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रविवार, 19 मई 2024

ये कैसी आस्था!!!!!


            (   छायाचित्र साभार - गूगल इमेज  )


अखबारों और टीवी चैनल में लगातार खबरें आ रही थी की यमनोत्री, गंगोत्री और केदारनाथ ,बद्रीनाथ धाम पर भूस्खलन और कई किलोमीटर लंबे जाम लगे हुए । बुजुर्गों बच्चों सहित सभी को समस्या हुई। 

लोगों की शिकायत प्रशासन से थी…पर क्या ये शिकायत उचित थी? 


जब मैं छोटी थी, मुझे याद है हमारे गांव से चार धाम यात्रा का जत्था रवाना हुआ था। उसमे सभी बुजुर्ग थे ,उम्र ६० साल से ज्यादा। जब वो रवाना हुए गांव के लोग उन्हें गांव की सीमा तक विदा करने आए । भेंट किए कुछ महिलाएं रो भी रही थी।

मेरा मन बहुत से प्रश्न किए जा रहा था। घर लौट कर अपनी दादी से पहला सवाल दागा ,दादी वो लोग तो चार धाम जा रहे, फिर रो क्यों रहे,ये तो अच्छी बात है ना घूमना फिरना? दादी का जवाब मिला गुड़िया जब हम अपने सारे कर्तव्य पूरे कर लेते जैसे बच्चों की पढ़ाई लिखाई ,शादी , नाती पोते तब चार धाम यात्रा करते । और ये यात्रा इतनी कठिन होती कि इससे वापस लौटना, ना लौटना भी निश्चित नहीं होता।कई तो अपने अंतिम समय तक वहीं रहते। 

मैने दूसरा सवाल की बूढ़े बस क्यों गए?

दादी ने बताया कि जब परिवार से जुड़े सारे काम हो जाते तब इस उम्र में मोह त्याग करके भगवान के दर्शन को जाते। इसलिए जवान लोग नहीं जाते, और यात्रा भी इतनी कठिन की जीवित लौटना कई बार असंभव होता। इसलिए जवान लोग नहीं जाते ।वो कोई घूमने की जगह थोड़े ना हैं, वो तो संसार भोगने के बाद मुक्ति का धाम है।

खैर मेरे मन में भी TV मूवी या तस्वीरें देख कर इन जगहों पर जाने का मन हुआ पर पता नहीं क्यों ये भीड़ मुझे डराती रही।

तो वापस आते हैं की प्रकृति का ये तांडव इन जगहों पर अब कुछ ज्यादा ही हो रहा। 

तो जरा सोचिए ,जहां पहले बहुत सीमित संख्या में लोगों का आना जाना था तो संसाधन पर इतना जोर नहीं पड़ता था जितना आज लाखों की संख्या में पहुंचने पर ।

तब हम पैदल या प्राकृतिक साधनों से ही यात्रा करते थे ,बहुत कम गाडियां चलती थी,आज हम गाडियां तो  गाडियां ,हेलीकॉप्टर लेकर घूमने जाते…. घूमना ही कहूंगी क्योंकि आपने दर्शन को पर्यटन बना दिया और वहां जाकर भी दर्शन कम रील्स और तस्वीर लेने में ज्यादा ध्यान लगा देते। पहले जो चार धाम हमारे कर्तव्यों को पूरा करने के बाद मुक्ति की राह होते थे ,वो अब हमारी छुट्टियों की बकेट लिस्ट का एक हिस्सा बन कर रह गए हैं।

प्रकृति सदैव वही देती जो हम उसे देते। हमने उसे अतिरिक्त अकारण भार दिया ,जो वो अपने तरीके से लौटा रही है। 

तकनीकी ने लोगों की हर जगह पर दखल बढ़ा दी है। पर इसका अर्थ ये नहीं की हम साधन को सुविधा से बढ़कर विलासिता बना लें। हम जाते दर्शन करने पर हमारा कार्बन उत्सर्जन उस धाम के पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाता क्या इससे बेखबर हैं। 

प्रकृति तो अपना संतुलन कायम करेगी ही। हम बस दोहन कर रहे , लौटाने के मामले में अपना खाता देखेंगे तो नकारात्मक स्तर पर ही जाएगा।

देखा जाए तो हम मानव दुनिया में पैदा हुए जीवों में सबसे स्वार्थी होते हैं। हम ईश्वर को भी अपनी सुविधा अनुसार ही पूजते । अगर हमारी श्रद्धा वास्तविक है तो हमारा सबसे पहला कर्तव्य ये होना चाहिए कि जिस स्थान पर हमारे आराध्य का धाम ,हमारी ओर से उस स्थान को कोई क्षति ना पहुंचे। हम अपने ईश्वर के घर को ही प्रदूषित ( पर्यावरणीय , सांस्कृतिक)  कर कौन सा पुण्य अर्जित कर रहे,ये मेरी समझ से परे है। 

खैर इस बीच मोबाइल रील्स बैन होने की खबर कहीं ना कहीं सोशल मीडिया की दिखावे वाली भेड़ भीड़ से कुछ तो राहत दिलाएगी। 


# ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका 

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