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Sunday, November 26, 2017

साधिका की वेदना

सुनो ,मेरे विचार निरभ्र आकाश नहीं,ये है विदीर्ण ,अधकृत ,अपरिमित से ही सही ,पर इसे बान्धा हुआ है मैंने एक जाने पहचाने से निश्चित आकार में ।
सुनो मन मेरा कोई हिम स्खलित उच्छ्रंखल जल धारा नहीं, ये एक अंत सलिला सा है। जो कई सतहों से विवर्तन से गुजरता। क्या ये अलौकिक पयोधि का निश्चित प्रारब्ध पाएगा??
इन समस्त गुण दोष से प्रस्तर भिंनित मेरी अर्ध निम्लित दृष्टि ;विवर,आक्रांत ,निर्वापित वर्जना की सीमा से परे देखना चाह रही है। विपन्न भाव और म्लान स्मृति की स्वामिनी मैं ,अब चाह रही है एक प्रतष ,प्रतकर्य ,वैयक्तिक सन्निधाता।
बिल्कुल विपन्नाव की तीव्र वांछना होती एक सहज ,विपरिक्रान्त ,औदार्य प्रश्रय । सम्भवत: भंवर से लड़ती उसकी परिणीति भी यही शांति होती।
मेरी व्याकुल सी दृष्टि विस्तीर्ण भाव से भृंग बनकर निर्निमेष तुम्हें ही निहारती है। हे मधुसूदन , अब स्वीकार कर लो एक आराधिका के पार्थिव पूजन और प्रेमपगे भावों को। मुझे मोक्ष नहीं, भक्ति दो।

तुम्हारी साधिका की वेदना

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