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Thursday, July 12, 2012

सृजन

प्रकृति ने जब लिया आकार..
सृजन को मिलता वृहद विस्तार...
संवेदित मन जब हुआ साकार..
ह्रदय से उद्गम,स्नेह अपार..
उभरी एक ममतामयी आभा..
जीवन की एक नयी परिभाषा..

ईश्वर का है दिव्य अवतार...

जीवन में स्पंदित , माँ का प्यार 



(
मधुलिका )

2 comments:

  1. वाह !!! आपकी रचनाओ मे अनुपम श्रेणी में इसे में अव्वल सम्झता हूँ .. हर्दय से आभार ..
    सदा आशीष मिलाता रहे आपको " माँ शारदा का !!"

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    1. माँ शब्द ही ऐसा है की वो जहाँ भी जुड़ता है वो अपने आप उत्कृष्ट हो जाता है..धन्यवाद भाई

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