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शनिवार, 16 नवंबर 2024

सुबह -ए - अवध और शाम -ए - बनारस



 


जानती हूं ये पंक्ति उलट पलट की गई लग रही हैं।पर मै इसी क्रम में थी इन जगहों पर। इस दीवाली के पहले के कुछ दिन हमारे धर्म और आस्था में अग्रणी स्थान रखने वाले दो शहरों में बीते। बुजुर्ग कहते हैं कि अवध ( अयोध्या ) की शाम और बनारस की सुबह कभी नहीं भूली जा सकती..... आखिर क्या है इस सुबह और शाम में.... ? हालांकि मैं यहां उल्टे क्रम में थी,तो मैं अपना अनुभव लिखूंगी। 


सरयू से लेकर गंगा तक सूर्य की यात्रा ..... सरयू के घाट असीम शांति से पूर्ण होते हैं यहां आप खुद में कोई प्रश्न नहीं करते । शांत ,स्थिर और ठहरी सी प्रतीत होती जलधारा, आस पास विचरती वानर सेना जैसे राम का चरित्र उन लहरों में समा गया हो ,जिसने जन्म से समाधि तक राम को खुद में पाया.....। अयोध्या आपको विचलित नहीं करता , धीर गंभीर अनुभव होता है यह शहर। हां बिल्कुल राम की तरह, स्थिति चाहे जो भी हो एक सी गति , और स्थिर भाव वाला अवध यानि कि अयोध्या। दीवाली के लाखों दिए और अनगिनत पटाखों की ध्वनि भी शांत ही लग रही थी। क्यों... जरा "राम" बोल कर अनुभव कीजिए....हृदय में गहरे उतरते भाव ,धीर -गंभीर ,हर स्थिति में विचलन से बचती, मर्यादा से परिपूर्ण छवि आपको स्वयं ही महसूस हो जाएगी। संभवतः उत्तर आपको मिल रहे होंगे।


चलते हैं बनारस..... शिव के चरित्र को सोचिए अब दो विपरीत ध्रुवों ,आचरण ,विचार , गुण का मिलन जिस पर हो जाए ,वही शिव हैं। वो भोले हैं तो रुद्र भी।वो संन्यासी हैं तो एक ओर संसारी भी। वो श्मशान में बसे तो दूसरी ओर कैलाश पर परिवार बसाए। जब योगी हुए तो संसार उन्हें ना ढूंढ पाए ,जब लीला में आए तो मोहिनी  (विष्णु) भी उन्हें लुभावनी लगी। वो पत्नी के लिए संसार भुला सकते, तो वो उसके बिना ब्रह्मचारी भी हुए। प्रसन्न तो औघड़ दानी, क्रोध में तांडव भी करते..... वो आदि भी हैं और अंत भी । यही छवि बनारस शहर के चरित्र में दिखती। शहर एक है पर उसमें दो आत्माएं वास करती ।नया बनारस और पुराना काशी.... शिव के दो रूपों सा। पतली तंग कुलिया.... फ्लाई ओवर से फैलाव लेता बनारस.. ।अल्हड़ ,आह्लादित बोली और खाना तो दूसरी ओर आधुनिकता की ओर बढ़ता बनारस। 

कहते हैं बनारस में रस है..... सत्य है आपको व्याकरण के माध्यम से ज्ञात और अनुभव होने वाले हर रस अनुभव होते हैं।मैने माता गंगा में सफर शुरू किया नमो घाट की ओर से ....आधुनिक , सुविधासंपन्न घाट से शुरू हुआ सफर.... गंगा के पानी की धारा के विरुद्ध हुई यात्रा आगे बढ़ते हुए कई घाटों के दर्शन कराते हुए जा रही थी। जिसमें खुशी भी थी ,उत्सुकता भी, रोमांच भी। कुछ सुना हुआ था, कुछ अनदेखा भी...। पर वास्तविकता सदा छवि या सुने अनुसार नहीं होती, बनारस में महसूस हुआ। रोमांच की जगह एक स्तब्धता ने ले ली जब शव जलवाहन दिखा.... ,उसके बाद एक सफेद कपड़े में लिपटी मृत देह जो मोक्ष की प्राप्ति की ललक में गंगा के सानिध्य में तैरती दिखी। 

कई अलग अलग घाट जो देश के अलग अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे...जिसमें मध्यप्रदेश का बहुत ज्यादा प्रतिनिधित्व दिखा। इन सब कोलाहल में आगे बढ़ते मन में वही तैरती हुई मृत देह ही भारी पड़ रही थी। और उसी समय सामने आया : #मणिकर्णिका। 


एक ऐसा सत्य जिसका सामना हर मनुष्य से होगा,कई बार उसके जीवन में ,और अंतिम बार जीवन के बाद । मणिकर्णिका वास्तव में बस घाट नहीं है, यह एक संदेश है कि जीवन एक पथ है,जिसका गंतव्य मृत्यु है। इस पथ में जीवन के सारे रस आते हैं, जिनको सत्य मान कर हम गंतव्य से डरने लगते। इस घाट को देखकर समझ आया कि मृत्यु भी एक कर्म है जो अनिवार्य है। चंडाल के भावहीन चेहरे और तेजी से चलते हाथों और क्रियाकलापों ने समझा दिया कि काया बिना जीव के किसी अर्थ की नहीं, जब तक हममें जीवन है तभी तक हम सार्थक । पथ के अनुभव ,कार्य ही महत्वपूर्ण होते। गंतव्य पर पहुंचने के बाद जो शेष होता वो यह कि हमने किनको खुद से जुड़ी ऐसी स्मृतियां देने के कारण दिए कि हमारे बाद सदभाव और सुख से हमें स्मरण करे। हम क्या थे,क्यों थे, सारे भाव ,सारे रस इस मणिकर्णिका में आकर समाप्त हो जाते हैं।

हां बनारस में रस है..... जो मोह से मसान तक के सत्य के बीच का पथ है। जीवन मोह और माया के बीच झूलता है,पर अगर इसमें कर्तव्य भी सम्मिलित हो तो मसान हमें डराता नहीं, बल्कि संतुष्टि देता की हां इस देह में जीव के रूप में हमारी यात्रा सार्थक रही है। मैं भी बनारस के इस रूप से विशेष रूप में सम्मोहित हुई, जहां एक घाट में जीवन के उत्सव सजे हुए थे और दूसरे घाट में मुक्ति के साधन। 

मैं अपनी बिटिया का चेहरे के नेपथ्य में देख रही थी,जलती हुई चिताओं की अग्नि की लाल ,पीली और नारंगी आभा को। मोह के पीछे मसान दिख रहा था। 

समझ आ रहा था कि क्यों हम मानवों के लिए विश्वनाथ ने मोक्ष के लिए यह स्थान दिया । यहां एक कदम पर मोह से मसान तक हम माप सकते हैं। 


मणिकर्णिका मृत्यु का पर्याय नहीं है। यह पर्याय है जीवन की संतुष्टि की, देह की मृत्यु होती है ,आत्मा की नहीं। आत्मा अगर संतुष्ट तो काल चक्र के जीवन मृत्यु के क्रम से बाहर निकल जाती। अगर अपने जीवन में हर रस ,हर कर्त्तव्य को हमने अगर पूर्ण निष्ठा और सत्यता से जिया तो मोक्ष मिलना अनिवार्य है। गंतव्य तक पहुंचने पर यदि हम संतुष्ट हो जाते तो देह का मोह वापस हमें इस चक्र में नहीं लाता। यही पूर्णता ; काशी / वाराणसी / बनारस का मूल है। 


ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते,

 पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते,

 ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका 

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