स्वाधीनता केवल सामाजिक गुण नहीं है। यह एक दृष्टिकोण है,व्यक्ति के मानस की एक दशा। हम कहते हैं कि समाज हमें स्वतंत्रता नहीं देता; पर समाज कैसे दे??? हमीं तो अपने दृष्टिकोण से समाज बनाते हैं। मैं अपने आप को किसी विशेष नियम से बद्ध नहीं मानती। मेरा मन स्वाधीनता पर कायम है। वो कहाँ मानता है ,हमारे ही बनाए ; छद्म आवरण से ढके ,मौखिक किन्तु मान्य नियम ,जो समाज के रूप में हम भी दूसरों पर आरोपित करते हैं।
तो क्यों ना मैं अपने प्रयासों के लिए सजग होऊं। सफलता......??? मिलेगी या नहीं!!!! क्यों नही जब स्वाधीन मन से ईमानदार प्रयास होंगे तो क्या जग में कुछ ऐसा है, जो नही साबित किया जा सकता, जो अप्राप्त रह जाए।
बस उस वक़्त याद रखना होगा कि कहीं स्वाधीनता सिर्फ दिखावा ना बन जाए। मन से उस स्थिति को उतनी ही दृढ़ता से महसूस करना अनिवार्य होगा,जितना कि जीवन और उसके बाद मृत्यु का क्रम। उसके लिए समाज के नियमों की ओर नहीं ताकना होता। वो अपरिहार्य है, अनिवार्य भी, अजेय भी और किसी अन्य चरण द्वारा अनाधिकृत भी ।
मन को आकाश करना सरल है। पर उस आकाश पर यकीन करना उतना ही दुष्कर। निश्चित तौर पर हम स्वयं की मान्यताओं को नकारेंगे। खुद से लड़ेंगे, खुद के अंदर एक समाज को जन्म देकर स्वाधीनता से डरेंगे। पर स्वाधीनता तो आत्मा है ,आसमान है ,वो भाव जो नियमों से परे भी अस्तित्व में है ,और सत्य भी है। तो गर उस सत्य को महसूस करना है तो तोड़ने होंगे स्व - प्रतिबंध, महसूस करना होगा आत्मा को , विचार को , अनुभूति को एक बन्द दायरे से परे होकर । खत्म करना होगा मैं को "अहम्" में जगाने के लिए। क्योंकि सत्य तो यही है कि #अंत_ही_आरम्भ_है।
#अहम्_ब्रम्हास्मि 🙏🙏
#ब्रह्मनाद
#डॉ_मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी
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