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गुरुवार, 28 मई 2026

मोह और आध्यात्मिकता


              (छायाचित्र : गूगल से साभार)



मनुष्य सदैव दो दिशाओं के बीच खड़ा रहा है।एक दिशा उसे संसार की ओर खींचती है, जहाँ संबंध हैं, इच्छाएँ हैं, उपलब्धियों का आकर्षण है और स्वयं को सिद्ध करने की अंतहीन आकांक्षा है। वहीं दूसरी दिशा अंतस की गहराई की ओर ले जाती है, जहाँ मौन है.....उत्तर की प्रत्याशा में जन्मते प्रश्न हैं....और उस सत्य की खोज है जो परिवर्तन से परे है।इन्हीं दोनों के मध्य खड़ा मनुष्य अक्सर पूछता है....क्या आध्यात्मिकता भी मोह है?

यदि गहराई से देखा जाए, तो मोह केवल किसी व्यक्ति, वस्तु या सुख से जुड़ाव नहीं है। मोह वह सूक्ष्म आग्रह है, जिसमें मन स्वयं को स्थायी देखना चाहता है।वह हर उस चीज़ को पकड़ लेना चाहता है जो क्षणभंगुर है।यही कारण है कि कभी मनुष्य के रूप में हम धन में अमरत्व खोजते हैं.... कभी प्रेम में...... कभी संबंधों में .....कभी यश में और अंततः ईश्वर में। किंतु आध्यात्मिकता तब मोह बन जाती है, जब वह केवल भय से उपजी हुई हो।जब हम मृत्यु से डरकर, अकेलेपन से ऊबकर या चुनौतियों से हारकर ईश्वर की शरण में जाते हैं , तब साधना भी एक प्रकार का अवलंबन मात्र रह जाती है।हम मुक्ति नहीं चाहते, केवल अपने टूटते हुए अस्तित्व को बचाना चाहते हैं।और ऐसी अवस्था में ध्यान, पूजा, व्रत और तप भी भीतर के भय को ढकने का माध्यम बन जाते हैं।

परंतु वास्तविक आध्यात्मिकता वहाँ आरंभ होती है, जहाँ पकड़ समाप्त होने लगती है। जहाँ हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि जीवन परिवर्तनशील है........शरीर नश्वर है.....संबंध अस्थायी हैं और समय किसी के लिए नहीं रुकता।इसी स्वीकृति के बाद जो शांति जन्म लेती है, वही अध्यात्म है।

आध्यात्मिकता संसार से भागना नहीं है।यह संसार को उसके वास्तविक रूप में देख पाने की क्षमता है। यह वह दृष्टि है, जिसमें मनुष्य प्रेम करता है, पर स्वामित्व नहीं चाहता.....कर्तव्य निभाता है, पर अहंकार नहीं पालता.......संबंधों में रहता है, पर उनमें स्वयं को नहीं खोता....... स्वयं के अंदर की यात्रा करता है,पर स्थायित्व नहीं खोता ।  

मोह बाँधता है, जबकि अध्यात्म मुक्त करता है।मोह कहता है ,“यह मेरा है।”अध्यात्म कहता है कि “कुछ भी स्थायी नहीं, क्षण भंगुर है ....फिर भी सब सुंदर है।“ क्योंकि सुंदरता जड़ता में नहीं, अनुभव में बसती है।जीवन भी निरंतर बदलता रहता है,फिर भी हर क्षण अपने भीतर एक अनमोल अर्थ और सौंदर्य समेटे होता है।

हमारा सबसे बड़ा भ्रम यह है कि नश्वर होकर भी अनश्वर होने का स्वप्न देखते हैं ।मिट्टी से बने होकर भी समय को चुनौती देना चाहते हैं ।शायद इसी कारण हम चमत्कारों में सत्य से ज्यादा विश्वास करना चाहते हैं.... विज्ञान में अमरता खोजते हैं, कभी स्मृतियों में और कभी ईश्वर में।

वास्तव में सत्य यह है कि आध्यात्मिकता अमरत्व की चेष्टा करने की नहीं, बल्कि नश्वरता को शांत मन से स्वीकार कर लेने की कला है। और जब यह स्वीकृति आ जाती है, तब मोह धीरे-धीरे विलीन होने लगता है और भीतर एक गहरा, निर्मल मौन जन्म लेता है। 


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका

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