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Thursday, June 16, 2016

फूल पत्ती कवियत्री

एक मुक्तक , जिसे गद्य या पद्य विधा से अलग भाव से पढियेगा। हाँ इसमें रस और प्रवाह का पूर्णतः अभाव है। ये कविता नही आत्मकथा है,एक फूल -पत्ती कवियत्री का।
सुधार सुझाव आमंत्रित।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
कल्पनाएं अनंत की ,,,
पर दुबके होते हैं ,
एक कमरे के कोने में।।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
सपने सजाते हैं ,पलकों पर।
पर बेझिल होती हैं ,
छुप के रोती हुई ,
आंसुओं के बोझ से।।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
सहेजती कोमल भाव,
सजाती ख्याल फूलों से,
जीती हैं रोज ,
कांटो सी सच्चाई।।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
तुम्हारे अमर्यादित हास्य की,
एकमात्र नायिका,
भोगती हैं,
कई पीड़ित सम्बन्ध ।।
हम फूल पत्ती कवियत्री।।
नापते हैं ,ख्यालों में दुनिया,
हम सिमटे होते हैं,
बस दो जोड़े "सामानांतर" ,
दीवारों से। ।
हम फूल पत्ती कवियत्री,
परोसते रूमानी मुक्तक,
मुस्काते हैं तस्वीर में,
और गढ़ते एक,
गुड़िया सी छवि।।
कभी जी कर देखना,
इच्छाओं को समर्पण का,
जामा पहनाकर।
हम फूल पत्ती कवियत्रियों ,
का सच ...
खिड़की से दृश्य को,
दुनिया समझती।
और हक़ में हमारे बस,
एक टुकड़ा ,आकाश का,,,
और एक कतरा धूप।।
(डॉ. मधुलिका)

2 comments:

  1. शानदार भाव .. मेरे एक बचपन के अंग्रेज़ी के टीचर कहते थे..बच्चों कविता में भाव की प्रधानता होती है..शब्दों की नहीं..

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    1. संजय जी आभार , भाव ही शब्द को सार्थकता देते हैं, इसलिए भाव को प्रधानता देती हूँ.

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