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मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

सांझ की गोद में अकेला तारा

              

( छायाचित्र अंतर्जाल से साभार) 




दिन भर की भागदौड़, जिम्मेदारियों और भीतर-बाहर के अनगिनत शोर के बाद, जब साँझ धीरे-धीरे अपनी मुलायम बाँहें फैलाकर आकाश को समेटने लगती है, तब मैं अक्सर छत पर चली आती हूँ। यह समय जाने क्यों मुझे हमेशा अपने सबसे अधिक निकट लगता है। जैसे पूरा दिन दुनिया का होता है, और यह साँझ का धुँधलका केवल मेरा।तब दिन का कोलाहल  धीरे-धीरे थमने के लिए अचानक से बढ़ने लगता है और आकाश अपनी गहरी नीलिमा लिए धुँधली सुनहरी चादर ओढ़ने लगता है। उस नीरव क्षण में, जब चारों ओर एक मधुर एकांत उतर आता है, मेरी दृष्टि अनायास ही पश्चिमी आकाश के उस एकमात्र मासूम तारे पर ठहर जाती है। जो हर दिन न जाने कहाँ से चुपके से आकर आसमान के कोने में बैठ जाता है। वह तारा मुझे कभी सिर्फ़ तारा नहीं लगता। वह मुझे हमेशा किसी मासूम, भोले, नन्हे शिशु सा लगता है, जो अपनी मां की गोद में खेलते-खेलते दुनिया को पहली बार देख रहा हो। 


मैं उसे देर तक निहारती रहती हूँ। और वह भी अपनी निष्पाप टिमटिमाहट से जैसे मुझे ही देखता रहता है। वह तारा न जाने कब से मेरा मौन सहचर बन गया है। हमारे बीच कोई शब्द नहीं होते, फिर भी एक अनकहा संवाद निरंतर बहता रहता है। मैं कभी पलट जाती हूँ, कभी अपनी दृष्टि हटा लेती हूँ, पर वह नन्हा ज्योति-बिंदु अपनी टुकुर-टुकुर चितवन से जैसे मेरा पीछा नहीं छोड़ता।


उसकी वह भोली टिमटिमाहट मुझे किसी अबोध बालक की आँखों की याद दिलाती है, जो अपनी माँ की गोद में खेलते-खेलते अचानक किसी अनजान चेहरे को कौतूहल, विस्मय ,निष्कपट और निर्मल जिज्ञासा से निहारने लगता है। उसकी आँखों में जैसे एक मौन प्रश्न तैरता है ......"माँ, तुम्हारे अतिरिक्त भी क्या इस संसार में कोई और है?"


उस तारे को देख मुझे बार-बार यही अनुभूति होती है कि आकाश भी कभी-कभी मनुष्य की तरह भावुक हो उठता है। वह तारा मानो संध्या का वही नन्हा शिशु है, जो दिन के विशाल आँचल में छिपा रहता है और सांझ ढलते ही अपनी जिज्ञासु आँखें खोलकर संसार को देखना आरंभ करता है।

कितना अद्भुत है यह क्षण .... मैं पृथ्वी पर खड़ी, अपने एकांत के साथ;और वह आकाश की ऊंची गोद में, अपनी निस्संग चमक के साथ।उस क्षण मैं न जाने क्यों भीतर से भीग जाती हूँ।

एक तारा…....इतना छोटा, इतना अकेला… और फिर भी इतना अपना। कभी-कभी लगता है, वह तारा मुझे नहीं, मेरे भीतर की उस स्त्री को देखता है, जो दिन भर मुस्कुराती रहती है, सबका ध्यान रखती है, सबकी बातें सुनती है, सबके लिए उपस्थित रहती है… पर साँझ ढलते-ढलते अपने हिस्से का थोड़ा-सा एकांत चुपचाप समेटने छत पर चली आती है।धरती पर खड़ी उसे देखते-देखते जाने कब मैं अपने ही भीतर उतरने लगती हूँ।


शायद इसलिए वह तारा मुझे इतना प्रिय है।क्योंकि वह भी मेरी तरह भीड़ में नहीं, एकांत में चमकता है। दोनों ही अकेले, दोनों ही मौन, और दोनों ही एक-दूसरे के अस्तित्व को चुपचाप स्वीकारते हुए। हम दोनों का परिचय शब्दों से नहीं, अनुभूतियों से जन्म लेता है। वह तारा मेरे लिए अब केवल आकाश का एक प्रकाश-बिंदु नहीं रहा; वह मेरे संध्याकालीन एकांत का सबसे निष्कलुष, सबसे अबोध, और सबसे सच्चा साथी बन गया है।


सच तो यह है कि वह अकेला तारा अब आकाश का हिस्सा कम,मेरी साँझों का हिस्सा अधिक लगने लगा है।


#ब्रह्मनाद 

#डॉ_मधूलिका