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शुक्रवार, 31 मई 2024

Happy birthday पापा


 

जन्मदिन की शुभकामनाएं पापा,

हम उस पीढ़ी के नहीं थे ,जहां पापा को गले लगाकर , किस्सी देकर ,लव यू बोल कर विश किया जाए। हमने तो अपने बड़ो के जन्मदिन में कभी केक भी नहीं काटे। बचपन में कभी आपको जन्मदिन मनाते देखा या सुना ही नहीं। 

जानती हूं आपने जितने संघर्षों से जीवन शुरू किया और जिया ,हम लोगों के लिए साधन -सुविधाएं जुटाई ,उस बीच में जन्मदिन याद रखके सेलीब्रेट करना आप लोगों के लिए बेमानी था। मेरी स्मृति में जो बातें नहीं थीं वो घर के बाकी लोगों ने बताया कि आपको मेरा 1 सेकंड भी रोना नहीं देखा जाता था,और बचपन में आपसे ज्यादा करीब थी। बड़े होते होते कुछ दूरियां बन गई ,क्योंकि जितना संघर्ष आपने जिया कहीं ना कहीं वो आपके बच्चों की अतिरिक्त सुरक्षा भावना में बदल गया।तब समझ नहीं आता था, वो हमें पीढ़ियों का अंतर लगता था,वो दरअसल अंतर नहीं था ,आपकी वो भावना थी ,जो आपको अपने बचपन में जीने को नहीं मिली। आप एक सुरक्षा आवरण बनाना चाहते थे और हमें लगता आप रोक टोक कर रहे। 



बहुत सी बातें ऐसी है जो आपसे चाह कर भी सामने बैठ कर नहीं बोल पाऊंगी ,पर जब जब जीवन में पीछे मुड़ कर देखती उनका एहसास आंख नम करता। हम आपको नहीं जता पाएंगे कि आपने हमरे लिए कितने त्याग किए,पर यकीन मानिए आपकी नातिन के आने के बाद मुझे ये एहसास तीव्रता से होता की दुनिया में मां बाप जितना त्याग कोई नहीं कर सकता। मां जहां रोकर , गले लगाकर सब जता जाती, पिता चुप रहकर ; बच्चों की इच्छाओं के लिए अपनी चाहते मारकर उन सुविधाओं को जुटा कर पूरा करता। जीवन के लिए मां पृथ्वी की तरह आधार बनती, तो पिता आकाश की तरह छाया रहता।

आज के इस विशेष दिन में ईश्वर से यही मनाऊंगी कि आपके जीवन के बचे हुए सपने पूरे हो और आप एक लंबी स्वस्थ आयु जिएं।मुझे आपके जीवट पर गर्व है।🤗❤️🎂

#आपकी गुड़िया 

#ब्रह्मनाद

#डॉ_मधूलिका 

बुधवार, 22 मई 2024

चाय और तुम


 

#ख्याल

चाय और तुम्हारा साथ .....दुनिया में इससे बेहतर सुकूं शायद ही मुझे दोबारा नसीब हो। किसी गहरी घाटी की किसी अंतिम छोर पर टेंट लगाकर जतन से जुटाकर लाई गई कुछ सूखी लकड़ियों और पत्थर के ढेरों से बनाए गए चूल्हे पर चढ़ी हुई चाय....।


 हल्की ठंडक का एहसास.... मुँह से निकलता धुंआ और आँखों में बरसों से ठहरी नमी रहकर रहकर बाहर निकलने को बेताब..... उन लकड़ियों की आंच से तुम्हारा दिव्य चेहरा लाल सा दिख रहा। जैसे अभी किसी युद्ध से तपकर लौटे हो और शौर्य अब तक उबल रहा हो। पर तुम्हारी आंखे मासूमियत के साथ मुझे और उबलती चाय को तक रही हैं। एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है। तुम होंठों को हिलाने की नाकाम कोशिश कर ,चुप हो रहा जाते।जैसे बोलना बहुत कुछ हो ,पर छोर न मिल रहा हो। 


मैं तुम्हारी आँखों मे ही खोई हुई हूँ। तुम चेहरे और आँखो के इशारे से मुझसे पूछते.... क्या हुआ ।और मैं सर डुलाकर मना कर फिर चाय को ताकने लगती। अंदर एक शोर से है। इस मुलाकात से पहले क्या क्या नहीं सोचा था। ढेर बात करूँगी ,ढेर सवाल .... कुछ शिकायतें।और अब जैसे उस शोर को अंदर के निर्वात ने ग्रस लिया। 


तुम्हारी आंखें और हाँथ मेरी नजरें रह रह कर इनपर टिक जाती। हां बस इनसे ही तो मेरा परिचय हुआ था। चेहरे से नहीं।वो ही मुझे मेरे लगे... मुझे यूँ ताकते पाकर तुम्हारे होंठों पर मुस्कान खेल जाती और मैं झेंप कर उन जलती लकड़ीयों को खोतने लगती। तुम धीरे से मेरे पास सरकते और मेरे हांथ को अपने हांथों में लेकर दबा लेते।जैसे मुझे यकीन दिला रहे हो...हां ये मैं ही हूँ। उस ठंडक वाले एहसास में तुम्हारे हांथों की नरमी और गर्मी मुझे अंदर तक सिजा रही है।


अचानक चाय खौलती और जलने की मीठी सी खुशबू हम दोनों ने नाक में समाती। हल्के धुएं से आंखें लाल और आंसू भरी हो जाती ,जिनकी आड़ में मैं अपने आंसुओं को भी पोछ लेती।


छान कर चाय की गिलास तुम्हारे हांथों में पकड़ा देती।जिसे तुम जैकेट की आस्तीन पंजों तक खींचकर उसके बीच पकड़ लेते। पहला घूंट लेने के लिए मैं गिलास को थामे तुम्हारे हांथों को तुम्हारे होंठों की ओर करती और एक चुस्की के बाद मैं चुस्की लेती।

वो बड़ी सी गिलास से 2 चुस्कियों के बीच हम दोनों चुप्पी में भी ढेर बातें कर ले रहे। तुम्हारे होंठों को छूने के बाद जब गिलास मेरे होंठों तक आती तो मानो तुम्हारा मन उमड़ कर उस एक चुस्की चाय में पिघल जाता।चाय की खत्म होने वाली अंतिम चुस्की मैं तुम्हें ही पीने को देती,कहते हैं खाने पीने का अंतिम घूंट और कौर ,तृप्ति का होता है। मैं वो तृप्ति तुम्हारे नाम कर देती हूँ। 


मेरे जीवन की क्षुधा तुम हो, मेरे आत्मा की प्यास तुम हो .... और उससे तो मैं कभी तृप्त ही नहीं हो पाऊंगी। मैं घूंट घूंट अपनी आंखों से तुम्हें पी रही हूँ। मेरी आत्मा तृप्त होने की बजाय और क्षुधातुर हो रही है। 

हम दोनों उठ खड़े हुए तुमने अपनी बाहों के सहारे मुझे जमीन से कुछ ऊपर उठा लिया।देखा आज मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे। तुम्हारे होंठों पर अपने होंठ रख मैं आंखें बंद कर लेती हूँ।और आंसुओं की दो जोड़ा धार उस निर्जन में भागीरथी से भी प्रचंड तरीके से बह निकली। 

उद्वेग काबू करके एक दूसरे के माथे पर बोसा रख तुम वापस मुझे जमीन के हवाले कर देते। तुम्हारे बलिष्ट हांथों से होते हुए मेरा चेहरा तुम्हारी हथेलियों में समा गया। जिन्हें मैं नेमत समझ कर चूम रही हूँ। आंखें आखों में कैद हो गई है। हम दोनों अपने अपने रास्तों के रुख करते । बस इतना हो बोल पाते .....अपना ख्याल रखना।

मैं पहले नहीं मुड़ सकी.... इसलिए तुम एक झटके से मुड़ कर तेज़ कदमों से निकल गए।मैं वहीं खड़ी देखती रही जब तक तुम्हारा अक्स् ओछ्ल न हो गया। 

ये मेरी अंतिम चाय थी....उस वक़्त तक के लिए जब तक तुम दोबारा मुझे नहीं मिल जाते। हर शाम की चाय की चुस्कियों से एक के होंठों से दूसरेके होंठों तक चुप सी बातें करने को।

#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका 

रविवार, 19 मई 2024

ये कैसी आस्था!!!!!


            (   छायाचित्र साभार - गूगल इमेज  )


अखबारों और टीवी चैनल में लगातार खबरें आ रही थी की यमनोत्री, गंगोत्री और केदारनाथ ,बद्रीनाथ धाम पर भूस्खलन और कई किलोमीटर लंबे जाम लगे हुए । बुजुर्गों बच्चों सहित सभी को समस्या हुई। 

लोगों की शिकायत प्रशासन से थी…पर क्या ये शिकायत उचित थी? 


जब मैं छोटी थी, मुझे याद है हमारे गांव से चार धाम यात्रा का जत्था रवाना हुआ था। उसमे सभी बुजुर्ग थे ,उम्र ६० साल से ज्यादा। जब वो रवाना हुए गांव के लोग उन्हें गांव की सीमा तक विदा करने आए । भेंट किए कुछ महिलाएं रो भी रही थी।

मेरा मन बहुत से प्रश्न किए जा रहा था। घर लौट कर अपनी दादी से पहला सवाल दागा ,दादी वो लोग तो चार धाम जा रहे, फिर रो क्यों रहे,ये तो अच्छी बात है ना घूमना फिरना? दादी का जवाब मिला गुड़िया जब हम अपने सारे कर्तव्य पूरे कर लेते जैसे बच्चों की पढ़ाई लिखाई ,शादी , नाती पोते तब चार धाम यात्रा करते । और ये यात्रा इतनी कठिन होती कि इससे वापस लौटना, ना लौटना भी निश्चित नहीं होता।कई तो अपने अंतिम समय तक वहीं रहते। 

मैने दूसरा सवाल की बूढ़े बस क्यों गए?

दादी ने बताया कि जब परिवार से जुड़े सारे काम हो जाते तब इस उम्र में मोह त्याग करके भगवान के दर्शन को जाते। इसलिए जवान लोग नहीं जाते, और यात्रा भी इतनी कठिन की जीवित लौटना कई बार असंभव होता। इसलिए जवान लोग नहीं जाते ।वो कोई घूमने की जगह थोड़े ना हैं, वो तो संसार भोगने के बाद मुक्ति का धाम है।

खैर मेरे मन में भी TV मूवी या तस्वीरें देख कर इन जगहों पर जाने का मन हुआ पर पता नहीं क्यों ये भीड़ मुझे डराती रही।

तो वापस आते हैं की प्रकृति का ये तांडव इन जगहों पर अब कुछ ज्यादा ही हो रहा। 

तो जरा सोचिए ,जहां पहले बहुत सीमित संख्या में लोगों का आना जाना था तो संसाधन पर इतना जोर नहीं पड़ता था जितना आज लाखों की संख्या में पहुंचने पर ।

तब हम पैदल या प्राकृतिक साधनों से ही यात्रा करते थे ,बहुत कम गाडियां चलती थी,आज हम गाडियां तो  गाडियां ,हेलीकॉप्टर लेकर घूमने जाते…. घूमना ही कहूंगी क्योंकि आपने दर्शन को पर्यटन बना दिया और वहां जाकर भी दर्शन कम रील्स और तस्वीर लेने में ज्यादा ध्यान लगा देते। पहले जो चार धाम हमारे कर्तव्यों को पूरा करने के बाद मुक्ति की राह होते थे ,वो अब हमारी छुट्टियों की बकेट लिस्ट का एक हिस्सा बन कर रह गए हैं।

प्रकृति सदैव वही देती जो हम उसे देते। हमने उसे अतिरिक्त अकारण भार दिया ,जो वो अपने तरीके से लौटा रही है। 

तकनीकी ने लोगों की हर जगह पर दखल बढ़ा दी है। पर इसका अर्थ ये नहीं की हम साधन को सुविधा से बढ़कर विलासिता बना लें। हम जाते दर्शन करने पर हमारा कार्बन उत्सर्जन उस धाम के पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाता क्या इससे बेखबर हैं। 

प्रकृति तो अपना संतुलन कायम करेगी ही। हम बस दोहन कर रहे , लौटाने के मामले में अपना खाता देखेंगे तो नकारात्मक स्तर पर ही जाएगा।

देखा जाए तो हम मानव दुनिया में पैदा हुए जीवों में सबसे स्वार्थी होते हैं। हम ईश्वर को भी अपनी सुविधा अनुसार ही पूजते । अगर हमारी श्रद्धा वास्तविक है तो हमारा सबसे पहला कर्तव्य ये होना चाहिए कि जिस स्थान पर हमारे आराध्य का धाम ,हमारी ओर से उस स्थान को कोई क्षति ना पहुंचे। हम अपने ईश्वर के घर को ही प्रदूषित ( पर्यावरणीय , सांस्कृतिक)  कर कौन सा पुण्य अर्जित कर रहे,ये मेरी समझ से परे है। 

खैर इस बीच मोबाइल रील्स बैन होने की खबर कहीं ना कहीं सोशल मीडिया की दिखावे वाली भेड़ भीड़ से कुछ तो राहत दिलाएगी। 


# ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका 

रविवार, 12 मई 2024

हमारा मदर्स डे


 


सच कहूं तो मुझे अंग्रेजी वाला मदर डे कभी समझ ना आया।जब तक खुद मां नहीं बनी, उसके बाद समझ आया की इस दुनिया में बीज के रूप में आने के बाद से बच्चे का हर दिन मदर्स डे ही होता है। अगर रिश्तों को सैलरी देने का रिवाज होता तो "मां" जितनी सैलरी इस दुनिया में किसी को नहीं मिलती।ना जाने कितनी भूमिकाएं एक साथ निभाती, बिना जताए की वो खुद को ही हमारे लिए भूल सी जाती। 

साहब हम उस जमाने की पौध हैं ,जिन्हें मां ने जी भर के डंडों और झाड़ू से भी कूटा है 🤭 और बिना दिन विशेष सेलिब्रेशन के  मां का महत्व जिया है। खास बात  ये कि मां के द्वारा पीटे जाने पर  हमें चुप नहीं कराया जाता था , बल्कि ना चुप होने पर फिर से कूटा जाता था। उस समय  PTM में टीचर से शिकायत नहीं होती थी, बल्कि टीचर घर आ कर शिकायत करके फिर मां के हांथ तबियत से पिटवाते थे। 


#हम तब ग्रीटिंग, गिफ्ट और केक देकर ,

एक दिन को मां को समर्पित नहीं कर पाते थे, 

पर हां जिस दिन मां उदास हो  उस दिन ,

हम बिन बोले सारे काम समय से निपटाते थे,

अपने कपड़े - किताबें बिना टोके,

सही जगह जमा जाते थे। 


घर पर जिस दिन मां की डांट नहीं खाते थे,

उस दिन की शांति हमें अन्दर से डराती थी।

उस दिन खाना मां बिना कुछ पूछे ही बनाती थी।

दिन भर छोटी बातों पर भिड़ते हम बच्चे भी,

उस दिन कुछ ज्यादा ही अनुशासित बन जाते थे। 

मां गुस्सा है या दुखी है ,

कुछ समझ नहीं पाते थे।

मां से जाकर पूछ पाएं उनकी तकलीफ,

कभी भी वो हिम्मत जुटा नहीं पाते थे,

पर चुपचाप काम में लगी मां की आंखें देख,

हम बच्चे सब समझ ही जाते थे।

दिन भर कई बड़ों के ताने  सुनकर भी, 

पीड़ाएं चुप से आसुओं में बहा जाती थी।


कभी - कभी पापा को वो भी,

साड़ी ना दिलाने का ताना  दे जाती थी, 

पर जब हांथ में पैसे आए तो ,

कई जगह उन्हें छुपाती थी।


लाख हसरतें उसकी भी थी लेकिन,

पर अपने लिए कहां कुछ ले आती थी। 


चुपके से जोड़ के जमा किए पैसों से,

कभी हम बच्चों की यूं ही की फरमाइश , 

कभी राशन, कभी बिजली का बिल ,

कभी मेहमानो के खर्चों की ,

छोटी बड़ी कीमतें चुकाती थी, 

हां पर कभी पड़ोसन की नई साड़ी देख ,

थोड़ी सी ललचाती  भी थी। 

पर बच्ची की नई फ्रॉक या,

 बेटे की वो चमचम साइकिल ,

 वो साड़ी भी ज्यादा सुख पाती थी। 


हां सच है ,

कि जिस दिन हम उससे पीटे जाते थे ,

वो हमसे ज्यादा आंसू बहाती थी।

 रात को फिर हमारी पसंद का कुछ,

 विशेष व्यंजन बना आवाज लगाती थी।


हां ये सच है कि,

मेरी मां  टेक्नोलॉजी में थी थोड़ी अनाड़ी, 

स्मार्ट फोन और कंप्यूटर की नहीं थी उनको जानकारी।


एक छोटी सी मोटे गत्ते वाली डायरी में,

कुछ खास अवसरों की तारीखें लिखी जाती थी, 

फिर उन तारीखों में सुबह सुबह से,

वो बस  रसोई में पाई जाती थी।


तब सेल्फी में मुस्कुराने के जमाने नहीं थे ,

वो सबकी खुशियां ही अपने चेहरे में सजाती थी।

सबको भरपेट खिला और पड़ोस में भिजवा कर ही

मां के मन को एक विशेष तृप्ति आती थी।


हां ये सच है की ,

हमने मदर डे एक दिन में पहले कभी मनाया नहीं था,

क्योंकि मां हमारी हर दिन को त्यौहार बनाया था।


#ब्रह्मनाद

#डॉ_मधूलिका

शुक्रवार, 10 मई 2024

#मैं _कबाड़ी


 


#मैं_कबाड़ी 


मां मुझे कबाड़ी कहती थीं…. वैसे सच कहूं तो हूं ,अब भी 😊। इस शब्द के पीछे मेरी छोटी -छोटी पुरानी चीजें सहेज कर रखने की आदत थी ।पुरानी चिट्ठियां ,किसी सहेली का दिया हुआ बिना ढक्कन का सूखी स्याही वाला पैन, किसी सहपाठी की हैंडमैड ग्रीटिंग , कुछ छोटे छोटे तोहफ़े,जो न तो उपयोग किए गए और न ही अलग किए गए, एक पुरानी स्लैम बुक ,जिसकी लिखावट पेज के पीलेपन के साथ कहीं गाढ़ी और कहीं धुंधली सी होने लगी, किसी कॉपी के पेज की किनार फाड़ कर लिखा हुआ ट्रांसफर होने वाली सहेली का एड्रेस ,डायरी में दबे कुछ सूखे फूल ,कुछ मोर पंख और एक खास पेड़ की सूखी पत्ती;जिसे विद्या कहते, पहला स्क्रेच किया हुआ रिचार्ज कूपन , पहले बोर्ड एग्जाम में लगी पासपोर्ट साइज फोटो, एक पन्ने- पन्ने अलग हो रही पर सहेज कर रखी डायरी, कुछ अदला बदली कर मिले हुए स्टीकर ,हांथ से बनाई गई राखी, रंगोली के बिंदुओं के मिला कर बने कुछ डिजाइन और मेंहदी के भी डिजाइन ,गुड़िया के कपड़े , पीतल की नथ बेंदी जो पहली बार स्कूल एनुअल डे में डांस परफॉर्मेंस में पहनी थी,एक कढ़ाई किया रुमाल ,एक क्लिप जिसकी जोड़ी खोने के बाद भी वो फेंकी ना गई। 

कुल मिलाकर बचपन की मेरी यही जमा पूंजी थी। मेरे लिए खजाना ,मां के लिए कबाड़ । हर बार दिवाली की सफाई में मेरे पुराने नोट्स और खिलौने की पेटी के साथ एक छोटी पेटी इन सामानों से भरी हुई निकलती।मां के निर्देश के साथ की काम की चीज रखो,बाकी बांट दो या फेंक दो। पर मुझे तो सब काम का लगता। भले ही us ट्रांसफर पर गई सहेली ने ना मुझे ना मैने उसे कोई लैटर लिखा पर उसका एड्रेस मुझसे फेंका ना गया। मैं उन्हें धूप दिखाई ,पेटी साफ करती और वो वापस साल भर के लिए अपना स्थान ले लेते। 

दीवाली की सफाई का ये बोझिल थकाने वाला दौर मेरे बड़े होने पर मुझे कहीं न कहीं उत्साहित कर जाता था ,इस सो कॉल्ड कबाड़ के कारण….. मैं एक एक समान छूती,देखती,पढ़ती। और मुस्कराते हुए पिछले कई सालों का सफर उस एक या दो घंटे में कर लेती। 

अरे नहीं टाइम ट्रैवल नहीं ,बल्कि डाउन टू मेमोरी लेन 😊


मैं उस क्षण में पहुंच जाती जब वो जमा की हुई चीजें वर्तमान में किसी प्रसंग के बीच में थीं। कभी उन्हें छू कर ,देख कर मैं मुस्कुरा उठती ,कभी किसी भावुक क्षण में जा पहुंचती और आंखों के कोर भीग जाते। 

वर्तमान में इतिहास को जीना सदा सरल नहीं होता।क्योंकि उसमें ऐसा बहुत कुछ होता जो रेत की तरह मुट्ठी से निकल चुका होता ,जो हम बार बार जीना चाहते और कुछ ऐसा भी जो हम पेंसिल की लिखावट की तरह इरेजर से मिटा देना चाहते।पर इतिहास पाषाण शिला पर दर्ज लेख होता ,आप चाहो ना चाहो वो अपना अस्तित्व दिखाता ,वक्त से साथ धूलिम हो सकता पर अमिट…….। 

खैर मेरा ये कबाड़ मेरे लिए एक पैरलर यूनिवर्स था। जिसमें कई बार मैं अपना बचपन जीती।

खिलौने के पेटी की बात करूं तो कुछ जिद से मिले कुछ रसोई के लिए मेरा इंट्रेस्ट जगाने की पहल के लिए मेरे ननिहाल से मिले रसोई के सामना का छोटा छोटा रेप्लिका….कुछ मिट्टी से मुझे जोड़ने के लिए दादी के द्वारा बनाए गए मिट्टी के खिलौने, पड़ोस की हम उम्र लड़की की मुझे जलाने के लिए खरीदी गई गुड़िया के जवाब में मेरी जिद से खरीदी गई गुड़िया। पूरी पेटी भरी हुई थी कई यादों से , हां इसमें एक कोना उन कॉमिक्स का भी था जो अदला बदली के दौरान उनके असली मालिकों द्वारा भुला दी गई थी। 

मुझे याद है जब मेरे पीजी करने के दौरान मैं दीवाली की सफाई में होस्टल से घर नहीं पहुंच पाई थी ,तब मां ने मेरे खिलौने की पेटी हमारे घर में काम करने वाली बाई जिन्हें हम चाची बोलते थे ;उनकी बेटी को दे दी थीं। जब मैं घर पहुंची और पता चला की मां ने वो खिलौने दे दिए तो लगा अचानक बचपन का एक हिस्सा टूट कर अलग हो गया जीवन से। मेरे शरीर में जो बचपन जी रहा था अचानक वो वयस्कता की ओर बढ़ने लगा। हंसमुख व्यवहार कहीं ना कहीं गंभीरता के आवरण से ढकने लग गया था। जैसे कोहरे ने असली दृश्य मतलब असली मधु को ढंक लिया। जो आज तक खुद को उसी कोहरे में ही ढंकी पा रही। 

हां कुछ स्मृतियां मां के पास भी थीं। एक सितारे वाली पुरानी साड़ी, कुछ ब्लैक एंड व्हाइट फोटोज और कुछ पुराने गहने। पर उनका बचपन उतना कबाड़ नहीं जोड़ पाया था जितना मेरे पास था ,जिसे बिखेर कर वो स्मृतियों की सफर का टिकट कटा सकें। 

मैं बड़ी होने लगी ,मन बचपन में ही जीना चाहता था। पर अफसोस उस सुखद कबाड़ की जगहें हमें सजावटी सामान भरना सिखाया जाने लगता। पुराने एल्बम की तस्वीरें भी धुंधली पड़ने लगती ,पन्ने फटने लगते ,जीवन के नए चरण में नई स्मृतियां जड़ जमाई गई स्मृतियों को उखाड़ कर अलग करने का प्रयास करने लगती। 

कल जो मेरे लिए खजाना था ,वक्त उसे कबाड़ बना देता और फिर कई वर्षो बाद हमारे ही लोगों के लिए वो कबाड़ भी अप्रासंगिक हो जाता। शायद हमने भी ऐसी कई खजानों को कबाड़ बना कर अप्रासंगिक किया होगा। 

जीवन यही है शिला लेख धूमिल होने लगते … हां मिटते नहीं पर कुछ अनजानी नजरों के लिए कोई मायने भी नहीं रखते । अगर इन स्मृतियों को कबाड़ और फिर अप्रासंगिक होने से बचाना चाहते हैं तो कोशिश यही रहना चाहिए की कुछ ऐसा दे जाओ जो एंटीक की भांति सहेज लिया जाए और लोग उसके लिए इतिहास भी खोजें।खैर मैं अपने कबाड़ को सोच का अब भी कभी - कभी खोल लेती…….अपने ख्यालों में। भौतिक रूप से अब मैं अपनी बिटिया की चीजें सहेजने लगी हूं,अच्छी बात ये है वो कबाड़ी है पर बहुत सी स्थितियों में वो वर्तमान को महत्व देती और कबाड़ को खुद से अलग करने में कोई परहेज नहीं करती। मैं संतुष्ट हूं की बहुत से लोगों की कटु स्मृति वो मेरी तरह नहीं सहेजेगी,बल्कि वो आगे बढ़ते रहेगी ,इतिहास से भविष्य की ओर। 


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका