( छायाचित्र गूगल से साभार)
सोते हुए बच्चे सचमुच इस सृष्टि की सबसे निष्कलुष और अनुपम कृति प्रतीत होते हैं। उनके शांत मुखमंडल पर ठहरी हुई वह कोमल आभा मानो ईश्वर की करुणा और निष्कपटता का साक्षात् स्पर्श हो। ऐसा लगता है जैसे सृजनहार ने मासूमियत को आकार देकर उसे श्वास दे दी हो, और फिर उसे संसार के कोलाहल से दूर, क्षण भर के लिए पूर्ण विश्राम में रख दिया हो।
उनकी बंद पलकें किसी गहन विश्वास की प्रतीक लगती हैं। वह विश्वास कि जगत सुरक्षित है, कि बाहरी जटिलताएँ अभी उनसे बहुत दूर हैं। उनके चेहरे पर फैली सहज निश्चिंतता यह आभास कराती है कि जीवन का वास्तविक स्वरूप चिंता, स्पर्धा और अपेक्षाओं में नहीं, बल्कि उस सरल विश्रांति में निहित है जहाँ मन किसी भी प्रकार के आडंबर से मुक्त होता है।
उन्हें देखते हुए प्रतीत होता है मानो समस्त समस्याएँ उसी क्षण अपना अस्तित्व खो देती हों। समय की गति भी धीमी हो जाती है। अनुभव होता कि जीवन का अर्थ किसी अन्य की प्रशंसा प्राप्त करने या अकारण पहचान के संघर्ष में नहीं, बल्कि उस मौन शांति में सिमट आता है ,जहाँ आत्मा स्वयं से मिलती है।
ऐसा लगता है कि निश्चिंतता कोई दुर्लभ उपलब्धि नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक अवस्था है जिसे हम अपने ही जटिल विचारों से दूर कर देते हैं।
शायद जीवन का सार भी उसी क्षण में छिपा है जब हम बिना किसी की बातों को मन पर आरोपित किए, अन्य के व्यवहारों को हृदय में बिना बोझ बनाए, सहज भाव से अपनी आंतरिक शांति का चयन कर सकें। जैसे सोता हुआ बच्चा संसार से कोई प्रश्न नहीं करता, कोई उत्तर नहीं खोजता, वह शून्य के जैसे विशिष्ट अस्तित्व में होता।जिसमें पूरी सृष्टि समाई होती है। और यही शून्य ,जीवन की अनंत पूर्णता है।
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#डॉ_मधूलिका
