में उसकी अनाज या पैसे से मदद कर दिया करते थे ।थोड़ी बहुत जमीन भी थी जिसमें कभी फसल कभी मौसमी सब्जियां उगा लिया करते थे ।सुरू 3 साल की थी जब उसके दुर्भाग्य ने उसकी जिंदगी में कदम रखा ।दुर्गा पूजा के लिए शहर से झांकियां देखकर पूरा  गांव वापस  लौट रहा था।

सुरु के पिता कुछ खरीददारी के लिए शहर ही रुक गए। दोनों मां बेटी नदी के रास्ते गांव लौटने लगे ।सुरू को उसकी मां ने एक बांसुरी दिलाई थी ,सुरु उसको लेकर खुश थी बाल सुलभ जिज्ञासा और उत्साह से लबरेज थी।  वह बार-बार उसमें सांस फूंकती और उसकी मां उस बेसुर में ही सुर सुन ले रही थी । नाव में सुरू लहरों से खेलने लगी। छोटी बच्ची के हाथ पानी तक नहीं पहुंच रहे थे, उसने अपने शरीर को थोड़ा आगे किया और पानी छूने की कोशिश में वह नदी में गिर गई ।उसके गिरते ही सुरु कर मां ने अपनी बच्ची को बचाने के लिए छलांग लगा दी ।हालांकि उसे  तैरना नहीं आता था ।बहाव बहुत तेज था ,और नदी काफी गहरी ही है। नाव में बैठे कुछ अन्य लोग इन्हें बचाने के लिए कूद गए ।सुरू बचा ली गई पर ,उसकी मां न जाने बहाव में कहां चली गई ......

उसकी लाश भी बरामद ना हुई ।

सुरू के पिता ने लौटकर अपनी दुनिया उजड़ी हुई पाई ।सिर्फ इतना ही नहीं उस घटनाक्रम में सुरू के दिमाग में बहुत असर डाला ....उसके मुंह से आवाज निकलना ही बंद हो गई। गुमसुम उदास और खोई हुई रहने लगी ।शहर ले जाकर उसे डॉक्टर को भी दिखाया गया ,किसी तरह इलाज शुरू किया गया ,पर डॉक्टर ने बताया कि सुरु के दिमाग में सदमे का असर है ।जिसकी वजह से वह बोल नहीं पा रही । 

हां पर सुरू के साथ हरदम ही थी उसकी बांसुरी जो उसकी मां ने उसे दिलाई थी ।सुरू कभी-कभी उसमें ही स्वर फूंक ही देती थी ।डॉक्टर ने दिलासा दिया  कि इसकी आवाज़ वापस आ सकती है  ,और दवाइयां चल रही थी ।

किसी तरह दोनों बाप बेटी गृहस्थी रमा रहे थे ।पर बच्ची को अपने पीछे अकेले छोड़कर जाने से वह डरता था । काम नहीं करेगा तो क्या होगा ...खाएंगे कैसे ??यही सोचकर उसने दूसरों की सलाह से दूसरी शादी कर ली ।चंपा सुरू की दूर की मौसी थी ,जो कि परितक्त्या थी और पहली शादी से उसकी दो बेटियां थी ।दोनों सुरू से बड़ी थी ।शादी के बाद तो उसने सुरू को शुरुआत में बहुत प्यार दिया। धीरे-धीरे उसने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए ।दोनों बेटियां स्कूल जाती और सुरू घर का काम करती। बापू ने कई बार मना किया ,हर बार चंपा आत्महत्या की धमकी देकर उसका मुंह बंद करा देती ।वह धीरे-धीरे घर से और ज्यादा बाहर रहने लगा ,और सुरू पर अत्याचार बढ़ता चला जा रहा था दोनों बहने गूंगी कह शुरू का मजाक उड़ाती , पहनने के लिए उतरन दी जाती  ।सारे घर का काम सुरू से कराया जाता ।सुरू बिल्कुल अकेली हो चुकी थी ।उसके कोई साथी नहीं थे, ना घर ना बाहर ,ना स्कूल उसकी किस्मत में। अगर कोई साथ था तो ,बस वह बांसुरी जब वह बहुत दुखी हो जाती तो अपनी बांसुरी लेकर नदी के किनारे आम के बगीचे में चली जाती ,और अपने स्वरों से न जाने किसे पुकारती।


धीरे-धीरे वक्त बीता जमीन बेचकर सुरू की बहनों की शादी हुई ।इसी बीच सुरू के पिता बीमार हुए और फिर ऐसे खाट पकड़ी कि दोबारा नहीं उठे ।सुरू धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी ।उसके बांसुरी के स्वर और भी ज्यादा मार्मिक  हो चले थे। गांव के सम्पन्न लोग अपनी बेटियों की शादी में शहनाई की जगह सुरू को ही बांसुरी बजाने के लिए बुलाते हैं।  कठोर से कठोर प्राणी भी रो पड़े वह दर्द फूंकती सुुरु की बांसुरी । शायद उसका सारा दर्द उसी बांसुरी से झलकता था । चंपा उसकी सौतेली मां सुरू की बांसुरी के बदले मूल्य वसूल लेती थी ,और इसी शर्त पर वह उसे जाने भी देती थी। सुरू चाहकर भी उसका विरोध नहीं कर सकती थी ।विरोध करने पर जलती हुई लकड़ी से उसे आंकना, उसे पीटना आम हो चला था ।सुरू का अपना कहने वाला कोई नहीं , बाप है जो से अजनबी से बन गए,मां तो सौतेली ही रही ।इस अकेलेपन में सुरु ने साथी बनाया बांसुरी को ,नदी किनारे हलचल करती मछलियों ,बगीचे में  आम के पेड़ों को, उस पर बैठने वाले पक्षियों को और गायों को।

सब बताते हुए नानी की आंखें भर आईं थी,मैं बिल्कुल स्तब्ध थी। फूलों सी नाजुक सुरभाषी ने क्या कुछ झेला अपनी जिंदगी में।

दूसरे दिन मैंने शहर जा रहे मामा जी दवाइयों की लिस्ट दे दी,जो सुरु के बापू के लिए थी। शाम को मामा जी के आते जैसे ही दवाइयां मेरे हाँथ लगी; मैं तुरंत सुरु के घर की ओर लगभग दौड़ सी लगा दी।ना जाने क्यों मेरे मन के एक कोमल से कोने में सुरु किसी करुण मूर्ति सी विराजित हो चुकी थी। मैं उसकी तकलीफें हर कोशिश कर कम करना चाहती थी। जर्जर से दरवाज़े को थपथपाने की  आवाज़ से सुरु ने ही सांकल खोली। मुझे देखकर एक खुशी की चमक और भोली मुस्कान बिखेर कर इशारे से अंदर बुला कर हाँथ जोड़ कर अभिवादन किया।

मैंने उसके हांथ ने चूल्हा फूंकने वाली धौकनी देखी। शायद वो खाना बना रही थी। चंपा मामी अपने बीमार पति के बाजू से खाट पर बैठे हुए  अपने खुरदुरे और कटे फटे पैरों को बड़े जतन से महावर लगा कर संवार रही थी। मुझे देखके लाल कत्थई से दांत निकाल उठ कर मेरा स्वागत किया। मैंने उन्हें दवाइयों का थैला और हिदायत दी,और खाना बनाने में व्यस्त सुरु को आवाज़ देकर हाँथ हिलाकर वापस लौट पड़ी। अद्भुत सौंदर्य था सुरु का । लकड़ी की कालिख माथे पर फैल कर जैसे उस पसीने में डूबे चेहरे को नज़र से बचा रही थी।और उस पर बेतरतीब बंधे बालों की झूलती लत ,जैसे कोई नागिन किसी धवल वस्त्र पर बल खाए।


दूसरे दिन शाम को सुरु मुझे घर जी चौखट की ओट पर खड़ी दिखी। नानी से उसे इशारे से अंदर बुलाया, वो आज पहली बार मुझे थोड़ी सी खुश दिखी। आते ही उसने मेरे हांथों को पकड़ कर अपने माथे से लगा लिया। मैंने उसकी आँखों मे झिलमिलाते खुशी के आंसू देखे। समझ तो मैं गई थी कि ये धन्यवाद ज्ञापन का तरीका है। मैने उसे पगली बोल कर प्यार से उसके गालों में चपत लगाई। वो काफी देर तक मेरे कुर्सी का पाया पकड़ कर नीचे ही बैठी रही। बीच बीच मे अपनी निश्छल हंसी से जता जाती की में शामिल हूँ।

सुरु का अब लगभग रोज का शाम का यही क्रम था। उसका कुछ वक्त हमारे घर मे बीतता।4 दिन बाद सरपंच मामा जी अचानक घर आए ,और मुझे बताया कि गांव के बड़े मन्दिर में जन्माष्टमी का कार्यक्रम आयोजित होगा। और इस बार शहर से सेठ दीनदयाल(वो मन्दिर उनके ही किसी पूर्वज ने बनवाया था ) इस कार्यक्रम में खास तौर पर शामिल होंगे। सरपंच जी कार्यक्रमों के लेकर मुझसे मदद और सलाह चाहते थे।

मेरे मन मे यकायक एक नृत्यनाटिका का ख्याल आया। हां उसका केंद्र सुरभाषी ही थी। मेरी सलाह उन्हें  बहुत जँची। चंपा मामी की कमज़ोरी मुझे पता थी,अगले दिन कुछ रुपये उन्हें देकर सुरु के लिए मैंने इजाजत मांग ली।

गांव की कुछ अन्य लड़कियों ,छोटे लड़कों और सुरु की खास सहेलियों "गायों" के साथ मैंने पूरे जतन से नाटिका तैयार कराई। सुरु की बांसुरी अब मुस्कुरा रही थी।

जन्माष्टमी के दिन मंदिर के भव्य प्रांगण ने सारी तैयारियां हो चुकी थी। सेठ दीनदयाल तय समय से कुछ विलंब में पहुंचे। अभिजात्य से दमकता चेहरा,60 से 65 के बीच की अवस्था , सर के बाल उम्र के साथ उड़ चुके थे । आंखें भूरी और बड़ी शातिर सी लगी । उनके स्वागत के पश्चात ,मुख्य पूजा हुई और फिर नाटिका मंचन की बारी थी।सुरु थोड़ा डरी,पर मैंने उसे दिलासा दिया कि सिर्फ बांसुरी ही तो बजाना है। नाटिका के मंचन में सुरभाषी ने कृष्ण को साक्षात ही खुद में उतार लिया था। उसकी भव्य छवि ,बांसुरी के मधुर स्वर वहां मौजूद हर व्यक्ति को मंत्रमुग्ध कर चुके थे। इस नाटिका में सुरु की गाय सखियों ने बड़े अनुशासन से उसका साथ दिया। नाटिका खत्म होते ही सेठ जी मुक्त कंठ सराहना कर सुरु को बुला कर गले मे पहनी हुई सोने की चेन उतार कर इनाम स्वरूप दिया। जिसे भीड़ में खड़ी चंपा मामी ने मंच पर जाकर सबके सामने ही छीनते हुए ,सेठ जी का चरण वंदन किया। सेठ जी की नज़र सुरु पर ही थी।

कार्यक्रम के अंत मे मुझे उनसे मिलाया गया। और वो गांव के विकास के लिए कुछ मदद की घोषणा करते हुए रवाना हुए। भण्डारे के बाद सब अपने घर का रुख किये। उस रात मेरे कानों में सिर्फ सुरु की बांसुरी गूंज रही थी,और बन्द आंखों में उसकी कृष्ण रूप छवि।

अगले दिन सुरु दोपहर ही घर पर पहुंच गई। और ना जाने साधिकार मुझे खींचते हुए कहां ले जाने लगी। थोड़ी देर में मुझे इसका जवाब मिल गया। वो सुरु का इस गांव में अपना खास कोना था, उसके दोस्त और सखियों का।

हाँ नदी किनारे आम का बगीचा , वहाँ ठहरी गायों का झुंड और नदी किनारे उछलती मछलियां। शायद वो सुरु की बांसुरी में नाचती थी।

मैंने देखा सुरु ने आम के पत्तों को विशेष तरह मोड़ कर ताले नुमा आकृति बनाई है। और लगभग पेड़ हर डाल में लटकाया हुआ है। मेरे पूछने पर उसने इशारे से बताया कि ये उन पेड़ो और गायों से अपने रिश्ते और प्यार को इन तालों के रूप में सुरक्षित  कर रही है,ये उसी का प्रतीक। उस दिन सुरु ने उन मछलियों का विशेष उछलकूद मुझे दिखाई जो उसकी बांसुरी ओर कूदती थीं। मैंने सम्भवतः सुरु के उस विशेष आरक्षित कोने में खुद का स्थान निश्चित कर लिया था।

तीसरे दिन मुझे वापस लौटना था , क्योंकि मेरी पहली पोस्टिंग के लिए मुझे तैयारी ज निकलना था। सुरु को पता चलते ही उसकी आँखों की गंगा जमुना रुकने का नाम ही नही ले रही थी। मैंने सुरु से लौटते वक्त वादा लिया कि वो खुश रहेगी और वापस बोलने की कोशिश भी करेगी। नदी के रास्ते वापस लौटते हुए सुरु मुझे तब तक दिखाई दी जब तक मेरी नाव दृष्टि सीमा से पार ना हो गई। मैं लौट आई थी अपने घर के अलावा एक और अपनी बना कर।

वापस आकर मैं काम मे कुछ यूं उलझी की काफी वक्त तक सीतामढ़ी की कोई खबर ना ले पाई।पर मेरे ख्यालों से सुरु कभी गई ही नहीं।

लगभग 11 महीने बाद हमें एक स्वास्थ्य शिविर ने जाने का आदेश मिला। सारे नव पदस्थापना वाले डॉक्टर उसमे निश्चित दिन की ड्यूटी पूरी करेंगे। मैं तो ये खबर पाकर ख़ुश हो गई......क्यों???? क्यों वो गांव सीतामढ़ी के नजदीक था। और मैने तय किया कि घर पर ही रुक कर कैम्प आया- जाया करूँगी।

सुरु अचानक ही मेरे दिमाग मे हावी होने लगी। उससे मिलने के लिए मैं बेताब हो रही थी। मैं गांव पहुंची और मुझे देखकर घर और अब खिल गए। थकान की वजह से मैं दोपहर खाना खाकर सो गई थी। अचानक मुझे थोड़ी देर में सुरु की बांसुरी की स्वर लहरी सुनाई दी। मैं खुशी से उठ बैठी।

नानी ने अचानक मुझे जगा पाकर कारण पूछा । मैंने बोला मुझे सुरु से मिलना है ,उसकी बांसुरी मुझे सुनाई दी।

नानी  घबरा कर बोली ,चुप कर कहीं कोई बांसुरी नही है।

नानी  की स्थिति देखकर इतना तो मैं समझ गई थी कि कहीं कुछ दुखद हुआ। मेरे लाख पूछने पर भी उन्होंने ना बताया।

शाम को जब मैं सुरभाषी से मिलने उसके घर जाने को तैयार हुई तब नानी का सब्र भी चुक गया। उनकी रुलाई सी फूट पड़ी। उन्होंने रोते हुए बताया सुरु अब नही रही। मुझे यकीन ना हुआ। मैं अवाक सी रह गई। नानी ने बताना की मेरे जाने के कुछ दिन बाद सेठ जी वापस गांव आए थे। सीधे सुरु के घर गए ,और विवाह का प्रस्ताव दिया। उसके बापू तैयार ना थे पर चंपा के आगे किसी की एक ना चली । सेठ जी ने एक नियत दिन पर सुरु को शहर बुला कर शादी करने का वादा कर वापस चले गए। सुरु का तो सब कुछ जैसे दांव पर था। तुम्हारे जाने के बाद वो खुश रहने की कोशिश करती थी, रोज मन्दिर जाकर बांसुरी बजाती ,शायद वापस बोलने की आशा से। 15 दिन करीब वो उसी बागीचे में रोती रहती। कभी गायों के पास .....उसकी तकलीफ ना वो बोल सकती थी ,और जिसे समझना चाहिए था वो पत्थर की बनी थी। गांव वाले चंपा को समझाए तो उल्टा उन्हें सुरु के भाग्य के दुश्मन ठहराकर अपशब्द बोलती।

हर दोपहर सुरु की बांसुरी के करुण स्वर सबका हृदय उद्वेलित करने लगे। मर्म पर कुछ तोड़ से जाते,पर सब बस सुन सकते थे कुछ कर नही पाए। सेठ जी का भी डर ,सो उनसे कौन बैर मोल ले। नियत तिथि पर सेठ जी का मुनीम शादी का जोड़ा-गहने और नगद रुपये लेकर सुरभाषी के घर उसे शहर ले जाने को हाज़िर हुआ। चंपा ने पैसे चट से अपने पास रख सुरु को जोड़ा पहनने का आदेश दिया। सुरु के मना करने पर उसके बापू सहित खुद को मार लेने की धमकी देकर उसे जोड़ा पहनाया। सुरु रोए जा रही थी,और चंपा उत्साहित। तैयार कर ज्यों ही उसे घर से बाहर भेजने का वक़्त आया सुरु की आर्तनाद और रुलाई  अपने बापू से लिपट कर इस स्वर में फूटी की पत्थर भी फट जाए।

सुरु देहरी को दोनों हांथों से थाम कर खुद को वहीं रोकने का प्रयास कर रही थी और चंपा उसे बाहर की ओर खींच रही थी। इस प्रयास में देहरी की कीलें सुरु की हथेलियों को लहूलुहान कर चुकी थी। इस रोकने और खींचे जाने की कवायद में चंपा ने जोर से दरवाजा बंद किया और सुरु की एक तेज़ चीख गूंज गई। लहूलुहान हाँथ और दर्द से तड़पती सुरु अचानक उठ कर बगीचे की ओर भागी। मुनीम और चंपा उसके पीछे भागे। सुरु आम के हर पेड़ से लिपट कर बस रोए जा रही थी, ऐसा लग रहा था कि उस मजबूर की पुकार सिर्फ वही सुन सकते ,सिर्फ वही उसके अपने। गायों के झुंड ने उसे घेर लिया था जैसे  उसकी रक्षा कर रहे हों,और पक्षियों ने ऐसा कलरव किया कि कान फटने को थे। चम्पा और मुनीम उस तक पहुंच ही ना पा रहे थे। सुरभाषी हर एक गाय को गले से लगाकर रो रही थी।

उसके हांथों से बहते खून ने पेड़ों और गायों के शरीर पर ऐसे छाप बना दी थी जैसे विदा होती बेटी घर छोड़ने पर सिंदूर रचे हांथा बनाती।

ना जाने कितना कुछ बोलना चाहती होगी सुरभाषी, कितने मनुहार, कितनी प्रार्थना अपनों से खुद को दूर ना भेजने के लिए। उसके दिल मे जो घुमड़ रहा था वो शायद कोई नही सुन सका था सिर्फ उन मूक पेड़ों, गायों और पक्षियों के सिवा। सिर्फ उसकी  मूक विदाई के साथी प्रकृति के सिर्फ  मूक अंग ही बने। जो सिर्फ संवेदना और करुणा महसूस कर सकते थे। सुरभाषी के दिल मे उड़ रहे भावनाओं के तूफान को शब्द नही थे, उसे समझा वही जो बोल नही सकते थे। सुरभाषी बस बेतहासा बिलख रही थी।

अब तक मुंशी ने अन्य मातहतों के साथ मिलकर गायों को मारकर भागना शुरू किया। कील लगे मोटे लट्ठ गायों को घाव भी देने लगे और चोट भी ,और वो चोट सुरु के दिल दिमाग और ज्यादा लगी। सुरु तड़प सी उठी और खुद चुपचाप मुनीम की ओर बढ़ चली। अंतिम बार उसने पलट कर बगीचे को देखा ,गायों को सहलाकर प्यार किया,सजल आंखों से उन पक्षियों को देखा जैसे कह रही हो कि सिर्फ मेरी विदाई तुम सब ही समझ और महसूस कर पाए।ना जाने कितने शब्द उस अंतिम चितवन से वो बोल गई। गायों के रँभाने का स्वर बहुत तेज़ हो चुका था पर सुरभाषी अब वो शान्त हो चुकी थी, धीरे से चलते हुए नदी के किनारे पहुंची जहां वो मछलियों को आटा खिलाती। अपने हाँथ से किनारे की गीली मिट्टी लेकर गोली सी बनाकर नदी में डाल दी,मछलियां उस दिन उछली नहीं थी,किनारे पानी मे पड़े उसके पैर के आस पास ही झुंड़ बनाकर शांत थी।

सुरभाषी बेझिल कदम से खोई हुई सी नाव पर जाकर बैठ गई,फिर धीरे से अपने कपड़ों से बांसुरी निकाल के एक बार स्वर लगाई और उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जैसे वो अपना तर्पण ही कर दी हो,बिल्कुल वही भाव । गांव के सभी उसे हाँथ हिलाकर नम आंखों से विदाई दिए ,पर वो मूर्तिवत जड़ ही चली गई। उसके चेहरे पर हांथों से निकला खून लगा हुआ था, ऐसा लगा कि जैसे कोई उदास सी सिंदूर लगी दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन होने वाला है।


एक हफ्ते बाद नदी में उसी बगीचे के किनारे वाली जगह में सुरु का मृत शरीर तैरता हुआ मिला। गांव में हंगामा मचा हुआ था। उसके कलाई में रस्सी से बंधे होने का निशान गाढ़ा था। पर किसी ने कुछ ना कहा इस मौत पर, हां चंपा के घड़ियाली आंसू जरूर सबने घृणा से देखे। सेठ जी की कोठी पर माली का काम करने वाले गांव के ही हल्कू ने बताया कि 1 हफ्ते तक रोज़ उस कोठी से चीखें सुनाई देती थी सेठ जी की गालियों के स्वरों के बीच, जिसमे गूंगी और बाप की औकात का खास उल्लेख होता। हर सुबह गुलाब की सैकड़ों कुचली हुई कलियां कोठी के कचरे के ढेर से निकलती थी।।

सुरु लौट चुकी थी उस नदी में प्रवाहित अपनी आत्मा के पास , अपने सबसे प्यारे साथियों के पास। पर उसके स्वर अब मूक नहीं थे। हर रोज उसकी बांसुरी गूंज रही थी ,उसके आत्मीयों के सानिध्य में।

हां सुरभाषी के बांसुरी के सुर अब बिन बजे ही हर किसी को सुनाई देते थे। वो अब इतने मुखर थे कि उन्हें अब शांत नहीं कराया जा सकता था...........हां सुनो,वो अब भी गूंज रहे मेरे कानों में एक आर्त स्वर से। मैनें कान बन्द कर लिए,पर सुरभाषी के सुर गूंज ही रहे........................


#ब्रह्मनाद 

-डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी