पेज

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

मरने से पहले जीना सीख ले


(चित्र गूगल से साभार )


#जिजीविषा


#life_is_not_a_bed_of_roses 


जीवन क्या है? जन्म से मृत्यु तक का सफर..... एक लंबा अरसा ..जिसे किसी नियमित दिनचर्या के तहत व्यतीत किया जाता है। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो रुकिए ,मैं चाहती हूँ आप इस लेख को जरूर पढ़ें। शायद नज़रिया ही बदल जाए। 


समस्या ,दुख, तकलीफ ,रोग ....... कौन है जिसकी जिंदगी में इन शब्द से परिचित नहीं........!! जवाब होगा - कोई भी नहीं।  जिंदगी सकारात्मक और नकारात्मक परिस्थिति या ऊर्जा के बीच एक पेंडुलम की तरह गति करती है। पर कई बार हमारे जीवन मे कठिन परिस्थिति ,समस्या या बीमारी इतनी हावी हो जाती हैं की हम जीने की चाह खोने लगते। दिलासा , सलाह सब बेमानी से लगने लगते। दूसरों को देखकर खुद की स्थिति की तुलना हताशा और बढ़ा जाते। प्रश्न उठते की ये हमारे साथ ही क्यों हुआ???? 

     इसका जवाब भी मिलना असम्भव। पर जो घट गया उसके कारण ढूंढते रहने से क्या समस्या हल हो जाएगी .......???? नहीं, तो कोसना ,रोना और अवसाद से बेहतर है कि जिंदगी को हम सकारात्मक नज़रिये से देखना शुरू करें। पर कैसे.......?????  चलिए आपको कुछ बताती हूँ। 


मैं आदत के मुताबिक अक्सर यू - ट्यूब पर शार्ट मूवी या सब्सक्राइब चैनल के वीडियोज देखती रहती। एक दो दिन पहले स्क्रॉल डाउन करते हुए अचानक एक वीडियो क्लिक हो गया। अनमनी सी मैं उसे बदलने वाली थी ,पर उसमे एक शब्द ने मुझे रोक लिया। शब्द था #जिजीविषा । जिसका अर्थ है - जीने की प्रबल इच्छा /जीने की उत्कट इच्छा। 


वीडियो एक बच्ची *"गैबी शुल"* का था। 9 साल की उम्र में कैंसर के चलते उसका एक पैर घुटने के पास से काटना पड़ा । कीमोथेरेपी आदि के बाद उसे नकली पैर/ प्रोस्थेटिक लिंब लगाया गया। पर इस लड़की की चाह सिर्फ जीवन बिताना नहीं थी। इसकी चाह थी जीवन को अपनी इच्छा अनुरूप भरपूर जीना। अपने एक सुंदर सपने को इसी जीवन मे पूरा करना। उसकी जिंदगी उसे शारीरिक अक्षमता और बीमारी के कारण एक चुनौती के रूप में मिली। उसकी चाह ने उसे जिंदगी के प्रति नज़रिया और उद्देश्य दिया। 

वो लड़की अब एक बैले डान्सर है। एक ऐसी बैले डांसर जिसका एक पैर घुटने के ऊपर से नहीं है। पैरों पर सन्तुलन ,उनके द्वारा बनती विभिन्न मुद्राएं, लय एवम गति के साथ तारतम्य इस प्रोस्थेटिक लिंब के साथ .............हां, बहुत दुष्कर था ये काम और  परिस्थिति विषम । पर उसने हार ना मानी........और जिजीविषा जीत गई,उसकी अक्षमता पर। और यही वजह बनी ;मृत्यु से पहले #जीवन जीने की । 

आज गैबी सफल और प्रोफेशनल डांसर है। किशोरी गैबी अपने अदम्य साहस और जीवन के प्रति प्रबल इच्छाशक्ति के चलते अपनी साथी डांसर के साथ उतनी ही दक्षता और लयबद्धता से कदम मिलाती ,जितनी सम्भवतः दोनों पैरों से सक्षम कोई अन्य डांसर। उनका परिवार , उनकी प्रशिक्षिका और साथी कलाकार भी इसके लिए उसे भरपूर सहयोग करते। पर ये सफलता तब तक सम्भव नहीं होती जब तक गैबी की जिजीविषा ने विजय ना पाई होती। 


एक 6 साल की बच्ची ( 6 की उम्र में बीमारी ने असर दिखाया था) कैंसर जैसी बीमारी से जूझते हुए सम्भवतः टूट ही गई होगी.... शायद उसने किस्मत को कोसा भी होगा..... शायद ईश्वर से प्रश्न भी किये होंगे। किस डांसर के शरीर का वो हिस्सा ही अलग हो जाना जो उसकी उस कला विशेष का  अनिवार्य आधार है ..... । किन्तु गैबी ने हार ना मानी । जीवन एक बार मिलता और अगर उस कमज़ोर स्थिति में वो हर जाती तो शायद मरने से पहले ही हर पल मौत को जीती। पर उस मासूम सी बच्ची को पता था कि मौत अटल है , ध्रुव सत्य है,टाली नही जा सकती, एक दिन आएगी ही...और जो घट गया उसे भी बदला नहीं जा सकता तो क्यों ना हर पल में जिंदगी भर दी जाए। हर गुजरते पल में अपने सपने जी लिए जाएं। 

गैबी उस जिंदगी को जीना सीख चुकी है ,जो उसे कभी मौत से बदतर लगी होगी, इसीलिए अब मौत के बाद भी वो जियेगी। उसके जीवन के प्रति चाह ने उसे मिसाल बना दिया है। जिंदगी के बाद भी वो उदाहरण के रूप में हर बार के जिक्र के साथ जिंदा रहेगी । 

संसार मे कोई भी अमर नहीं है। पर मरने के बाद वही याद किये जाते ,जो जीवन सिर्फ काटते नहीं ,बल्कि "जी" जाते हैं। 

सिर्फ गैबी ही नहीं कई अन्य मशहूर लोगों के उदाहरण भी हमारे पास हैं ,जिन्होंने जिंदगी में मिली कठिनतम चुनौतियों को अपनी उत्कट आकांक्षा से जीता है। 


#अल्बर्ट_आइंस्टीन - (पहचान बताने की जरूरत है क्या ??) 

#स्टीफ़ेन_हॉकिन्स - मशहूर वैज्ञानिक  ।

#सुधा_चन्द्रन - शास्त्रीय शैली नृत्यांगना,अभिनेत्री ।

#अरुणिमा_सिन्हा- प्रोस्थेटिक लिंब के सहारे माउंट एवरेस्ट फतेह। 

#गिरीश_शर्मा - 2 साल की उम्र में हादसे में पैर खोने के बाद भी बैडमिंटन चैम्पियन बने। पैरालम्पिक में गोल्ड मैडल। 


#जिया_भी_जाता_है_एक_जिंदगी_के_बाद ........इन सब उदाहरण के अलावा भी ऐसे कई नाम आपको मिल जाएंगे जिन्होंने जिंदगी से शिकायत के बजाय ,हादसों को खुद के लिए एक परीक्षा माना।  इस जज्बे के लिए  हर पल लड़ाई ली ; अपने दुख ,तकलीफ और समस्याओं से । यदि हम तकलीफ में है तो प्रयास करें किसी अन्य की तकलीफ को दूर करने का, हमारी जिंदगी में उदासी का घना कोहरा ,तो किसी को मुस्कान की किरण देने की कोशिश करिये। हम किसी रोग से पीड़ित तो खुद के साथ दूसरों को उससे लड़ने की हिम्मत बंधाइये।  हमारे जीवन मे जो कमी  हम महसूस करते ,प्रयास करना चाहिए कि हमारे माध्यम से  वो कमी किसी अन्य की जिंदगी में  पूर्ण हो जाए। किसी की मुस्कान से आप ये अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि किसने जिंदगी में क्या सहा ,कितनी परीक्षा दीं.......??? किसी की मुस्कान का मतलब ये भी हो सकता है कि जिंदगी तू आसमान कितने भी ऊंचे कर ले, चुनौतियों के मकाम कितने भी कठिन कर ले, मेरे जज़्बे ,मेरी जिजीविषा उसे जीत ही लेगें। 

तो बनाए रखिये खुद पर यकीन और #मरने_से_पहले_जीना_सीख_ले। 

#ब्रह्मनाद

©®✍️डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

शनिवार, 24 जनवरी 2026

संस्मरण - यादें बचपन की

 



 



संस्मरण - भाग 2 ; यादें बचपन की 


–------------------------ - ----- ------


तो लेडीज एंड लेडाज़ अररररर मेरा मतलब जेंटलमैन ,

 बचपन के कुछ वाकये जेहन से कभी नहीं मिटते.. कहने को तो कहा जाता है कि बचपन की बातें इंसान सामान्यतः भूल जाता है... स्थाई स्मृतियां बड़े होकर बनती हैं। पर यही वो वक्त होता जो हमारी नींव भी बना जाता।कभी हम कुछ ऐसा सीख जाते हैं जो ताउम्र हमें याद रखता, हमारे व्यक्तित्व का एक मजबूत हिस्सा बनकर । हां कुछ के लिए ये  स्थिति कमजोर हिस्सा भी साबित हो सकती हैं। फर्क पड़ता है कि आप किनके संपर्क में आए ..... आप किनसे मिले.... आपके अनुभव कैसे रहे।

ये प्रसंग है जब मैं कक्षा 11 में थी.... अवसर राज्यस्तरीय भाषण प्रतियोगिता( वर्षा नहीं बताऊंगी,अन्यथा आप लोग मेरी उम्र का अंदाजा लगा लेंगे) । इससे पहले मैं  कई उतार चढ़ाव और संघर्ष वाली परिस्थितियों के बीच "विनोबा भावे जन्मशती " के अवसर पर आयोजित जिला स्तरीय भाषण प्रतियोगिता जीत चुकी थी। ( इसके बारे में आपने पुराने संस्मरण में पढ़ा था) 


अगस्त में जिला स्तरीय प्रतियोगिता जीतने के बाद मैं राज्य स्तरीय प्रतियोगिता के लिए उत्साहित होकर जुट गई। पर मेरे पापा हमेशा मुझे टोकते की इसमें कुछ नही रखा,पढाई में कोताही नहीं  करो। खैर मेरी माता जी मुझे प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष सहयोग करती रहतीं। पर आशा के उलट भाषण प्रतियोगिता का बुलावा हम तक सितंबर में भी नही पहुंचा। मुझे भी ये सब ठन्डे बस्ते में गया मामला दिखने लगा। मन ही मन सोचने लगी की सरकारी खाना पूर्ती हुई है। 


मैं वापस अपनी दिनचर्या में रम गई। अगस्त से मेरे पापा की तबियत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। कुल मिलाकर घर में कमाने वाले वो इकलौते इंसान थे और वो भी अगस्त से बिस्तर में लगे हुए थे। पापा अधिवक्ता हैं। उनकी तबियत खराब मतलब कमाई का जरिया "शून्य"।


पैसा पानी की तरह बह रहा था ,पर वो ठीक होने का नाम नहीं ले रहे थे। डॉक्टर उनका मर्ज ही नही पकड़ पा रहे थे। अक्टूबर महीने तक तबियत में कोई सुधार नही। हम सबका मनोबल टूटा सा था। उसी बीच अचानक एक दिन लगभग दोपहर 2 बजे स्कूल के प्रभारी प्राचार्य ने मुझे बुलाकर कहा,जिला शिक्षाधिकारी कार्यालय से फ़ोन आया की तुम्हें कल सुबह भोपाल में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल होना है। सुनते ही मेरा उत्साह चरम पर पहुँच गया। किन्तु दुसरे ही क्षण सर ने ते कहा कि स्कूल में लिखित में ऐसा आदेश नही पहुंचा इसलिए तुम्हें भेजने की जिम्मेदारी हमारी नहीं। 


ना तो टी ए, डी ए का ना ही किसी टीचर को साथ भेजने की। समय भी इतना नहीं बचा था कि लगभग 2 घण्टे की दूरी में स्थित जिला कार्यालय में जाकर लिखित आदेश लाया जा सके। उमरिया से भोपाल जाने वाली ट्रेन 4.30 पर निकल जाती थी। तो ये पूरी स्थिति हमारे अनुकूल नहीं दिखी। घर में पापा की स्थिति मुझे पता थी ,इसलिए मैं मान चुकी थी की बेटा तू इस प्रतियोगिता में भाग नहीं ले पाएगी। फिर भी घर पहुँच कर माँ - पापा को हमने ये खबर दी। 


आशा के उलट पापा ने पहली बार मुझे उत्साहित करते हुए कहा कि तुम्हारा नाम वहां दर्ज होगा,तभी ये नोटिस जिला कार्यालय तक पहुंचा। और रही टी ए, डी ए की बात तो मैं तुम्हारा और तुम्हारे साथ जाने वाले टीचर का खर्च दूंगा। कम से कम इस मुकाम में पहुँचने के बाद तुम रुकोगी नहीं।


इसी बीच स्कूल प्रबंधन ने हमारी एक स्नेही मैडम को हमारे साथ जाने राजी कर लिया ,हाँ शर्त यही थी की खर्च हम ही वहन करेंगे। आनन-फानन तैयारी हुई,पर तब तक उमरिया से ट्रेन निकल चुकी थी। मैं फिर निराश सी रेलवे स्टेशन से लौटने लगी। तभी मेरे एक दूर के नानाजी जो स्टेट बैंक के मैनेजर थे वो अपनी गाड़ी से जबलपुर की ओर आ रहे थे। उन्होंने आवाज़ देकर हमें बुलाया और साथ चलने की पेशकश की। बस अँधा क्या चाहे ,दो आँखें। फिर एक बार हम आगे बढ़े ये सोचकर की शायद पहुँच जाएं। 


जबलपुर पहुँचते ही फटाफट टिकेट लेकर दौड़ते भागते ट्रैन पकड़ी गई। ये भाग्य ही था कि उस दिन आधे घण्टे देरी से निकली। अब मन आशा ,निराशा,उत्साह और पापा की चिंता से भाव मे डूब और तैर रहा था।सब सोचते सोचते आँख कब लगी पता ना चला। सुबह आँख भोपाल में खुली। 


पहली बार घर से ,अपनों से इतनी दूर एक प्रतियोगिता में । उत्साह की जगह एक अनजाने डर और अजनबी शहर के कौतूहल ने ले ली थी। हम सीधे रजिस्ट्रेशन स्थल पर पहुंचे। चूंकि हमारे पास लिखित कोई कागजात नहीं था इसलिए ये साबित करने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी की जिला स्तरीय के विजयी प्रतिभागी हम ही हैं। हमारे प्राचार्य महोदय ने आने से पहले एक विभागीय पत्र इस संदर्भ में पूरे घटनाक्रम के विवरण के साथ आयोजक मंडल के नाम लिख कर हमें दे दिया था। अंततः उस पत्र की वजह से मुझे प्रतियोगिता में स्थान मिल गया। 


पहला अवसर जब पूरे प्रदेश के लगभग हर जिले से प्रतिभागी साथ थे। उम्र में वहां मैं सबसे छोटी थी इसलिए जल्द ही वहां आए हुए अन्य प्रतिभागियों की छोटी बहन घोषित हो गई । पर अशोकनगर से महाविद्यालय स्तर के दो प्रतिभागी श्वेता जैन दीदी (निबंध) और श्रीवास्तव भैया (भाषण; नाम याद नही रहा अब ) से जल्द ही मेरा स्नेह प्रगाढ़ हो गया। 


इन सारे घटनाक्रम में मुझे भाषण तैयारी करने का अवसर न मिला। मैं डरी और आशंकित थी ,अपनी हार के लिए। 


नियत समय पर मुहैया बस द्वारा सभी प्रतिभागी संस्कृति भवन पहुँचे। पहले महाविद्यालय स्तर की प्रतियोगिताएं होना तय था। एक से एक प्रतिभासम्पन्न प्रतिभागियों को देख कर मेरा डर चरम पर पहुँच गया। सर्दी में भी मुझे पसीने छूटने लगे। मेरी असहज स्थिति को श्रीवास्तव भैया ने भांप लिया। तात्कालिक भाषण के शुरू होने से पहले उन्होंने मुझे हॉल से बाहर बुलाया। और फिर सर पर चपत लगा कर पूछे "गुड़िया ,डर रही है क्या" और मैं रो पड़ी। घर में पापा की स्थिति और सारा घटनाक्रम उन्हें रोते हुए बता दी। 


और अचानक उन्होंने बड़े प्यार से सर पर हाँथ रख कर मुझे बोले की बेटा पहली बात की तुझे जीतना है ,तेरे पापा के पहली बार तेरे पर विश्वास के लिए। दूसरी बात तू अगर जीत नहीं  सकी तो क्या कोई तुझे फांसी देगा? मेरे ना बोलते ही उन्होंने कहा सुन आज तुझे जीत का मंत्र देता हूँ ..... *जब किसी को सुनो तो सोचो की तुमसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। तुम शून्य हो।और जब तुम बोलो तो ये सोचना की सामने वाले शून्य हैं,उनको सिर्फ उतना ही पता है,जितना कि तुम बोलोगी ।

*दूसरी बात भाषण के पहले खड़े होकर भीड़ में  हर तरफ बैठे लोगों के चेहरे देखो,ताकि जब तुम बोलने लगो तो अचानक कोई तुम्हें कोई अजनबी ना लगे। 

*तीसरी बात लोगों को सुन कर सार निकाल कर भाषण दो। और अगर प्रतियोगिता के शीर्षक की कोई टैग लाइन है तो उसे बोलने में जरूर उपयोग करो।


मैं थोड़ी संयत होकर हॉल में गई। चूंकि सितंबर के बाद मैंने सम्बंधित साहित्य को एक बार भी नहीं पढ़ी थी। फिर भैया की बात को मान कर कान /दिमाग खोल कर भाषण सुनी। मेरे भाषणों में मैं कोशिश करती थी अंत किसी खास उद्धरण या पंच लाइन से हो,इस बार उसका अभाव होने वाला था । खैर मेरा नाम पुकारा गया और मैं मंच पर पहुँच कर उन्हीं मन्त्रों का अनुकरण की। बोलते बोलते समय सीमा का मुझे ध्यान ना रहा और वांर्निंग बेल ने मेरी तन्द्रा भंग की। और 2 सेकण्ड के लिए मैं फिर घबरा गई। मुझे2 मिनट में भाषण खत्म करना था । और मेरा ध्यान फिर उन भैया के चेहरे पर गया। उन्होंने मुस्कुराकर हम सबके कपड़े में टँके बैच पर इशारा किया ,और मैं समझ गई की मुझे पंच लाइन मिल गई। भाषण का अंत हुआ बैच पर लिखे आह्वान के साथ। और हॉल में बजती तालियों ने मुझे इतना यकीन दिला दिया की प्रतियोगिता जीतूं ना जीतूं ,लोगों के दिमाग में अपना स्थान जीत चुकी हूँ। 


कुछ देर बाद प्रतियोगिता के परिणाम में द्वितीय विजेता के रूप जब मेरा नाम पुकारा गया ,मैं रो पड़ी थी। उस दिन मुझे जो सबक मिले वो मुझे हर मंच में सफल सिद्ध करते गए। 


जिंदगी भी ऐसी ही है। मैं डरती हूँ इससे, पर जब मैं इसके हर पहलू को सोचकर ,आंख में आंख डालकर बोलूंगी तो इसे भी शून्य होकर मेरी बात को मानना होगा।


#ब्रह्मनाद 

©® डॉ मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

सोमवार, 19 जनवरी 2026

12/12/24











 तू मांगे एक सितारा चांद मै तेरे हांथ में रख दूंगा.... एक ट्रेडिंग गाने की ये पंक्ति सुनकर मुझे तुम्हारी याद आती है। हां सामान्यतः हर मां अपने बच्चे की हर ख्वाहिश अपने स्तर से भी ऊपर जाकर पूरा करना चाहती है.. मै भी। पर मैं ना सिर्फ तुम्हारी  ख्वाहिश को पूरा होते देखना चाहती हूं ,बल्कि यह भी चाहती हूं कि अपने साथ साथ तुम दूसरों के अरमानों को पूरा करने में समर्थ रहो।


जानती हूं कि तुमने हमेशा संघर्ष किया है। तुम जज्बे में हमेशा फाइटर थी। तुम्हारी सफलताएं उतनी आम नहीं जितनी किसी अन्य इंसान की हो सकती।तुम्हें बहुत मेहनत करनी होती है हर एक एक कदम पर खुद को साबित करने और अपनी कमजोरियों पर जीतने के लिए। तुम्हारे आने के बाद मैने एक नया जन्म लिया है। सच कहूं तो तुमने मुझे नए सिरे से गढ़ा। तुमने मुझे खुद की ताकत का भरोसा दिलाया। तुमने सिखाया कि मैं हार नहीं सकती,मुझे उस कमजोरी को जीतना होगा जो जीवन की प्रत्याशा खत्म कर सकती।मेरे जीवन में मां के अलावा तुमने मुझे "मै" बनाया। 

आज तुम अपने जीवन के नए साल में प्रवेश कर रही हो। होने को आज तुम्हारे बचपन के सालों का अंत है,पर वास्तव में तुम्हारा भोलापन ,सरलता, निश्छलता सदा तुम्हारे बचपन को जीवित रखेगा। तुम उतनी ही पावन और दैवीय हो जितना ईश्वर का स्वरूप। अन्य की दृष्टि का मुझे पता नहीं पर तुमने मेरे जीवन में आकर मुझे आम जीवन से ऊपर उठाकर खास मकसद दिया। 


हां तुम बहुत विशेष हो ,इसलिए नहीं कि तुम मेरी संतान हो, बल्कि इसलिए कि तुम बहुत से लोगों को आशा देती हो।

मेरी बच्ची आज तुम्हारे जन्मदिन पर मै यही दुआ करती हूं कि कई लोगों के लिए तुम सदा प्रेरणा बनकर रहो, उनकी आशाओं को तुम्हारे होने से बल मिले.... इस दुनिया की हर खुशी तुम्हारे नाम हो, और सफलता... मुझे पता है तुम अपने प्रयासों से हासिल कर ही लोगी। स्वस्थ रहो, यशस्वी हो, कर्म से जीवन सफल करो।


इस चेहरे की खुशी एक पल को भी कम ना हो, 

तुम्हारी आँखें दुख से एक पल भी नम ना हो,

दिन बदले ,माह बदले ,या बदलते रहे कई साल,

तुम्हारी खुशियों के मौसम एक पल को भी कम न हो।


जन्मदिन की शुभकामना मेरी लाडो अन्वेषा😘❤️👰🫅🤱🍬🎂🍫🎊🎉🎁।