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Thursday, July 12, 2012

चांदनी



हर रात दबे पांव ,मेरे कमरे से गुजरती है चांदनी...


मेरी आहों की करवटों से ,अब डरती है चांदनी..

रोते हुए रातों में, कभी गुजारी थी हमने सदियाँ..

अब मेरे ही सायों में सिसकती है चांदनी ,,,

(मधूलिका )

2 comments:

  1. चमकती, चहकती, दमकती चांदनी सुनी थी...... ये कुछ नई सी है, ग़मगीन चांदनी...!!

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    1. हा हा हा हा उसका भाव तो स्थिर है ,ये तो हम इंसानों की फितरत है जो अपनी भावानुरूप ढाल कर देखना चाहते हैं

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